यूहन्‍ना 7:53–8:59

53  इसलिए वे अपने-अपने घर लौट गए। 8  मगर यीशु जैतून पहाड़ पर चला गया।  लेकिन, सुबह होने पर वह फिर मंदिर में आया और सब लोग उसके पास आने लगे। वह बैठ गया और उन्हें सिखाने लगा।  तब शास्त्री और फरीसी एक स्त्री को ले आए जो किसी गैर-आदमी के साथ व्यभिचार करते पकड़ी गयी थी। उन्होंने उस स्त्री को बीच में खड़ा करने के बाद  यीशु से कहा: “हे गुरु, यह स्त्री किसी गैर-आदमी के साथ संभोग करते पकड़ी गयी है।  मूसा ने कानून में हमें यह बताया है कि ऐसी स्त्रियों को पत्थरवाह कर मार डालना चाहिए। तू इस बारे में क्या कहता है?”  बेशक, उन्होंने यह बात उसकी परीक्षा करने के लिए कही थी, ताकि उन्हें उस पर इलज़ाम लगाने की कोई वजह मिल जाए। मगर यीशु झुककर उंगली से ज़मीन पर कुछ लिखने लगा।  मगर जब वे उससे पूछते ही रहे, तो उसने सीधे होकर उनसे कहा: “तुममें से जो पापी न हो, वह सबसे पहले इसे पत्थर मारे।”  और यह कहकर वह फिर से झुककर ज़मीन पर लिखता रहा।  मगर उसकी यह बात सुनकर, बड़ों से लेकर छोटों तक, एक-एक कर सभी वहाँ से जाने लगे और वह अकेला रह गया और वह स्त्री भी रह गयी जो उनके बीच खड़ी थी। 10  तब यीशु ने सीधे होकर उस स्त्री से कहा: “हे स्त्री, वे लोग कहाँ गए? क्या किसी ने भी तुझे सज़ा के लायक नहीं ठहराया?” 11  स्त्री ने कहा: “नहीं साहब, किसी ने नहीं।” यीशु ने कहा: “न ही मैं तुझे सज़ा के लायक ठहराऊँगा। चली जा, लेकिन फिर से पाप में न लग जाना।” 12  इसलिए यीशु ने फिर लोगों से बात की और कहा: “मैं दुनिया की रौशनी हूँ। जो मेरे पीछे चलता है वह हरगिज़ अंधकार में न चलेगा, मगर ज़िंदगी की रौशनी उसके पास होगी।” 13  इसलिए फरीसियों ने उससे कहा: “तू खुद अपने बारे में गवाही देता है, इसलिए तेरी गवाही सच्ची नहीं है।” 14  जवाब में यीशु ने उनसे कहा: “अगर मैं अपने बारे में खुद गवाही देता हूँ, तो भी मेरी गवाही सच्ची है, क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं कहाँ से आया हूँ और कहाँ जा रहा हूँ। मगर तुम नहीं जानते कि मैं कहाँ से आया हूँ और कहाँ जा रहा हूँ। 15  तुम इंसानी नज़रिए से न्याय करते हो, मगर मैं किसी का न्याय नहीं करता। 16  और अगर न्याय करता भी हूँ, तो मेरा न्याय सच्चा है, क्योंकि मैं अकेला नहीं हूँ बल्कि पिता मेरे साथ है जिसने मुझे भेजा है। 17  साथ ही तुम्हारे अपने कानून में यह लिखा है: ‘दो लोगों की गवाही सच्ची मानी जाए।’ 18  एक मैं खुद हूँ जो अपने बारे में गवाही देता हूँ, और दूसरा पिता है जिसने मुझे भेजा है, वह मेरे बारे में गवाही देता है।” 19  इसलिए वे उससे कहने लगे: “कहाँ है तेरा पिता?” यीशु ने जवाब दिया: “तुम न तो मुझे, न ही मेरे पिता को जानते हो। अगर तुम मुझे जानते, तो मेरे पिता को भी जानते।” 20  ये बातें उसने मंदिर में सिखाते वक्‍त खज़ाने के भवन के अहाते में कही थीं। मगर किसी ने उसे नहीं पकड़ा, क्योंकि उसका वक्‍त अभी नहीं आया था। 