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क्या ऐसा महसूस करना ठीक है?

क्या ऐसा महसूस करना ठीक है?

दुःख में डूबा एक आदमी लिखता है: “इंग्लैंड में बचपन से मुझे सिखाया गया था कि सबके सामने अपनी भावनाएँ ज़ाहिर करना गलत बात है। मुझे आज भी याद है कि जब मुझे किसी वजह से दर्द होता तो मेरे पिताजी, जो कि पहले मिलिट्री में थे, दाँत भींचकर कहते थे, ‘खबरदार जो तू रोया तो!’ मुझे याद नहीं कि हमारी माँ ने कभी हम बच्चों को प्यार से चूमा हो या अपनी बाँहों में लिया हो। (हम चार बच्चे थे।) जब मैं 56 साल का था तब मैनें अपने पिताजी को मरते देखा। मुझे लगा मानो मेरा सब कुछ लुट गया हो। मगर फिर भी, उनकी मौत के वक्‍त शुरू में मैं रो ही नहीं पा रहा था।”

कुछ संस्कृतियों में लोग अपनी भावनाएँ खुलकर ज़ाहिर करते हैं। वे खुश हैं या उदास, यह देखनेवालों को आसानी से मालूम पड़ जाता है। लेकिन उत्तरी यूरोप और ब्रिटेन जैसे कुछ देशों में लोगों को, खासकर पुरुषों को यह सिखाया जाता है कि उन्हें अपनी भावनाएँ सबके सामने ज़ाहिर नहीं करनी चाहिए बल्कि उन्हें अंदर ही दबा देना चाहिए, चेहरे पर शिकन तक नहीं लानी चाहिए, और एक खुली किताब नहीं बनना चाहिए। मगर क्या किसी अज़ीज़ की मौत होने पर दुःख ज़ाहिर करना गलत है? इसके बारे में बाइबल क्या कहती है?

बाइबल में बताए गए लोग, जो रोए

बाइबल को भूमध्य सागर के पूर्वी इलाके में रहनेवाले इब्रानियों ने लिखा था, जो अपनी भावनाओं का इज़हार करनेवाले लोग थे। बाइबल में ऐसे बहुत-से लोगों के उदाहरण दर्ज़ हैं जिन्होंने खुलकर अपना दुःख प्रकट किया। जब राजा दाऊद के बेटे अम्मोन की हत्या कर दी गई, तब उसने बहुत मातम मनाया। दरअसल, वह “अपने पुत्र के लिये दिन दिन विलाप करता रहा।” (2 शमूएल 13:28-39) यहाँ तक कि राजगद्दी हड़पने की कोशिश करनेवाले अपने विश्‍वासघाती बेटे अबशालोम की मौत पर भी वह बहुत रोया। बाइबल बताती है: “तब राजा [दाऊद] बहुत घबराया, और फाटक के ऊपर की अटारी पर रोता हुआ चढ़ने लगा; और चलते चलते यों कहता गया, कि हाय मेरे बेटे अबशालोम! मेरे बेटे, हाय! मेरे बेटे अबशालोम! भला होता कि मैं आप तेरी सन्ती मरता, हाय! अबशालोम! मेरे बेटे, मेरे बेटे!” (2 शमूएल 18:33) दाऊद ने वैसे ही शोक मनाया जैसा कोई भी पिता मनाता। आम तौर पर जब किसी बच्चे की मौत हो जाती है तो माता-पिता यही कहते हैं कि उनके बच्चों की जगह उन्हें मौत क्यों ना आ गयी! वाकई, यह कुदरत का कितना बड़ा मज़ाक लगता है ना कि माँ-बाप से पहले उनके बच्चों की मौत हो जाए।

जब यीशु के दोस्त लाजर की मौत हुई तब यीशु ने क्या किया? यीशु उसकी कब्र के नज़दीक पहुँचने पर रोने लगा। (यूहन्‍ना 11:30-38) और बाद में जब यीशु की मौत हुई तो मरियम मगदलीनी भी उसकी कब्र के पास जाकर रोयी थी। (यूहन्‍ना 20:11-16) यह सच है कि पुनरुत्थान के बारे में बाइबल की सही समझ रखनेवाला एक मसीही दुःख के सागर में नहीं डूब जाता। वह उन लोगों की तरह शोक ही नहीं करता रहता है जिन्हें मरे हुओं की स्थिति के बारे में बाइबल की सही समझ नहीं है। लेकिन हर आम इंसान की तरह एक सच्चा मसीही भी, पुनरुत्थान की आशा होने के बावजूद अपने अज़ीज़ की मौत पर रोता और शोक मनाता है।—1 थिस्सलुनीकियों 4:13, 14.

