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 उनके विश्वास की मिसाल पर चलिए | सारा

परमेश्वर ने उसे “राज-घराने की औरत” कहा

परमेश्वर ने उसे “राज-घराने की औरत” कहा

सारा ने अपना काम खत्म कर लिया है। अब वह पास की पहाड़ी की तरफ देख रही है। उसने बड़ी सूझ-बूझ से अपने दास-दासियों को काम सौंपा और उन्होंने उसकी निगरानी में खुशी-खुशी काम किया। सारा ने भी अपना काम मन लगाकर पूरा किया। शायद उनका तंबू थोड़ा फट गया था, उसी को सिलने में वह लगी हुई थी। बकरी के बालों से बना यह मोटा तंबू धूप और बारिश की मार सहते-सहते काफी पुराना हो गया है। यह उसे बार-बार याद दिलाता है कि खानाबदोश की ज़िंदगी जीते उन्हें कितने अरसे हो गए हैं। वह शायद अपनी हथेलियों का दर्द कम करने के लिए उन्हें आपस में मल रही है। आज तो दोपहर कब बीत गया, पता ही नहीं चला और अब तो सुनहरी छटा बिखर आयी है। उसने अब्राहम * को सुबह जाते हुए देखा था। वह उसी दिशा में उसके आने की राह देख रही है। तभी उसे अपने पति के जैसा कोई पहाड़ी की चोटी पर आता दिखायी देता है, उसके चेहरे पर मुसकान खिल उठती है।

जब अब्राहम अपने बड़े परिवार को लेकर फरात नदी पार करके कनान देश आया था, तब से दस साल हो गए हैं। इस सफर के बारे में कुछ पता न होने पर भी सारा ने अपने पति का साथ दिया। वह जानती है कि परमेश्वर का मकसद है कि एक वंश आए और उससे एक राष्ट्र बने। यह वंश उसके पति अब्राहम से आनेवाला है और उस पर परमेश्वर की आशीष होगी। लेकिन इस सबमें सारा की क्या भूमिका है? वह तो बाँझ है और अब 75 साल की हो चुकी है। वह शायद सोचती होगी, ‘जब तक मैं अब्राहम की पत्नी हूँ, तब तक यहोवा का वादा कैसे पूरा हो सकता है?’ अगर वह यह चिंता कर रही है और सब्र खोने लगी है, तो यह लाज़िमी है।

हम भी शायद कभी-कभी सोचें कि परमेश्वर के वादे न जाने कब पूरे होंगे। सब्र रखना आसान नहीं होता, खासकर तब जब हम उस बात का इंतज़ार कर रहे हों, जो हमारे लिए बहुत मायने रखती है। हम इस बेमिसाल स्त्री के विश्वास से क्या सीख सकते हैं?

“यहोवा ने मेरी कोख बंद कर रखी है”

यह परिवार हाल ही में मिस्र से लौटा है। (उत्पत्ति 13:1-4) उन्होंने बेतेल के पूर्व में एक ऊँचे इलाके में डेरा डाला। बेतेल को कनानी लोग लूज बुलाते थे। सारा यहाँ से वह देश देख सकती है, जिसे देने का परमेश्वर ने उनसे वादा किया है। इसमें कनानियों के गाँव हैं और सड़कें भी हैं, जो दूर-दूर के इलाकों में जाती हैं। लेकिन इस नज़ारे में वह बात नहीं, जो उसके अपने शहर ऊर में थी, जहाँ वह पली-बढ़ी थी। ऊर मेसोपोटामिया का एक शहर है, जो यहाँ से 1,900 किलोमीटर दूर है। वह अपने कई रिश्तेदारों को छोड़ आयी है और वहाँ की सुख-सुविधाएँ भी। जैसे, बाज़ार, मंडी और बढ़िया घर, जिसकी मज़बूत दीवारें और छत थी और पानी की अच्छी व्यवस्था थी। पर अगर कोई यह सोचे कि सारा ये बातें याद करके वादा किए हुए शहर को उदास होकर देख रही है, तो वह परमेश्वर की सेवा करनेवाली इस स्त्री को नहीं जानता।

