लूका के मुताबिक खुशखबरी 10:1-42

10  इसके बाद प्रभु ने 70 और चेले चुने और जिस-जिस शहर और इलाके में वह खुद जानेवाला था, वहाँ उन्हें दो-दो की जोड़ियों में अपने आगे भेजा।+  2  वह उनसे कहने लगा, “बेशक, कटाई के लिए फसल बहुत है मगर मज़दूर थोड़े हैं। इसलिए खेत के मालिक से बिनती करो कि वह कटाई के लिए और मज़दूर भेजे।+  3  जाओ, मगर देखो! मैं तुम्हें मेम्नों की तरह भेड़ियों के बीच भेज रहा हूँ।+  4  अपने साथ पैसों की थैली मत लेना, न खाने की पोटली, न ही जूतियाँ लेना+ और रास्ते में किसी को नमस्कार मत करना।+  5  जब तुम किसी घर में जाओ तो पहले कहो, ‘इस घर में शांति हो।’+  6  अगर वहाँ कोई शांति चाहनेवाला हो, तो तुम्हारी शांति उस पर बनी रहेगी। लेकिन अगर न हो तो तुम्हारी शांति तुम्हारे पास लौट आएगी।  7  इसलिए उसी घर में रहो+ और जो कुछ वे तुम्हें दें, वह खाओ-पीओ+ क्योंकि काम करनेवाला मज़दूरी पाने का हकदार है।+ अपने ठहरने के लिए घर-पर-घर बदलते मत रहना। 8  जब तुम किसी शहर में जाओ और लोग तुम्हें अपने यहाँ ठहराएँ, तो वे तुम्हारे आगे जो खाना परोसें उसे खाओ,  9  वहाँ बीमारों को ठीक करो और प्रचार करो कि ‘परमेश्‍वर का राज तुम्हारे पास आ गया है।’+  10  लेकिन जब किसी शहर में लोग तुम्हें अपने यहाँ न ठहराएँ तो वहाँ के चौराहों में जाओ और कहो,  11  ‘तुम्हारे शहर की धूल तक जो हमारे पैरों में लगी है, हम पोंछ डालते हैं ताकि यह तुम्हारे खिलाफ गवाही दे।+ फिर भी याद रखो कि परमेश्‍वर का राज पास आ गया है।’  12  मैं तुमसे कहता हूँ कि उस दिन सदोम का हाल उस शहर के हाल से ज़्यादा सहने लायक होगा।+ 13  हे खुराजीन, धिक्कार है तुझ पर! हे बैतसैदा, धिक्कार है तुझ पर! क्योंकि जो शक्‍तिशाली काम तुममें हुए थे,+ अगर वे सोर और सीदोन में हुए होते, तो वहाँ के लोगों ने टाट ओढ़कर और राख में बैठकर कब का पश्‍चाताप कर लिया होता।+  14  इसलिए न्याय के वक्‍त, सोर और सीदोन का हाल तुम्हारे हाल से ज़्यादा सहने लायक होगा।  15  और कफरनहूम+ तू, तू क्या सोचता है कि तुझे आकाश तक ऊँचा किया जाएगा? तू तो नीचे कब्र में जाएगा! 16  जो तुम्हारी सुनता है, वह मेरी भी सुनता है।+ जो तुम्हें ठुकराता है, वह मुझे भी ठुकराता है। जो मुझे ठुकराता है, वह उस परमेश्‍वर को भी ठुकराता है जिसने मुझे भेजा है।”+ 17  इसके बाद वे 70 चेले खुशी-खुशी लौटे और कहने लगे, “प्रभु,* तेरा नाम लेने से दुष्ट स्वर्गदूत भी हमारे अधीन हो रहे हैं।”+  18  तब यीशु ने उनसे कहा, “मैं देख सकता हूँ कि शैतान बिजली की तरह आकाश से गिर चुका है।+  19  देखो! मैंने तुम्हें साँपों और बिच्छुओं को पैरों तले रौंदने और दुश्‍मन की ताकत पर काबू पाने का अधिकार दिया है+ और कोई भी चीज़ तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाएगी।  20  फिर भी इस बात से खुश मत हो कि स्वर्गदूत तुम्हारे अधीन किए जा रहे हैं, मगर इस बात पर खुशी मनाओ कि तुम्हारे नाम स्वर्ग में लिखे गए हैं।”+  21  उसी घड़ी वह पवित्र शक्‍ति से भर गया और खुशी से फूला नहीं समाया और बोला, “हे पिता, स्वर्ग और पृथ्वी के मालिक, मैं सबके सामने तेरी बड़ाई करता हूँ कि तूने ये बातें बुद्धिमानों और ज्ञानियों+ से तो बड़े ध्यान से छिपाए रखीं, मगर नन्हे-मुन्‍नों पर प्रकट की हैं। क्योंकि हे पिता, तुझे यही तरीका मंज़ूर है।