रोएँ या ना रोएँ

आज हमारे बारे में क्या? क्या आपको अपनी भावनाएँ ज़ाहिर करना मुश्‍किल लगता है या क्या आप शर्म महसूस करते हैं? आजकल के सलाहकार इस बारे में क्या राय देते हैं? दरअसल उनकी ज़्यादातर सलाहें बाइबल में बहुत पहले दर्ज़ की गई सलाहों से मिलती-जुलती हैं। वे कहते हैं कि हमें अपनी भावनाओं को दबाकर नहीं रखना चाहिए बल्कि उन्हें खुलकर व्यक्‍त करना चाहिए। इससे हमें अय्यूब, दाऊद और यिर्मयाह जैसे बाइबल के समय के वफादार पुरुषों की याद आती है जिनके दुःख भरे शब्द बाइबल में दर्ज़ है। बेशक, उन्होंने अपनी भावनाओं को अंदर-ही-अंदर दबाकर नहीं रखा था। इसलिए यह अक्लमंदी की बात नहीं होगी कि आप शोक करने के लिए लोगों से दूर-दूर रहें। (नीतिवचन 18:1) हाँ, यह बात सही है कि अलग-अलग संस्कृतियों में लोग अलग-अलग तरीके से अपना दुःख ज़ाहिर करते हैं और यह कुछ हद तक उनके धार्मिक विश्‍वास पर भी निर्भर करता है। *

अगर आपको रोना आए, तब आपको क्या करना चाहिए? दरअसल रोना इंसान के स्वभाव का एक हिस्सा है। एक बार फिर याद कीजिए कि लाजर की मौत के वक्‍त क्या हुआ था। उस वक्‍त यीशु ‘आत्मा में बहुत ही उदास हुआ, और उसके आंसू बहने लगे।’ (यूहन्‍ना 11:33, 35) इस तरह यीशु ने दिखाया कि अपनों की मौत पर रोना स्वाभाविक है।

जब कोई अपना गुज़र जाता है तो रोना और दुःख मनाना स्वाभाविक है

इस बात की सच्चाई हमें एन नाम की एक माँ के साथ हुए हादसे से मालूम पड़ती है। उसकी बच्ची रेचल SIDS (सडन इंफॆंट डॆथ सिंड्रोम) रोग की शिकार होकर मर गयी। उसका पति कहता है: “ताज्जुब की बात है कि अपनी बच्ची के अंतिम संस्कार पर न तो एन रोयी और ना ही मैं, जबकि वहाँ मौजूद हर कोई रो रहा था।” इस पर एन कहती है: “यह सच है, लेकिन बाद में मैं खूब रोयी, इतना कि दोनों के हिस्से का मिलाकर मैं अकेली रो ली। लगता है कि इस हादसे का असली सदमा मुझ पर कुछ हफ्तों बाद हुआ जब मैं एक दिन घर में बिलकुल अकेली थी। मैं पूरा दिन रोती रही। मगर मैं सोचती हूँ कि ऐसा रोना मेरे लिए बहुत मददगार साबित हुआ है क्योंकि उसके बाद से मेरा मन कुछ हलका हुआ। मैंने अपनी बच्ची के लिए बहुत शोक मनाया। मैं तो यही मानती हूँ कि जो इंसान दुःखी है, उसे रोने से नहीं रोकना चाहिए। हालाँकि दूसरे लोग तो कहते ही हैं कि ‘चुप हो जाओ, मत रोओ’ लेकिन रोए बिना गम सहना नामुमकिन है।”

