क्या इसे रचा गया था?
कोशिका—एक नाम, पर सबका अपना-अपना काम
जीवन की शुरूआत एक कोशिका या सैल (cell) से होती है जिसे ज़ाइगोट कहते हैं। यह इतनी छोटी होती है कि इसे देखने के लिए माइक्रोस्कोप की ज़रूरत होगी। इस एक कोशिका से 200 से ज़्यादा कोशिकाएँ बनती हैं जिनका आकार और साइज़ अलग-अलग होता है। हर कोशिका को एक काम दिया जाता है। इन अलग-अलग कामों से ही एक कमाल होता है। कुछ महीने बाद एक नन्हा-सा, प्यारा-सा बच्चा पैदा होता है! चलिए इस बारे में थोड़ा और पता करते हैं।
गौर कीजिए: एक ज़ाइगोट के DNA में पूरी जानकारी दी होती है कि एक बच्चा कैसे बनेगा। ज़ाइगोट DNA की कॉपी बनाकर दो कोशिकाओं में बँट जाता है। फिर दो से चार, चार से आठ, इस तरह कोशिकाएँ बढ़ती रहती हैं। शुरू-शुरू में ये दिखने में एक-जैसी होती हैं। पर फिर हर कोशिका अलग-अलग रूप लेने लगती है और अलग-अलग काम करने लगती है।
गर्भ में नए जीवन की शुरूआत होने के एक हफ्ते बाद, कोशिकाएँ दो समूहों में बँटने लगती हैं और उसके हिसाब से काम करने लगती हैं। कुछ कोशिकाएँ भ्रूण (embryo) का रूप ले लेती हैं तो दूसरी, प्लेसेन्टा (placenta) और टिशू (tissue) का रूप ले लेती हैं जिनकी मदद से भ्रूण बढ़ पाता है।
तीसरे हफ्ते के दौरान भ्रूण की कोशिकाएँ तीन परतों में बँट जाती हैं। बाहरी परत से बच्चे की नसें, मस्तिष्क, मुँह, त्वचा और दूसरी कोशिकाएँ बनती हैं। बीचवाली परत से किडनी, खून, माँस-पेशियाँ और दूसरे टिशू बनते हैं। और अंदरवाली परत से फेफड़े, ब्लैडर और पाचन-तंत्र बनता है।
जैसे-जैसे बच्चा बढ़ता है, कोशिकाएँ बँटकर 200 से ज़्यादा हो जाती हैं और हर कोशिका को पता होता है कि उसे कौन-सा रूप लेना है और क्या काम करना है
पूरे नौ महीने के दौरान, कुछ कोशिकाएँ अकेले या समूह में भ्रूण की एक जगह से दूसरी जगह जाकर अलग-अलग अंग बनाती हैं। दूसरी कोशिकाएँ एक-साथ इकट्ठा होकर अलग-अलग आकार लेने लगती हैं। जैसे, रस्सी का आकार, गोलाकार जिसमें गड्ढे पड़ते हैं या कागज़ की तरह चपटा। इन सबके लिए कोशिकाओं का आपस में ताल-मेल होना बहुत ज़रूरी है। एक मिसाल लेते हैं। जब एक बच्चे में खून पहुँचाने का नेटवर्क बनने लगता है, तो जिन कोशिकाओं ने मिलकर एक चपटा आकार लिया था, वे पाइप या ट्यूब जैसा आकार लेने लगती हैं। भ्रूण में एक-साथ कई जगहों पर ऐसा होता है। फिर ये ट्यूब पेड़ की शाखाओं की तरह फैल जाते हैं और आपस में जुड़कर वह नेटवर्क बनाते हैं।
जब तक एक बच्चा पैदा होता है, तब तक अरबों कोशिकाओं से उसके अलग-अलग अंग सही तरीके से, सही जगह पर और सही वक्त पर बन चुके होते हैं।
आपको क्या लगता है? एक कोशिका को कैसे पता है कि उसे कौन-सा रूप लेना है और क्या काम करना है? क्या उसमें इस काबिलीयत का खुद-ब-खुद विकास हुआ है? या फिर किसी ने इसे इस तरह रचा है?