+  22  मेरे पिता ने सबकुछ मेरे हाथ में सौंपा है। बेटा कौन है, यह कोई नहीं जानता सिवा पिता के। और पिता कौन है, यह कोई नहीं जानता सिवा बेटे के+ और उसके, जिस पर बेटा उसे प्रकट करना चाहे।”+ 23  तब उसने मुड़कर अपने चेलों से अकेले में कहा, “सुखी हैं वे जिनकी आँखें वह सब देखती हैं जो तुम देख रहे हो।+  24  क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ, बहुत-से भविष्यवक्‍ताओं और राजाओं ने चाहा था कि वह सब देखें जो तुम देख रहे हो, मगर नहीं देख सके+ और वे बातें सुनें जो तुम सुन रहे हो, मगर नहीं सुन सके।” 25  इसके बाद, एक आदमी जो कानून का अच्छा जानकार था, यीशु की परीक्षा लेने के लिए खड़ा हुआ। उसने कहा, “गुरु, हमेशा की ज़िंदगी का वारिस बनने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?”+  26  यीशु ने कहा, “कानून में क्या लिखा है? तूने क्या पढ़ा है?”  27  उसने जवाब दिया, “‘तुम अपने परमेश्‍वर यहोवा से अपने पूरे दिल, अपनी पूरी जान, अपनी पूरी ताकत और अपने पूरे दिमाग से प्यार करना,’+ और ‘अपने पड़ोसी से वैसे ही प्यार करना जैसे तुम खुद से करते हो।’”+  28  यीशु ने कहा, “तूने सही जवाब दिया। ऐसा ही करता रह और तू जीवन पाएगा।”+ 29  मगर उस आदमी ने खुद को नेक साबित करने+ के इरादे से यीशु से पूछा, “असल में मेरा पड़ोसी कौन है?”  30  यीशु ने कहा, “एक आदमी यरूशलेम से नीचे उतरकर यरीहो जा रहा था और लुटेरों ने उसे घेर लिया। उन्होंने उसके कपड़े उतरवा लिए और उसका सबकुछ छीनकर उसे बहुत मारा और अधमरा छोड़कर वहाँ से चले गए।  31  इत्तफाक से एक याजक उसी सड़क से नीचे जा रहा था, मगर जब उसने उस आदमी को पड़ा देखा, तो सड़क की दूसरी तरफ से निकल गया।  32  उसी तरह, जब एक लेवी भी वहाँ से जा रहा था और उसने उस आदमी को देखा, तो सड़क की दूसरी तरफ से निकल गया।  33  मगर फिर एक सामरी+ उस सड़क से गुज़रा और जब उसने उस आदमी को देखा तो उसका दिल तड़प उठा।  34  वह उसके पास गया और उसके घावों पर तेल और दाख-मदिरा डालकर पट्टियाँ बाँधी। फिर वह उसे अपने गधे पर लादकर एक सराय में ले आया और उसकी देखभाल की।  35  अगले दिन उसने सरायवाले को दो दीनार देते हुए कहा, ‘इस आदमी की देखभाल करना और इसके अलावा जो भी खर्च होगा, वह मैं लौटकर तुझे दे दूँगा।’  36  अब बता, तुझे क्या लगता है, उन तीनों में से किसने उस आदमी का पड़ोसी होने का फर्ज़ निभाया,+ जिसे लुटेरों ने घेर लिया था?”  37  उसने कहा, “वही जिसने उस पर दया की और उसकी मदद की।”+ तब यीशु ने उससे कहा, “जा और तू भी ऐसा ही कर।”+ 38  फिर वे आगे बढ़े और एक गाँव में गए। वहाँ मारथा+ नाम की एक औरत थी, जिसने उसे अपने घर मेहमान ठहराया।  39  उसकी एक बहन भी थी, जिसका नाम मरियम था। वह नीचे प्रभु के पैरों के पास बैठकर उसकी बातें* सुन रही थी।  40  मगर मारथा का ध्यान बहुत-सी तैयारियाँ करने में बँटा हुआ था। इसलिए वह यीशु के पास आयी और बोली, “प्रभु, क्या तुझे परवाह नहीं कि मेरी बहन ने सारा काम मुझ अकेली पर छोड़ दिया है? उससे बोल कि आकर मेरा हाथ बँटाए।”  41  प्रभु ने उससे कहा, “मारथा, मारथा, तू बहुत बातों की चिंता कर रही है और परेशान हो रही है।  42  असल में थोड़ी ही चीज़ों की ज़रूरत है या बस एक ही काफी है।+ जहाँ तक मरियम की बात है, उसने अच्छा भाग चुना है+ और वह उससे नहीं छीना जाएगा।”

