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जीवन कहानी

यहोवा के लिए सबकुछ मुमकिन है

यहोवा के लिए सबकुछ मुमकिन है

“मौत नहीं रहेगी और जो मर गए हैं, वे भी ज़िंदा किए जाएँगे।” मेरी पत्नी, मायराम-बूबू ने बस में एक औरत को यह कहते सुना। वह सोच में पड़ गयी कि यह औरत क्या कह रही है। वह इसका मतलब जानना चाहती थी, इसलिए जब बस रुकी और कुछ लोग उतर गए तो वह उस औरत के पीछे-पीछे गयी। उस औरत का नाम आपून मामबेट-सादिकोवा था और वह यहोवा की एक साक्षी थी। उन दिनों साक्षियों से बात करना खतरे से खाली नहीं था, लेकिन हमने आपून से आगे चलकर जो बातें सीखीं उनसे हमारी ज़िंदगी ही बदल गयी।

सुबह से शाम तक कड़ी मेहनत की

मेरा जन्म 1937 में किर्गिस्तान के टौक-माक कसबे के पास हुआ। हम किर्गिस जाति के हैं और किर्गिस भाषा बोलते हैं। मेरे माता-पिता कौलखोज़ में यानी कई खेतों से मिलकर बनी ज़मीन पर दूसरे मज़दूरों के साथ कड़ी मेहनत करते थे। मज़दूरों को राशन-पानी तो मिलता था लेकिन मज़दूरी साल में एक बार मिलती थी। माँ ने मुझे और मेरी बहन को बहुत मुश्‍किल से पाला-पोसा। मैंने स्कूल में पाँच साल तक पढ़ाई की, इसके बाद मैंने भी कौलखोज़ में मज़दूरी करना शुरू किया।

टेस्की आला-टू पर्वतमाला

मैं ऐसे इलाके में रहता था जहाँ घोर गरीबी थी और दो वक्‍त की रोटी जुटाने के लिए कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ती थी। जब मैं जवान था तो मैं ज़िंदगी के मकसद और भविष्य के बारे में इतना नहीं सोचता था। लेकिन तब मुझे क्या पता था कि यहोवा परमेश्‍वर और उसके मकसद के बारे में सच्चाई जानने से मेरी ज़िंदगी ही बदल जाएगी! आप शायद सोच रहे होंगे कि किर्गिस्तान में लोगों तक सच्चाई कैसे पहुँची? यह एक रोमांचक कहानी है और इसकी शुरूआत उत्तरी किर्गिस्तान में हुई जहाँ से मैं आया था।

साइबेरिया से आए लोगों ने किर्गिस्तान में सच्चाई फैलायी

किर्गिस्तान में सच्चाई 1950 के दशक में पहुँची। उस वक्‍त किर्गिस्तान सोवियत संघ का हिस्सा था और लोगों के दिलो-दिमाग में कम्यूनिस्ट विचारधारा ज़ोर पकड़ी हुई थी। इसलिए सच्चाई का बीज बढ़ने के लिए पहले इस विचारधारा पर जीत पाना ज़रूरी था। उस दौरान पूरे सोवियत संघ में यहोवा के साक्षी राजनैतिक मामलों में निष्पक्ष बने रहे। (यूह. 18:36) इस वजह से कम्यूनिस्ट सरकार ने उन्हें दुश्‍मन समझकर उन पर ज़ुल्म ढाए। लेकिन कोई भी विचारधारा परमेश्‍वर के वचन को नेकदिल लोगों तक पहुँचने से रोक नहीं सकती। अपने अनुभव से मैंने यही सीखा है कि यहोवा के लिए “सबकुछ मुमकिन है।”​—मर. 10:27.

