रोमियों 9:1-33

9  मैं मसीह में सच कहता हूँ, मैं झूठ नहीं बोल रहा, इसलिए कि मेरा ज़मीर मेरे साथ पवित्र शक्‍ति में गवाही देता है,  कि मुझे गहरा दुःख है और मेरे दिल में ऐसा दर्द उठता है जो थमने का नाम नहीं लेता।  काश ऐसा होता कि अपने भाइयों और रिश्‍तेदारों के बजाय, मैं वह शापित जन ठहरता जो मसीह से दूर हो गया है और जिनसे मेरा खून का रिश्‍ता है उनके बजाय मुझे नाश किया जाता।  ये इस्राएली हैं, जिन्हें बेटों के तौर पर गोद लिया गया था। उन्हीं को महिमा, और करार और मूसा का कानून दिया गया था और पवित्र सेवा सौंपी गयी थी और उन्हीं से वादे किए गए थे।  हमारे पुरखे भी उन्हीं में से हैं और उन्हीं के वंश में से मसीह पैदा हुआ। परमेश्‍वर जो सबके ऊपर है, हमेशा-हमेशा के लिए धन्य हो। आमीन।  मगर ऐसा नहीं है कि परमेश्‍वर का वचन मानो नाकाम हो गया। इसलिए कि इस्राएल के वंश से निकलनेवाले सभी सचमुच “इस्राएली” नहीं हैं।  न ही अब्राहम के वंश के होने की वजह से वे सभी असल में उसके बच्चे हैं, मगर जैसा लिखा है: “जो ‘तेरा वंश’ कहलाएगा, वह इसहाक से होगा।”  इसका मतलब यह है कि जो खून के रिश्‍ते से अब्राहम के बच्चे हैं, वे असल में परमेश्‍वर के बच्चे नहीं, बल्कि जो परमेश्‍वर के वादे के मुताबिक उसके बच्चे हैं, वे ही अब्राहम का वंश माने जाते हैं।  क्योंकि वादे के शब्द ये थे: “मैं अगले साल इसी वक्‍त आऊँगा और सारा एक बेटे को जन्म देगी।” 10  मगर यह वादा सिर्फ इसी मामले में नहीं किया गया था, बल्कि तब भी किया गया था जब रिबका हमारे पुरखे इसहाक से गर्भवती हुई और उसके गर्भ में जुड़वाँ बच्चे थे। 11  और यह वादा उस वक्‍त किया गया जिस वक्‍त तक बच्चे पैदा भी न हुए थे, न ही उन्होंने कोई अच्छा-बुरा काम ही किया था, ताकि परमेश्‍वर के मकसद के मुताबिक चुनाव, कामों पर निर्भर न होकर उस परमेश्‍वर पर निर्भर रहे जो किसी का चुनाव करने के लिए उसे बुलाता है। 12  रिबका से कहा गया: “बड़ा, छोटे का दास होगा।” 13  ठीक जैसा लिखा भी है: “याकूब से मैंने बहुत प्यार किया, मगर एसाव से कम *।” 14  तो हम क्या कहें? क्या परमेश्‍वर अन्याय करता है? हरगिज़ नहीं! 15  इसलिए कि वह मूसा से कहता है: “मैं जिस किसी पर दया दिखाना चाहूँ उस पर दया दिखाऊँगा और जिस किसी पर करुणा करना चाहूँ उस पर करुणा करूँगा।” 16  तो फिर यह न तो चाहनेवाले पर निर्भर करता है, न ही दौड़ में शामिल होनेवाले पर, बल्कि परमेश्‍वर पर निर्भर करता है जो दया दिखाता है। 17  इसलिए कि शास्त्रवचन फिरौन के बारे में यह कहता है: “मैंने तुझे इस वजह से अब तक ज़िंदा छोड़ा है, ताकि तुझे मिसाल बनाकर अपनी शक्‍ति दिखाऊँ जिससे मेरा नाम सारी धरती पर मशहूर हो।” 