मरकुस के मुताबिक खुशखबरी 15:1-47

15  सुबह होते ही मुखियाओं और शास्त्रियों ने प्रधान याजकों के साथ मिलकर यानी पूरी महासभा ने आपस में सलाह-मशविरा किया।+ उन्होंने यीशु को बाँधा और पीलातुस के पास ले गए और उसके हवाले कर दिया।+  तब पीलातुस ने यीशु से सवाल किया, “क्या तू यहूदियों का राजा है?”+ जवाब में उसने कहा, “तू खुद यह कहता है।”+  लेकिन प्रधान याजक उस पर तरह-तरह के इलज़ाम लगाने लगे।+  अब पीलातुस एक बार फिर उससे सवाल करने लगा, “क्या तेरे पास कोई जवाब नहीं?+ देख, ये तुझ पर कितने इलज़ाम लगा रहे हैं।”+  मगर यीशु ने और कोई जवाब नहीं दिया, इसलिए पीलातुस को बहुत ताज्जुब हुआ।+  ऐसा था कि पीलातुस हर साल त्योहार के वक्‍त, लोगों की गुज़ारिश पर किसी एक कैदी को रिहा कर देता था।+  उस वक्‍त बरअब्बा नाम का एक आदमी कुछ और लोगों के साथ जेल में कैद था। इन सबने सरकार के खिलाफ बगावत की थी और खून किया था।  अब भीड़ पीलातुस के पास आयी और गुज़ारिश करने लगी कि जैसा वह उनके लिए करता आया है, वैसा ही करे।  उसने लोगों से कहा, “क्या मैं तुम्हारे लिए यहूदियों के राजा को रिहा कर दूँ?”+ 10  पीलातुस जानता था कि प्रधान याजकों ने ईर्ष्या की वजह से यीशु को उसके हवाले किया था।+ 11  मगर प्रधान याजकों ने भीड़ को यह कहने के लिए भड़काया कि वह यीशु के बजाय बरअब्बा को रिहा करे।+ 12  एक बार फिर पीलातुस ने उनसे कहा, “तो मैं इस आदमी का क्या करूँ जिसे तुम यहूदियों का राजा कहते हो?”+ 13  वे फिर चिल्ला उठे, “इसे काठ पर लटका दे!”*+ 14  मगर उसने कहा, “क्यों, इसने क्या बुरा किया है?” मगर वे और भी ज़ोर से चिल्लाने लगे, “इसे काठ पर लटका दे!”*+ 15  तब पीलातुस ने भीड़ को खुश करने के लिए बरअब्बा को रिहा कर दिया और यीशु को कोड़े लगवाने के बाद,+ काठ पर लटकाकर मार डालने के लिए सौंप दिया।+ 16  फिर सैनिक यीशु को राज्यपाल के भवन के अंदर, आँगन में ले गए। उन्होंने सैनिकों की पूरी पलटन को वहाँ बुला लिया।+ 17  उन्होंने उसे बैंजनी कपड़ा पहनाया और काँटों का एक ताज बनाकर उसके सिर पर रखा।+ 18  वे ज़ोर से चिल्लाकर कहने लगे, “हे यहूदियों के राजा, सलाम!” 19  वे नरकट से उसे सिर पर मारने लगे, उस पर थूकने लगे और उसे झुककर प्रणाम करने लगे। 20  जब उन्होंने उसका खूब मज़ाक उड़ा लिया, तो वह बैंजनी कपड़ा उतार दिया और उसी के कपड़े उसे पहना दिए। फिर वे उसे काठ पर ठोंकने के लिए ले गए।+ 21  उस वक्‍त शमौन नाम का एक आदमी देहात से आ रहा था और वहाँ से गुज़र रहा था। वह कुरेने का रहनेवाला था और सिकंदर और रूफुस का पिता था। सैनिकों ने उसे जबरन सेवा के लिए पकड़ा कि वह यीशु का यातना का काठ उठाकर ले चले।*+ 22  फिर वे यीशु को गुलगुता नाम की जगह ले आए, जिसका मतलब है, “खोपड़ी स्थान।”+ 23  यहाँ उन्होंने उसे नशीली गंधरस मिली दाख-मदिरा पिलाने की कोशिश की,+ मगर उसने नहीं पी। 24  उन्होंने उसे काठ पर ठोंक दिया और उसके ओढ़ने के लिए चिट्ठियाँ डालीं ताकि तय कर सकें कि किसे क्या मिलेगा और उन्हें आपस में बाँट लिया।+ 25  यह तीसरा घंटा था और उन्होंने उसे काठ पर ठोंक दिया। 26  उस पर जो इलज़ाम था, उसे लिखकर ऊपर लगा दिया गया: “यहूदियों का राजा।”+ 27  और उन्होंने उसके साथ दो लुटेरों को भी काठ पर लटकाया, एक उसके दायीं तरफ और दूसरा बायीं तरफ।+ 28  — 29  जो लोग वहाँ से गुज़र रहे थे वे सिर हिला-हिलाकर उसकी बेइज़्ज़ती करने लगे,+ “अरे ओ मंदिर को ढानेवाले, उसे तीन दिन के अंदर बनानेवाले!+ 30  यातना के काठ से नीचे उतरकर खुद को बचा ले।” 31  इसी तरह, प्रधान याजक भी शास्त्रियों के साथ मिलकर यह कहते हुए आपस में उसका मज़ाक उड़ा रहे थे, “इसने दूसरों को तो बचाया, मगर खुद को नहीं बचा सकता!+ 32  ज़रा इसराएल का राजा मसीह अब यातना के काठ से नीचे तो उतरे ताकि हम देखें और यकीन करें।”+ यहाँ तक कि जो आदमी उसके दोनों तरफ काठ पर थे, वे भी उसे बुरा-भला कह रहे थे।+ 33  जब छठा घंटा हुआ, तो पूरे देश में* अंधकार छा गया और नौवें घंटे तक छाया रहा।+ 34  नौवें घंटे में यीशु ने ज़ोर से पुकारा, “एली, एली, लामा शबकतानी?” जिसका मतलब है, “मेरे परमेश्‍वर, मेरे परमेश्‍वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?”+ 35  यह सुनकर पास खड़े कुछ लोग कहने लगे, “देखो! यह एलियाह को पुकार रहा है।” 36  फिर एक आदमी भागकर गया और उसने एक स्पंज को खट्टी दाख-मदिरा में डुबोकर नरकट पर रखा और उसे यह कहते हुए पीने के लिए दिया,+ “देखते हैं, एलियाह इसे नीचे उतारने के लिए आता है या नहीं।” 37  लेकिन यीशु ज़ोर से चिल्लाया और उसने दम तोड़ दिया।+ 38  तब मंदिर का परदा+ ऊपर से नीचे तक फटकर दो टुकड़े हो गया।+ 39  जब उसके सामने खड़े सेना-अफसर ने देखा कि उसकी मौत पर क्या-क्या हुआ तो उसने कहा, “वाकई यह इंसान, परमेश्‍वर का बेटा था।”*+ 40  वहाँ कुछ औरतें भी थीं, जो दूर खड़ी देख रही थीं। उनमें मरियम मगदलीनी, छोटे याकूब और योसेस की माँ मरियम और सलोमी भी थीं।+ 41  ये औरतें उसके साथ-साथ रहती थीं और जब वह गलील में था तब उसकी सेवा करती थीं।+ वहाँ और भी कई औरतें थीं जो उसके साथ यरूशलेम आयी थीं। 42  दोपहर काफी बीत चुकी थी और यह तैयारी का दिन था यानी सब्त से पहले का दिन। 43  इसलिए अरिमतियाह का रहनेवाला यूसुफ वहाँ आया जो धर्म-सभा का एक इज़्ज़तदार सदस्य था। वह खुद भी परमेश्‍वर के राज के आने का इंतज़ार कर रहा था। वह हिम्मत करके पीलातुस के सामने गया और उसने यीशु की लाश माँगी।+ 44  मगर पीलातुस को ताज्जुब हुआ कि यीशु वाकई मर चुका है। इसलिए उसने सेना-अफसर को बुलाकर पूछा कि क्या वह मर चुका है। 45  पीलातुस ने सेना-अफसर से यह पक्का कर लेने के बाद कि वह मर चुका है, उसकी लाश यूसुफ को सौंप दी। 46  तब यूसुफ बढ़िया मलमल खरीदकर ले आया और उसने यीशु की लाश नीचे उतारी और उसे मलमल में लपेटकर एक कब्र में रख दिया,+ जो चट्टान खोदकर बनायी गयी थी। और कब्र के द्वार पर एक पत्थर लुढ़काकर उसे बंद कर दिया।+ 47  लेकिन मरियम मगदलीनी और योसेस की माँ मरियम उस जगह को देखती रहीं जहाँ उसे रखा गया था।+