कुछ लोग कैसा महसूस करते हैं

कुछ लोगों ने अपने अज़ीज़ की मौत पर कैसा महसूस किया है? मिसाल के लिए, क्वेनीता पर गौर कीजिए। वह जानती है कि एक बच्चे की मौत का दुःख क्या होता है। पाँच बार उसका गर्भ गिर चुका था। फिर एक और बार वह गर्भवती हुई। इसलिए जब एक कार दुर्घटना की वजह से उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा तो वह अपने बच्चे के बारे में सोचकर बहुत घबरा रही थी। दो हफ्ते बाद उसे समय से पहले ही प्रसव-पीड़ा शुरू हो गयी। फिर कुछ समय बाद नन्हीं वनैसा पैदा हुई—जिसका वज़न सिर्फ 0.9 किलोग्राम से थोड़ा ज़्यादा था। क्वेनीता याद करते हुए बताती है, “उस वक्‍त मैं खुशी से फूली न समायी। आखिरकार मैं माँ जो बन गई!”

लेकिन उसकी खुशी बस कुछ पल की ही थी क्योंकि चार दिन के बाद वनैसा मर गयी। क्वेनीता याद करते हुए कहती है, “मुझे ऐसा लगा कि मेरी दुनिया उजड़ गई। माँ बनने का हक मुझसे छिन गया। मैं खुद को अधूरी महसूस करने लगी थी। घर लौटने पर जब मैंने वह कमरा देखा जिसे हमने खुद वनैसा के लिए तैयार किया था, साथ ही जब उन छोटी-छोटी बनियानों पर मेरी नज़र पड़ी जो मैंने उसके लिए खरीदी थीं, तो मेरा सीना चिर गया। अगले दो-तीन महीने तक लगातार उस दिन के ख्याल मेरे मन में आते रहे जब वनैसा पैदा हुई थी। इस दौरान मैं किसी से भी मिलना नहीं चाहती थी।”

क्या इतना दुःख करना पागलपन है? शायद दूसरों को यह दर्द समझना मुश्‍किल हो, लेकिन क्वेनीता जैसी दूसरी औरतें जो इस तरह के हालात से गुज़र चुकी हैं, बताती हैं कि उन्हें अपने नन्हें बच्चे के लिए ऐसा ही दुःख हुआ जैसा उन्हें किसी बड़े की मौत पर होता। वे कहती हैं कि दरअसल बच्चे के पैदा होने के काफी अरसे पहले से ही माँ-बाप उसे दुलार करना शुरू कर देते हैं। खासकर माँ और बच्चे के बीच प्यार का एक अनोखा बंधन बँध जाता है। इसलिए जब वह छोटा बच्चा मर जाता है तो माँ को लगता है कि सचमुच में कोई बड़ा इंसान मर गया है। यही सच्चाई दूसरों को भी समझने की ज़रूरत है।

गुस्से और दोष की भावना का आप पर क्या असर पड़ सकता है

एक और माँ को जब बताया गया कि उसके छः साल के बेटे को जन्म से ही दिल की बीमारी थी और इसी वजह से अचानक उसकी मौत हो गई है, तो उसने यह कहकर अपनी भावनाएँ ज़ाहिर कीं: “मैं तरह-तरह की भावनाओं से गुज़री। कभी-कभी यकीन ही नहीं होता था कि मेरे बेटे की मौत हो गई है, कभी मेरे अंदर दोष की भावना पैदा होती तो कभी मुझे अपने पति और डॉक्टर पर गुस्सा आता था कि मेरे बेटे को इतनी गंभीर बीमारी थी और वे बस देखते रहे।”

गुस्सा, दुःख का दूसरा लक्षण हो सकता है। यह गुस्सा डॉक्टरों और नर्सों के ऊपर हो सकता है कि उन्हें मरीज़ की अच्छी देखभाल करनी चाहिए थी मगर उन्होंने नहीं की। या फिर यह गुस्सा दोस्तों और रिश्‍तेदारों पर भी हो सकता है क्योंकि लगता है कि जो उन्हें नहीं कहना चाहिए वही कह रहे हैं या जो नहीं करना चाहिए वही कर रहे हैं। कुछ लोगों को मरनेवाले पर भी गुस्सा आता है कि उसने अपनी सेहत की परवाह नहीं की। स्टेला कहती है: “मुझे याद है कि मुझे अपने पति पर गुस्सा आता था कि अगर उन्होंने अपना ख्याल रखा होता तो ऐसा नहीं होता। वे सख्त बीमार थे और डॉक्टर ने भी उन्हें कई बार आगाह किया था मगर उन्होंने उसकी एक ना सुनी।” और कभी-कभी मरनेवाले पर इसलिए भी गुस्सा आता है क्योंकि वह खुद तो मर जाता है लेकिन बाकी लोगों को भारी बोझ में दबा छोड़ जाता है।

