दूसरा शमूएल 22:1-51
22 यह गीत दाविद ने यहोवा के लिए तब गाया+ जब यहोवा ने उसे सभी दुश्मनों से और शाऊल के हाथ से छुड़ाया।+
2 दाविद ने कहा,
“यहोवा मेरे लिए बड़ी चट्टान और मज़बूत गढ़ है,+ वही मेरा छुड़ानेवाला है।+
3 मेरा परमेश्वर मेरी चट्टान है+ जिसकी मैं पनाह लेता हूँ,वह मेरी ढाल+ और मेरा उद्धार* का सींग* है, मेरा ऊँचा गढ़ है,+वह मेरे लिए ऐसी जगह है जहाँ मैं भागकर जा सकता हूँ,+ वह मेरा उद्धारकर्ता है।+तू ही मुझे ज़ुल्म से बचाता है।
4 मैं यहोवा को पुकारता हूँ जो तारीफ के काबिल हैऔर मुझे दुश्मनों से बचाया जाएगा।
5 मौत की लहरों ने मुझे चारों तरफ से आ घेरा,+निकम्मे आदमियों ने अचानक आनेवाली बाढ़ की तरह मुझे डरा दिया।+
6 कब्र के रस्सों ने मुझे घेर लिया,+मेरे सामने मौत के फंदे बिछाए गए।+
7 मुसीबत में मैंने यहोवा को पुकारा,+अपने परमेश्वर को मैं पुकारता रहा।
तब अपने मंदिर से उसने मेरी सुनी,मेरी मदद की पुकार उसके कानों तक पहुँची।+
8 धरती काँपने लगी, बुरी तरह डोलने लगी,+आकाश की नींव हिल गयी,+उसमें भयानक हलचल हुई क्योंकि उसका क्रोध भड़क उठा था।+
9 उसके नथनों से धुआँ उठने लगा,मुँह से भस्म करनेवाली आग निकलने लगी,+उसके पास से दहकते अंगारे बरसने लगे।
10 नीचे उतरते वक्त उसने आसमान झुका दिया,+काली घटाएँ उसके पैरों तले आ गयीं।+
11 वह एक करूब पर सवार होकर+ उड़ता हुआ आया।
वह एक स्वर्गदूत*+ के पंखों पर दिखायी दिया।
12 फिर उसने काली घनघोर घटाओं को,उनके अंधकार को अपना मंडप बनाया।+
13 उसके सामने ऐसा तेज था कि धधकते अंगारे निकल रहे थे।
14 फिर स्वर्ग से यहोवा गरजने लगा,+परम-प्रधान ने अपनी बुलंद आवाज़ सुनायी।+
15 उसने तीर चलाकर+ उन्हें तितर-बितर कर दिया,बिजली चमकाकर उनमें खलबली मचा दी।+
16 जब यहोवा ने डाँट लगायी और उसके नथनों से फुंकार निकली,+तो समुंदर का तल नज़र आने लगा,+धरती की बुनियाद तक दिखने लगी।
17 उसने ऊपर से हाथ बढ़ाकर मुझे थाम लिया,गहरे पानी से खींचकर बाहर निकाल लिया।+
18 उसने मुझे ताकतवर दुश्मन से छुड़ाया,+उन लोगों से जो मुझसे नफरत करते थे, मुझसे ज़्यादा ताकतवर थे।
19 वे मेरी मुसीबत के दिन मुझ पर टूट पड़े,+लेकिन यहोवा मेरा सहारा था।
20 वह मुझे निकालकर एक महफूज़* जगह ले आया,+उसने मुझे दुश्मनों से छुड़ाया क्योंकि वह मुझसे खुश था।+
21 यहोवा मेरी नेकी के मुताबिक मुझे फल देता है,+मेरी बेगुनाही* के मुताबिक इनाम देता है।+
22 क्योंकि मैं हमेशा यहोवा की राहों पर चलता रहा,मैंने अपने परमेश्वर से दूर जाने की दुष्टता नहीं की।
23 उसके सभी न्याय-सिद्धांत+ मेरे सामने हैं,मैं कभी उसकी विधियों से हटकर दूर नहीं जाऊँगा।+
24 मैं उसकी नज़रों में निर्दोष बना रहूँगा,+मैं हमेशा खुद को बुराई से दूर रखूँगा।+
25 यहोवा मेरी नेकी के मुताबिक मुझे फल दे,+मेरी बेगुनाही के मुताबिक इनाम दे जो उसने अपनी आँखों से देखी है।+
26 जो वफादार रहता है उसके साथ तू वफादारी निभाता है+जो सीधा है उसके साथ तू सीधाई से पेश आता है,+
27 जो खुद को शुद्ध बनाए रखता है उसे तू दिखाएगा कि तू शुद्ध है,+मगर जो टेढ़ी चाल चलता है उसके साथ तू होशियारी* से काम लेता है।+