कई फुटनोट

या “काठ पर लटकाकर मार डाल!”
या “काठ पर लटकाकर मार डाल!”
या “उठाए।”
शा., “पूरी धरती पर।”
या शायद, “परमेश्‍वर का एक बेटा था; किसी ईश्‍वर का एक बेटा था।”

अध्ययन नोट

महासभा: यरूशलेम में यहूदियों की सबसे बड़ी अदालत। “महासभा” के यूनानी शब्द सिनेड्रियोन का शाब्दिक मतलब है, “के साथ बैठना।” हालाँकि यह शब्द एक आम सभा के लिए भी इस्तेमाल होता था, लेकिन इसराएल में इसका मतलब फैसला सुनानेवाला धार्मिक समूह या अदालत भी हो सकता था।​—मत 5:22 का अध्ययन नोट और शब्दावली देखें; साथ ही महासभा का भवन कहाँ रहा होगा, यह जानने के लिए अति. ख12 देखें।

महासभा: मत 26:59 का अध्ययन नोट देखें।

पीलातुस: यहूदिया का रोमी राज्यपाल (या प्रशासक), जिसे सम्राट तिबिरियुस ने ईसवी सन्‌ 26 में नियुक्‍त किया था। पीलातुस करीब 10 साल तक हुकूमत करता रहा। बाइबल के लेखकों के अलावा दूसरे लेखकों ने भी उसका ज़िक्र किया। जैसे, रोमी इतिहासकार टैसीटस ने लिखा कि पीलातुस ने तिबिरियुस के शासन के दौरान मसीह को मरवाने का हुक्म दिया। इसराएल के कैसरिया में एक प्राचीन रोमी रंगशाला में एक शिलालेख मिला जिस पर लातीनी भाषा में लिखा है: “यहूदिया का प्रशासक, पुन्तियुस पीलातुस।”​—पीलातुस का किन इलाकों पर शासन था, यह जानने के लिए अति. ख10 देखें।

क्या तू यहूदियों का राजा है?: रोमी साम्राज्य में सम्राट की इजाज़त के बिना कोई भी राजा नहीं बन सकता था। इसीलिए शायद पीलातुस ने यीशु के राज करने के अधिकार के बारे में पूछताछ की।

तू खुद यह कहता है: ज़ाहिर है कि यीशु ने अपने इस जवाब से पुख्ता किया कि पीलातुस की कही बात सच है। (मत 26:25, 64 के अध्ययन नोट से तुलना करें।) हालाँकि यीशु ने पीलातुस के सामने यह माना कि वह वाकई राजा है, मगर उस मायने में नहीं जिस मायने में पीलातुस सोच रहा था। यीशु का राज “इस दुनिया का नहीं है,” इसलिए वह रोमी साम्राज्य के लिए कोई खतरा नहीं था।​—यूह 18:33-37.

क्या तू यहूदियों का राजा है?: मत 27:11 का अध्ययन नोट देखें।

तू खुद यह कहता है: मत 27:11 का अध्ययन नोट देखें।

किसी एक कैदी को रिहा कर देता था: इस घटना के बारे में खुशखबरी की किताबों के चारों लेखकों ने लिखा। (मत 27:15-23; लूक 23:16-25; यूह 18:39, 40) इस रिवाज़ का कोई आधार इब्रानी शास्त्र में नहीं मिलता। लेकिन मालूम होता है कि यीशु के दिनों तक यहूदियों ने खुद यह रिवाज़ शुरू कर दिया था। रोमियों के लिए यह रिवाज़ कोई नया नहीं था क्योंकि सबूत दिखाते हैं कि वे भीड़ को खुश करने के लिए कैदियों को रिहा करते थे।

वे फिर चिल्ला उठे: जैसे लूक 23:18-23 से पता चलता है, भीड़ ने कम-से-कम तीन बार पीलातुस से चिल्लाकर कहा कि यीशु को मार डालो। मरकुस के इस ब्यौरे से पता चलता है कि पीलातुस ने तीन बार भीड़ से यीशु के बारे में सवाल किया।​—मर 15:9, 12, 14.

