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ऐसे बच्चों की परवरिश करना जिन्हें खास देखभाल की ज़रूरत है

ऐसे बच्चों की परवरिश करना जिन्हें खास देखभाल की ज़रूरत है

ऐसे बच्चों की परवरिश करना जिन्हें खास देखभाल की ज़रूरत है

फिनलैंड में सजग होइए! लेखक द्वारा

आइए मारकुस (बायीं तरफ) से मिलिए। उसकी उम्र 20 साल है। मारकुस बगैर मदद के न तो खा-पी सकता है और ना ही नहा-धो सकता है। वह रात को ठीक-से सो भी नहीं पाता और पूरी रात उसकी देखभाल करने के लिए किसी-न-किसी को होना चाहिए। वह कई बार चोट खा चुका है, इसलिए अकसर उसकी मरहम-पट्टी करने की ज़रूरत पड़ी है। मगर इन सब कमियों के बावजूद मारकुस अपने माँ-बाप की जान है। उन्हें उसकी यह बात बहुत अच्छी लगती है कि वह शांत स्वभाव का है और दूसरों से प्यार और उनकी परवाह करता है। उन्हें इस बात का गम नहीं कि मारकुस आम बच्चों की तरह नहीं है, बल्कि उन्हें अपने बेटे पर नाज़ हैं।

‘विश्‍व स्वास्थ्य संगठन’ का अनुमान है कि बड़े-बड़े देशों में हर तीसरा शख्स किसी-न-किसी तरह से मेन्टली रिटारडेड या मानसिक रूप से मंद है। इसकी कई वजह हो सकती हैं। जैसे, खानदानी बीमारी, जन्म के वक्‍त बच्चे के सिर पर पहुँची चोट, बचपन में मस्तिष्क में किसी तरह का इंफेक्शन होना, पौष्टिक आहार की कमी और रसायनों का बुरा असर। इसके अलावा, माँ का नशीली दवाइयाँ लेने या शराब पीने से भी गर्भ में पल रहे बच्चे की दिमागी शक्‍ति पर असर पड़ सकता है। लेकिन ज़्यादातर मामलों में वजह का पता लगाना मुमकिन नहीं होता। क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसे माँ-बाप की ज़िंदगी कैसी होती है जिनके बच्चे, आम बच्चों की तरह नहीं होते? हम ऐसे माँ-बाप की हिम्मत कैसे बढ़ा सकते हैं?

जब उन्हें बुरी खबर दी जाती है

माता-पिता का संघर्ष तब शुरू होता है, जब उन्हें पहली बार पता चलता है कि उनका बच्चा मानसिक रूप से मंद है। सिर्कका नाम की एक माँ याद करती है: “जब मुझे और मेरे पति को पता चला कि हमारी बिटिया को डाउन सिंड्रोम है, तो हमारा कलेजा फट गया।” मारकुस की माँ, आना कहती है: “जब मुझे बताया गया कि मारकुस, मानसिक रूप से मंद होगा, तो मुझे यह चिंता सताने लगी कि दूसरे उसे किस नज़र से देखेंगे। लेकिन इस चिंता में डूब जाने के बजाय मैंने अपना ध्यान उसकी ज़रूरतों को पूरा करने और यह जानने में लगाया कि मैं उसके लिए क्या कर सकती हूँ।” ईर्मगार्ड ने भी कुछ ऐसा ही किया। वह कहती है: “जब डॉक्टरों ने हमें बताया कि हमारी बेटी यूनिके मानसिक रूप से मंद है, तब मेरे दिमाग में बस एक ही बात घूमने लगी कि मैं अपनी बच्ची की मदद कैसे कर सकती हूँ।” सिर्कका, आना और ईर्मगार्ड जैसे माता-पिताओं को जब बुरी खबर दी जाती है, तो ऐसे में वे क्या कर सकते हैं?