कुछ लोग गुस्से की वजह से खुद को दोषी मानने लगते हैं यानी वे खुद को कोसने लगते हैं कि उन्होंने गुस्सा क्यों किया। तो कुछ लोग अपने अज़ीज़ की मौत के लिए खुद को ही कसूरवार मानने लगते हैं। वे ऐसा कहकर खुद को यकीन दिलाने की कोशिश करते हैं, “अगर मैंने उनको डॉक्टर के पास ले जाने में ज़रा जल्दी की होती तो वे कभी ना मरते” या “मुझे उन्हें किसी बढ़िया डॉक्टर को दिखाना चाहिए था” या वे सोचते हैं कि “काश, मैंने ही सेहत के मामले में उनके साथ थोड़ी सख्ती बरती होती; तो यह नौबत ना आती।”

बच्चे की मौत सचमुच एक गहरा सदमा है—सच्ची हमदर्दी और परवाह माता-पिता का दुःख हलका कर सकती है

कुछ लोग तो और भी दोषी महसूस करते हैं, खासकर जब उनके अज़ीज़ की वक्‍त से पहले एकाएक मौत हो जाती है। उस वक्‍त मरे हुए की एक-एक बात उनके दिमाग में घूमने लगती है कि वे कब उस पर नाराज़ हुए थे, कब उससे झगड़ा किया था। या वे महसूस करने लगते हैं कि उन्हें अपने अज़ीज़ को जितना प्यार देना था वह उन्होंने नहीं दिया।

बहुत-सी माँओं को लंबे समय तक दुःख घेरे रहता है जिससे विशेषज्ञों की यह बात सही साबित होती है कि एक बच्चे की मौत से माँ-बाप की ज़िंदगी में खालीपन आ जाता है, खासतौर से माँ के लिए।

जब आपके जीवन-साथी की मौत हो जाए

जीवन-साथी को खोने पर भी गहरा सदमा पहुँचता है, खासतौर पर तब जब दोनों ने साथ-साथ बहुत कुछ किया हो। जिसके साथ सफर किया था, अलग-अलग काम किए थे, मिलकर मौजमस्ती की थी और जिस पर वे पूरी तरह निर्भर थे, उसके ना रहने पर लगता है मानो उनकी ज़िंदगी ही खत्म हो गयी है।

यूनिस बताती है कि जब उसका पति दिल का दौरा पड़ने की वजह से अचानक मर गया, तब उस पर क्या बीती। “पहले हफ्ते तो मैं पूरी तरह सुन्‍न हो गई मानो मेरे शरीर में जान ही ना हो। यहाँ तक कि मुझे किसी स्वाद या खुशबू का भी एहसास नहीं होता था। लेकिन मैं सोच-समझ पा रही थी क्योंकि मैंने देखा था कि मेरे पति को सी.पी.आर. (दोबारा साँस दिलाने के लिए सीने को हाथ से बार-बार दबाने का तरीका) और दवाइयाँ दी जा रही हैं। इसलिए मुझे पता था कि वे मर चुके हैं। फिर भी मैं अपने आप पर बुरी तरह खीज रही थी, मानो मैं एक गाड़ी को पहाड़ की चोटी की तरफ जाते और गहरी खाई में गिरते देख रही हूँ, लेकिन मैं उसे बचाने के लिए कुछ नहीं कर पा रही।”

क्या वह रोयी? “बिलकुल, मैं रोयी, खासतौर से जब मैं वो सारे कार्ड पढ़ती जो उनकी मौत के बाद लोगों ने हमदर्दी के लिए भेजे थे। मैं हर कार्ड को पढ़ते समय रोती थी। इस तरह रोने से मुझे बाकी का दिन गुज़ारने में मदद मिली। लेकिन जब लोग बार-बार मुझसे पूछते थे कि मैं कैसा महसूस करती हूँ, तो मैं सह नहीं पाती थी। सचमुच, मेरा हाल बहुत बुरा था।”