कोड़े लगवाए: रोमी लोग बहुत ही खतरनाक कोड़ा इस्तेमाल करते थे, जिसे लातीनी में फ्लैगेलम कहा जाता है। यहाँ जो यूनानी क्रिया (फ्रागेल्लोयो, मतलब “कोड़े लगवाना”) इस्तेमाल हुई है, वह इसी शब्द से निकली है। इस कोड़े में एक हत्था होता था जिसमें कई रस्सियाँ या गुथी हुई चमड़े की पट्टियाँ लगी होती थीं। कभी-कभी इन पट्टियों में नुकीली हड्डियाँ या धातु के टुकड़े लगाए जाते थे। इन कोड़ों की मार के ज़ख्म बहुत गहरे और दर्दनाक होते थे और शरीर की खाल के चीथड़े उड़ जाते थे, यहाँ तक कि इनकी मार से मौत भी हो सकती थी।

कोड़े लगवाने: मत 27:26 का अध्ययन नोट देखें।

राज्यपाल के . . . भवन: यूनानी शब्द प्रेटोरियन (जो लातीनी शब्द प्रीटोरियुम से निकला है) का मतलब है, रोमी राज्यपालों का सरकारी निवास। मुमकिन है कि यरूशलेम में यह निवास वह महल था जिसे हेरोदेस महान ने बनवाया था। यह निवास यरूशलेम के दक्षिणी हिस्से में यानी ऊपरी शहर के उत्तर-पश्‍चिम में था। (यह भवन कहाँ था, यह जानने के लिए अति. ख12 देखें।) दरअसल पीलातुस का निवास कैसरिया में था मगर कुछ मौकों पर, जैसे त्योहार के समय वह यरूशलेम में ठहरता था क्योंकि ऐसे मौकों पर शहर में खलबली मचने का खतरा रहता था।

राज्यपाल के भवन: मत 27:27 का अध्ययन नोट देखें।

उन्होंने उसे बैंजनी कपड़ा पहनाया: उन्होंने यीशु का मज़ाक उड़ाने के इरादे से ऐसा किया क्योंकि उसने खुद को राजा कहा। मत्ती के ब्यौरे (27:28) में बताया गया है कि सैनिकों ने यीशु को “सुर्ख लाल रंग का एक कपड़ा” पहनाया, जो आम तौर पर राजा, नगर-अधिकारी या सेना-अफसर पहनते थे। मरकुस और यूहन्‍ना के ब्यौरे (19:2) में कहा गया है कि यह कपड़ा बैंजनी रंग का था। लेकिन प्राचीन समय में ऐसे किसी भी रंग को “बैंजनी” कहा जाता था जिसमें लाल और नीले रंगों का मिश्रण हो। इसके अलावा, देखनेवाले को कौन-सा रंग दिखायी दे रहा था, यह इससे तय होता है कि वह कहाँ से देख रहा था, उस कपड़े पर किधर से रौशनी पड़ रही थी और पीछे क्या था। खुशखबरी की किताबों के लेखकों ने जिस तरह अलग-अलग रंगों का ज़िक्र किया, वह दिखाता है कि उन्होंने एक-दूसरे के ब्यौरे की नकल नहीं की।

ताज: सैनिकों ने यीशु के राजा होने की बात का कई तरीकों से मज़ाक उड़ाया, जैसे उसे बैंजनी कपड़ा पहनाया, काँटों का ताज उसके सिर पर रखा और मत 27:29 के मुताबिक राजदंड के तौर पर उसे “एक नरकट” दिया।

सलाम!: या “तेरी जय हो!” उन्होंने उसी तरह यीशु की जयजयकार की, जैसे वे सम्राट की करते थे। ज़ाहिर है कि वे इस तरह यीशु का मज़ाक उड़ा रहे थे क्योंकि उसने कहा कि वह राजा है।

सलाम!: मत 27:29 का अध्ययन नोट देखें।

उस पर थूकेंगे: किसी इंसान पर या उसके चेहरे पर थूकना दिखाता है कि थूकनेवाला उसे कितना नीच समझता है, उसमें कितना गुस्सा है या वह अपनी दुश्‍मनी निकाल रहा है और जिस पर थूका जाता है उसकी बहुत बेइज़्ज़ती होती है। (गि 12:14; व्य 25:9) यहाँ यीशु कह रहा था कि उसे यह सब सहना पड़ेगा और इससे मसीहा के बारे में यह भविष्यवाणी पूरी होगी: “अपमान सहने और थूके जाने पर मैंने मुँह नहीं छिपाया।” (यश 50:6) जब उसे महासभा के सामने लाया गया तो उस दौरान उस पर थूका गया। (मर 14:65) फिर पीलातुस का फैसला सुनाए जाने के बाद रोमी सैनिकों ने उस पर थूका।​—मर 15:19.

दंडवत करने: या “झुककर प्रणाम करने।” जब यूनानी क्रिया प्रोस्किनीयो किसी देवता या ईश्‍वर की पूजा के संबंध में इस्तेमाल हुई है तो उसका अनुवाद “उपासना” किया गया है और जब इंसानों को आदर देने के संबंध में हुई है तो उसका अनुवाद “दंडवत करना” या “झुककर प्रणाम करना” किया गया है। इस आयत में ज्योतिषियों ने पूछा, “यहूदियों का जो राजा पैदा हुआ है, वह कहाँ है?” इससे पता चलता है कि यहाँ किसी ईश्‍वर को नहीं बल्कि इंसानी राजा को दंडवत करने की बात की गयी है। कुछ ऐसा ही मतलब देने के लिए मर 15:18, 19 में यही यूनानी शब्द इस्तेमाल किया गया था। इन आयतों में बताया गया है कि सैनिकों ने यीशु का मज़ाक उड़ाने के इरादे से उसे “झुककर प्रणाम” किया और ‘यहूदियों का राजा’ पुकारा।​—मत 18:26 का अध्ययन नोट देखें।

उस पर थूकने लगे: इस तरह जब यीशु का अपमान किया गया, तो मर 10:34 में दर्ज़ खुद यीशु की भविष्यवाणी और यश 50:6 में दर्ज़ मसीहा के बारे में भविष्यवाणी पूरी हुई।​—मर 10:34 का अध्ययन नोट देखें।

उसे झुककर प्रणाम करने लगे: या “उसे दंडवत करने लगे; उसका सम्मान करने लगे।” यहाँ यूनानी क्रिया प्रोस्किनीयो उन सैनिकों के संबंध में इस्तेमाल हुई है, जो यीशु का मज़ाक उड़ाने के इरादे से उसे प्रणाम कर रहे थे और ‘यहूदियों का राजा’ कहकर पुकार रहे थे।​—मर 15:18; मत 2:2 का अध्ययन नोट देखें।

काठ पर लटकाकर मार डालें: या “खंभे पर लटका दें।” यूनानी क्रिया स्टौरोऊ मसीही यूनानी शास्त्र में 40 बार आयी है और इस आयत में पहली बार इस्तेमाल हुई है। इस क्रिया की यूनानी संज्ञा स्टौरोस है जिसका अनुवाद “यातना का काठ” किया गया है। (मत 10:38; 16:24; 27:32 के अध्ययन नोट और शब्दावली में “काठ”; “यातना का काठ” देखें।) सेप्टुआजेंट में यही क्रिया एस 7:9 में इस्तेमाल हुई है, जहाँ हामान को करीब 65 फुट (20 मी.) ऊँचे काठ पर लटकाने का आदेश दिया गया है। प्राचीन यूनानी भाषा में इस क्रिया का मतलब है, “बल्लियाँ गाड़कर या तो बाड़ा बाँधना या सुरक्षा के लिए आड़ बनाना।”