ध्यान दीजिए कि करीब 2,000 साल बाद यीशु के एक शिष्य पौलुस ने परमेश्वर की प्रेरणा से क्या लिखा। उसने सारा और अब्राहम के विश्वास के बारे में बात करते हुए लिखा, “अगर वे उस देश को याद करते रहते जिसे वे छोड़कर आए थे, तो उनके पास वापस लौटने का मौका था।” (इब्रानियों 11:8, 11, 15) न तो सारा, न ही अब्राहम अपने बीते दिनों को बार-बार याद करते रहे। अगर वे अपनी ख्वाहिशें पूरी करने की सोचते रहते, तो वे वापस जाने का मन बना लेते। लेकिन अगर वे ऊर वापस चले जाते, तो उन्हें वे आशीषें नहीं मिलतीं, जिनका यहोवा उनसे वादा कर रहा  था। लाखों इंसानों के लिए विश्वास की बढ़िया मिसाल बनने के बजाय इतिहास के पन्नों से उनका नाम मिट जाता।

सारा बीते दिनों को याद करने के बजाय अपना ध्यान आगे होनेवाली बातों पर लगाती है। वह इस सफर में अपने पति का पूरा साथ देती है, फिर चाहे डेरा उठाना हो, मवेशियों को इकट्ठा करके आगे बढ़ना हो या फिर दोबारा डेरा डालना हो। वह और भी बहुत-से बदलाव और मुश्किलों का सामना करती है। एक बार फिर यहोवा अब्राहम से किया अपना वादा दोहराता है, लेकिन सारा का अब भी कोई ज़िक्र नहीं करता!​—उत्पत्ति 13:14-17; 15:5-7.

आखिरकार सारा सोचती है कि अब वह और नहीं रुक सकती, वह अब्राहम को बता देगी कि कई दिनों से उसके मन में क्या चल रहा है। कल्पना कीजिए कि जब उसने अब्राहम से बात की होगी, तब उसके दिल में कैसी जद्दोजेहद चल रही होगी, जो उसके चेहरे पर भी नज़र आ रही होगी। उसने कहा, “देख, यहोवा ने मेरी कोख बंद कर रखी है।” फिर वह उससे कहती है कि वह उसकी दासी हाजिरा के ज़रिए बच्चे पैदा करे। क्या आप सोच सकते हैं कि उसे यह बात कहते हुए कितना दुख हुआ होगा? आज हमें सारा की यह पेशकश शायद बहुत अजीब लगे, लेकिन उस ज़माने में वारिस पैदा करने के लिए एक आदमी की दूसरी पत्नी यानी उप-पत्नी होना आम बात थी। * सारा ने शायद सोचा होगा कि अब्राहम के ज़रिए एक वंश आने का यही एक तरीका है, तभी परमेश्वर का मकसद पूरा होगा और अब्राहम के वंश से एक राष्ट्र बनेगा। इसके लिए वह कोई भी त्याग करने को तैयार थी, फिर चाहे वह कितना ही मुश्किल क्यों न हो। अब्राहम ने क्या किया? शास्त्र में लिखा है कि उसने “[सारा] की बात मान ली।”​—उत्पत्ति 16:1-3.

क्या पवित्र शास्त्र बाइबल में बताया गया है कि सारा को यह त्याग करने के लिए यहोवा ने उभारा? नहीं। इसके बजाय उसकी इस पेशकश से पता चलता है कि वह इस मामले को इंसानों की नज़र से देख रही है। उसे लगता है कि उसकी मुसीबत के लिए परमेश्वर ही ज़िम्मेदार है और इस मामले को हल करने का परमेश्वर के पास और क्या तरीका हो सकता है। सारा का इस तरह समस्या हल करना उस पर और भी मुसीबतें ले आता। फिर भी हम देख सकते हैं कि उसकी पेशकश में कोई स्वार्थ नहीं है। आज जहाँ दुनिया में हर कोई दूसरों के बजाय अपनी इच्छा पहले पूरी करता है, ऐसे में सारा की निःस्वार्थ भावना क्या अनोखी नहीं है? अगर हम अपनी इच्छाओं से पहले परमेश्वर के मकसद को पूरा करने में योगदान देते हैं, तो हम सारा के विश्वास की मिसाल पर चल रहे होते हैं।

“तू हँसी थी”

कुछ ही दिनों बाद हाजिरा अब्राहम से गर्भवती हो जाती है। अब शायद उसे लगने लगता है कि उसकी सारा से ज़्यादा अहमियत है। वह अपनी मालकिन को नीचा दिखाने लगती है। बेऔलाद सारा के लिए यह बहुत बड़ा झटका है! शास्त्र साफ-साफ नहीं बताता, लेकिन अब्राहम की इजाज़त से और परमेश्वर की मदद से सारा  हाजिरा को सज़ा देती है। बाद में हाजिरा को एक लड़का होता है, जिसका नाम इश्माएल रखा जाता है। फिर कुछ साल बीत जाते हैं। (उत्पत्ति 16:4-9, 16) ब्यौरा बताता है कि इसके बाद जब उन्हें यहोवा का संदेश मिलता है, तब सारा 89 साल की और अब्राहम 99 का है। उन्हें एक अनोखा संदेश मिलता है।