किस बात ने यूनिस को अपने दुःख से बाहर निकलने में मदद दी? वह कहती है: “अनजाने में ही मैंने यह फैसला कर लिया था कि मैं आगे अपनी ज़िंदगी जीना चाहती हूँ। लेकिन आज भी यह बात मुझे बुरी तरह तड़पाती है कि मेरे पति जो ज़िंदगी से बहुत प्यार करते थे वो आज इसका आनंद लेने के लिए मेरे साथ नहीं हैं।”

‘आपके लिए दूसरों को फैसला मत करने दीजिए . . . ’

एक किताब “विदाई—कब और कैसे अलविदा कहें”  (अँग्रेज़ी) के लेखक यह सलाह देते हैं: “आपको कैसा महसूस करना चाहिए या क्या करना चाहिए, इसका फैसला दूसरों को मत करने दीजिए। हर इंसान में फर्क है और दुःख की घड़ियों से लड़ने और उन्हें बिताने में वह दूसरों अलग से होता है। दूसरे सोच सकते हैं और आपको यह एहसास दिला सकते हैं कि उनके हिसाब से आप कुछ ज़्यादा ही दुःख का इज़हार कर रहे हैं या इससे उलटे यह कि आपको जितना दुःख व्यक्‍त करना चाहिए उतना नहीं कर रहे। ऐसे लोगों को माफ कर दीजिए और उनकी बातों को भूल जाइए। अगर आप लोगों के या समाज के बनाए हुए साँचे में अपने आप को ढालने की कोशिश करेंगे तो आप अपनी भावनाओं से उबरकर ठीक नहीं हो पाएँगे।”

हाँ, यह बात सही है कि अपने दुःख को दूर करने के लिए इंसान अलग-अलग तरीके इस्तेमाल करते हैं। हम यह बताने की कोशिश नहीं कर रहे हैं कि कौन-सा तरीका दूसरे से बेहतर है। मगर खतरा तब पैदा होता है जब एक इंसान एकदम गुमसुम हो जाता है और बदले हुए हालात के मुताबिक खुद को बिलकुल ढाल नहीं पाता। ऐसे में उसे हमदर्द दोस्तों की मदद की ज़रूरत हो सकती है। बाइबल कहती है: “मित्र सब समयों में प्रेम रखता है, और विपत्ति के दिन भाई बन जाता है।” इसलिए किसी से मदद माँगने, बात करने या रोने से मत झिझकिए।—नीतिवचन 17:17.

जब हमारा कोई अपना मर जाता है, तो ऐसे में दुःखी होना स्वाभाविक है और दूसरों के सामने यह दुःख ज़ाहिर करना गलत नहीं है। लेकिन इससे जुड़े कुछ और भी सवाल हैं, जिनका हमें जवाब पाने की ज़रूरत है जैसे, ‘मैं अपना दुःख लिए कैसे जीऊँ? क्या गुस्सा और अपने आप पर दोष मढ़ना स्वाभाविक है? मैं इन भावनाओं पर काबू कैसे पा सकता हूँ? अपने अज़ीज़ की मौत का दुःख सहने में कौन-सी बातें मेरी मदद कर सकती हैं? अगले भाग में इन सवालों और दूसरे सवालों के भी जवाब दिए गए हैं।

^ पैरा. 8 उदाहरण के लिए, नाइजीरिया के योरूबा लोग अपनी परंपरा के मुताबिक पुनर्जन्म में विश्‍वास करते हैं। इसलिए जब किसी माँ का बच्चा मर जाता है तो बहुत मातम मनाया जाता है मगर यह मातम बस कुछ दिनों के लिए होता है। एक योरूबा गाने के टेक में ऐसा कहा गया है: “कलश का पानी छलका है, मगर कलश नहीं टूटा।” योरूबा लोगों के मुताबिक पानी से भरा यह कलश माँ है, जो दोबारा गर्भवती हो सकती है और शायद मरा हुआ बच्चा ही उसकी कोख से पुनर्जन्म ले सकता है। मगर यहोवा के साक्षी ऐसी प्रथाओं को नहीं मानते जो अंधविश्‍वास पर आधारित हैं, जो अमर आत्मा या पुनर्जन्म जैसी झूठी धारणाओं से निकली हैं और बाइबल पर आधारित नहीं हैं।—सभोपदेशक 9:5, 10; यहेजकेल 18:4, 20.