कई फुटनोट

^ या “मालिक।”
^ या “शिक्षा (संदेश)।” शा., “उसका वचन।”

अध्ययन नोट

इसके बाद: लूक 10:1 से 18:14 तक जो घटनाएँ दर्ज़ हैं वे खुशखबरी की दूसरी किताबों में नहीं पायी जातीं। लेकिन इन अध्यायों में जिन विषयों पर जानकारी दी गयी है उनमें से कुछ विषय खुशखबरी की दूसरी किताबों में पाए जाते हैं। मुमकिन है कि जब लेखकों ने यीशु की शुरूआती सेवा के बारे में ब्यौरा लिखा तो उन्होंने उसमें इन विषयों को शामिल किया। ऐसा लगता है कि लूका ने जिन घटनाओं के बारे में लिखा, वे ईसवी सन्‌ 32 के पतझड़ में ‘डेरों (या छप्परों) के त्योहार’ के बाद घटी थीं। (अति. क7 देखें।) इस दौरान ज़ाहिर है कि यीशु ने इसराएल के दक्षिणी भाग में, यानी यरूशलेम और उसके आस-पास के इलाकों में, साथ ही यहूदिया और पेरिया ज़िलों में सेवा करने पर ध्यान दिया। उसने धरती पर आखिरी छ: महीने इन्हीं इलाकों में प्रचार किया।

70: कुछ शुरूआती हस्तलिपियों में यहाँ “72” लिखा है। इसलिए कुछ अनुवादों में यही संख्या लिखी है। लेकिन शुरू की कई अधिकृत हस्तलिपियों में “70” लिखा है। जैसे, चौथी सदी की कोडेक्स साइनाइटिकस और पाँचवीं सदी की कोडेक्स एलेक्ज़ैंड्रिनस और कोडेक्स एफ्रीमी सीरि रिसक्रिपटस। इस बारे में बाइबल के विद्वानों की अलग-अलग राय है, लेकिन संख्या के इतने छोटे फर्क से आयत का मतलब नहीं बदलता। बहुत-सी प्राचीन हस्तलिपियाँ और अनुवाद एक बात पर सहमत हैं, वह यह कि यीशु ने चेलों के बड़े समूह को दो-दो की जोड़ियों में बाँटकर प्रचार के लिए भेजा।

70 और चेले: ज़ाहिर है कि इनमें वे 12 प्रेषित शामिल नहीं थे, जिन्हें पहले ही प्रशिक्षण देकर प्रचार के लिए भेजा गया था।​—लूक 9:1-6.

जूतियाँ: ऐसा मालूम होता है कि यीशु यहाँ एक और जोड़ी जूती की बात कर रहा था क्योंकि उसने चेलों से कहा कि अपने साथ . . . न ही जूतियाँ लेना। लंबे सफर में एक और जोड़ी जूती ले जाना आम था, क्योंकि अगर एक जोड़ी घिस गयी या फीते टूट गए तो दूसरी जोड़ी पहनी जा सकती थी। यीशु ने पहले जब इसी से मिलती-जुलती हिदायतें दी थीं, तब चेलों से कहा था कि उनके पास जो जूतियाँ हैं उन्हें वे “कस [या “पहन”] लें।” (मर 6:8, 9) और जैसे मत 10:9, 10 में लिखा है, उसने चेलों को यह भी हिदायत दी कि उनके पास जो एक जोड़ी जूती है उसके अलावा वे दूसरी जोड़ी न लें।