एमील यानसेन

साक्षियों पर ढाए ज़ुल्म का नतीजा यह हुआ कि किर्गिस्तान में सच्चाई फैली। वह कैसे? सोवियत संघ में साइबेरिया का इलाका भी आता था। जिन लोगों को कम्यूनिस्ट सरकार अपना दुश्‍मन मानती थी, वह उन्हें देश से खदेड़कर यहीं साइबेरिया भेजती थी। जब इन लोगों को रिहा किया गया तो बहुत-से लोग किर्गिस्तान आए। एमील यानसेन उनमें से एक थे। उनका जन्म 1919 में किर्गिस्तान में हुआ था। जब वे मज़दूरों के शिविर में थे तब उनकी मुलाकात साक्षियों से हुई। उन्होंने सच्चाई सीखी और 1956 में वे अपने घर लौटे। वे ज़ोकुलुक के पास एक इलाके में बस गए जहाँ मेरा घर था और सच्चाई का संदेश फैलाया। सन्‌ 1958 में किर्गिस्तान में सबसे पहली मंडली ज़ोकुलुक में बनी थी।

विक्टर विंटर

इसके करीब एक साल बाद भाई विक्टर विंटर, ज़ोकुलुक आकर बस गए। इस वफादार भाई ने एक-के-बाद-एक कई मुश्‍किलों का सामना किया। निष्पक्ष रहने की वजह से उन्हें दो बार, तीन-तीन साल के लिए जेल की सज़ा हुई। इसके बाद उन्हें और दस साल जेल जाना पड़ा और पाँच साल के लिए उन्हें साइबेरिया भेज दिया गया। ज़ुल्मों के बावजूद किर्गिस्तान में सच्ची उपासना फैलती गयी।

मेरे कसबे में सच्चाई सुनायी गयी

एडुवार्ड वारटर

सन्‌ 1963 तक किर्गिस्तान में करीब 160 यहोवा के साक्षी थे। इनमें से ज़्यादातर लोग जर्मनी, यूक्रेन और रूस के रहनेवाले थे। ऐसे ही एक भाई थे एडुवार्ड वारटर जिनका बपतिस्मा 1924 में जर्मनी में हुआ था। सन्‌ 1940 के दशक में नात्ज़ी सरकार ने उन्हें एक यातना शिविर में भेजा और फिर कुछ साल बाद सोवियत संघ की कम्यूनिस्ट सरकार ने उन्हें साइबेरिया भेजा। सन्‌ 1961 में ये वफादार भाई कान्ट कसबे में आकर बस गए। यह जगह मेरे कसबे के बहुत नज़दीक थी।

एलीज़ाबेत फौट; आकसामे सुलताना-लीएवा

कान्ट में एलीज़ाबेत फौट नाम की एक वफादार बहन भी रहती थी। वह सिलाई का काम करके अपना गुज़ारा चलाती थी। वह अपने काम में बहुत हुनरमंद थी इसलिए डॉक्टर और टीचर जैसे बड़े-बड़े लोग उससे अपने कपड़े सिलवाने आते थे। उसकी एक ग्राहक थी आकसामे सुलताना-लीएवा। यह औरत सरकारी वकील के कार्यालय में एक अधिकारी की पत्नी थी। आकसामे जब भी बहन एलीज़ाबेत के पास आती थी तो कई सवाल करती थी। वह मरे हुओं की दशा के बारे में और ज़िंदगी का मकसद जानना चाहती थी। बहन सीधे बाइबल से उसके सवालों का जवाब देती थी। आगे चलकर आकसामे ने सच्चाई अपनायी और एक जोशीली प्रचारक बनी।

निकोलाय शीमपोश

उसी दौरान मोलदोवा के एक भाई, निकोलाय शीमपोश को सर्किट निगरान ठहराया गया जिन्होंने करीब 30 साल तक सेवा की। मंडलियों का दौरा करने के साथ-साथ उन्होंने प्रकाशनों की कॉपियाँ छापने और इन्हें बाँटने के काम की भी देखरेख की। लेकिन उनका काम अधिकारियों की नज़र में आ गया। इस वजह से भाई एडुवार्ड वारटर ने इन शब्दों से भाई निकोलाय का हौसला बढ़ाया, “जब अधिकारी तुमसे पूछताछ करें, तो उन्हें खुलकर बताओ कि हमारे प्रकाशन ब्रुकलिन के मुख्यालय से आते हैं। खुफिया पुलिस की आँखों में देखकर जवाब देना। तुम्हें डरने की कोई ज़रूरत नहीं।”​—मत्ती 10:19.