21  यीशु ने एक बार फिर उनसे कहा: “मैं जा रहा हूँ और तुम मुझे ढूँढ़ोगे, मगर फिर भी अपनी पापी हालत में मरोगे। जहाँ मैं जा रहा हूँ वहाँ तुम नहीं आ सकते।” 22  इसलिए यहूदी कहने लगे: “क्या यह खुद को मार डालेगा? क्योंकि यह कहता है: ‘जहाँ मैं जा रहा हूँ वहाँ तुम नहीं आ सकते।’ ” 23  इसलिए वह उनसे कहने लगा: “तुम नीचे के हो, मैं ऊपर का हूँ। तुम इस दुनिया के हो, मैं इस दुनिया का नहीं। 24  इसलिए मैंने तुमसे कहा कि तुम अपनी पापी हालत में मरोगे। क्योंकि अगर तुम इस बात पर यकीन नहीं करते कि मैं वही हूँ तो तुम अपनी पापी हालत में मरोगे।” 25  तब वे उससे कहने लगे: “तू है कौन?” यीशु ने उनसे कहा: “आखिर मैं तुमसे अब तक बात कर ही क्यों रहा हूँ, जबकि तुम्हें मेरी बात समझ ही नहीं आती? 26  तुम्हारे बारे में मुझे बहुत-सी बातें कहनी हैं, साथ ही बहुत-से मामलों का न्याय करना है। सच तो यह है कि जिसने मुझे भेजा है वह सच्चा है और जो बातें मैंने उससे सुनीं, वही मैं दुनिया में बता रहा हूँ।” 27  वे समझ न सके कि यीशु उनसे पिता के बारे में बात कर रहा है। 28  इसलिए यीशु ने कहा: “जब एक बार तुम इंसान के बेटे को ऊँचे पर चढ़ा चुके होगे, तो तुम जान लोगे कि मैं वही हूँ और मैं अपनी पहल पर कुछ भी नहीं करता, बल्कि जैसा पिता ने मुझे सिखाया है मैं ये बातें बताता हूँ। 29  जिसने मुझे भेजा है वह मेरे साथ है। उसने मुझे अकेला नहीं छोड़ा, क्योंकि मैं हमेशा वही करता हूँ जिससे वह खुश होता है।” 30  जब वह ये बातें बोल रहा था, तो बहुतों ने उस पर विश्‍वास किया। 31  तब यीशु उन यहूदियों से जिन्होंने उस पर यकीन किया था, कहने लगा: “अगर तुम मेरी शिक्षा में बने रहते हो, तो तुम सचमुच मेरे चेले हो। 32  तुम सच्चाई को जानोगे और सच्चाई तुम्हें आज़ाद करेगी।” 33  उन्होंने उसे जवाब दिया: “हम अब्राहम के वंशज हैं और कभी-भी किसी के गुलाम नहीं रहे। तो फिर तू कैसे कहता है कि ‘तुम आज़ाद हो जाओगे।’?” 34  यीशु ने उन्हें जवाब दिया: “मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ, हर कोई जो पाप करता है वह पाप का गुलाम है। 35  और गुलाम घर में हमेशा नहीं रहता, मगर बेटा हमेशा तक रहता है। 36  इसलिए अगर बेटा तुम्हें आज़ाद करे, तो तुम सचमुच आज़ाद हो जाओगे। 37  मैं जानता हूँ कि तुम अब्राहम के वंशज हो, मगर तुम मुझे मार डालने की ताक में हो, क्योंकि मेरी बातें तुम्हारे दिलों में जड़ नहीं पकड़तीं। 38  मैंने अपने पिता के यहाँ जो देखा है मैं वही कहता हूँ। जबकि तुम वही करते हो जो तुमने अपने पिता से सुना है।” 39  यहूदियों ने उसे जवाब दिया: “हमारा पिता तो अब्राहम है।” यीशु ने उनसे कहा: “अगर तुम अब्राहम के वंशज हो, तो अब्राहम के जैसे काम करो। 40  मगर तुम मुझे, एक ऐसे इंसान को मार डालने की ताक में हो, जिसने तुम्हें वह सच्चाई बतायी है जो मैंने परमेश्‍वर से सुनी है। अब्राहम ने तो ऐसा नहीं किया था। 41  तुम अपने पिता जैसे काम करते हो।” उन्होंने कहा: “हम व्यभिचार से पैदा नहीं हुए। हमारा एक ही पिता है, परमेश्‍वर।” 