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परिवार के लिए मदद | शादी का बंधन

नाराज़गी कैसे दूर करें

नाराज़गी कैसे दूर करें

चुनौती

आपके जीवन-साथी ने आपके खिलाफ कुछ बुरा-भला कहा या किया है और आप उसे भुला नहीं पाते। रुखाई से कही उसकी बातें और बिना सोचे-समझे किए उसके काम बार-बार आपके मन में आते रहते हैं। नतीजा अपने जीवन-साथी के लिए आपके दिल में जो प्यार था वह अब गुस्सा या नाराज़गी में बदल गया है। अब आपको लगता है कि इससे निकलने का कोई रास्ता नहीं। आपके लिए शादीशुदा ज़िंदगी बोझ बन गयी है जिसमें प्यार है ही नहीं, आपको बस उसे ढोना है।

हार मत मानिए, हालात सुधर सकते हैं। सबसे पहले नाराज़गी से जुड़ी कुछ बातों पर गौर कीजिए।

आपको क्या मालूम होना चाहिए

नाराज़गी पालना पति-पत्नी को ज़िंदगी के सफर में आगे बढ़ने से रोकता है

नाराज़गी, शादी को तबाह कर सकती है। क्यों? क्योंकि नाराज़गी उन गुणों को नज़रअंदाज़ कर देती है, जिन पर शादी की बुनियाद खड़ी होती है, जैसे: प्यार, भरोसा और वफादारी। दरअसल नाराज़गी शादीशुदा ज़िंदगी में उठनेवाली समस्याओं का नतीजा नहीं है। यह अपने आप में एक समस्या है। इसलिए बाइबल कहती है: “हर तरह की जलन-कुढ़न . . . को खुद से दूर करो।”—इफिसियों 4:31.

अगर आप नाराज़गी पालते हैं तो आप खुद को नुकसान पहुँचा रहे होते हैं। नाराज़गी पालना ऐसा है मानो एक व्यक्‍ति खुद के गाल पर तमाचा मारता है और उम्मीद करता है कि दूसरे को दर्द होगा। अपनी किताब पारिवारिक झगड़ों को सुलझाना (अँग्रेज़ी) में मार्क ज़ीकल लिखते हैं: “परिवार के जिस सदस्य से आपकी नाराज़गी है, उस व्यक्‍ति को शायद आपकी नाराज़गी के बारे में पता ही न हो, वह अपने रोज़मर्रा के काम करता रहे और शायद उस पर इन सबका कोई असर ही न हो।” निचोड़ क्या है? ज़ीकल आगे कहते हैं, ‘नाराज़गी पालने से हमें ज़्यादा चोट पहुँचती है, इतनी शायद उस व्यक्‍ति के शब्दों या कामों से न पहुँचे।’

नाराज़गी पालना ऐसा है मानो एक व्यक्‍ति खुद के गाल पर तमाचा मारता है और उम्मीद करता है कि दूसरे को दर्द होगा

नाराज़गी पालना या न पालना, चुनाव आपको करना है। कुछ लोगों को शायद यह बात अजीब लगे कि एक व्यक्‍ति को खुद फैसला लेना होता है कि वह नाराज़ होगा या नहीं। शायद वह कहे ‘मेरे जीवन-साथी ने मुझे नाराज़ होने पर मजबूर किया है।’ इस तरह की सोच रखने का मतलब है कि हम चाहते हैं, दूसरे अपना व्यवहार बदलें मगर हकीकत यह है कि दूसरों का व्यवहार बदलना हमारे बस की बात नहीं। ऐसे में बाइबल एक सुझाव देती है “हर कोई खुद अपने काम की जाँच करे।” (गलातियों 6:4) किसी हालात में दूसरे क्या कहते या करते हैं इस पर हमारा कोई ज़ोर नहीं, मगर हाँ, उस वक्‍त हम कैसे पेश आते हैं, यह पूरी तरह हमारे हाथ में है। नाराज़गी पालना हर समस्या का हल नहीं है।