इसके फौरन बाद भाई निकोलाय को कान्ट बुलाया गया जहाँ खुफिया पुलिस का मुख्यालय था। भाई ने बताया कि आगे क्या हुआ, “अफसर ने पूछा कि हमें प्रकाशन कहाँ से मिलते हैं। मैंने साफ-साफ बताया कि ये हमें ब्रुकलिन से मिलते हैं। यह सुनकर वह चुप हो गया, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे। उसने मुझे जाने दिया और फिर कभी पूछताछ के लिए नहीं बुलाया।” इस तरह साक्षियों ने निडर होने के साथ-साथ सूझ-बूझ से उत्तरी किर्गिस्तान में प्रचार किया। आखिरकार 1980 के दशक में यहोवा के बारे में अनमोल सच्चाई मेरे परिवार तक पहुँची और मेरी पत्नी मायराम-बूबू ने सबसे पहले इसे सुना।

मेरी पत्नी ने तुरंत पहचान लिया कि यही सच्चाई है

मायराम-बूबू किर्गिस्तान के नारिन इलाके से है। अगस्त 1974 में एक दिन वह मेरी बहन के घर आयी और वहीं पर हम पहली बार मिले। मैंने उसे देखते ही पसंद कर लिया और हमने उसी दिन शादी कर ली।

आपून मामबेट-सादिकोवा

जनवरी 1981 में जब मायराम-बूबू बाज़ार जा रही थी तब उसने बस में उस औरत की बातें सुनीं, जिसका ज़िक्र लेख की शुरूआत में किया गया था। मेरी पत्नी इस बारे में और जानना चाहती थी, इसलिए उसने उस औरत से उसका नाम और पता पूछा। उस औरत ने अपना नाम आपून बताया लेकिन उसने और कोई जानकारी नहीं दी क्योंकि उन दिनों साक्षियों के काम पर पाबंदी लगी थी। अपना पता देने के बजाय उसने मायराम-बूबू से उसका पता लिया। जब मेरी पत्नी घर आयी तो वह बहुत खुश थी।

उसने कहा, “पता है, आज मैंने कुछ लाजवाब बातें सुनी हैं। एक औरत ने बताया कि बहुत जल्द ऐसा वक्‍त आएगा जब लोग नहीं मरेंगे। जंगली जानवर भी हमें चोट नहीं पहुँचाएँगे।” लेकिन मुझे ये बातें खयाली पुलाव लगीं। मैंने अपनी पत्नी से कहा, “उसे पहले आकर पूरी बात तो बताने दो। फिर देखते हैं कि उन बातों पर यकीन किया जा सकता है या नहीं।”

तीन महीने बाद आपून हमारे घर आयी। फिर मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ और इस दौरान दूसरी साक्षी बहनों के साथ हमारी जान-पहचान हुई। वे किर्गिस जाति में से ऐसे पहले लोग थे जिन्होंने सच्चाई अपनायी थी। इन बहनों ने हमें हैरान कर देनेवाली सच्चाइयाँ सिखायीं! उन्होंने किताब, फ्रॉम पैराडाइस लॉस्ट टू पैराडाइस रीगेन्ड * से हमें यहोवा के बारे में बताया और यह भी कि उसने इंसानों के लिए क्या मकसद ठहराया है। पूरे टौक-माक में इस किताब की सिर्फ एक ही कॉपी थी, इसलिए हमने हाथ से लिखकर अपने लिए एक कॉपी बनायी।

हमने सबसे पहले उत्पत्ति 3:15 में दी भविष्यवाणी के बारे में सीखा। यह भविष्यवाणी यीशु पूरा करेगा जो परमेश्‍वर के राज का राजा है। यह एक ऐसा संदेश है जिसे सबको बताना ज़रूरी है! इससे हमें और भी वजह मिलती है कि हम इसका प्रचार करने में पूरा-पूरा हिस्सा लें। (मत्ती 24:14) देखते-ही-देखते बाइबल की सच्चाई हमारी ज़िंदगी बदलने लगी।

पाबंदी के दौरान सभाएँ और बपतिस्मा

टौक-माक में एक भाई ने हमें साक्षियों की एक शादी में बुलाया। अब तक हमने जितनी भी शादियाँ देखी थीं, वहाँ मेहमान अकसर शराब पीकर धुत हो जाते थे, बुरा बरताव करते थे और गंदी भाषा इस्तेमाल करते थे। पर यहाँ ऐसा कुछ नहीं था। इस शादी में शराब नहीं रखी गयी थी और सबकुछ कायदे और तरतीब से हो रहा था। साक्षियों का व्यवहार कितना अलग था!

