मरकुस के मुताबिक खुशखबरी 7:1-37

7  अब फरीसी और कुछ शास्त्री जो यरूशलेम से वहाँ आए थे, उसके पास जमा हुए।+  उन्होंने देखा कि उसके कुछ चेले दूषित हाथों से यानी बिना हाथ धोए खाना खाते हैं।  (दरअसल फरीसी और सारे यहूदी अपने पुरखों की ठहरायी परंपराओं को सख्ती से मानते हैं। इसलिए वे तब तक खाना नहीं खाते जब तक कि कोहनी तक हाथ न धो लें।  और बाज़ार से लौटने पर वे तब तक नहीं खाते जब तक कि वे पानी से खुद को शुद्ध न कर लें। ऐसी कई और परंपराएँ उन्हें मिली हैं जिन्हें वे सख्ती से मानते हैं। जैसे प्यालों, सुराहियों और ताँबे के बरतनों को पानी में डुबकी दिलाना।)+  इन फरीसियों और शास्त्रियों ने यीशु से पूछा, “क्यों तेरे चेले हमारे पुरखों की परंपराएँ नहीं मानते और दूषित हाथों से खाना खाते हैं?”+  यीशु ने उनसे कहा, “यशायाह ने तुम कपटियों के बारे में बिलकुल सही भविष्यवाणी की थी, जैसा लिखा है, ‘ये लोग होंठों से तो मेरा आदर करते हैं, मगर इनका दिल मुझसे कोसों दूर रहता है।+  ये बेकार ही मेरी उपासना करते हैं क्योंकि ये इंसानों की आज्ञाओं को परमेश्‍वर की शिक्षाएँ बताकर सिखाते हैं।’+  तुम परमेश्‍वर की आज्ञाओं को छोड़ देते हो और इंसानों की परंपराओं को पकड़े रहते हो।”+  फिर उसने कहा, “तुम अपनी परंपरा को बनाए रखने के लिए कितनी चतुराई से परमेश्‍वर की आज्ञा टाल देते हो।+ 10  मिसाल के लिए, मूसा ने कहा था, ‘अपने पिता और अपनी माँ का आदर करना,’+ और ‘जो कोई अपने पिता या अपनी माँ को बुरा-भला कहता है* वह मार डाला जाए।’+ 11  मगर तुम कहते हो, ‘अगर एक आदमी अपने पिता या अपनी माँ से कहता है, “मेरे पास जो कुछ है जिससे तुझे फायदा हो सकता था वह कुरबान है (यानी परमेश्‍वर के लिए रखी गयी भेंट है),” तो यह गलत नहीं।’ 12  ऐसा करके तुम उसे अपने पिता या अपनी माँ के लिए कुछ भी नहीं करने देते।+ 13  इस तरह तुम अपनी परंपराएँ सिखाकर परमेश्‍वर के वचन को रद्द कर देते हो।+ तुम ऐसे बहुत-से काम करते हो।”+ 14  फिर उसने भीड़ को दोबारा अपने पास बुलाया और उनसे कहा, “तुम सब मेरी बात ध्यान से सुनो और इसके मायने समझो।+ 15  ऐसी कोई चीज़ नहीं जो बाहर से इंसान के अंदर जाकर उसे दूषित कर सके। मगर जो चीज़ें इंसान के अंदर से निकलती हैं, वे ही उसे दूषित करती हैं।”+ 16  — 17  जब वह भीड़ से दूर एक घर में गया, तो उसके चेले उस मिसाल के बारे में उससे सवाल पूछने लगे।+ 18  तब उसने चेलों से कहा, “क्या तुम भी उनकी तरह समझ नहीं रखते? क्या तुम नहीं जानते कि बाहर की कोई भी चीज़ जो इंसान के अंदर जाती है, उसे दूषित नहीं कर सकती? 