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भाग 3

नूह और उसका परिवार जलप्रलय से बच निकला!

नूह और उसका परिवार जलप्रलय से बच निकला!

परमेश्वर ने दुष्ट संसार का नाश किया, लेकिन नूह और उसके परिवार को बचाया

जैसे-जैसे इंसानों की आबादी बढ़ती गयी, पाप और बुराई भी तेज़ी से फैलती गयी। उस वक्‍त एक नबी आया, जिसका नाम हनोक था। वह शायद अपने ज़माने में यहोवा परमेश्वर का अकेला उपासक था। उसने लोगों को चेतावनी दी कि परमेश्वर जल्द ही दुष्टों का नामो-निशान मिटानेवाला है। मगर लोग दुष्टता करने से बाज़ नहीं आए। हालात बद-से-बदतर हो गए। परमेश्वर के कुछ स्वर्गदूत बागी बन गए। उन्होंने यहोवा की सेवा छोड़ दी और इंसानी शरीर धारण कर धरती पर आ गए। अपनी हवस पूरी करने के लिए उन्होंने स्त्रियों से शादी की। स्वर्गदूतों का इस तरह संबंध बनाना परमेश्वर के मकसद के खिलाफ था, क्योंकि उन्हें इसके लिए हरगिज़ नहीं बनाया गया था। इसके बाद, उनकी संतानें हुईं जो बड़े होकर ‘नेफिलीम’ कहलायीं। नेफिलीम आम इंसानों से कहीं ज़्यादा बड़े और ताकतवर थे। वे लोगों को डराते-धमकाते थे। उनकी वजह से पूरी दुनिया में मार-धाड़ और खून-खराबा दिन-ब-दिन बढ़ता चला गया। यह सब देखकर यहोवा को बहुत दुख हुआ!

हनोक के बाद एक और व्यक्‍ति था, जो ज़माने से एकदम अलग था। उसका नाम था नूह। वह और उसका परिवार वही काम करता था, जो परमेश्वर की नज़रों में सही था। इसलिए जब परमेश्वर ने बुरे लोगों को नाश करने के लिए जलप्रलय लाने की ठानी, तो उसने यह भी तय किया कि वह नूह, उसके परिवार और कुछ जानवरों को बचाएगा। इसके लिए उसने नूह को एक बड़ा जहाज़ बनाने की आज्ञा दी, जो दिखने में एक बड़े आयताकार बक्से जैसा हो। नूह ने परमेश्वर का कहा माना और जहाज़ बनाना शुरू किया। इसे पूरा करने में उसे लगभग 40 या 50 साल लगे। बाइबल में नूह को ‘नेकी का प्रचारक’ भी कहा गया है। (2 पतरस 2:5) उसने लोगों को आनेवाले जलप्रलय के बारे में खबरदार किया, पर उन्होंने उसकी एक न सुनी। आखिरकार वह वक्‍त आ ही गया जब नूह, अपने परिवार और जानवरों समेत जहाज़ के अंदर जाता। फिर परमेश्वर ने जहाज़ का दरवाज़ा बंद कर दिया। कुछ ही समय बाद आकाश के झरोखे खुल गए।

चालीस दिन और चालीस रात मूसलाधार बारिश हुई और पूरी धरती पानी में डूब गयी। सारे दुष्ट मारे गए। कुछ महीनों बाद, पानी घटने लगा और जहाज़ एक पहाड़ पर जा टिका। जब ज़मीन पूरी तरह सूख गयी तब नूह, उसका परिवार और जानवर जहाज़ के बाहर आए। वे करीब एक साल तक जहाज़ में रहे। बाहर आने के बाद, नूह ने परमेश्वर का धन्यवाद करने के लिए जानवरों की बलि चढ़ायी। परमेश्वर उसके बलिदान से बहुत खुश हुआ। उसने नूह और उसके परिवार से वादा किया कि वह फिर कभी जलप्रलय लाकर इंसानों का नाश नहीं करेगा। सच, इस वादे से कितनी तसल्ली मिलती है! मगर परमेश्वर ने सिर्फ वादा ही नहीं किया, बल्कि यकीन दिलाने के लिए एक निशानी भी दी। उसने आसमान में सात रंगों का एक मेघधनुष ठहराया।

जलप्रलय के बाद परमेश्वर ने इंसानों को कुछ नयी आज्ञाएँ दीं। उसने उन्हें जानवरों का माँस खाने की इजाज़त दी, मगर लहू खाने से मना किया। उसने नूह की संतानों को यह भी आज्ञा दी कि वे एक ही जगह पर न रहें, बल्कि पूरी धरती पर फैल जाएँ। मगर कुछ लोगों ने यह आज्ञा नहीं मानी। उनमें से एक था निम्रोद, जो खुद-ब-खुद लोगों पर नेता बन बैठा। उसने लोगों को बाबेल नाम के शहर में एकजुट किया, जो बाद में बैबिलोन कहलाया। निम्रोद ने उन्हें एक बड़ी मीनार बनाने के लिए कहा। मगर परमेश्वर ने उनके इरादों पर पानी फेर दिया। वह कैसे? उस ज़माने में एक ही भाषा बोली जाती थी। इसलिए परमेश्वर ने लोगों की भाषा में गड़बड़ी पैदा कर दी और वे अलग-अलग भाषाएँ बोलने लगे। अब वे एक-दूसरे की बात समझ नहीं पा रहे थे। इस वजह से मीनार बनाने का काम ठप्प पड़ गया और लोग अलग-अलग जगह जाकर बस गए।

—यह भाग उत्पत्ति, अध्याय 6 से 11; यहूदा 14, 15 पर आधारित है।