उसे काठ पर ठोंकने: या “उसे काठ (या खंभे) पर लटकाने।”​—मत 20:19 का अध्ययन नोट और शब्दावली में “काठ”; “यातना का काठ” देखें।

कुरेने: यह शहर क्रेते द्वीप के दक्षिण-पश्‍चिम में उत्तरी अफ्रीका के तट के पास बसा था।​—अति. ख13 देखें।

तुमसे कहे कि मेरा बोझ उठाकर . . . चल: यहाँ जबरन सेवा की बात की गयी है जो रोमी अधिकारी किसी भी नागरिक से करवा सकते थे। जैसे, कोई सरकारी काम जल्दी पूरा करवाने के लिए वे लोगों या जानवरों को ज़बरदस्ती उस काम में लगा सकते थे या लोगों की कोई भी चीज़ ले सकते थे। कुरेने के रहनेवाले शमौन के साथ ऐसा ही हुआ। रोमी सैनिकों ने उसे “जबरन सेवा के लिए पकड़ा” कि वह यीशु का यातना का काठ उठाकर ले चले।​—मत 27:32.

यातना का काठ: या “मौत का काठ।”​—शब्दावली में “काठ”; “यातना का काठ” देखें; साथ ही मत 10:38 और 16:24 के अध्ययन नोट भी देखें, जहाँ ये शब्द लाक्षणिक तौर पर इस्तेमाल हुए हैं।

कुरेने: मत 27:32 का अध्ययन नोट देखें।

सिकंदर और रूफुस का पिता: कुरेने के रहनेवाले शमौन के बारे में यह जानकारी सिर्फ मरकुस ने दी।

जबरन सेवा के लिए पकड़ा: यहाँ उस सेवा की बात की गयी है जो रोमी अधिकारी किसी भी नागरिक से करवा सकते थे। जैसे, कोई सरकारी काम जल्दी पूरा करवाने के लिए वे लोगों या जानवरों को ज़बरदस्ती उस काम में लगा सकते थे या लोगों की कोई भी चीज़ ले सकते थे।​—मत 5:41 का अध्ययन नोट देखें।

यातना का काठ: मत 27:32 का अध्ययन नोट देखें।

गुलगुता: यह एक इब्रानी शब्द से निकला है जिसका मतलब है, “खोपड़ी।” (यूह 19:17 देखें; न्या 9:53 से तुलना करें जहाँ इब्रानी शब्द गुलगोलेथ का अनुवाद “खोपड़ी” किया गया है।) यीशु के दिनों में यह जगह यरूशलेम की शहरपनाह के बाहर थी। लेकिन यह ठीक कहाँ थी, इसका पता नहीं। (अति. ख12 देखें।) बाइबल यह नहीं बताती कि गुलगुता पहाड़ी पर था, लेकिन यह ज़रूर बताती है कि कुछ लोगों ने दूर से देखा था कि यीशु को कैसे मार डाला गया।​—मर 15:40; लूक 23:49.

गुलगुता: मत 27:33 का अध्ययन नोट देखें।

खोपड़ी स्थान: इनके यूनानी शब्द हैं, क्रेनीयू टॉपोस जो इब्रानी शब्द गुलगुता का अनुवाद हैं। (यूह 19:17 और इसी आयत में गुलगुता पर अध्ययन नोट देखें।) बाइबल के कुछ अँग्रेज़ी अनुवादों में लूक 23:33 में “कैलवेरी” शब्द इस्तेमाल हुआ है। यह लातीनी शब्द कैलवेरिया से निकला है जिसका मतलब है, “खोपड़ी।” शब्द कैलवेरिया लातीनी वल्गेट बाइबल में इस्तेमाल हुआ है।

पित्त: यहाँ यूनानी शब्द खोली का मतलब है, पौधों से निकाला कड़वा रस या कोई कड़वा पदार्थ। इस घटना से एक भविष्यवाणी पूरी हुई, यह दिखाने के लिए मत्ती ने भज 69:21 की बात लिखी। सेप्टुआजेंट में इसी आयत में यही यूनानी शब्द, “ज़हर” के इब्रानी शब्द के लिए इस्तेमाल हुआ है। ज़ाहिर है कि यरूशलेम की औरतों ने पित्त मिलाकर दाख-मदिरा तैयार की थी ताकि दर्द कम करने के लिए उन लोगों को पिलायी जा सके जिन्हें काठ पर लटकाया गया था। रोमी अधिकारियों को इस पर कोई एतराज़ नहीं था। इसके मिलते-जुलते ब्यौरे मर 15:23 में लिखा है कि उस दाख-मदिरा में ‘नशीला गंधरस’ मिलाया गया था। इसलिए ज़ाहिर है कि उस दाख-मदिरा में गंधरस और कड़वा पित्त, दोनों मिलाए गए थे।

नशीली गंधरस मिली दाख-मदिरा: इसके मिलते-जुलते ब्यौरे मत 27:34 में लिखा है कि दाख-मदिरा में “पित्त” मिलाया गया था। लेकिन मुमकिन है कि उस दाख-मदिरा में गंधरस और कड़वा पित्त, दोनों मिलाए गए थे। ज़ाहिर है कि यह मिश्रण दर्द कम करने के लिए पिलाया जाता था।​—इसी आयत में उसने नहीं पी पर अध्ययन नोट और मत 27:34 का अध्ययन नोट देखें।

उसने नहीं पी: ज़ाहिर है कि यीशु अपने विश्‍वास की परीक्षा के दौरान पूरे होश-हवास में रहना चाहता था।

उसका ओढ़ना आपस में बाँट लिया: यूह 19:23, 24 में इस घटना की कुछ ऐसी बारीकियाँ बतायी गयी हैं जो मत्ती, मरकुस और लूका की किताब में नहीं पायी जातीं। ये हैं: रोमी सैनिकों ने शायद कुरते और ओढ़ने, दोनों पर चिट्ठियाँ डालीं; उन्होंने ओढ़ने के ‘चार टुकड़े करके आपस में बाँट लिए, हरेक को एक टुकड़ा मिला’; वे कुरते को फाड़कर टुकड़े नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने उस पर चिट्ठियाँ डालीं और मसीहा के कपड़ों पर इस तरह चिट्ठियाँ डालकर उन्होंने भज 22:18 की भविष्यवाणी पूरी की। सबूत दिखाते हैं कि यह एक दस्तूर था कि अपराधियों को मारनेवाले सैनिक उनके कपड़े रख लेते थे। अपराधियों को मारने से पहले उनके कपड़े उतारे जाते थे और उनकी चीज़ें ले ली जाती थीं। इस तरह उन्हें और भी ज़्यादा अपमानित किया जाता था।