यहोवा फिर से अपने दोस्त अब्राहम से वादा करता है कि वह उसे बहुत-सी जातियों का पिता बनाएगा। परमेश्वर उसका नाम भी बदल देता है। अब तक लोग उसे अब्राम के नाम से जानते थे। लेकिन अब यहोवा उसे अब्राहम नाम देता है, जिसका मतलब है, “बहुतों का पिता।” पहली बार यहोवा ज़ाहिर करता है कि उसके मकसद में सारा की क्या भूमिका है। पहले उसका नाम सारै था, जिसका शायद मतलब है, “झगड़ालू।” लेकिन अब वह उसका नाम बदलकर सारा रखता है। इसी नाम से आज हम सब उसे जानते हैं। इस नाम का मतलब है, “राज-घराने की औरत।” यहोवा ने इस स्त्री का यह नाम क्यों रखा? वह अब्राहम को बताता है, “मैं उसे आशीष दूँगा और उससे तुझे एक बेटा होगा। मेरी आशीष सारा पर होगी और उससे बहुत-सी जातियाँ निकलेंगी और देशों के राजा पैदा होंगे।”​—उत्पत्ति 17:5, 15, 16.

यहोवा ने ऐसे वंश का करार किया था, जिससे सब राष्ट्रों को आशीष मिलती। यह करार यहोवा सारा के बेटे के ज़रिए पूरा करेगा! उस बेटे का नाम परमेश्वर ने इसहाक चुना, जिसका मतलब है, “हँसी।” जब अब्राहम को पता चलता है कि यहोवा सारा की गोद भरेगा, तो वह ‘मुँह के बल गिरकर परमेश्वर को दंडवत करता है और मन-ही-मन हँसने लगता है।’ (उत्पत्ति 17:17) वह खुशी के मारे फूला नहीं समाता।​—रोमियों 4:19, 20.

फिर कुछ ही दिनों बाद तीन अजनबी आदमी अब्राहम के तंबू में आते हैं। भरी दोपहरी का वक्‍त है, फिर भी यह बुज़ुर्ग पति-पत्नी फुर्ती से इन मेहमानों का स्वागत-सत्कार करते हैं। अब्राहम सारा से कहता है, “जल्दी से तीन पैमाना मैदा ले और उसे गूँधकर रोटियाँ बना।” उस ज़माने में मेहमान-नवाज़ी करने में बहुत काम करना पड़ता था। अब्राहम पूरा काम सारा पर ही नहीं छोड़ता। वह फटाफट गोश्त लेकर आता है और बाकी खाने-पीने की चीज़ों का भी इंतज़ाम करता है। (उत्पत्ति 18:1-8) वे “आदमी” और कोई नहीं, यहोवा के स्वर्गदूत हैं! शायद यही घटना पौलुस के मन में रही होगी, जब उसने लिखा, “मेहमान-नवाज़ी करना मत भूलना क्योंकि ऐसा करके कुछ लोगों ने अनजाने में ही स्वर्गदूतों का सत्कार किया था।” (इब्रानियों 13:2) अब्राहम और सारा ने मेहमान-नवाज़ी की एक बढ़िया मिसाल रखी। क्या आप उनके जैसे बन सकते हैं?

सारा को मेहमान-नवाज़ी करना बहुत पसंद था

उनमें से एक स्वर्गदूत अब्राहम से परमेश्वर का वादा दोहराता है कि सारा एक बेटे को जन्म देगी। सारा यह सब तंबू में से सुन रही थी। इस उम्र में बच्चा पैदा करने की बात उसे इतनी अजीब लगी कि वह खुद को रोक न सकी और मन-ही-मन हँसकर कहने लगी, “मैं तो बूढ़ी हो गयी हूँ, मेरा मालिक भी बूढ़ा हो गया है। क्या इस उम्र में वाकई मुझे औलाद का सुख मिलेगा?” लेकिन स्वर्गदूत सारा से एक सवाल करके उसकी सोच ठीक करता है, “क्या यहोवा के लिए कुछ भी नामुमकिन है?” इस पर सारा जो कहती है, वह बस उसका डर है और वह अपनी सफाई में ऐसा कहती है, जो आम तौर पर कोई भी करता। वह बोल पड़ती है, “नहीं, मैं नहीं हँसी!” स्वर्गदूत ने कहा, “नहीं, तू हँसी थी।”​—उत्पत्ति 18:9-15.