‘मानसिक और शारीरिक रूप से दुर्बल बच्चों के लिए अमरीका का राष्ट्रीय प्रसार केंद्र’ यह सलाह देता है: “सबसे पहले तो आप ज़रूरी जानकारी इकट्ठी कर सकते हैं। जैसे, अपने बच्चे की बीमारी के बारे में, क्या सेवाएँ उपलब्ध हैं, और आप उसे अपने हाथ-पैर और दिमाग का जितना हो सके, उतना इस्तेमाल करने में किन खास तरीकों से मदद दे सकते हैं।” जिस तरह एक मुसाफिर एक नक्शे की मदद से देख पाता है कि उसने कितने फासले तय किए हैं और वह कहाँ-कहाँ से गुज़र रहा है, ठीक उसी तरह माँ-बाप इन तमाम जानकारी को इस्तेमाल करके यह देख पाते हैं कि बच्चे की देखभाल करने में वे किस दिशा में जा रहे हैं और क्या हासिल कर रहे हैं।

आशा की किरण

हालाँकि ऐसे बच्चों के माँ-बाप को कदम-कदम पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, मगर निराशा में भी आशा की किरण होती है। वह कैसे? आइए चार वजहों पर गौर करें।

पहली, माता-पिता को यह जानकर तसल्ली मिल सकती है कि अकसर ऐसे बच्चे दुःखी नहीं हैं। अपनी किताब, द रिटारडेड चाइल्ड में डॉ. रॉबर्ट आइज़क्सन लिखते हैं: “ज़्यादातर बच्चे खुश-मिज़ाज होते हैं, उन्हें दूसरों का साथ अच्छा लगता है, वे संगीत सुनना, खेल-कूद करना, लज़ीज़ खाना खाना और दोस्तों के साथ घुलना-मिलना पसंद करते हैं।” भले ही वे आम बच्चों के मुकाबले ज़िंदगी में ज़्यादा कुछ हासिल नहीं कर पाते और उनका कम लोगों से वास्ता पड़ता है, मगर वे अपनी “छोटी-सी दुनिया” में आम बच्चों से ज़्यादा खुश रहते हैं।

दूसरी, माता-पिता अपने बच्चे की उन कामयाबियों पर नाज़ कर सकते हैं जो बच्चे को बहुत मेहनत करने के बाद मिलती हैं। बच्चे के लिए हर नया काम सीखना, पहाड़ चढ़ने के बराबर होता है। और जब बच्चा इसमें कामयाब हो जाता है, तो इससे माँ-बाप और बच्चे दोनों को बेइंतिहा खुशी मिलती है। ब्रायन की मिसाल लीजिए। उसे ट्यूबरस स्क्लेरॉसिस (एक किस्म की खानदानी बीमारी) और ऑटिज़्म (एक किस्म का मानसिक विकार जिसमें बच्चा अपने आप में खोया रहता है) है और उसे दौरे भी पड़ते हैं। वह होशियार है, मगर बोल नहीं सकता और अपने हाथों पर भी उसका कोई काबू नहीं है। इसके बावजूद, उसने धीरे-धीरे कप में से पानी वगैरह पीना सीख लिया है। पहले उसने आधे कप में से, फिर भरे हुए कप में से पीने की कोशिश की। इस तरह अपने दिमाग और शरीर का तालमेल बिठाने का नतीजा यह हुआ है कि अब ब्रायन अपना सबसे पसंदीदा ड्रिंक, दूध खुद-ब-खुद पी सकता है।

ब्रायन के माता-पिता का मानना है कि इस कामयाबी से उसने अपनी कमियों पर एक और छोटी जीत पायी है। उसकी माँ, लॉरी का कहना है: “हमारी नज़र में हमारा बेटा, जंगल में पाए जानेवाले बाँज या सागौन पेड़ की तरह है। ये पेड़ हालाँकि दूसरे पेड़ों की तरह जल्दी नहीं बढ़ते, मगर उनकी लकड़ियाँ बहुत कीमती होती हैं। उसी तरह मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चे भी धीरे-धीरे बढ़ते हैं। मगर उनके माता-पिता की नज़र में वे कीमती और टिकाऊ पेड़ की तरह होते हैं।”

तीसरी वजह, बहुत-से माता-पिताओं का दिल भर आता है जब वे देखते हैं कि उनके बच्चे स्वभाव से बहुत प्यार करनेवाले हैं। ईर्मगार्ड कहती है: “यूनिके जल्दी सोना पसंद करती है, मगर सोने से पहले वह हमेशा घर के सभी लोगों को पप्पी देती है। अगर किसी दिन घर लौटने में हमें देर हो जाती है, तो वह एक छोटा-सा नोट लिखती है और माफी माँगती है कि हमारे आने का इंतज़ार करने के बजाय वह सोने चली गयी। इतना ही नहीं, वह यह भी लिखती है कि वह हमसे प्यार करती है और उसे सुबह हमसे मिलने का इंतज़ार रहेगा।”