19  क्योंकि वह उसके दिल में नहीं बल्कि उसके पेट में जाती है और फिर मल-कुंड* में निकल जाती है?” इस तरह उसने खाने की सभी चीज़ों को शुद्ध ठहराया। 20  इसके बाद उसने कहा, “इंसान के अंदर से जो निकलता है, वही उसे दूषित करता है।+ 21  क्योंकि इंसानों के अंदर से, उनके दिलों से ही ये बातें निकलती हैं:+ बुरे विचार, नाजायज़ यौन-संबंध, चोरी, कत्ल, 22  व्यभिचार, लालच, दुष्ट काम, धोखाधड़ी, निर्लज्ज काम, ईर्ष्या से भरी आँखें, निंदा, घमंड और मूर्खता। 23  ये सारी बुराइयाँ इंसान के अंदर से निकलती हैं और उसे दूषित करती हैं।”+ 24  वहाँ से उठकर यीशु सोर और सीदोन के इलाके में गया।+ वहाँ वह एक घर में गया और नहीं चाहता था कि कोई उसके बारे में जाने। फिर भी, वह लोगों की नज़र से छिप न सका। 25  वहाँ एक औरत थी, जिसकी छोटी बच्ची में दुष्ट स्वर्गदूत समाया था। जैसे ही यीशु वहाँ आया, उसके आने की खबर सुनकर वह औरत उसके पास आयी और उसके पैरों पर गिर पड़ी।+ 26  वह औरत* यूनानी थी और सीरिया प्रांत के फीनीके इलाके की रहनेवाली थी। वह उससे बिनती करती रही कि मेरी बेटी में से दुष्ट स्वर्गदूत निकाल दे। 27  मगर यीशु ने उससे कहा, “पहले बच्चों को जी-भरके खा लेने दो क्योंकि बच्चों की रोटी लेकर पिल्लों के आगे फेंकना सही नहीं।”+ 28  मगर औरत ने कहा, “सही कहा साहब, मगर फिर भी पिल्ले बच्चों की मेज़ से गिरे टुकड़े तो खाते ही हैं।” 29  यह सुनकर यीशु ने उससे कहा, “तूने जो यह बात कही है, इसलिए जा, दुष्ट स्वर्गदूत तेरी बेटी में से निकल चुका है।”+ 30  तब वह औरत अपने घर चली गयी और उसने देखा कि उसकी बच्ची बिस्तर पर लेटी है और दुष्ट स्वर्गदूत उसमें से निकल चुका था।+ 31  जब यीशु सोर के इलाके से निकला, तो वह सीदोन और दिकापुलिस के इलाके से होता हुआ वापस गलील झील पहुँचा।+ 32  यहाँ लोग उसके पास एक बहरे आदमी को लाए जो ठीक से बोल भी नहीं पाता था।+ उन्होंने यीशु से बिनती की कि वह अपना हाथ उस पर रखे। 33  यीशु उस आदमी को भीड़ से दूर अलग ले गया और उसके कानों में अपनी उँगलियाँ डालीं और थूकने के बाद उसकी जीभ को छुआ।+ 34  फिर उसने आकाश की तरफ देखा और गहरी आह भरकर उससे कहा, “एफ्फतह,” जिसका मतलब है “खुल जा।” 35  तब उस आदमी की सुनने की शक्‍ति लौट आयी+ और उसकी ज़बान खुल गयी और वह साफ-साफ बोलने लगा। 36  फिर यीशु ने उन्हें सख्ती से कहा कि यह सब किसी को न बताएँ।+ मगर जितना वह मना करता, उतना ही वे उसकी खबर फैलाते गए।+ 37  वाकई, लोग हैरान थे+ और कह रहे थे, “उसने कमाल कर दिया! वह तो बहरों और गूँगों को भी ठीक कर देता है।”+