क्या सारा इसलिए हँसी कि उसे यहोवा पर विश्वास नहीं था? बिलकुल नहीं। शास्त्र में लिखा है, “विश्वास ही से सारा ने गर्भवती होने की शक्‍ति पायी, हालाँकि उसके बच्चे पैदा करने की उम्र बीत चुकी थी क्योंकि उसने माना था कि जिस परमेश्वर ने वादा किया है वह विश्वासयोग्य है।” (इब्रानियों 11:11) सारा यहोवा को जानती थी, उसे पता था कि वह अपना कोई भी वादा पूरा कर सकता है। हम सभी को परमेश्वर पर सारा के जैसा विश्वास होना चाहिए। हमें परमेश्वर को अच्छी तरह जानना चाहिए। जब हम बाइबल से उसके बारे में जानेंगे, तो समझ पाएँगे कि सारा का परमेश्वर पर इस तरह विश्वास करना क्यों सही था। यहोवा वाकई वफादार परमेश्वर है और अपना हर वादा पूरा करता है। कभी-कभी तो वह अपना वादा कुछ इस तरह पूरा कर सकता है कि हमें हैरानी हो या शायद हमें अब्राहम की तरह हँसी आए।

“सारा की बात मान”

सारा के अटूट विश्वास के लिए यहोवा ने उसे आशीष दी

आखिरकार 90 की उम्र में सारा ने वह मुबारक दिन देखा, जिसके लिए वह सारी उम्र तरसती रही। उसने अपने प्यारे पति को एक बेटा दिया! इस वक्‍त अब्राहम 100 साल का है। उसने बच्चे का नाम इसहाक यानी “हँसी” रखा, जैसे परमेश्वर ने कहा था। सोचिए कि थकी होने पर भी सारा का चेहरा कैसे खुशी से खिल उठता है, जब वह कहती है, “परमेश्वर ने मुझे हँसते-मुस्कुराते जीने की वजह दी है। अब मेरे बारे में जो कोई सुनेगा, उसके  चेहरे पर भी हँसी खिल उठेगी।” (उत्पत्ति 21:6) उसे यहोवा से चमत्कार के ज़रिए जो तोहफा मिला है, उससे उसे आखिरी साँस तक खुशियाँ मिलती रहेंगी, मगर उस पर काफी ज़िम्मेदारियाँ भी आएँगी।

जब इसहाक 5 साल का होता है, तब उसके माता-पिता उसके दूध छुड़ाए जाने पर एक दावत रखते हैं। लेकिन इस दिन सभी खुश नहीं हैं। ब्यौरा बताता है कि सारा “गौर करती रही” कि 19 साल का इश्माएल इसहाक के साथ बुरा व्यवहार कर रहा है, वह उसकी खिल्ली उड़ा रहा है। यह कोई मामूली हँसी-मज़ाक नहीं है। सदियों बाद परमेश्वर की प्रेरणा से पौलुस ने लिखा कि इश्माएल का यह व्यवहार ज़ुल्म था। सारा समझ जाती है कि इस खिल्ली का क्या मतलब है। यह असल में उसके बेटे के लिए एक बड़ा खतरा है। सारा जानती है कि इसहाक उसका बेटा ही नहीं, एक चुना हुआ व्यक्‍ति भी है, जो परमेश्वर के मकसद में एक बड़ी भूमिका निभानेवाला है। इस वजह से वह हिम्मत जुटाकर अब्राहम से साफ-साफ बात करती है। वह उससे हाजिरा और इश्माएल को दूर भेज देने के लिए कहती है।​—उत्पत्ति 21:8-10; गलातियों 4:22, 23, 29.