मारकुस बोल नहीं सकता, मगर उसने जी-तोड़ कोशिश करके साइन लैंग्वेज में कुछ शब्द सीखे हैं, ताकि अपने मम्मी-डैडी को बता सके कि वह उनसे बेहद प्यार करता है। टीआ एक ऐसी लड़की है जिसका मानसिक रूप से विकास नहीं हुआ है। उसके बारे में उसके माता-पिता कहते हैं: “टीआ जिस तरह हमसे लिपटकर या हमें चूमकर अपना प्यार जताती है, उससे वह हमारी ज़िंदगी में खुशियों की बहार ले आयी है।” जिस तरह ये बच्चे अपना प्यार ज़ाहिर करते हैं, उनके माता-पिताओं को भी अपनी बातों और अपने बर्ताव से उनके लिए प्यार जताना चाहिए।

चौथी वजह यह है कि मसीही माता-पिताओं को बड़ी खुशी मिलती है, जब उनका बच्चा परमेश्‍वर पर अपना विश्‍वास ज़ाहिर करता है। यूहा इसकी अच्छी मिसाल है। अपने पिता की अंत्येष्टि पर उसने प्रार्थना करने की इजाज़त माँगकर सबको हैरत में डाल दिया। अपनी छोटी-सी प्रार्थना में उसने कहा कि उसे विश्‍वास है कि उनके पापा, परमेश्‍वर की याद में बसे हैं और परमेश्‍वर उन्हें अपने ठहराए वक्‍त पर दोबारा ज़िंदा करेगा। फिर उसने सभी घरवालों का नाम लेकर परमेश्‍वर से दुआ की कि वह इस हालात का सामना करने में उनकी मदद करे।

उसी तरह, परमेश्‍वर पर यूनिके का भरोसा देखकर उसके माता-पिता फूले नहीं समाते। यूनिके को जो-जो सिखाया जाता है, उसे हर बात समझ में नहीं आती है। मिसाल के लिए, वह बाइबल के कई किरदारों के बारे में जानती है मगर उनका, दूसरी जानकारी से क्या ताल्लुक है, वह यह नहीं जानती। बहरहाल, वह इतना ज़रूर समझती है कि एक-न-एक-दिन सर्वशक्‍तिमान परमेश्‍वर दुनिया की तमाम समस्याओं को मिटा देगा। यूनिके को उस दिन का इंतज़ार है जब परमेश्‍वर की नयी दुनिया में वह मानसिक रूप से मंद नहीं होगी और ज़िंदगी का लुत्फ उठा सकेगी।

उन्हें आत्म-निर्भर होना सिखाइए

मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चे की हालत, बड़े होने पर भी वैसी-की-वैसी रहती है। इसलिए उनके माता-पिता को चाहिए कि वे उन्हें आत्म-निर्भर होना सिखाएँ। मारकुस की माँ, आना कहती है: “अगर हम कोई काम मारकुस को कोशिश करने देने के बजाय खुद करें, तो उसे बड़ी आसानी से और मिनटों में निपटा सकते हैं। मगर हमने ऐसा नहीं किया। उलटा हमने वह काम उसे करने दिया और जहाँ-जहाँ उसे मदद चाहिए थी, वहाँ उसकी मदद की।” यूनिके की माँ कहती है: “यूनिके में कई अच्छे गुण हैं, मगर कभी-कभी वह बहुत ज़िद्दी हो जाती है। जो काम वह नहीं करना चाहती, वह उससे करवाने के लिए हमें उसे याद दिलाना पड़ता है कि अगर वह हमें खुश करना चाहती है, तो उसे वह काम करना होगा। हमारी बात मानने के बाद भी हमें उसे तब तक उकसाते रहना पड़ता है, जब तक कि वह उसे पूरा न कर दे।”

ब्रायन की माँ, लॉरी हमेशा अपने बेटे की ज़िंदगी को खुशगवार बनाने की कोशिश में लगी रहती है। उसने और उसके पति ने तीन साल तक ब्रायन को कंप्यूटर पर टाइपिंग करना सिखाया है। ब्रायन बहुत खुश है कि अब वह अपने दोस्तों और रिश्‍तेदारों को कंप्यूटर के ज़रिए ई-मेल भेज सकता है। लेकिन टाइपिंग करते वक्‍त किसी-न-किसी को उसकी कलाई पकड़नी पड़ती है। उसके माता-पिता अभी कोशिश कर रहे हैं कि ब्रायन सिर्फ कोहनी के सहारे खुद-ब-खुद टाइपिंग कर पाए। उन्हें मालूम है कि कलाई को छोड़कर सिर्फ कोहनी को सहारा देने में अगर वे कामयाब हो जाते हैं, तो इसका मतलब होगा कि ब्रायन पहले से ज़्यादा आत्म-निर्भर हो गया है।