उसके ओढ़ने . . . आपस में बाँट लिया: मत 27:35 का अध्ययन नोट देखें।

चिट्ठियाँ डालीं: शब्दावली में “चिट्ठियाँ” देखें।

तीसरा घंटा: यानी सुबह करीब 9 बजे। कुछ लोगों का कहना है कि यहाँ बताए समय और यूह 19:14-16 में बताए समय में फर्क है। उन आयतों में लिखा है कि ‘दिन के करीब छठे घंटे’ (करीब 12 बजे) पीलातुस ने यीशु को काठ पर लटकाकर मार डालने के लिए सौंप दिया। हालाँकि यह फर्क समझाने के लिए बाइबल में ज़्यादा जानकारी नहीं मिलती, फिर भी कुछ बातें हैं जिन पर ध्यान दिया जा सकता है: खुशखबरी की किताबों में यीशु की ज़िंदगी के आखिरी दिन यानी उसकी मौत से पहले हुईं घटनाओं के समय के बारे में जो बताया गया है, वह आम तौर पर एक-दूसरे से मेल खाता है। जैसे, चारों किताबें बताती हैं कि याजक और मुखिया सूरज निकलने के बाद मिले और फिर वे यीशु को रोमी राज्यपाल पुन्तियुस पीलातुस के पास ले गए। (मत 27:1, 2; मर 15:1; लूक 22:66–23:1; यूह 18:28) मत्ती, मरकुस और लूका ने बताया कि जब यीशु को काठ पर लटकाया जा चुका था तब “छठे घंटे से . . . नौवें घंटे तक” देश में अंधकार छाया रहा। (मत 27:45, 46; मर 15:33, 34; लूक 23:44) यीशु को सज़ा देने के समय को लेकर जो फर्क है उसकी एक वजह शायद यह है: कुछ लोगों का मानना था कि कोड़े मारना, काठ पर लटकाकर मार डालने की सज़ा में ही शामिल है। कई बार सज़ा पानेवाले को कोड़े इतनी बेरहमी से मारे जाते थे कि वह उसी समय दम तोड़ देता था। यीशु को भी इतनी बेदर्दी से कोड़े मारे गए थे कि वह पूरे रास्ते अपना काठ उठाकर नहीं ले जा पाया बल्कि बीच में दूसरे आदमी को उसका काठ उठाना पड़ा। (लूक 23:26; यूह 19:17) अगर यह माना जाए कि काठ पर लटकाकर मार डालने की सज़ा कोड़े मारने से शुरू हो जाती थी, तो यीशु को कोड़े लगवाने और काठ पर लटकाकर मार डालने के बीच ज़रूर कुछ वक्‍त गुज़रा होगा। यह बात मत 27:26 और मर 15:15 से पुख्ता होती है, जहाँ कोड़े लगवाने और काठ पर लटकाकर मार डालने का ज़िक्र साथ-साथ किया गया है। तो फिर लेखकों ने शायद यीशु को मार डालने की सज़ा का अलग-अलग समय इसलिए बताया क्योंकि सज़ा के बारे में उनका नज़रिया अलग था। इन सारी बातों से पता चलता है कि क्यों पीलातुस को यह जानकर ताज्जुब हुआ कि काठ पर लटकाने के बाद इतनी जल्दी यीशु की मौत हो गयी। (मर 15:44) इसके अलावा, उस ज़माने में रात की तरह दिन को भी चार पहरों में बाँटा जाता था और हर पहर तीन घंटे का होता था। बाइबल के लेखक इसी के मुताबिक समय की जानकारी देते थे। इसलिए बाइबल में अकसर तीसरे, छठे और नौवें घंटे का ज़िक्र मिलता है और इन घंटों का हिसाब सूरज निकलने से यानी करीब 6 बजे से लगाया जाता था। (मत 20:1-5; यूह 4:6; प्रेष 2:15; 3:1; 10:3, 9, 30) इतना ही नहीं, उन दिनों घड़ियाँ नहीं होती थीं, इसलिए दिन का कोई समय बताते वक्‍त अकसर “करीब” शब्द इस्तेमाल होता था, जैसा कि यूह 19:14 में लिखा है। (मत 27:46; लूक 23:44; यूह 4:6; प्रेष 10:3, 9) इन बातों का निचोड़ यह है: मरकुस ने शायद काठ पर लटकाकर मार डालने की सज़ा में कोड़े लगवाने की बात भी शामिल की, जबकि यूहन्‍ना ने सिर्फ काठ पर लटकाकर मार डालने की बात की। दोनों लेखकों ने शायद मोटे तौर पर घंटों का ज़िक्र किया। मरकुस ने दिन के पहले पहर के आखिरी घंटे, यानी तीसरे घंटे का और यूहन्‍ना ने दूसरे पहर के आखिरी घंटे यानी छठे घंटे का ज़िक्र किया। यूहन्‍ना ने जब समय के बारे में बताया तो उसने “करीब” शब्द भी लिखा। शायद यही कुछ वजह हैं कि क्यों खुशखबरी की किताबों में अलग-अलग समय का ज़िक्र किया गया है। और-तो-और, यूहन्‍ना ने जो समय बताया वह मरकुस के बताए समय से अलग है, यह दिखाता है कि जब सालों बाद यूहन्‍ना ने खुशखबरी की किताब लिखी, तो उसने मरकुस के ब्यौरे की नकल नहीं की।

लुटेरों: या “डाकुओं।” यूनानी शब्द लीस्टेस का मतलब हो सकता है, मार-पीट करके लूटनेवाला। कभी-कभी यह शब्द क्रांतिकारियों के लिए भी इस्तेमाल होता था। यही शब्द बरअब्बा के सिलसिले में इस्तेमाल हुआ है (यूह 18:40), जिसके बारे में लूक 23:19 में बताया गया है कि वह “बगावत और कत्ल” के इलज़ाम में जेल में था। इसके मिलते-जुलते ब्यौरे लूक 23:32, 33, 39 में इन लुटेरों को “अपराधी” कहा गया है जिसके यूनानी शब्द (काकूरगोस) का शाब्दिक मतलब है, “बुराई या दुष्ट काम करनेवाला।”

लुटेरों: मत 27:38 का अध्ययन नोट देखें।

बाद की कुछ हस्तलिपियों में यहाँ लिखा है: “और शास्त्र का यह वचन पूरा हुआ जो कहता है, ‘और वह अपराधियों में गिना गया।’” ये शब्द यश 53:12 का हिस्सा हैं। लेकिन ये शब्द सबसे पुरानी और भरोसेमंद हस्तलिपियों में मर 15:28 में नहीं पाए जाते। ज़ाहिर है कि ये शब्द मरकुस के मूल पाठ का हिस्सा नहीं हैं। इनसे मिलते-जुलते शब्द लूक 22:37 में दर्ज़ हैं और यह आयत परमेश्‍वर की प्रेरणा से लिखी गयी है। कुछ लोगों का मानना है कि किसी नकल-नवीस ने लूका के ये शब्द इस आयत में लिख दिए।​—अति. क3 देखें।