हम टौक-माक की मंडली की कुछ सभाओं में भी गए। मौसम ठीक रहने पर ये सभाएँ जंगलों में रखी जाती थीं। भाई-बहन जानते थे कि पुलिस की हम पर कड़ी नज़र है इसलिए सभाओं के दौरान एक भाई पहरा देता था। सर्दियों में हम सभाओं के लिए किसी-न-किसी के घर पर इकट्ठा होते थे। लेकिन कई बार पुलिस आकर पूछताछ करने लगती कि यहाँ क्या चल रहा है। जुलाई 1982 में जब मेरा और मायराम-बूबू का बपतिस्मा हुआ, तो हमें सतर्क रहना था। (मत्ती 10:16) उस दिन सभी भाई छोटे-छोटे समूह में जंगल में इकट्ठा हुए। हमने एक राज-गीत गाया, बपतिस्मे का भाषण सुना और शूआई नदी में बपतिस्मा लिया।

अपनी सेवा बढ़ाने का मौका मिला

सन्‌ 1987 में एक भाई ने कहा कि बालिक्ची कसबे में दिलचस्पी रखनेवाला एक व्यक्‍ति रहता है और मैं उससे मिलने जाऊँ। वहाँ जाने के लिए ट्रेन से चार घंटे लगते थे। हम वहाँ कई बार गए और हमने देखा कि बहुत-से लोगों को सच्चाई में दिलचस्पी है। हमारे लिए अपनी सेवा बढ़ाने का यह बढ़िया मौका था!

मैं और मायराम-बूबू अकसर बालिक्ची जाने लगे। शनिवार-रविवार के दिन हम वहीं रुक जाते थे। हम प्रचार में जाते और सभाएँ चलाते। हमारे प्रकाशनों की माँग तेज़ी से बढ़ने लगी। हम टौक-माक से प्रकाशनों को मिशौक या एक बोरे में लाते थे जिसमें आम तौर पर आलू रखे जाते थे। हम हर महीने प्रकाशनों से भरे दो बोरे लाते थे मगर ये भी कम पड़ जाते थे। बालिक्ची से आते-जाते वक्‍त भी हम ट्रेन में यात्रियों को गवाही देते थे।

आठ साल बाद 1995 में बालिक्ची में एक मंडली बनी। उन सालों के दौरान टौक-माक से बालिक्ची आने-जाने में बहुत पैसा खर्च हुआ। हमारे पास ढेर सारा पैसा नहीं था, तो फिर हम यह खर्च कैसे उठा पाए? एक भाई नियमित तौर पर हमें कुछ पैसे देता था ताकि हमारा खर्च पूरा हो सके। यहोवा जानता था कि हम अपनी सेवा बढ़ाना चाहते थे, इसलिए उसने हमारे लिए “आकाश के झरोखे” खोल दिए। (मला. 3:10) सच, यहोवा के लिए सबकुछ मुमकिन है।

प्रचार में और परिवार की देखरेख में व्यस्त

सन्‌ 1992 में मुझे प्राचीन ठहराया गया और मैं देश का पहला किर्गिस प्राचीन बना। टौक-माक की मंडली में हमें प्रचार के नए-नए तरीके आज़माने को मिले। मिसाल के लिए, हम यहाँ के कॉलेजों में कई किर्गिस विद्यार्थियों के साथ बाइबल अध्ययन करने लगे। उनमें से एक, आज शाखा समिति का सदस्य है और दो और विद्यार्थी खास पायनियर हैं। इसके अलावा, हम उन लोगों की भी मदद करने की कोशिश करते थे जो हमारी सभाओं में आते थे। दरअसल 1990 के दशक की शुरूआत में हमारे प्रकाशन और सभाएँ रूसी भाषा में होती थीं। लेकिन मंडली में ज़्यादातर लोग अपनी मातृ-भाषा किर्गिस समझते थे। इसलिए मैं सभाओं का अनुवाद किर्गिस में करता था जिस वजह से लोगों को सच्चाई आसानी से समझ आने लगी।