किसी को नमस्कार मत करना: या “किसी को नमस्कार करके गले न लगाना।” कुछ हालात में यूनानी शब्द आस्पाज़ोमे (“नमस्कार करना”) में “नमस्ते” या “कैसे हो” कहने के अलावा, गले मिलना और फिर लंबी बातचीत करना शामिल होता था, खासकर जब दो दोस्त मिलते थे। यीशु अपने चेलों को बेरुखी से पेश आने का बढ़ावा नहीं दे रहा था। इसके बजाय वह ज़ोर दे रहा था कि उन्हें ध्यान भटकानेवाली बातों से दूर रहना चाहिए और अपने समय का अच्छा इस्तेमाल करना चाहिए। प्राचीन समय में भविष्यवक्‍ता एलीशा ने भी अपने सेवक गेहजी को ऐसी ही हिदायत दी थी। (2रा 4:29) यीशु और एलीशा ने जो काम सौंपे थे उन्हें जल्द-से-जल्द किया जाना था, ज़रा भी देर नहीं की जानी थी।

शांति चाहनेवाला: शा., “शांति का बेटा।” हालाँकि यूनानी में ये शब्द लिखे हैं, लेकिन इनमें शायद एक इब्रानी मुहावरे की झलक है। उस मुहावरे का मतलब है, शांति-पसंद या शांत स्वभाव का इंसान। इस संदर्भ में ये शब्द उस इंसान के लिए इस्तेमाल हुए हैं जो परमेश्‍वर के साथ सुलह करना चाहता है और ‘शांति की खुशखबरी’ सुनकर अपनाता है। इस वजह से परमेश्‍वर के साथ उसका शांति-भरा रिश्‍ता होता है।​—प्रेष 10:36.

अपने ठहरने के लिए घर-पर-घर बदलते मत रहना: एक बार पहले भी यीशु ने इससे मिलती-जुलती हिदायतें अपने 12 प्रेषितों को दी थीं। (मत 10:11; मर 6:10; लूक 9:4) अब वह 70 प्रचारकों को हिदायत दे रहा था कि जब वे किसी नगर में पहुँचें, तो जिस घर में उनकी मेहमान-नवाज़ी की जाती है, उन्हें उसी घर में रहना चाहिए। उन्हें घर-पर-घर बदलते नहीं रहना चाहिए, यानी ऐसे घर की तलाश नहीं करनी चाहिए जहाँ ज़्यादा सहूलियतें या मन-बहलाव के इंतज़ाम हों। अगर चेले यीशु की हिदायत मानते तो वे दिखाते कि उनके लिए आराम से ज़्यादा प्रचार काम मायने रखता है।

के हाल से ज़्यादा सहने लायक होगा: यीशु के शब्दों से लगता है कि सदोम और अमोरा के कुछ लोग उस दिन यानी न्याय के दिन के दौरान दोबारा ज़िंदा किए जा सकते हैं। (मत 10:15; 11:22, 24; लूक 10:14) अगर ऐसा हुआ तो वे उन “बुरे” लोगों में से होंगे जिन्हें “मरे हुओं में से ज़िंदा किया जाएगा।” (प्रेष 24:15) पर सदोम और अमोरा में रहनेवाला हर कोई ज़िंदा किया जाएगा कि नहीं, यह फैसला ‘सारी दुनिया के न्याय करनेवाले’ यहोवा और उसके बेटे के हाथ में है।—उत 18:25; यूह 5:22; कृपया यूह 5:29 का अध्ययन नोट भी देखें।

सोर और सीदोन: फीनीके के गैर-यहूदी शहर, जो भूमध्य सागर के तट पर बसे थे।​—अति. ख10 देखें।

आकाश: मत 11:23 का अध्ययन नोट देखें।

कब्र: मत 11:23 का अध्ययन नोट देखें।

मैं देख सकता हूँ कि शैतान बिजली की तरह आकाश से गिर चुका है: ज़ाहिर है कि यीशु यहाँ भविष्यवाणी कर रहा था कि शैतान को स्वर्ग से खदेड़ दिया जाएगा। मगर उसने यह बात ऐसे कही, मानो वह पूरी हो चुकी है। प्रक 12:7-9 के मुताबिक, भविष्य में स्वर्ग में युद्ध होगा और परमेश्‍वर के राज की शुरूआत होने पर शैतान को फेंक दिया जाएगा। यीशु यहाँ ज़ाहिर कर रहा था कि उस युद्ध में शैतान और उसके दुष्ट स्वर्गदूतों की हार पक्की है, क्योंकि परमेश्‍वर ने अभी-अभी 70 चेलों, यानी अपरिपूर्ण इंसानों को दुष्ट स्वर्गदूतों को निकालने की ताकत दी थी।​—लूक 10:17.