कई फुटनोट

या “गाली देता है।”
या “शौचालय।”
या “वह औरत जन्म से।”

अध्ययन नोट

दूषित हाथों से यानी बिना हाथ धोए: मरकुस ने यहाँ और आयत 3 और 4 में जिस तरह शब्दों को समझाया, उससे उन लोगों को काफी मदद मिलती जो “दूषित हाथों” यानी हाथ धोने के यहूदी रिवाज़ से अनजान थे। (“मरकुस की किताब पर एक नज़र” देखें।) यह रिवाज़ साफ-सफाई को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि बस परंपरा पर चलने के खयाल से माना जाता था। बाद में बैबिलोनी तलमूद (सोताह 4) में बताया गया कि बिना हाथ धोए खाना, वेश्‍या के साथ संबंध रखने जैसा है। तलमूद यह भी कहता है कि जो लोग हाथ धोने की बात को गंभीरता से नहीं लेते उन्हें “दुनिया से मिटा” दिया जाएगा।

दूषित हाथों से यानी बिना हाथ धोए: मरकुस ने यहाँ और आयत 3 और 4 में जिस तरह शब्दों को समझाया, उससे उन लोगों को काफी मदद मिलती जो “दूषित हाथों” यानी हाथ धोने के यहूदी रिवाज़ से अनजान थे। (“मरकुस की किताब पर एक नज़र” देखें।) यह रिवाज़ साफ-सफाई को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि बस परंपरा पर चलने के खयाल से माना जाता था। बाद में बैबिलोनी तलमूद (सोताह 4) में बताया गया कि बिना हाथ धोए खाना, वेश्‍या के साथ संबंध रखने जैसा है। तलमूद यह भी कहता है कि जो लोग हाथ धोने की बात को गंभीरता से नहीं लेते उन्हें “दुनिया से मिटा” दिया जाएगा।

हाथ . . . धो लें: मूसा के कानून के मुताबिक, याजकों को वेदी के पास सेवा करने या भेंट के तंबू के अंदर जाने से पहले हाथ-पैर धोने होते थे। (निर्ग 30:18-21) लेकिन जैसे मर 7:2 के अध्ययन नोट में बताया गया है, यीशु के दिनों के फरीसी और दूसरे यहूदी बस परंपरा मानने के खयाल से खुद को शुद्ध करते थे। खुशखबरी की चार किताबों में से सिर्फ मरकुस की किताब में बताया गया है कि हाथ धोने के रिवाज़ में कोहनी तक हाथ धोए जाते थे।

खुद को शुद्ध . . . कर लें: कई प्राचीन हस्तलिपियों में इस आयत में यूनानी शब्द बपटाइज़ो (गोता लगाना; डुबकी लगाना) लिखा है, जो अकसर मसीही बपतिस्मे के लिए इस्तेमाल हुआ है। लेकिन लूक 11:38 में इस शब्द का मतलब है, यहूदी परंपरा के मुताबिक शुद्धिकरण के अलग-अलग रिवाज़ जो बार-बार माने जाते थे। दूसरी प्राचीन हस्तलिपियों में इस आयत (मर 7:4) में यूनानी शब्द रैनटाइज़ो इस्तेमाल हुआ है जिसका मतलब है, “छिड़कना; छिड़ककर शुद्ध करना।” (इब्र 9:13, 19, 21, 22) भले ही हस्तलिपियों में दो अलग शब्द इस्तेमाल हुए हैं, मगर मोटे तौर पर उनका मतलब एक ही है। वह यह कि यहूदी हर बार खाना खाने से पहले परंपरा के मुताबिक किसी-न-किसी तरह खुद को शुद्ध करते थे। यरूशलेम में पुरातत्ववेत्ताओं को ऐसे स्नान-कुंड मिले हैं जिनमें यहूदी लोग परंपरा के मुताबिक खुद को शुद्ध करते थे। इससे पता चलता है कि इस आयत में क्रिया बपटाइज़ो ज़्यादा सही है जिसका मतलब है, “डुबकी लगवाना।”

पानी में डुबकी दिलाना: शा., “बपतिस्मा देना।” यहाँ यूनानी शब्द बपटिस्मॉस यह बताने के लिए इस्तेमाल हुआ है कि यीशु के दिनों में कुछ कट्टर यहूदी शुद्धिकरण के कौन-से रिवाज़ मानते थे। वे खाने से पहले प्यालों, सुराहियों और ताँबे के बरतनों को बपतिस्मा देते थे यानी उन्हें पानी में डुबोते थे।

मंदिर के खज़ाने: मंदिर की शायद वह जगह जहाँ ‘दान-पात्र’ रखे जाते थे। (यूह 8:20) मुमकिन है कि यह जगह ‘औरतों के आँगन’ में थी जहाँ 13 दान-पात्र रखे थे। (अति. ख11 देखें।) माना जाता है कि मंदिर में खज़ाने का गोदाम भी था जिसमें इन दान-पात्रों का पैसा लाकर रखा जाता था।