लेकिन माता-पिता को ध्यान रखना चाहिए कि वे अपने बच्चे से हद-से-ज़्यादा की उम्मीद न करें या उस पर ज़्यादा दबाव न डालें। हर बच्चे में एक-जैसी काबिलीयत नहीं होती। किताब, खास बच्चा (अँग्रेज़ी) यह सुझाव देती है: “इस मामले में माता-पिताओं को इस सिद्धांत पर चलना चाहिए कि वे अपने बच्चों को आत्म-निर्भर होने का बढ़ावा देने के साथ-साथ उन्हें ज़रूरी मदद भी दें, ताकि बच्चे निराश न हो जाएँ।”

सबसे बड़ी मदद

मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चों के माँ-बाप के लिए सब्र और धीरज से काम लेना बहुत ज़रूरी है। जब उनके आगे एक-के-बाद-एक समस्या आती है, तो उनसे लड़ते-लड़ते वे अकसर थक-हार जाते हैं। और अकसर इसके बुरे अंजाम निकलते हैं। वे शायद लाचार महसूस करके रो पड़ें और खुद पर तरस खाना भी शुरू कर दें। ऐसे में माता-पिता क्या कर सकते हैं?

माता-पिता, “प्रार्थना के सुननेवाले” परमेश्‍वर को मदद के लिए पुकार सकते हैं। (भजन 65:2) वह उन्हें मुश्‍किल हालात में डटे रहने के लिए उम्मीद, ताकत और साहस देता है। (1 इतिहास 29:12; भजन 27:14) वह हमारे दुःखों में हमें तसल्ली देता है और चाहता है कि हम उस “आशा में आनन्दित” रहें, जो बाइबल में दी गयी है। (रोमियों 12:12; 15:4,5; 2 कुरिन्थियों 1:3,4) परमेश्‍वर पर भरोसा रखनेवाले माता-पिता इस बात का यकीन रख सकते हैं कि भविष्य में जब ‘अन्धों की आखें और बहिरों के कान खोले जाएंगे, लंगड़े चलने लगेंगे और गूंगे खुशी के मारे चिल्लाने लगेंगे’ तब उनका लाडला या लाडली भी तन और मन से एकदम तंदुरुस्त होगा।—यशायाह 35:5,6; भजन 103:2,3. (4/06)

माता-पिता क्या कर सकते हैं

अपने बच्चे की कमी के बारे में जानने की कोशिश कीजिए।

निराश मत होइए, मगर एक सही नज़रिया रखिए।

जहाँ तक मुमकिन हो, अपने बच्चे को आत्म-निर्भर होना सिखाइए।

परमेश्‍वर से उम्मीद, ताकत और साहस पाइए।

दूसरे क्या कर सकते हैं

बच्चे से उसकी उम्र के हिसाब से बात कीजिए और उसमें सच्ची दिलचस्पी लीजिए।

माता-पिता से उनके बच्चे के बारे में बात कीजिए और उनकी मेहनत की सराहना कीजिए।

माता-पिता की भावनाओं को समझने की कोशिश कीजिए और उन्हें लिहाज़ दिखाइए।

ऐसे बच्चों के माता-पिताओं और परिवारों के साथ मिलकर कुछ कीजिए और वक्‍त बिताइए।

[पेज 18 पर बक्स/तसवीर]

दूसरे किस तरह मदद कर सकते हैं

दर्शक, रेस में दौड़ लगानेवालों के धीरज को देखकर उनकी दाद देते हैं। उसी तरह, आप शायद यह देखकर हैरान रह जाएँ कि मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चे के माता-पिता में कितना दम है। वे चौबीसों घंटे लगातार अपने बच्चे की देखरेख में लगे रहते हैं। आम तौर पर, रेस के दर्शक दौड़ लगानेवालों के हाथों में पानी की बोतलें थमाते हैं, ताकि पानी पीकर उन्हें दौड़ते रहने की ताकत मिले। सवाल यह है कि क्या आप ऐसे माँ-बाप को ताज़गी पहुँचा सकते हैं, जो ज़िंदगी-भर अपने बच्चे की खास ज़रूरतें पूरी करने में लगे रहते हैं?