साँपों और बिच्छुओं: इस संदर्भ में यीशु ने इन जीवों का ज़िक्र लाक्षणिक तौर पर किया, जिनका मतलब है नुकसान पहुँचानेवाली बातें।​—यहे 2:6 से तुलना करें।

नन्हे-मुन्‍नों पर: मत 11:25 का अध्ययन नोट देखें।

यहोवा: यहाँ व्य 6:5 की बात लिखी है। मूल इब्रानी पाठ में इस आयत में परमेश्‍वर के नाम के लिए चार इब्रानी व्यंजन (हिंदी में य-ह-व-ह) इस्तेमाल हुए हैं।​—अति. ग देखें।

दिल . . . जान . . . ताकत . . . दिमाग: जो आदमी कानून का अच्छा जानकार था, वह यहाँ व्य 6:5 की बात कह रहा था। मूल इब्रानी पाठ में इस आयत में तीन शब्द इस्तेमाल हुए हैं, दिल, जान और ताकत। लेकिन यूनानी में लिखे लूका के ब्यौरे के मुताबिक, उस आदमी ने चार पहलू बताए: दिल, जान, ताकत और दिमाग। इससे पता चलता है कि यीशु के दिनों में माना जाता था कि व्य 6:5 के तीन इब्रानी शब्दों में यूनानी में बताए चारों पहलू शामिल हैं।​—ज़्यादा जानने के लिए मर 12:30 का अध्ययन नोट देखें।

अपनी पूरी जान: शब्दावली में “जीवन” देखें।

अपने पड़ोसी: मत 22:39 का अध्ययन नोट देखें।

एक सामरी: आम तौर पर यहूदी सामरियों को तुच्छ समझते थे और उनसे कोई नाता नहीं रखते थे। (यूह 4:9) यहाँ तक कि कुछ यहूदी किसी का अपमान करने और उसे नीचा दिखाने के लिए उसे “सामरी” कहते थे। (यूह 8:48) मिशना के मुताबिक एक रब्बी ने कहा, “जो सामरियों की रोटी खाता है, वह मानो सूअर का गोश्‍त खाता है।” (शेबीथ 8:10) बहुत-से यहूदी, सामरी की गवाही पर यकीन नहीं करते थे और न ही उससे किसी तरह की मदद लेते थे। सामरियों के प्रति यहूदियों के इस रवैए के बारे में यीशु जानता था, इसलिए उसने इस मिसाल में एक ज़बरदस्त सीख दी। इस मिसाल को अकसर अच्छे सामरी या दयालु सामरी की मिसाल कहा जाता है।

उसके घावों पर तेल और दाख-मदिरा डालकर पट्टियाँ बाँधी: वैद्य लूका ने यीशु की मिसाल में बतायी कई बारीक बातों के बारे में लिखा। इस तरह लूका ने बताया कि उस ज़माने में मरहम-पट्टी कैसे की जाती थी। घाव पर तेल और दाख-मदिरा डालना घरेलू इलाज माना जाता था। कभी-कभी घाव नरम करने के लिए तेल डाला जाता था। (यश 1:6 से तुलना करें।) दाख-मदिरा में कुछ औषधीय गुण हैं और इसे हलका रोगाणु-नाशक माना जाता है। लूका ने यह भी बताया कि घावों पर पट्टियाँ बाँधी गयी थीं ताकि वे नासूर न हो जाएँ।

एक सराय: यूनानी शब्द का शाब्दिक मतलब है, “ऐसी जगह जहाँ सबका स्वागत किया जाता है या अंदर आने दिया जाता है।” सराय में मुसाफिरों और उनके जानवरों के रुकने का भी इंतज़ाम होता था। सरायवाला मुसाफिरों की बुनियादी ज़रूरतें पूरी करता था। अगर उससे वहाँ किसी रुकनेवाले की देखभाल करने के लिए कहा जाए, तो वह शायद पैसा लेकर यह भी करता था।