कुरबान: यूनानी शब्द कोरबान इब्रानी शब्द कुरबान से लिया गया है जिसका मतलब है, “एक चढ़ावा।” यह इब्रानी शब्द लैव्यव्यवस्था और गिनती की किताबों में बहुत बार आया है। यह शब्द दो तरह के चढ़ावों के लिए इस्तेमाल हुआ है, एक जिसमें खून शामिल था (जैसे जानवरों की बलि) और दूसरा जिसमें खून शामिल नहीं था (जैसे अनाज, रोटी वगैरह)। (लैव 1:2, 3; 2:1; गि 5:15; 6:14, 21) इसी से जुड़ा शब्द कोरबानस मत 27:6 में आया है जिसका अनुवाद ‘मंदिर का खज़ाना’ किया गया है।​—मत 27:6 का अध्ययन नोट देखें।

परमेश्‍वर के लिए रखी गयी भेंट: शास्त्री और फरीसी सिखाते थे कि एक व्यक्‍ति जब पैसा, ज़मीन-जायदाद या कोई और चीज़ परमेश्‍वर को अर्पित कर देता है तो वह मंदिर की हो जाती है। फिर भी इस परंपरा के मुताबिक, वह उन चीज़ों को खुद के लिए इस्तेमाल कर सकता था, मगर माँ-बाप की देखभाल के लिए नहीं। इसलिए ज़ाहिर है कि कुछ लोग अपने माँ-बाप की देखभाल करने की ज़िम्मेदारी से बचने के लिए अपनी संपत्ति परमेश्‍वर को भेंट कर देते थे।​—मर 7:12.

कुछ हस्तलिपियों में यहाँ लिखा है: “अगर किसी के सुनने के कान हों तो सुने।” लेकिन ये शब्द प्राचीन और अहम हस्तलिपियों में नहीं पाए जाते। इसलिए ज़ाहिर है कि ये शब्द मरकुस के मूल पाठ का हिस्सा नहीं हैं। लेकिन इनसे मिलते-जुलते शब्द मर 4:9, 23 में दर्ज़ हैं जो परमेश्‍वर की प्रेरणा से लिखे शास्त्र का हिस्सा हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि किसी नकल-नवीस ने मर 4:9, 23 से मेल खाते शब्द इस आयत में लिख दिए, क्योंकि उसे लगा कि आयत 14 को ध्यान में रखते हुए ये शब्द यहाँ आने चाहिए।​—अति. क3 देखें।

इस तरह उसने खाने की सभी चीज़ों को शुद्ध ठहराया: मूल यूनानी पाठ में ये शब्द जिस तरह लिखे हैं उससे यह भी समझा जा सकता है कि ये शब्द यीशु ने कहे थे। लेकिन आम तौर पर माना जाता है कि ये शब्द मरकुस ने लिखे थे। उसने यह समझाने के लिए ये शब्द लिखे कि यीशु ने इससे पहले जो कहा उसका क्या मतलब है। यीशु के कहने का यह मतलब नहीं था कि अब यहूदी ऐसी चीज़ें खा सकते हैं जिन्हें मूसा के कानून में अशुद्ध कहा गया है। वह कानून यीशु की मौत तक लागू रहा। इसी संदर्भ को ध्यान में रखकर हमें मरकुस के शब्दों को समझना चाहिए। (लैव, अध्या. 11; प्रेष 10:9-16; कुल 2:13, 14) परंपराओं पर ज़ोर देनेवाले धर्म गुरुओं को लगता था कि अगर एक इंसान शुद्धिकरण के लंबे-चौड़े रिवाज़ न माने तो खाने की “शुद्ध” चीज़ों से भी वह अशुद्ध हो सकता था। इससे ज़ाहिर होता है कि मरकुस, यीशु की कही बात को इस तरह समझा रहा था कि एक यहूदी महज़ इस बात से अशुद्ध नहीं हो जाता कि उसने इंसानी परंपराओं के मुताबिक हाथ धोए बिना “शुद्ध” चीज़ें खा ली हैं। इसके अलावा, कुछ लोगों का मानना है कि मरकुस बता रहा था कि आगे चलकर यीशु की बात मसीहियों पर लागू होगी। जब मरकुस ने खुशखबरी की किताब लिखी तब तक पतरस वह दर्शन देख चुका था जिसमें इस आयत के मिलते-जुलते शब्द उससे कहे गए थे। पतरस से कहा गया कि “परमेश्‍वर ने” खाने-पीने की उन चीज़ों को “शुद्ध किया है,” जो मूसा के कानून के मुताबिक एक वक्‍त पर अशुद्ध मानी जाती थीं। (प्रेष 10:13-15) लोग चाहे जो भी मानें, एक बात ज़ाहिर है कि ये शब्द यीशु के नहीं हैं बल्कि मरकुस ने परमेश्‍वर की प्रेरणा से यह समझाने के लिए लिखे थे कि इससे पहले यीशु ने जो कहा उसका क्या मतलब था।

