भजन 63:1-11

दाविद का सुरीला गीत। यह गीत उस समय का है जब दाविद यहूदा के वीराने में था।+ 63  हे परमेश्‍वर, तू मेरा परमेश्‍वर है, मैं तुझे ढूँढ़ता रहता हूँ।+ मैं तेरे लिए प्यासा हूँ।+ इस सूखी तपती ज़मीन पर, जहाँ एक बूँद पानी भी नहीं,मैं तेरे लिए इतना तरस रहा हूँ कि बेहोश होने पर हूँ।+   जब मैंने तुझे पवित्र जगह में देखा था,तब मैंने तेरी ताकत और महिमा की झलक पायी थी।+   तेरा अटल प्यार जीवन से कहीं ज़्यादा अनमोल है,+इसलिए मेरे होंठ तेरी महिमा करेंगे।+   मैं सारी ज़िंदगी तेरी तारीफ करूँगा,हाथ उठाकर तेरा नाम पुकारूँगा।   मैं उम्दा और सबसे बढ़िया हिस्सा पाकर* संतुष्ट हूँ।इसलिए मेरे होंठ खुशी से तेरी तारीफ करेंगे।+   मैं बिस्तर पर लेटे तुझे याद करता हूँ,रात के पहर तेरे बारे में मनन करता हूँ।+   क्योंकि तू मेरा मददगार है,+मैं तेरे पंखों की छाँव तले खुशी से जयजयकार करता हूँ।+   मैं तुझसे लिपटा रहता हूँ,तेरा दायाँ हाथ मुझे थामे रहता है।+   मगर जो मेरी जान के पीछे पड़े हैं,वे धरती की गहराइयों में समा जाएँगे। 10  वे तलवार के हवाले कर दिए जाएँगे,गीदड़ों* का निवाला बन जाएँगे। 11  मगर राजा परमेश्‍वर के कारण मगन होगा। जो कोई परमेश्‍वर की शपथ खाता है, वह खुशियाँ मनाएगा,*क्योंकि झूठ बोलनेवालों का मुँह बंद कर दिया जाएगा।

कई फुटनोट

शा., “मैं मानो चरबी और चिकने भोजन से।”
या “लोमड़ियों।”
या “गर्व करेगा।”

अध्ययन नोट

तसवीर और ऑडियो-वीडियो