ऐसा करने का एक आसान तरीका है, उनके बेटे या बेटी से बात करना। आपको शुरू-शुरू में शायद अजीब लगे क्योंकि हो सकता है, बच्चा आपकी बातों का हाँ-हूँ में जवाब दे या कुछ भी न बोले। मगर यह मत भूलिए कि ऐसे बहुत-से बच्चे दूसरों की सुनना पसंद करते हैं और हो सकता है, वे आपकी बातों पर गहराई से सोचें। कुछ मामलों में आपको पता नहीं चलेगा कि वे क्या सोच रहे हैं और उनके चेहरों से भी आपको उनकी भावनाओं का पता नहीं चलेगा। *

बाल स्नायु-विशेषज्ञ, डॉ. आननिके कॉइसटिनेन सुझाव देती है कि आप ऐसे बच्चों के साथ बातचीत कैसे कर सकते हैं: “पहले, आप शायद उनके परिवार या उनके शौक के बारे में बात कर सकते हैं। उनकी उम्र के हिसाब से बात कीजिए, ऐसे मत बोलिए जैसे आप किसी छोटे बच्चे से बात कर रहे हों। एक वक्‍त में एक विषय पर बात कीजिए और छोटे-छोटे वाक्यों का इस्तेमाल कीजिए। जल्दी-जल्दी मत बोलिए, बल्कि आपकी बातों पर उन्हें सोचने का वक्‍त दीजिए।”

बच्चों के माता-पिता भी चाहते हैं कि उनसे बात करनेवाला कोई हो। जब आप उनसे बात करेंगे और जानेंगे कि उन्हें किन-किन भावनाओं से गुज़रना पड़ता है, तो आप उनके दर्द को और अच्छी तरह समझ पाएँगे। मिसाल के लिए, मारकुस की माँ, आना अपने लाडले बेटे को और करीब से जानना चाहती है। उसे इस बात का गम है कि मारकुस उससे बात नहीं कर सकता और उसके मन में क्या चल रहा है, वह उसे नहीं बता सकता। उसे यह चिंता भी सताती रहती है कि उसके मरने के बाद, कौन उसके बेटे की देखभाल करेगा।

माता-पिता, मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चे की देखभाल में जी-जान लगा देते हैं, फिर भी उन्हें लगता है कि उन्हें और भी कुछ करना चाहिए। ब्रायन की देखभाल में अगर कोई भी कमी रह जाती है, तो उसके लिए उसकी माँ, लॉरी खुद को कोसती है। वह खुद को इस बात के लिए भी कसूरवार ठहराती है कि वह अपने दूसरे बच्चों पर सही तरह से ध्यान नहीं दे पाती है। इन माता-पिताओं में दिलचस्पी लेने, उनकी सराहना करने और उनकी भावनाओं के लिए लिहाज़ दिखाने से आप, उन्हें और उनके बच्चों को आदर देते हैं और उन्हें एहसास दिलाते हैं कि आप उनके साथ हैं। इस मामले में ईर्मगार्ड कहती है: “मुझे अच्छा लगता है जब कोई मेरी बेटी के बारे में बात करता है। मैं उन लोगों के करीब महसूस करती हूँ जो यूनिके के और मेरे सुख-दुःख में शरीक होना चाहते हैं।”

आप और भी कई छोटे-बड़े तरीकों से उनकी मदद कर सकते हैं। आप ऐसे माता-पिताओं और उनके बच्चे को अपने घर बुला सकते हैं या अगर आप अपने परिवार के साथ कुछ करने की सोच रहे हैं, तो उन्हें भी शामिल कर सकते हैं। यह भी मुमकिन हो सकता है कि आप, बच्चे के साथ कुछ घंटे बिताएँ जिससे उसके माता-पिता को आराम करने की थोड़ी फुरसत मिले।

[फुटनोट]

^ पैरा. 37 मई 8,2000 की सजग होइए! (अँग्रेज़ी) में लेख, “खामोशी की दुनिया से बाहर निकलने का लॉयडा का सफर” देखिए।

[पेज 18 पर तसवीर]

सच्ची परवाह दिखाने से आप, माता-पिता और बच्चे को आदर देते हैं

[पेज 19 पर तसवीर]

यूनिके की तरह मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चों को बड़े होने के बाद भी लगातार प्यार की ज़रूरत पड़ती है

[पेज 20 पर तसवीर]

लॉरी ने अपने बेटे ब्रायन को टाइपिंग करना सिखाया है और अब वह काफी हद तक आत्म-निर्भर है