सन्‌ 1989 में अपनी पत्नी और आठ बच्चों के साथ

प्रचार के अलावा, मैं और मेरी पत्नी अपने बढ़ते परिवार की देखरेख करने में व्यस्त थे। हम अपने बच्चों को प्रचार और सभाओं में ले जाते थे। उस वक्‍त हमारी बेटी गुलसायरा 12 साल की थी और उसे सड़कों पर आते-जाते लोगों से बाइबल के बारे में बात करना अच्छा लगता था। हमारे बच्चों को बाइबल की आयतें मुँह-ज़बानी याद करना बहुत पसंद था। इस तरह हमारे बच्चे और बाद में हमारे नाती-पोते मंडली के कामों में खुशी-खुशी लगे रहे। हमारे 9 बच्चे और 11 नाती-पोते अब भी हमारे साथ हैं और उनमें से 16 जन यहोवा की सेवा कर रहे हैं या अपने माता-पिताओं के साथ सभाओं में आ रहे हैं।

बड़े-बड़े बदलाव

सन्‌ 1950 के दशक में जिन प्यारे भाई-बहनों ने हमारे इलाके में सच्चाई सुनाना शुरू किया था, वे आज इस काम में हुए बड़े-बड़े बदलाव देखकर ज़रूर हैरान होंगे। वह क्यों? एक वजह यह है कि 1990 से हमें प्रचार करने और बड़ी तादाद में इकट्ठा होने की और भी आज़ादी मिली है।

प्रचार में अपनी पत्नी के साथ

सन्‌ 1991 में कज़ाकिस्तान में पहली बार एक बड़ा अधिवेशन रखा गया। मैं और मेरी पत्नी उस अधिवेशन में हाज़िर होने के लिए आलमा-आटा शहर गए जो आज आलमाटी के नाम से जाना जाता है। फिर 1993 में भाइयों ने किर्गिस्तान के बिशकेक शहर में पहली बार एक अधिवेशन आयोजित किया। अधिवेशन स्पारटाक स्टेडियम में रखा गया था और प्रचारकों ने इस स्टेडियम को साफ करने में पूरा एक हफ्ता लगाया। यह देखकर स्टेडियम का मैनेजर इतना खुश हुआ कि उसने मुफ्त में हमें वह जगह इस्तेमाल करने दी।

सन्‌ 1994 भी एक यादगार साल रहा। उसी साल पहली बार हमारे प्रकाशन किर्गिस भाषा में छपने शुरू हुए। आज बिशकेक के शाखा दफ्तर में अनुवादकों की टीम नियमित तौर पर किर्गिस भाषा में प्रकाशन तैयार करती है। सन्‌ 1998 में किर्गिस्तान में यहोवा के साक्षियों को कानूनी मान्यता मिली। तब से काफी बढ़ोतरी हुई है और प्रचारकों की गिनती 5,000 से ज़्यादा हो गयी है। आज किर्गिस्तान में अँग्रेज़ी, उज़बेक, किर्गिस, चीनी, तुर्की, रूसी, रूसी साइन लैंग्वेज और वीगुर भाषा में 83 मंडलियाँ और 25 समूह हैं। अलग-अलग माहौल और संस्कृति से आए हमारे ये प्यारे भाई-बहन एकता में रहकर यहोवा की सेवा कर रहे हैं। ये बड़े-बड़े बदलाव सिर्फ यहोवा की वजह से मुमकिन हो पाए हैं।

यहोवा ने मेरी ज़िंदगी की भी कायापलट की है। मैं एक गरीब मज़दूर परिवार से था और मैंने सिर्फ पाँच साल तक स्कूल की पढ़ाई की थी। फिर भी यहोवा ने मुझे अपनी सेवा में इस्तेमाल किया। उसकी बदौलत मैंने एक प्राचीन के तौर पर सेवा की और उन लोगों को बाइबल की अनमोल सच्चाइयाँ सिखायीं जो मुझसे ज़्यादा पढ़े-लिखे थे। वाकई, यहोवा अनोखे-से-अनोखा काम कर सकता है। मैं अपने अनुभव से पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि यहोवा के लिए “सबकुछ मुमकिन है।”​—मत्ती 19:26.

^ पैरा. 21 इसे यहोवा के साक्षियों ने प्रकाशित किया है, लेकिन अब इसकी छपाई बंद हो गयी है।