सिर हिला-हिलाकर: लोग आम तौर पर किसी पर हँसने, उसका मज़ाक उड़ाने या उसे नीचा दिखाने के लिए सिर हिलाते थे और कुछ बोलते भी थे। वहाँ से गुज़रनेवालों ने ऐसा करके अनजाने में भज 22:7 की भविष्यवाणी पूरी की।

सिर हिला-हिलाकर: मत 27:39 का अध्ययन नोट देखें।

यातना का काठ: या “मौत का काठ।”​—शब्दावली में “काठ”; “यातना का काठ” देखें; साथ ही मत 10:38 और 16:24 के अध्ययन नोट भी देखें, जहाँ ये शब्द लाक्षणिक तौर पर इस्तेमाल हुए हैं।

यातना के काठ: मत 27:32 का अध्ययन नोट देखें।

यातना का काठ: या “मौत का काठ।”​—शब्दावली में “काठ”; “यातना का काठ” देखें; साथ ही मत 10:38 और 16:24 के अध्ययन नोट भी देखें, जहाँ ये शब्द लाक्षणिक तौर पर इस्तेमाल हुए हैं।

यातना के काठ: मत 27:32 का अध्ययन नोट देखें।

तीसरे घंटे के करीब: यानी सुबह करीब 9 बजे। पहली सदी के यहूदी मानते थे कि दिन के 12 घंटे होते हैं जो सूरज निकलने यानी सुबह करीब 6 बजे से शुरू होता है। (यूह 11:9) इस हिसाब से तीसरा घंटा सुबह करीब 9 बजे होता था, छठा घंटा दोपहर करीब 12 बजे और नौवाँ घंटा करीब 3 बजे होता था। उन दिनों घड़ियाँ नहीं होती थीं, इसलिए अंदाज़े से ही समय बताया जाता था।​—यूह 1:39; 4:6; 19:14; प्रेष 10:3, 9.

तीसरे घंटे के करीब: यानी सुबह करीब 9 बजे। पहली सदी के यहूदी मानते थे कि दिन के 12 घंटे होते हैं जो सूरज निकलने यानी सुबह करीब 6 बजे से शुरू होता है। (यूह 11:9) इस हिसाब से तीसरा घंटा सुबह करीब 9 बजे होता था, छठा घंटा दोपहर करीब 12 बजे और नौवाँ घंटा करीब 3 बजे होता था। उन दिनों घड़ियाँ नहीं होती थीं, इसलिए अंदाज़े से ही समय बताया जाता था।​—यूह 1:39; 4:6; 19:14; प्रेष 10:3, 9.

छठा घंटा: यानी दोपहर करीब 12 बजे।​—मत 20:3 का अध्ययन नोट देखें।

अंधकार: इसके मिलते-जुलते ब्यौरे लूक 23:44, 45 में यह भी बताया गया है कि “सूरज ने रौशनी देना बंद कर दिया।” यह अंधकार इसलिए छा गया था क्योंकि परमेश्‍वर ने चमत्कार किया था। यह सूर्यग्रहण की वजह से नहीं हो सकता था। सूर्यग्रहण नए चाँद के वक्‍त होता है, जबकि यह फसह का वक्‍त था जब पूरा चाँद होता है। इसके अलावा, पूरा सूर्यग्रहण ज़्यादा-से-ज़्यादा आठ मिनट तक हो सकता है, जबकि यह अंधकार तीन घंटे तक रहा।

नौवें घंटे: यानी दोपहर करीब 3 बजे।​—मत 20:3 का अध्ययन नोट देखें।

एली, एली, लामा शबकतानी?: कुछ लोगों का मानना है कि ये अरामी शब्द हैं, लेकिन मुमकिन है कि ये उस वक्‍त बोली जानेवाली इब्रानी भाषा के शब्द हैं जिस पर अरामी भाषा का काफी असर था। मत्ती और मरकुस ने इन शब्दों को यूनानी में शब्द-ब-शब्द लिखा, इसलिए यह पता लगाना मुश्‍किल है कि ये ठीक कौन-सी भाषा के शब्द हैं।

मेरे परमेश्‍वर, मेरे परमेश्‍वर: यीशु ने स्वर्ग में रहनेवाले अपने पिता को पुकारते वक्‍त अपना परमेश्‍वर कहकर भज 22:1 की भविष्यवाणी पूरी की। उसने दर्द में तड़पते हुए जिस तरह पुकारा उससे सुननेवालों को शायद भज 22 की भविष्यवाणी में लिखी बहुत-सी बातें भी याद आ गयी होंगी। जैसे, उसका मज़ाक बनाया जाएगा, उसकी खिल्ली उड़ायी जाएगी, उसके हाथ-पैरों को चोट पहुँचायी जाएगी और चिट्ठियाँ डालकर उसके कपड़ों का बँटवारा किया जाएगा।​—भज 22:6-8, 16, 18.

एली, एली, लामा शबकतानी?: मत 27:46 का अध्ययन नोट देखें।

मेरे परमेश्‍वर, मेरे परमेश्‍वर: मत 27:46 का अध्ययन नोट देखें।

एलियाह: एक इब्रानी नाम जिसका मतलब है, “मेरा परमेश्‍वर यहोवा है।”

खट्टी दाख-मदिरा: या “सिरका।” मुमकिन है कि यह पतली और खट्टी दाख-मदिरा थी जिसे लातीनी भाषा में ऐसीटम (सिरका) या अगर उसमें पानी मिलाया जाता था तो उसे पॉस्का कहा जाता था। यह एक सस्ता पेय पदार्थ था जिसे गरीब लोग, यहाँ तक कि रोमी सैनिक अपनी प्यास बुझाने के लिए पीते थे। सेप्टुआजेंट में भज 69:21 में यूनानी शब्द ओक्सॉस भी इस्तेमाल हुआ है, जहाँ भविष्यवाणी की गयी थी कि मसीहा को पीने के लिए “सिरका” दिया जाएगा।

नरकट: या “छड़ी; लाठी।” यूहन्‍ना के ब्यौरे में इसे “मरुए की डंडी” कहा गया है।​—यूह 19:29; शब्दावली में “मरुआ” देखें।

खट्टी दाख-मदिरा: मत 27:48 का अध्ययन नोट देखें।

नरकट: मत 27:48 का अध्ययन नोट देखें।

उसने दम तोड़ दिया: या “उसने साँस लेना बंद कर दिया।” यहाँ यूनानी शब्द नफ्मा का शायद मतलब है, “साँस” या “जीवन-शक्‍ति।” हम ऐसा इसलिए कह सकते हैं क्योंकि इसके मिलते-जुलते ब्यौरे मर 15:37 में यूनानी क्रिया एकपनीयो (शा., “साँस छोड़ना”) इस्तेमाल हुई है (जहाँ इस क्रिया का अनुवाद “दम तोड़ दिया” या फुटनोट में “आखिरी साँस ली” किया गया है)। कुछ लोगों का मानना है कि जिस यूनानी शब्द का अनुवाद “उसने दम तोड़ दिया” किया गया है, उसका मतलब है कि यीशु ने ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष करना छोड़ दिया क्योंकि सारी बातें पूरी हो चुकी थीं। (यूह 19:30) उसने अपनी मरज़ी से “जान कुरबान कर दी।”​—यश 53:12; यूह 10:11.