नाजायज़ यौन-संबंध: यहाँ यूनानी शब्द पोर्निया का बहुवचन इस्तेमाल हुआ है जिसका मतलब हो सकता है, कई बार नाजायज़ यौन-संबंध रखना।​—मत 5:32 का अध्ययन नोट और शब्दावली देखें।

नाजायज़ यौन-संबंध: मत 15:19 का अध्ययन नोट देखें।

ईर्ष्या: शा., “बुरी; दुष्ट।” सचमुच की आँखों में अगर कोई खराबी हो या वे स्वस्थ न हों तो साफ दिखायी नहीं देगा। उसी तरह अगर एक इंसान की आँखों में ईर्ष्या भरी हो तो वह ज़रूरी बातों पर ध्यान नहीं दे पाएगा। (मत 6:33) ऐसी आँखें संतुष्ट नहीं होतीं बल्कि उनमें लालच भरा होता है। वे भटक जाती हैं और बेईमान होती हैं। उनकी वजह से एक इंसान मामले की जाँच ठीक से नहीं कर पाता और हर बात में अपना स्वार्थ ढूँढ़ने लगता है।​—मत 6:22 का अध्ययन नोट देखें।

तुझे जलन हो रही है: शा., “तेरी आँख दुष्ट है।” जिस यूनानी शब्द का अनुवाद “जलन” किया गया है उसका शाब्दिक मतलब है, “बुरा; दुष्ट।” (मत 6:23 का अध्ययन नोट देखें।) शब्द “आँख” यहाँ लाक्षणिक तौर पर इस्तेमाल हुआ है जिसका मतलब है, एक व्यक्‍ति के इरादे, स्वभाव या भावनाएँ।​—मर 7:22 में दिए शब्द, “ईर्ष्या से भरी आँखें” से तुलना करें।

व्यभिचार: यूनानी में यहाँ “व्यभिचार” शब्द का बहुवचन (मोइखीया) इस्तेमाल हुआ है।​—शब्दावली देखें।

निर्लज्ज काम: या “शर्मनाक बरताव।” यूनानी शब्द असेलजीआ का मतलब है, ऐसे काम जो परमेश्‍वर के नियमों के खिलाफ हैं और ऐसा रवैया जिससे निर्लज्जता और घोर अनादर ज़ाहिर होता है।​—शब्दावली देखें।

ईर्ष्या से भरी आँखें: जिस यूनानी शब्द का अनुवाद यहाँ “ईर्ष्या” किया गया है उसका शाब्दिक मतलब है, “बुरा; दुष्ट।” शब्द “आँख” यहाँ लाक्षणिक तौर पर इस्तेमाल हुआ है जिसका मतलब है, एक व्यक्‍ति के इरादे, स्वभाव या भावनाएँ। “ईर्ष्या से भरी आँखें” शब्दों का अनुवाद “ईर्ष्या” भी किया जा सकता है।​—मत 6:23; 20:15 के अध्ययन नोट देखें।