आप क्या कर सकते हैं

अपनी नाराज़गी की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लीजिए। ऐसे हालात में जीवन-साथी पर दोष लगाना बहुत आसान है। पर याद रखिए नाराज़गी पालने या न पालने का चुनाव आपका है। उसी तरह गलतियों को माफ करना भी आप ही के हाथ में है। बाइबल में दी यह सलाह लागू कीजिए, “सूरज ढलने तक तुम्हारा गुस्सा बना न रहे।” (इफिसियों 4:26) जब आपमें माफ करने का गुण होगा, तो शादीशुदा ज़िंदगी में उठनेवाली समस्याएँ ठंडे दिमाग से सुलझायी जा सकती हैं।—बाइबल सिद्धांत: कुलुस्सियों 3:13.

ईमानदारी से खुद की जाँच कीजिए। बाइबल इस बात को मानती है कि कुछ लोग ‘क्रोध करनेवाले’ और कुछ ‘अत्यन्त क्रोध करनेवाले’ होते हैं। (नीतिवचन 29:22) क्या आपका स्वभाव भी कुछ ऐसा है? अगर हाँ, तो खुद से पूछिए: ‘क्या मैं अकसर कड़वाहट पालता हूँ? मुझे कितनी जल्दी गुस्सा आता है? क्या मैं बात-बात पर राई का पहाड़ बना देता हूँ?’ बाइबल कहती है, “जो [व्यक्‍ति] बात की चर्चा बार बार करता है, वह परम मित्रों में भी फूट करा देता है।” (नीतिवचन 17:9; सभोपदेशक 7:9) यही सिद्धांत शादीशुदा ज़िंदगी में भी लागू होता है। इसलिए नाराज़गी पालना अगर आपकी आदत है, तो खुद से पूछिए, ‘क्या मैं अपने जीवन-साथी के साथ थोड़ा और सब्र से पेश आ सकता हूँ?बाइबल सिद्धांत: 1 पतरस 4:8.

जो ज़रूरी है उस पर ध्यान दीजिए। बाइबल कहती है, “चुप रहने का समय, और बोलने का भी समय है।” (सभोपदेशक 3:7) हर छोटी-छोटी गलती के बारे में बात करना ज़रूरी नहीं है। इसके बजाय, आप कभी-कभी बात को यूँ ही जाने दे सकते हैं, जैसे बाइबल कहती है, “अपने बिछौने पर मन ही मन सोचो और चुपचाप रहो।” (भजन 4:4) जब आपको लगता है कि मामले पर चर्चा करना ज़रूरी है, तो उस वक्‍त चर्चा कीजिए जब आपका गुस्सा शांत हो जाए। बेऑट्रीस जो एक पत्नी है, कहती है, “जब मुझे किसी बात से चोट पहुँचती है तो मैं पहले शांत होने की कोशिश करती हूँ। फिर कुछ समय बीतने पर मुझे एहसास होता है कि मामला तो उतना गंभीर था ही नहीं, तब मैं और भी आदर से अपनी बात कह पाती हूँ।”—बाइबल सिद्धांत: नीतिवचन 19:11.

“माफ करने” का असली मतलब जानिए। बाइबल में शब्द “माफ करना” कहीं-कहीं पर मूल भाषा के उस शब्द का अनुवाद है, जिसका मतलब है किसी चीज़ को जाने देना। इसलिए माफ करने का मतलब यह नहीं कि आप दूसरों की गलती को कम आँक रहे हैं या ऐसे पेश आ रहे हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं। असल में इसका मतलब हो सकता है कि आप मामले को बस यूँ ही जाने देते हैं। वह इसलिए कि आप जानते हैं कि नाराज़गी पालने से आपको ज़्यादा नुकसान हो सकता है, आपकी सेहत और आपकी शादीशुदा ज़िंदगी दोनों बिगड़ सकती हैं। ▪ (g14-E 09)