दम तोड़ दिया: या “आखिरी साँस ली।”​—मत 27:50 का अध्ययन नोट देखें।

मंदिर: यहाँ यूनानी शब्द नेयोस का मतलब है, मंदिर की मुख्य इमारत जिसमें पवित्र और परम-पवित्र भाग हैं।

परदा: कढ़ाई किया हुआ यह खूबसूरत परदा मंदिर के पवित्र भाग को परम-पवित्र भाग से अलग करता था। यहूदियों की मान्यता है कि यह परदा करीब 18 मी. (60 फुट) लंबा, 9 मी. (30 फुट) चौड़ा और 7.4 सें.मी. (2.9 इंच) मोटा था। इस भारी परदे को दो हिस्सों में फाड़कर यहोवा ने न सिर्फ यह ज़ाहिर किया कि वह अपने बेटे के कातिलों पर कितना क्रोधित है बल्कि यह भी कि अब स्वर्ग में दाखिल होना मुमकिन है।​—इब्र 10:19, 20; शब्दावली देखें।

मंदिर: मत 27:51 का अध्ययन नोट देखें।

परदा: मत 27:51 का अध्ययन नोट देखें।

एक अंगरक्षक: यहाँ इस्तेमाल हुआ यूनानी शब्द स्पैकाउलेटर लातीनी शब्द (स्पैक्युलेटर) से निकला है। इसका मतलब एक अंगरक्षक या दूत हो सकता है और कभी-कभी जल्लाद भी हो सकता है। करीब 30 लातीनी शब्दों से निकले यूनानी शब्द, मसीही यूनानी शास्त्र में इस्तेमाल हुए हैं। ये शब्द सेना, न्याय-व्यवस्था, पैसों और घर-बार से जुड़े हैं। इनमें से ज़्यादातर शब्द मरकुस और मत्ती की किताबों में हैं और खुशखबरी की किताबों के लेखकों के मुकाबले मरकुस ने सबसे ज़्यादा शब्द इस्तेमाल किए। इससे यह बात पुख्ता हो जाती है कि मरकुस ने अपनी खुशखबरी की किताब रोम में गैर-यहूदियों के लिए लिखी थी, खासकर रोमी लोगों के लिए।​—यूह 19:20 का अध्ययन नोट देखें।

सेना-अफसर: या रोमी “शतपति” जिसके अधीन करीब 100 सैनिक होते थे। यह बड़ा अधिकारी शायद उस वक्‍त मौजूद रहा हो जब यीशु को पीलातुस के सामने पेश किया गया और उसने यहूदियों को यह कहते सुना होगा कि यीशु का दावा है कि वह परमेश्‍वर का बेटा है। (मर 15:16; यूह 19:7) मरकुस ने यहाँ यूनानी शब्द कैंटिरायोन इस्तेमाल किया जो एक लातीनी शब्द से लिया गया है। यह यूनानी शब्द मर 15:44, 45 में भी आया है।​—“मरकुस की किताब पर एक नज़र” और मर 6:27; यूह 19:20 के अध्ययन नोट देखें।

मरियम मगदलीनी: इसकी पहचान बताने के लिए इसका उपनाम मगदलीनी (मतलब, “मगदला की रहनेवाली”) शायद मगदला से निकला है, जो गलील झील के पश्‍चिमी तट पर बसा एक नगर था। यह नगर कफरनहूम और तिबिरियास के लगभग बीच में था। माना जाता है कि मरियम, मगदला में पैदा हुई थी या उसका घर वहाँ था।​—मत 15:39; लूक 8:2 के अध्ययन नोट देखें।

मरियम मगदलीनी: मत 27:56 का अध्ययन नोट देखें।

छोटे याकूब: यीशु का एक प्रेषित और हलफई का बेटा। (मत 10:2, 3; मर 3:18; लूक 6:15; प्रेष 1:13) इस याकूब को ‘छोटा’ शायद इसलिए कहा गया क्योंकि वह जब्दी के बेटे प्रेषित याकूब से या तो उम्र में छोटा था या कद में।

योसेस: यह एक इब्रानी शब्द से निकला है और योसिप्याह नाम का छोटा रूप है जिसका मतलब है, “याह जोड़ दे (या बढ़ाए); याह ने जोड़ दिया (या बढ़ाया) है।” हालाँकि कुछ हस्तलिपियों में यहाँ “यूसुफ” लिखा है, लेकिन ज़्यादातर प्राचीन हस्तलिपियों में “योसेस” लिखा है।​—इसके मिलते-जुलते ब्यौरे मत 27:56 से तुलना करें।

सलोमी: मुमकिन है कि यह नाम एक इब्रानी शब्द से लिया गया है जिसका मतलब है, “शांति।” सलोमी, यीशु के चेलों में से एक थी। मत 27:56 की तुलना मर 3:17 और 15:40 से करने पर पता चलता है कि सलोमी शायद प्रेषित याकूब और यूहन्‍ना की माँ थी। मत्ती ने “जब्दी के बेटों की माँ” का ज़िक्र किया और मरकुस ने उसे “सलोमी” कहा। यही नहीं, मत्ती और मरकुस के ब्यौरे की तुलना यूह 19:25 से करने से पता चलता है कि सलोमी, यीशु की माँ मरियम की सगी बहन रही होगी। अगर ऐसा है तो याकूब और यूहन्‍ना यीशु के मौसेरे भाई थे। इसके अलावा मत 27:55, 56, मर 15:41 और लूक 8:3 से पता चलता है कि सलोमी उन औरतों में से एक थी, जो यीशु के साथ जाती थीं और अपनी धन-संपत्ति से उसकी सेवा करती थीं।

