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मैं अपने ही लिंग के व्यक्‍ति की तरफ आकर्षित हूँ, क्या इसका मतलब मैं समलैंगिक हूँ?

मैं अपने ही लिंग के व्यक्‍ति की तरफ आकर्षित हूँ, क्या इसका मतलब मैं समलैंगिक हूँ?

नहीं, बिलकुल नहीं!

हकीकत: कई मामलों में देखा गया है कि अपने ही लिंग के व्यक्‍ति की तरफ आकर्षित होना सिर्फ कुछ समय के लिए होता है।

सोलह साल की लतिका के साथ भी ऐसा ही हुआ। एक समय ऐसा था जब वह एक लड़की की तरफ आकर्षित हुई थी। वह कहती है, “जब मैं स्कूल में थी तो बायलॉजी क्लास में सिखाया गया कि जब हम जवानी का दौर शुरू करते हैं, तो हमारे शरीर के हार्मोन की मात्रा में ज़बरदस्त बदलाव होने लगता है। मुझे लगता है कि अगर नौजवानों को अपने शरीर से जुड़ी यह हकीकत पता चले, तो वे समझ पाएँगे कि अपने ही लिंग के व्यक्‍ति की तरफ आकर्षित होना बस कुछ समय के लिए होता है, फिर उन्हें यह चिंता नहीं सताएगी कि अब वे समलैंगिक बन गए हैं।”

सभी नौजवानों को चुनाव करना पड़ता है कि वे लैंगिकता या सेक्स के बारे में दुनिया की घिनौनी सोच अपनाएँगे या फिर पवित्र शास्त्र में दर्ज़ परमेश्‍वर की सोच

लेकिन तब क्या जब आपमें यह खिंचाव या आकर्षण कुछ समय बाद भी जारी रहे? क्या परमेश्‍वर का यह कहना कि समलैंगिकता गलत है, उसकी कठोरता को ज़ाहिर करता है?

अगर आप दूसरे सवाल का जवाब ‘हाँ’ में देते हैं तो आपको यह जानना चाहिए कि असल में यह बात इस गलत सोच पर आधारित है कि इंसानों को अपनी लैंगिक इच्छाएँ दबाकर नहीं रखनी चाहिए, बल्कि उन्हें पूरा करना चाहिए। लेकिन पवित्र शास्त्र हमें यकीन दिलाता है कि अगर हम सचमुच चाहें, तो गलत किस्म की लैंगिक इच्छाओं को अपने ऊपर हावी होने से रोक सकते हैं।—कुलुस्सियों 3:5.

पवित्र शास्त्र में लिखी यह बात बेतुकी नहीं है। क्यों? पवित्र शास्त्र, जो माँग अपने ही लिंग के व्यक्‍ति की तरफ आकर्षित होने वालों से करता है, वहीं माँग विपरीत लिंग की तरफ आकर्षित होनेवालों से करता है। वह माँग है, ‘नाजायज़ यौन-संबंध से दूर भागो।’ (1 कुरिंथियों 6:18) हकीकत यह है कि लाखों लोग जिनमें विपरीत लिंग की तरफ आकर्षित होने की भावना उठती है, वे पवित्र शास्त्र में दिए नियमों को लागू करके हर हालात में अपनी इच्छाओं को काबू में रख पाते हैं। जो लोग समान लिंग के व्यक्‍ति की तरफ आकर्षित होते हैं, वे भी अपनी इच्छाओं को काबू में रख सकते हैं, मगर तभी जब वे दिल से परमेश्‍वर के नियमों को लागू करना चाहें और उसे खुश करना चाहें।—व्यवस्थाविवरण 30:19.