18  तो फिर, वह जिस किसी पर चाहता है दया दिखाता है, मगर जिस किसी के मामले में चाहता है उसका दिल कठोर होने देता है। 19  इसलिए अब तू मुझसे कहेगा: “तो फिर क्यों वह इंसानों को अब तक दोषी ठहराता है? कौन है जो उसकी ज़ाहिर मरज़ी के खिलाफ खड़ा रह सका है?” 20  हे इंसान, तू कौन है जो परमेश्‍वर को पलटकर जवाब देने की जुर्रत करता है? क्या ढाली हुई चीज़ अपने ढालनेवाले से कह सकती है, “तू ने मुझे ऐसा क्यों बनाया?” 21  क्या कुम्हार को मिट्टी पर अधिकार नहीं कि वह एक ही लोंदे से एक बर्तन आदर के काम के लिए और दूसरा मामूली काम * के लिए बनाए? 22  तो क्या हुआ अगर परमेश्‍वर ने अपना क्रोध प्रकट करने और अपनी शक्‍ति दिखाने की इच्छा रखते हुए भी बड़ी सहनशीलता के साथ उन क्रोध के बर्तनों यानी दुष्ट लोगों को बरदाश्‍त किया जो नाश होने के लायक हैं? 23  क्या हुआ अगर उसने ऐसा इसलिए किया कि अपनी अपार महिमा दया के बर्तनों पर ज़ाहिर कर सके जिन्हें उसने महिमा पाने के लिए पहले से तैयार किया है, 24  यानी हम पर जिन्हें उसने न सिर्फ यहूदियों में से बल्कि गैर-यहूदी राष्ट्रों में से भी बुलाया है? 25  यह ऐसा ही है जैसा होशे की किताब में भी वह कहता है: “जो मेरे लोग नहीं हैं, उन्हें मैं ‘अपने लोग’ कहूँगा और जो मेरी प्यारी नहीं थी, उसे ‘प्यारी’ कहूँगा, 26  और जिस जगह उनसे कहा गया था कि ‘तुम मेरे लोग नहीं हो,’ वहाँ वे ‘जीवित परमेश्‍वर के बेटे’ कहलाएँगे।” 27  इतना ही नहीं, यशायाह इस्राएल के बारे में पुकारकर यह कहता है: “इस्राएल के बेटों की गिनती चाहे समुद्र की रेत के कणों जितनी अनगिनत क्यों न हो, मगर उनमें थोड़े ही हैं जिन्हें बचाया जाएगा। 28  इसलिए कि यहोवा उन लोगों से जो धरती पर जी रहे हैं, हिसाब लेगा और बड़ी तेज़ी से यह काम पूरा करेगा।” 29  साथ ही, जैसे यशायाह ने पहले कहा था: “अगर सेनाओं का यहोवा हमारे लिए एक वंश न छोड़ता, तो हम बिलकुल सदोम की तरह हो जाते और हमारा हाल अमोरा जैसा कर दिया जाता।” 30  तो फिर हम क्या कहें? यही कि गैर-यहूदी राष्ट्रों के लोग परमेश्‍वर की मंज़ूरी पाने की कोशिश नहीं कर रहे थे, फिर भी परमेश्‍वर उन्हें अपनी मंज़ूरी देता है क्योंकि उनमें विश्‍वास है। 31  लेकिन इस्राएल ने मूसा के कानून पर चलकर परमेश्‍वर की मंज़ूरी पाने की कोशिश की, मगर वे इस कानून का पूरी तरह पालन न कर सके। 32  वजह क्या थी? क्योंकि उन्होंने विश्‍वास से नहीं बल्कि अपने कामों से परमेश्‍वर की मंज़ूरी हासिल करनी चाही। उन्होंने “ठोकर खिलानेवाले पत्थर” पर ठोकर खायी। 33  जैसा लिखा भी है: “देख! मैं सिय्योन में ठोकर खिलानेवाला पत्थर और ठेस पहुँचानेवाली चट्टान रखता हूँ, मगर जो उस पर विश्‍वास करेगा वह निराश न होगा।”

कई फुटनोट

रोमि 9:13  शाब्दिक, “नफरत।”
रोमि 9:21  शाब्दिक, “अनादर।”