क्या अब्राहम मान जाता है? शास्त्र में लिखा है, “सारा की यह बात अब्राहम को बहुत बुरी लगी।” वह इश्माएल से बहुत प्यार करता है। उसकी भावनाएँ अपने बच्चे के लिए उमड़ आती हैं, इसलिए वह मामले को ठीक से नहीं समझ पा रहा है। लेकिन यहोवा मामले को अच्छी तरह समझता है, इसलिए वह अब्राहम को सलाह देता है, “सारा तेरी दासी और उस लड़के के बारे में जो कह रही है, उससे तुझे बुरा नहीं लगना चाहिए। सारा की बात मान, क्योंकि तुझसे जिस वंश का वादा किया गया है वह इसहाक से आएगा।” यहोवा अब्राहम को यह भी भरोसा दिलाता है कि हाजिरा और उसके लड़के की भी ज़रूरतें पूरी की जाएँगी। अब्राहम यहोवा पर विश्वास करता है और उसका कहा मानता है।​—उत्पत्ति 21:11-14.

सारा अब्राहम की वफादार पत्नी है, एक सच्चा जीवन-साथी। वह अपने पति से सिर्फ वे बातें नहीं कहती, जो वह सुनना चाहता है। जब भी सारा को अपने परिवार और अपने लोगों के भविष्य से जुड़ी कोई समस्या नज़र आती है, तो वह साफ-साफ अपने पति को बताती है। लेकिन इस तरह बात करने का यह मतलब नहीं कि वह अपने पति का आदर नहीं करती। दरअसल आगे चलकर परमेश्वर के सेवक पतरस ने, जो शादीशुदा था, कहा कि सारा अपने पति का गहरा आदर करती थी और पत्नियों के लिए बढ़िया मिसाल है। (1 कुरिंथियों 9:5; 1 पतरस 3:5, 6) असल में अगर सारा इस मामले में चुप रहे, तो वह अपने पति का आदर नहीं कर रही होगी, क्योंकि इससे उसके पति और परिवार को बहुत नुकसान उठाना पड़ सकता है। वह प्यार से अपनी बात कहती है।

कई स्त्रियों को सारा बहुत अच्छी लगती है। वे उससे सीखती हैं कि उन्हें अपने पति से कैसे साफ-साफ, मगर प्यार से बात करनी है। शायद कुछ पत्नियों को कभी-कभी लगे कि काश! यहोवा उनके मामले में भी कुछ करे, जैसे उसने सारा के मामले में किया था। लेकिन वे सारा की मिसाल से यह सीखती रहती हैं कि कैसे उन्हें प्यार और सब्र से पेश आना है और परमेश्वर पर विश्वास रखना है।

यहोवा ने सारा को “राज-घराने की औरत” कहा, पर उसने यह नहीं चाहा कि लोग उससे ऐसे पेश आएँ, जैसे वे राज-घराने की औरतों से पेश आते हैं

इस प्यारी स्त्री को खुद यहोवा ने “राज-घराने की औरत” कहा था, पर सारा ने यह नहीं चाहा कि लोग उससे ऐसे पेश आएँ, जैसे वे राज-घराने की औरतों से पेश आते हैं। हम समझ सकते हैं कि जब 127 साल की उम्र में उसकी मौत हुई, तो अब्राहम क्यों “बहुत रोया” और “मातम मनाने लगा।” * (उत्पत्ति 23:1, 2) उसे अपनी प्यारी पत्नी की बहुत याद आयी होगी। इसमें कोई शक नहीं कि परमेश्वर यहोवा भी “राज-घराने की” इस औरत को बहुत याद करता है और जब यह धरती खूबसूरत बाग जैसी हो जाएगी, तब वह उसे दोबारा ज़िंदा करेगा। हमेशा की ज़िंदगी और सुनहरा भविष्य बाहें फैलाए सारा का इंतज़ार कर रहे हैं और वे सभी, जो उसके विश्वास की मिसाल पर चलते हैं।​—यूहन्ना 5:28, 29.

^ पैरा. 3 पहले इस पति-पत्नी का नाम अब्राम और सारै था, लेकिन बाद में परमेश्वर ने उनका नाम अब्राहम और सारा रखा। अब वे इसी नाम से जाने जाते हैं, इसलिए हम यही नाम इस्तेमाल करेंगे।

^ पैरा. 10 कुछ समय के लिए यहोवा ने एक से ज़्यादा पत्नी और उप-पत्नियाँ रखने की प्रथा बरदाश्त की, लेकिन बाद में उसने यीशु मसीह को अधिकार दिया कि वह फिर से एक ही पत्नी रखने का स्तर कायम करे, जो अदन के बाग में ठहराया गया था।​—उत्पत्ति 2:24; मत्ती 19:3-9.

^ पैरा. 25 शास्त्र में, सब स्त्रियों में से सिर्फ सारा वह स्त्री है, जिसके बारे में बताया गया है कि मौत के वक्‍त उसकी कितनी उम्र थी।