यूनानी: मुमकिन है कि यह औरत इसराएली नहीं थी बल्कि यूनानी खानदान से थी।

बच्चों . . . पिल्लों: मूसा के कानून के मुताबिक कुत्तों को अशुद्ध माना जाता था, इसलिए बाइबल में अकसर यह शब्द नैतिक तौर से गिरे हुए लोगों के लिए इस्तेमाल हुआ है। (लैव 11:27; मत 7:6; फिल 3:2, फु.; प्रक 22:15) लेकिन मत्ती (15:26) और मरकुस ने जब यीशु की यह बातचीत लिखी तो उन्होंने कुत्तों के लिए अल्पार्थक संज्ञा इस्तेमाल की जिसका मतलब है, “पिल्ला” या “घर का कुत्ता।” इस तरह तुलना करने से किसी को ठेस नहीं पहुँचती। इससे शायद यह ज़ाहिर होता है कि यीशु ने वही शब्द इस्तेमाल किया जिससे गैर-यहूदी अपने पालतू जानवरों को प्यार से बुलाते थे। यीशु इसराएलियों की तुलना “बच्चों” से और गैर-यहूदियों की तुलना “पिल्लों” से करके शायद यह बताना चाहता था कि पहले किन पर ध्यान दिया जाना चाहिए। जब एक घर में बच्चे और कुत्ते दोनों होते हैं तो पहले बच्चों को खाना खिलाया जाता है।

दिकापुलिस: शब्दावली और अति. ख10 देखें।

एक बहरे आदमी को लाए जो ठीक से बोल भी नहीं पाता था: सिर्फ मरकुस ने बताया कि यीशु ने एक ऐसे बहरे आदमी को ठीक किया जो ठीक से बोल नहीं पाता था।​—मर 7:31-37.

से दूर अलग ले गया: यीशु जब बीमार लोगों को ठीक करता था तो आम तौर पर वह ऐसा नहीं करता था। मगर इस मौके पर उसने शायद ऐसा इसलिए किया ताकि उस आदमी को शर्मिंदगी महसूस न हो। यीशु उसका लिहाज़ करते हुए सबसे बेहतरीन तरीके से उसकी मदद करना चाहता था।

थूकने: यहूदी और गैर-यहूदी लोगों में से कुछ मानते थे कि थूकना, चंगाई का एक तरीका या निशानी है। इसलिए यीशु ने शायद उस आदमी को यह दिखाने के लिए थूका कि वह उसे ठीक करनेवाला है। बात चाहे जो भी रही हो, यीशु ने अपना थूक लेकर उसे कुदरती तरीके से ठीक नहीं किया।

गहरी आह भरकर: मरकुस ने अकसर यीशु की भावनाओं के बारे में लिखा। इस बारे में शायद उसे पतरस ने बताया होगा जो खुद एक भावुक इंसान था। (“मरकुस की किताब पर एक नज़र” देखें।) यह क्रिया शायद दिखाती है कि प्रार्थना करते हुए जिस तरह यीशु ने आह भरी या वह कराहा, उससे ज़ाहिर होता है कि उस आदमी के लिए उसे कितनी हमदर्दी थी या फिर पूरी मानवजाति की तकलीफ देखकर उसे कितना दर्द महसूस हुआ होगा। इसी से जुड़ी क्रिया रोम 8:22 में यह बताने के लिए इस्तेमाल हुई है कि सारी सृष्टि ‘कराह’ रही है।

एफ्फतह: यह एक यूनानी शब्द है, जिसके बारे में कुछ लोगों का मानना है कि यह एक इब्रानी शब्द से निकला है, जिसका अनुवाद यश 35:5 में “खोले जाएँगे” किया गया है। इस घटना में यीशु के कहे इस शब्द ने एक चश्‍मदीद गवाह के दिल पर इतनी गहरी छाप छोड़ी कि उसने मरकुस को यह घटना बताते वक्‍त यही शब्द दोहराया। वह गवाह शायद पतरस था। यह उन कुछेक घटनाओं में से एक है जहाँ यीशु के शब्द हू-ब-हू लिखे गए हैं। ऐसे शब्दों का एक और उदाहरण है, “तलीता कूमी” (मर 5:41)।

तसवीर और ऑडियो-वीडियो