दीनार: शब्दावली और अति. ख14 देखें।

वही जिसने उस पर दया की और उसकी मदद की: हो सकता है कि कानून के जानकार उस आदमी ने इस तरह जवाब इसलिए दिया हो क्योंकि वह “सामरी” कहने से झिझक रहा था। वजह चाहे जो भी हो, उसके जवाब और यीशु के आखिरी शब्दों से मिसाल की सीख साफ पता चलती है: सच्चा पड़ोसी वह होता है जो दया करता है।

एक गाँव: मुमकिन है कि यह बैतनियाह गाँव था, जो जैतून पहाड़ की दक्षिण-पूर्वी ढलान पर था और यरूशलेम से करीब 3 कि.मी. (2 मील) दूर था। (यूह 11:18 का अध्ययन नोट देखें।) इसी गाँव में मारथा, मरियम और लाज़र का घर था। जैसे गलील में सेवा करते वक्‍त यीशु कफरनहूम में रुकता था (मर 2:1), वैसे ही यहूदिया में सेवा करते वक्‍त वह बैतनियाह में रुकता था।

मारथा: यहाँ सिर्फ मारथा का ज़िक्र किया गया है कि उसने यीशु को अपने घर ठहराया। अकसर हर काम में मारथा ही पहल करती थी। (लूक 10:40; यूह 11:20) इससे पता चलता है कि वह शायद मरियम की बड़ी बहन थी।​—लूक 10:39.

असल में थोड़ी ही चीज़ों की ज़रूरत है या बस एक ही काफी है: कुछ प्राचीन हस्तलिपियों में सिर्फ इतना लिखा है: “लेकिन एक ही चीज़ ज़रूरी है।” इसलिए बाइबल के कुछ अनुवादों में यही शब्द पाए जाते हैं। मगर नयी दुनिया अनुवाद में जो लिखा है, उसका ठोस आधार हस्तलिपियों में पाया जाता है। चाहे किसी भी हस्तलिपि के शब्द सही माने जाएँ, यीशु की सलाह का मतलब एक ही है। वह यह कि परमेश्‍वर से जुड़ी बातों को पहली जगह दी जानी चाहिए। यह कहने के बाद यीशु ने मरियम की तारीफ की कि उसने परमेश्‍वर से जुड़ी बातों को पहली जगह देकर “अच्छा भाग” चुना है।

अच्छा भाग: या “सबसे बढ़िया भाग।” “भाग” का यूनानी शब्द मैरिस, सेप्टुआजेंट में खाने के सिलसिले में (उत 43:34; व्य 18:8) और लाक्षणिक तौर पर भी इस्तेमाल हुआ है (भज 16:5; 119:57)। मरियम के मामले में ‘अच्छे भाग’ का मतलब था, परमेश्‍वर के बेटे से यहोवा के बारे में सीखना।

तसवीर और ऑडियो-वीडियो

भेड़िया
भेड़िया

भेड़िए आम तौर पर रात को शिकार करते हैं। (हब 1:8) वे किसी से डरते नहीं, साथ ही बहुत खूँखार और लालची होते हैं। अकसर वे जितना खा सकते या उठाकर ले जा सकते, उससे ज़्यादा भेड़ों को मार डालते हैं। बाइबल के ज़माने में जानवरों, उनके स्वभाव और उनकी आदतों के बारे में अकसर लाक्षणिक तौर पर बात की जाती थी। अच्छे गुण या बुरे गुण बताने के लिए उनकी मिसाल दी जाती थी। जैसे, याकूब ने अपनी मौत से पहले जो भविष्यवाणी की, उसमें उसने बिन्यामीन के गोत्र के बारे में कहा कि वह भेड़िए (कैनिस लूपस ) की तरह निडर होकर लड़ेगा। (उत 49:27) लेकिन ज़्यादातर आयतों में भेड़िए का ज़िक्र बुरे गुण बताने के लिए किया गया है, जैसे लालच, क्रूरता और चालाकी। जिन लोगों की तुलना भेड़ियों से की गयी है, उनमें कुछ थे: झूठे भविष्यवक्‍ता (मत 7:15), मसीहियों के प्रचार का कड़ा विरोध करनेवाले (मत 10:16; लूक 10:3) और मंडली के अंदर से ही उठ खड़े होनेवाले झूठे शिक्षक जो मसीहियों के लिए खतरा थे (प्रेष 20:29, 30)। चरवाहे अच्छी तरह जानते थे कि भेड़िए उनकी भेड़ों के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं। एक बार यीशु ने कहा कि “मज़दूरी पर रखा गया आदमी” जब “भेड़िए को आते देखता है, तो भेड़ों को छोड़कर भाग जाता है।” मगर यीशु उस आदमी की तरह नहीं है जिसे “भेड़ों की परवाह नहीं होती।” इसके बजाय “वह अच्छा चरवाहा” है जो “भेड़ों की खातिर अपनी जान दे देता है।”​—यूह 10:11-13.