42  यीशु ने उनसे कहा: “अगर परमेश्‍वर तुम्हारा पिता होता, तो तुम मुझसे प्यार करते, क्योंकि मैं परमेश्‍वर की तरफ से भेजा गया हूँ और यहाँ हूँ। मैं अपनी मरज़ी से नहीं आया, बल्कि उसी ने मुझे भेजा है। 43  क्या वजह है कि मैं जो बोल रहा हूँ वह तुम नहीं जानते? इसलिए कि तुम मेरी बातों को स्वीकार नहीं कर सकते। 44  तुम अपने पिता शैतान से हो और अपने पिता की ख्वाहिशों को पूरा करना चाहते हो। वह शुरूआत से ही हत्यारा है और सच्चाई में टिका न रहा, क्योंकि सच्चाई उसमें है ही नहीं। जब वह झूठ बोलता है तो अपनी फितरत के मुताबिक ही बोलता है, क्योंकि वह झूठा है और झूठ का पिता है। 45  दूसरी तरफ, क्योंकि मैं तुम्हें सच्चाई बताता हूँ, तुम मेरा यकीन नहीं करते। 46  तुममें से कौन है जो यह साबित करे कि मैं पापी हूँ? और अगर मैं सच बोल रहा हूँ, तो फिर तुम मेरा यकीन क्यों नहीं करते? 47  जो परमेश्‍वर की तरफ से है वह परमेश्‍वर की बातें सुनता है। तुम इसीलिए मेरी बात नहीं सुनते, क्योंकि तुम परमेश्‍वर की तरफ से नहीं हो।” 48  जवाब में यहूदियों ने उससे कहा: “क्या हम सही नहीं कहते कि तू एक सामरी है और तेरे अंदर एक दुष्ट स्वर्गदूत है?” 49  यीशु ने जवाब दिया: “मेरे अंदर कोई दुष्ट स्वर्गदूत नहीं, मगर मैं अपने पिता का आदर करता हूँ, और तुम मेरा निरादर करते हो। 50  मैं अपने लिए महिमा नहीं चाहता, मगर एक है जो मेरे लिए यह चाहता है और वही न्यायी है। 51  मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ, अगर कोई मेरे वचन पर चलता है, तो वह कभी-भी मौत का मुँह न देखेगा।” 52  यहूदियों ने उससे कहा: “अब हम जान गए हैं कि तेरे अंदर एक दुष्ट स्वर्गदूत है। अब्राहम मर गया और भविष्यवक्‍ता भी मर गए। मगर तू कहता है, ‘अगर कोई मेरे वचनों पर चलता है, तो वह कभी-भी मौत का स्वाद न चखेगा।’ 53  क्या तू हमारे पिता अब्राहम से भी बढ़कर है? वह तो मर गया और भविष्यवक्‍ता भी मर गए। तू कौन होने का दावा करता है?” 54  यीशु ने जवाब दिया: “अगर मैं अपनी महिमा करूँ, तो मेरी महिमा कुछ भी नहीं। मगर मेरा पिता है जो मेरी महिमा करता है, वही जिसके बारे में तुम कहते हो कि वह तुम्हारा परमेश्‍वर है 55  और फिर भी तुमने उसे नहीं जाना है। मगर मैं उसे जानता हूँ। और अगर मैं यह कहूँ कि मैं उसे नहीं जानता, तो मैं तुम्हारे जैसा ठहरूँगा, यानी एक झूठा। मगर मैं उसे जानता हूँ और उसके वचन पर चलता हूँ। 56  तुम्हारा पिता अब्राहम मेरा दिन देखने की आशा से बेहद खुश था और उसने उसे देखा भी और बहुत खुश हुआ।” 57  इसलिए यहूदियों ने उससे कहा: “तू अब तक पचास साल का भी नहीं हुआ और फिर भी तू ने अब्राहम को देखा है?” 58  यीशु ने उनसे कहा: “मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ, इससे पहले कि अब्राहम वजूद में आया, मेरा वजूद रहा है।” 59  इस पर उन्होंने यीशु को मारने के लिए पत्थर उठा लिए। मगर वह छिप गया और मंदिर से बाहर निकल गया।

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