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यहोवा के साक्षी

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नौजवानों के सवाल

कोई मुसीबत आ पड़े, तो उसका सामना कैसे करूँ?

कोई मुसीबत आ पड़े, तो उसका सामना कैसे करूँ?

मुसीबत किसी पर भी आ सकती है। शास्त्र में लिखा है, ‘न तो दौड़ में वेग दौड़नेवाले और न युद्ध में शूरवीर जीतते, वे सब समय और संयोग के वश में हैं।’ (सभोपदेशक 9:11) इनमें वे जवान लोग भी हैं, जिन्होंने मुसीबत का सामना किया है। उन्होंने यह कैसे किया? आइए दो लोगों से इस बारे में जानें।

 रिबेका

जब मैं 14 साल की थी, तब मम्मी-पापा का तलाक हो गया।

मैंने खुद से कहा, ‘नहीं, मेरे मम्मी-पापा का तलाक नहीं हो सकता। पापा को बस थोड़ा-सा वक्‍त चाहिए। वे मम्मी से बहुत प्यार करते हैं। वे उन्हें छोड़ नहीं सकते। और वे मुझे कैसे छोड़कर जा सकते हैं?’

इस बारे में किसी से बात करना बहुत मुश्‍किल था। मैं इस बारे में सोचना नहीं चाहती थी। हालाँकि उस वक्‍त मुझे पता नहीं चल रहा था, लेकिन मैं गुस्से में रहती थी। मैं बहुत परेशान रहने लगी और मुझे नींद भी नहीं आती थी।

जब मैं 19 साल की हुई, तब मम्मी की मौत हो गयी। उन्हें कैंसर हो गया था। वे मेरी सबसे अच्छी दोस्त थीं।

मम्मी-पापा के तलाक से मैं पहले से ही सदमे में थी। मम्मी की मौत से तो मैं पूरी तरह टूट गयी। मैं अब भी इस दुख से उबर नहीं पायी हूँ। नींद तो जैसे उड़ ही गयी है। मैं आज भी बहुत परेशान रहती हूँ।

लेकिन कुछ ऐसी बातें भी हैं, जिनसे मुझे बहुत मदद मिली है। जैसे, नीतिवचन 18:1 हमें खबरदार करता है कि हम खुद को दूसरों से अलग न करें। मैं यह सलाह मानने की पूरी कोशिश करती हूँ।

मैं यहोवा की साक्षी हूँ, इसलिए मैं बाइबल पर आधारित किताबें-पत्रिकाएँ पढ़ती हूँ। इनसे मुझे हौसला मिलता है। जब मेरे मम्मी-पापा का तलाक हुआ, तो मुझे एक किताब से बहुत मदद मिली। वह है, क्वेश्‍चन्स यंग पीपल आस्क—आंसर्स दैट वर्क। खासकर इस किताब के वॉल्यूम 2 में इस अध्याय से मुझे काफी मदद मिली, “क्या मैं ऐसे परिवार में खुश रह सकता हूँ, जिसमें अकेली माँ या अकेले पिता हों?”

मुझे अपनी चिंता या परेशानियों का सामना करने में मत्ती 6:25-34 से काफी मदद मिलती है। इनमें से 27वीं आयत में यीशु ने कहा, “तुममें ऐसा कौन है जो चिंता कर एक पल के लिए भी अपनी ज़िंदगी बढ़ा सके?”

मुसीबतें तो हम सब पर आती हैं। लेकिन मैंने अपनी मम्मी से सीखा कि मुसीबतें आने पर हम जिस तरह उनका सामना करते हैं, वह बहुत मायने रखता है। उन्होंने बहुत-से दुख झेले, पहले तलाक, फिर जानलेवा बीमारी। लेकिन इस दौरान उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्हें परमेश्‍वर पर अटूट विश्‍वास था और आखिरी साँस तक उनका विश्‍वास कमज़ोर नहीं हुआ। उन्होंने मुझे यहोवा परमेश्‍वर के बारे में जो सिखाया, वह सब मैं कभी नहीं भूलूँगी।

ज़रा सोचिए: मुसीबतें आने पर आपको बाइबल और बाइबल पर आधारित किताबें-पत्रिकाएँ पढ़ने से कैसे मदद मिल सकती है?—भजन 94:19.

 कोर्डेल

जब मैं 17 साल का था, तब मैंने पापा को आखिरी साँस लेते देखा। उनसे बिछड़ने पर मुझे इतना दुख हुआ कि मैं बता नहीं सकता। मुझे इतना दुख कभी नहीं हुआ।

मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि अब वे नहीं रहे। ऐसा लग रहा था कि उस चादर में मेरे पापा नहीं, कोई और ही है। मैंने खुद से कहा, ‘वे कल उठ जाएँगे।’ मुझे बहुत खाली-खाली सा लग रहा था। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ।

हमारे परिवार में सभी यहोवा के साक्षी हैं। जब पापा की मौत हुई, तब हमारे इलाके के दूसरे साक्षियों ने हमें बहुत सहारा दिया। उन्होंने हमें खाना खिलाया, हमारे घर रुके। उन्होंने हमारा बहुत खयाल रखा और ऐसा काफी समय तक किया। इससे मेरा यकीन और बढ़ गया कि यहोवा के साक्षी ही सही मायने में यीशु की बतायी राह पर चलते हैं।—यूहन्‍ना 13:35.

शास्त्र में लिखी एक बात से मुझे बहुत हौसला मिला। वह 2 कुरिंथियों 4:17, 18 में लिखी है, “हालाँकि हमारी दुःख-तकलीफें पल-भर के लिए और हल्की हैं, ये हमारे लिए ऐसी अपार महिमा पैदा करती हैं जो बेमिसाल है और हमेशा तक कायम रहती है। इस दौरान हम अपनी नज़र दिखायी देनेवाली चीज़ों पर नहीं, बल्कि अनदेखी चीज़ों पर टिकाए रखते हैं। इसलिए कि जो चीज़ें दिखायी देती हैं वे कुछ वक्‍त के लिए हैं, मगर जो दिखायी नहीं देतीं वे हमेशा कायम रहती हैं।”

खासकर 18वीं आयत से मुझे बहुत हिम्मत मिली। अपनी मौत से पहले पापा ने जो तकलीफ सही, वह कुछ वक्‍त के लिए थी, लेकिन परमेश्‍वर ने जिस सुनहरे भविष्य का वादा किया है, वह हमेशा के लिए है। पापा की मौत के बाद मैंने सोचा कि मुझे अपनी ज़िंदगी कैसे बितानी चाहिए और अपने लक्ष्यों को पाने के लिए क्या करना चाहिए।

ज़रा सोचिए: अगर आप पर कोई मुसीबत आ पड़े, तो ऐसे में आपको अपने लक्ष्यों के बारे में दोबारा सोचने में कैसे मदद मिल सकती है?—1 यूहन्‍ना 2:17.