लाठी और खाने की पोटली
लाठी और खाने की पोटली

प्राचीन समय के इब्री लोग आम तौर पर अपने पास लाठी या डंडा रखते थे। यह कई तरह से काम में आता था, जैसे सहारे के लिए (निर्ग 12:11; जक 8:4; इब्र 11:21), बचाव या लड़ने के लिए (2शमू 23:21), दाँवने के लिए (यश 28:27) और जैतून के पेड़ झाड़ने के लिए ताकि फल गिर सकें (व्य 24:20; यश 24:13)। खाने की पोटली एक थैला होता था, जो आम तौर पर चमड़े का होता था। मुसाफिर, चरवाहे, किसान और दूसरे लोग इसे अपने कंधे पर टाँग लेते थे। इसमें खाना, कपड़े और दूसरी चीज़ें रखी जाती थीं। यीशु ने जब अपने प्रेषितों को प्रचार के लिए भेजा, तो उसने उन्हें लाठी और खाने की पोटली के बारे में भी हिदायतें दीं। प्रेषितों के पास जो चीज़ें थीं बस वही लेकर उन्हें जाना था और यहोवा उनका खयाल रखता। अगर वे कुछ और लेने की कोशिश करते तो प्रचार से उनका ध्यान भटक सकता था।​—यीशु की हिदायतों का क्या मतलब था, यह जानने के लिए लूक 9:3 और 10:4 के अध्ययन नोट देखें।

कफरनहूम, खुराजीन और बैतसैदा
कफरनहूम, खुराजीन और बैतसैदा

इस वीडियो में जो दृश्‍य दिखाया गया है वह ओफिर लुकआउट से लिया गया है जो गलील झील के उत्तर-पूर्वी किनारे पर है। जिस जगह को प्राचीन समय का कफरनहूम (1) माना जाता है, उससे करीब 3 कि.मी. (2 मील) दूरी पर ही खुराजीन (2) था। कफरनहूम में ही शायद यीशु उस वक्‍त रहता था जब उसने करीब दो साल गलील में बड़े पैमाने पर प्रचार किया था। प्रेषित पतरस और अन्द्रियास भी यहीं रहते थे। कर-वसूलनेवाले मत्ती का दफ्तर इसी शहर में या इसके आस-पास था। (मर 1:21, 29; 2:1, 13, 14; 3:16; लूक 4:31, 38) पतरस, अन्द्रियास और फिलिप्पुस पास के शहर बैतसैदा (3) के रहनेवाले थे। (यूह 1:44) यीशु ने बहुत-से चमत्कार इन तीन शहरों में या इनके आस-पास किए थे।​—अतिरिक्‍त लेख क7-घ, नक्शा 3ख और क7-च, नक्शा 4 देखें।

यरूशलेम से यरीहो जानेवाला रास्ता
यरूशलेम से यरीहो जानेवाला रास्ता

मुमकिन है कि इस छोटे-से वीडियो में दिखाया गया रास्ता (1), वही है जो प्राचीन समय में यरूशलेम से यरीहो जाता था। यह रास्ता 20 कि.मी. (12 मील) से भी ज़्यादा लंबा था और जहाँ पर इस रास्ते में मोड़ आता था वहाँ 1 कि.मी. (0.6 मील) खड़ी ढलान थी। इस वीरान और सुनसान रास्ते पर बहुत लूटमार होती थी, इसलिए यहाँ मुसाफिरों की हिफाज़त के लिए सैनिकों की एक चौकी होती थी। रोमी शहर यरीहो (2) उस जगह पड़ता था, जहाँ इस रास्ते पर यहूदिया का वीराना खत्म होता था। पुराना यरीहो शहर (3) रोमी शहर से करीब 2 कि.मी. (करीब 1 मील) दूर था।