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नौजवानों के सवाल

क्या उन्हें हर बात बताना ज़रूरी है?

क्या उन्हें हर बात बताना ज़रूरी है?

 आपके मम्मी-पापा क्यों हर बात जानना चाहते हैं?

उनका कहना है कि उन्हें आपकी चिंता है! मगर आपको लगता है कि वे आप पर कुछ ज़्यादा ही नज़र रखते हैं, आपको अपनी मरज़ी से जीने ही नहीं देते। उदाहरण के लिए:

  • एरीन नाम की लड़की कहती है, “मेरे पापा बिना पूछे मेरा फोन ले लेते हैं, मेरा पासवर्ड माँगते हैं और फिर सब मैसेज पढ़ लेते हैं। जब मैं उन्हें रोकने की कोशिश करती हूँ तो उन्हें लगता है कि मैं उनसे कुछ छिपा रही हूँ।”

  • डनीज़, जो अब 20-22 साल की है बताती है कि उसकी मम्मी बड़े ध्यान से उसका फोन बिल चैक करती थीं। डनीज़ यह भी कहती है, “मम्मी हर नंबर देखकर पूछती थीं कि यह किसका है और इतनी देर मैंने उससे क्या बात की।”

  • कैला नाम की एक लड़की कहती है कि एक बार उसकी मम्मी ने उसकी डायरी पढ़ ली। वह कहती है, “उस डायरी में मैंने अपने दिल की कई बातें लिखी थीं, यहाँ तक कि उनके बारे में भी कुछ लिखा था! उस दिन के बाद से मैंने डायरी लिखना ही छोड़ दिया।”

सौ बात की एक बात: आपके मम्मी-पापा आपका भला चाहते हैं, इसलिए कभी वे आपके साथ सख्ती बरतते हैं तो कभी आपको ढील देते हैं। उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी कैसे निभानी है, यह बताना आपका काम नहीं। फिर भी कभी-कभार आपको लग सकता है कि वे आपके साथ कुछ ज़्यादा ही सख्त हो रहे हैं। परेशान मत होइए! ऐसे हालात का सामना करने के लिए आप अपनी तरफ से कुछ कर सकते हैं।

 आप क्या कर सकते हैं

कुछ मत छिपाइए। बाइबल बढ़ावा देती है कि हम “सब बातों में ईमानदारी से काम” करें। (इब्रानियों 13:18) अपने मम्मी-पापा के साथ भी ऐसा ही कीजिए। जब आप उनसे सच कहेंगे और कुछ नहीं छिपाएँगे, तो हो सकता है वे आपको और छूट देने के लिए तैयार हो जाएँ।

ज़रा सोचिए: क्या आपने साबित किया है कि वे आप पर भरोसा कर सकते हैं? क्या आप उनके बताए समय तक घर पहुँचते हैं? क्या आप उन्हें अपने दोस्तों के बारे में बताने से कतराते हैं? कुछ पूछने पर क्या आप घुमा-फिराकर उन्हें जवाब देते हैं?

“मैं अपने मम्मी-पापा को खुलकर बताती हूँ कि मेरी ज़िंदगी में क्या चल रहा है। मैं बिना हिचकिचाए उनके हर सवाल का जवाब देती हूँ। बदले में, वे मुझ पर भरोसा करते हैं और मेरी हर बात में दखल नहीं देते। इस तरह हम एक-दूसरे को खुश रख पाते हैं।”—डीलिया।

सब्र रखिए। बाइबल कहती है, “तुम क्या हो, इसका सबूत देते रहो।” (2 कुरिंथियों 13:5) दूसरों का भरोसा जीतने में वक्‍त लगता है, लेकिन आपकी मेहनत बेकार नहीं जाएगी।

ज़रा सोचिए: आपके मम्मी-पापा आपकी उम्र से गुज़र चुके हैं, इसलिए वे आपको समझ सकते हैं। क्या अब आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उन्हें क्यों आपकी ज़िंदगी में दिलचस्पी रहती है?

“मुझे लगता है कि मम्मी-पापा नहीं चाहते कि हमारी उम्र में उन्होंने जो गलतियाँ कीं, वही गलतियाँ हम भी दोहराएँ।”—डैनियल।

खुद को उनकी जगह रखिए। उनकी नज़र से देखने की कोशिश कीजिए। बाइबल कहती है कि एक भली पत्नी “अपने घरबार का ध्यान रखती है” और एक अच्छा पिता अपने बच्चों को ‘यहोवा की मरज़ी के मुताबिक सिखाता और मार्गदर्शन देता है।’ (नीतिवचन 31:27; इफिसियों 6:4, फुटनोट) अब आप ही बताइए, अगर उन्हें यह ज़िम्मेदारी पूरी करनी है तो क्या उनके लिए यह जानना ज़रूरी नहीं कि आपकी ज़िंदगी में क्या चल रहा है?

ज़रा सोचिए: अगर आप उनकी जगह होते और जानते कि इस कच्ची उम्र में क्या-क्या होता है, तो क्या आप अपने बेटे या बेटी से बिना कोई सवाल-जवाब किए उन्हें पूरी छूट देते?

“जब आप जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते हैं तब आपको लगता है कि मम्मी-पापा आपकी ज़िंदगी में दखल दे रहे हैं। लेकिन अब जब मैं बड़ा हो गया हूँ तो मैं समझ पाता हूँ कि वे ऐसा क्यों करते हैं, यह उनका प्यार है!”—जेम्स।