28 तू नम्र लोगों को बचाता है,+लेकिन मगरूरों से तू अपनी आँखें फेर लेता है, उन्हें नीचे गिराता है।+
29 हे यहोवा, तू मेरा दीपक है,+यहोवा ही मेरे अँधेरे को उजाला करता है।+
30 तेरी मदद से मैं लुटेरे-दल का मुकाबला कर सकता हूँ,परमेश्वर की ताकत से मैं दीवार लाँघ सकता हूँ।+
31 सच्चे परमेश्वर का काम खरा* है,+यहोवा का वचन पूरी तरह शुद्ध है।+
वह उसकी पनाह लेनेवालों के लिए एक ढाल है।+
32 यहोवा को छोड़ और कौन परमेश्वर है?+
हमारे परमेश्वर के सिवा और कौन चट्टान है?+
33 सच्चा परमेश्वर मेरा मज़बूत किला है,+वह मेरे लिए सीधी* राह निकालेगा।+
34 वह मेरे पैरों को हिरन के पैरों जैसा बनाता है,मुझे ऊँची-ऊँची जगहों पर खड़ा करता है।+
35 वह मेरे हाथों को युद्ध का कौशल सिखाता है,मेरे बाज़ू ताँबे की कमान मोड़ सकते हैं।
36 तू मुझे अपनी उद्धार की ढाल देता है,तेरी नम्रता मुझे ऊँचा उठाती है।+
37 तू मेरे कदमों के लिए रास्ता चौड़ा करता है,मेरे पैर* नहीं फिसलेंगे।+
38 मैं अपने दुश्मनों का पीछा करूँगा और उन्हें नाश कर दूँगा,मैं उन्हें मिटाकर ही लौटूँगा।
39 मैं उन्हें मिटा दूँगा, उन्हें कुचल दूँगा ताकि वे उठ न सकें,+वे मेरे पैरों तले गिर जाएँगे।
40 तू मुझे ताकत देकर युद्ध के काबिल बनाएगा,+मेरे दुश्मनों को मेरे कदमों के नीचे कर देगा।+
41 तू मेरे दुश्मनों को मुझसे दूर भागने पर मजबूर करेगा,*+मुझसे नफरत करनेवालों का मैं अंत कर दूँगा।+
42 वे मदद के लिए पुकारते हैं, मगर उन्हें बचानेवाला कोई नहीं,वे यहोवा को भी पुकारते हैं, मगर वह उन्हें जवाब नहीं देता।+
43 मैं उन्हें कूटकर ज़मीन की धूल बना दूँगा,उन्हें चूर-चूर कर दूँगा और रौंदकर गलियों का कीचड़ बना दूँगा।
44 तू मुझे मेरे अपने लोगों के विरोध से भी बचाएगा,+
तू मेरी हिफाज़त करेगा ताकि मैं राष्ट्रों का मुखिया बनूँ,+जिन लोगों को मैं जानता तक नहीं वे मेरी सेवा करेंगे।+
45 परदेसी डरते-काँपते मेरे सामने आएँगे,+वे मेरे बारे में जो सुनते हैं, वह उन्हें उभारेगा कि मेरी आज्ञा मानें।
46 परदेसी हिम्मत हार जाएँगे,*अपने किलों से थरथराते हुए बाहर निकलेंगे।
47 यहोवा जीवित परमेश्वर है! मेरी चट्टान की तारीफ हो!+
परमेश्वर जो मेरे उद्धार की चट्टान है, उसकी बड़ाई हो!+
48 सच्चा परमेश्वर मेरी तरफ से बदला लेता है,+देश-देश के लोगों को मेरे अधीन कर देता है,+
49 वह मुझे दुश्मनों से छुड़ाता है।
तू मुझे मेरे हमलावरों से ऊँचा उठाता है,+मुझे ज़ुल्मी के हाथ से बचाता है।+
50 इसीलिए हे यहोवा, मैं राष्ट्रों के बीच तेरा शुक्रिया अदा करूँगा,+तेरे नाम की तारीफ में गीत गाऊँगा:*+
51 परमेश्वर शानदार तरीके से अपने राजा का उद्धार करता है,*+वह अपने अभिषिक्त जन से,दाविद और उसके वंश से सदा प्यार* करता है।”+
कई फुटनोट
^ या “मेरे ताकतवर उद्धारकर्ता।”
^ या “हवा।”
^ या “खुली।”
^ शा., “शुद्धता।”
^ या शायद, “नासमझी।”
^ या “परिपूर्ण।”
^ या “परिपूर्ण।”
^ या “टखने।”
^ या “तू मुझे मेरे दुश्मनों की पीठ दे देगा।”
^ या “मुरझा जाएँगे।”
^ या “संगीत बजाऊँगा।”
^ या “परमेश्वर अपने राजा के लिए बड़ी-बड़ी जीत दिलाता है।”
^ या “अटल प्यार।”