तैयारी का दिन: सबूतों से पता चलता है कि मरकुस ने अपनी किताब गैर-यहूदियों के लिए लिखी थी, इसलिए वह यहाँ तैयारी के दिन का मतलब समझाते हुए कहता है कि यह सब्त से पहले का दिन था। यह जानकारी खुशखबरी की दूसरी किताबों में नहीं पायी जाती। (मत 27:62; लूक 23:54; यूह 19:31) इसी दिन यहूदी सब्त की तैयारी करते थे। वे ज़्यादा खाना बनाते थे और ऐसे काम निपटाते थे जो सब्त के अगले दिन तक टाले नहीं जा सकते थे। ईसवी सन्‌ 33 में तैयारी के दिन नीसान 14 भी पड़ा।​—शब्दावली देखें।

अरिमतियाह: इस शहर का नाम एक इब्रानी शब्द से निकला है जिसका मतलब है, “ऊँचाई।” लूक 23:51 में इसे ‘यहूदिया के लोगों का शहर’ कहा गया है।​—अति. ख10 देखें।

महासभा: यरूशलेम में यहूदियों की सबसे बड़ी अदालत। “महासभा” के यूनानी शब्द सिनेड्रियोन का शाब्दिक मतलब है, “के साथ बैठना।” हालाँकि यह शब्द एक आम सभा के लिए भी इस्तेमाल होता था, लेकिन इसराएल में इसका मतलब फैसला सुनानेवाला धार्मिक समूह या अदालत भी हो सकता था।​—मत 5:22 का अध्ययन नोट और शब्दावली देखें; साथ ही महासभा का भवन कहाँ रहा होगा, यह जानने के लिए अति. ख12 देखें।

अरिमतियाह: मत 27:57 का अध्ययन नोट देखें।

यूसुफ: खुशखबरी की किताबों के चारों लेखकों ने यूसुफ के बारे में अलग-अलग जानकारी दी। इससे पता चलता है कि हर लेखक ने अपने अंदाज़ में किताब लिखी। जैसे, मत्ती कर-वसूलनेवाला था, इसलिए उसने लिखा कि यूसुफ “एक अमीर आदमी” था। मरकुस ने खासकर रोमी लोगों के लिए लिखा था, इसलिए उसने कहा कि वह “धर्म-सभा का एक इज़्ज़तदार सदस्य” था जो परमेश्‍वर के राज के आने का इंतज़ार कर रहा था। लूका हमदर्द वैद्य था, इसलिए उसने लिखा कि वह “एक अच्छा और नेक इंसान था” और उसने धर्म-सभा के लोगों का साथ नहीं दिया जो यीशु के खिलाफ साज़िश कर रहे थे। सिर्फ यूहन्‍ना ने यह लिखा कि वह “यीशु का एक चेला था, मगर यहूदियों के डर से यह बात छिपाए रखता था।”​—मत 27:57-60; मर 15:43-46; लूक 23:50-53; यूह 19:38-42.

धर्म-सभा का . . . सदस्य: यानी यरूशलेम में यहूदियों की सबसे बड़ी अदालत, महासभा का एक सदस्य।​—मत 26:59 का अध्ययन नोट और शब्दावली में “महासभा” देखें।

कब्र: या “स्मारक कब्र।” यह गुफा में बनी कब्र नहीं थी बल्कि चूने-पत्थर की चट्टान में बनायी गयी थी जिसे काटना आसान होता है। ऐसी कब्रों में अकसर ताक बने होते थे जिन पर लाशें रखी जाती थीं।​—शब्दावली में “स्मारक कब्र” देखें।

कब्र: मत 27:60 का अध्ययन नोट देखें।

पत्थर: ज़ाहिर है कि यह गोल था क्योंकि आयत कहती है कि उसे लुढ़काकर द्वार पर रखा गया था और मर 16:4 कहता है कि जब यीशु को ज़िंदा किया गया तो पत्थर “पहले से ही दूर लुढ़का हुआ था।” इसका वज़न शायद एक टन या उससे ज़्यादा रहा होगा। मत्ती के ब्यौरे में इसे “एक बड़ा पत्थर” बताया गया है।​—मत 27:60.

तसवीर और ऑडियो-वीडियो

महासभा
महासभा

यरूशलेम में यहूदियों की सबसे बड़ी अदालत को महासभा कहा जाता था। यह 71 सदस्यों से मिलकर बनी होती थी। (शब्दावली में “महासभा” देखें।) मिशना के मुताबिक, बैठने की जगह अर्ध-गोलाकार में तीन पंक्‍तियों में सीढ़ीनुमा होती थीं। दो शास्त्री अदालत के फैसले दर्ज़ करने के लिए मौजूद होते थे। चित्र में महासभा की जो बनावट दिखायी गयी है, उसकी कुछ बातें उस इमारत से मिलती-जुलती हैं जिसके खंडहर यरूशलेम में पाए गए हैं। कुछ लोगों का मानना है कि ये खंडहर पहली सदी की धर्म-सभा के भवन के हैं, जहाँ महासभा की अदालत लगती थी।​—अतिरिक्‍त लेख ख12, नक्शा “यरूशलेम और उसके आस-पास का इलाका” देखें।

1. महायाजक

2. महासभा के सदस्य

3. आरोपी

4. शास्त्री

एड़ी की हड्डी में कील
एड़ी की हड्डी में कील

इस तसवीर में दिखाया गया है कि कैसे एक इंसान की एड़ी में 4.5 इंच (11.5 सें.मी.) लंबी एक लोहे की कील ठोंकी गयी है। यह सचमुच की एड़ी की हड्डी नहीं बल्कि उसका नमूना है। असली हड्डी का टुकड़ा तो 1968 में पुरातत्ववेत्ताओं को उत्तरी यरूशलेम में खुदाई के वक्‍त मिला था। यह टुकड़ा रोमी लोगों के ज़माने का था। इससे पता चलता है कि लोगों को कीलों से काठ पर ठोंका जाता था। रोमी सैनिकों ने शायद इसी तरह की कीलों से यीशु मसीह को काठ पर ठोंका था। हड्डी का वह टुकड़ा पत्थर के एक बक्से में मिला था जिसमें लाश के सड़ जाने पर उसकी हड्डियाँ रखी जाती थीं। इससे पता चलता है कि किसी को काठ पर लटकाकर मार डालने के बाद कभी-कभी उसे दफनाया जाता था।

कब्र
कब्र

यहूदी आम तौर पर गुफाओं या चट्टानों को काटकर बनायी गयी कब्रों में लाश दफनाते थे। राजाओं की कब्रों को छोड़ बाकी सभी कब्रें शहरों से बाहर होती थीं। गौर करने लायक बात यह है कि जो यहूदी कब्रें मिली हैं, वे बहुत सादी हैं। ऐसा इसलिए था क्योंकि सबूत दिखाते हैं कि यहूदी न तो मरे हुओं की पूजा करते थे और न ही अमर आत्मा की शिक्षा को बढ़ावा देते थे।