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यहोवा के साक्षी

हिंदी

ऑनलाइन बाइबल | पवित्र शास्त्र का नयी दुनिया अनुवाद

दूसरा शमूएल 24:1-25

सारांश

  • दाविद ने गिनती लेकर पाप किया (1-14)

  • महामारी से 70,000 लोग मरे (15-17)

  • दाविद ने वेदी बनायी (18-25)

    • कीमत चुकाए बिना बलिदान नहीं (24)

24  यहोवा का क्रोध इसराएल पर फिर से भड़क उठा+ जब किसी ने दाविद को इसराएलियों के खिलाफ काम करने के लिए उकसाया और* कहा, “जा, इसराएल और यहूदा के लोगों की गिनती ले।”+  इसलिए राजा दाविद ने अपने सेनापति योआब+ से, जो उसके साथ था, कहा, “दान से बेरशेबा+ तक इसराएल के सब गोत्रों में जा और लोगों का नाम लिख। मैं लोगों की गिनती जानना चाहता हूँ।”  मगर योआब ने राजा से कहा, “मालिक, तेरा परमेश्‍वर यहोवा लोगों की गिनती 100 गुना बढ़ाए और तू अपनी आँखों से उनकी बढ़ती देखे। मगर मेरा मालिक राजा यह काम क्यों करना चाहता है?”  लेकिन दाविद नहीं माना और योआब और सभी सेनापतियों को राजा की बात के आगे झुकना पड़ा। इसलिए वे इसराएल के लोगों की नाम-लिखाई के लिए राजा के सामने से चले गए।+  उन्होंने यरदन पार की और अरोएर शहर+ में डेरा डाला और घाटी के बीचवाले शहर के दायीं तरफ* डेरा डाला। फिर वे गादियों के इलाके और याजेर+ की तरफ बढ़े।  वहाँ से वे गिलाद+ और तहतीम-होदशी देश गए और आगे बढ़ते हुए दान-यान गए और फिर घूमकर सीदोन+ गए।  इसके बाद वे सोर के किले+ में और हिव्वियों+ और कनानियों के सभी शहरों में गए। सबसे आखिर में वे बेरशेबा+ गए जो यहूदा के नेगेब में था।+  इस तरह उन्होंने पूरे देश का दौरा किया और नौ महीने 20 दिन बीतने पर यरूशलेम लौटे।  फिर योआब ने राजा को उन लोगों की गिनती बतायी जिनका नाम लिखा गया था। इसराएल में तलवारों से लैस सैनिक 8,00,000 थे और यहूदा के सैनिक 5,00,000.+ 10  मगर लोगों की गिनती लेने के बाद दाविद का मन* उसे बुरी तरह कचोटने लगा।+ दाविद ने यहोवा से कहा, “मैंने लोगों की गिनती लेकर बहुत बड़ा पाप किया है।+ हे यहोवा, दया करके अपने सेवक को माफ कर दे।+ मैंने बड़ी मूर्खता का काम किया है।”+ 11  जब सुबह दाविद उठा तो यहोवा का संदेश भविष्यवक्‍ता गाद+ के पास पहुँचा, जो दाविद का दर्शी था। 12  परमेश्‍वर ने उससे कहा, “दाविद के पास जा और उससे कह, ‘यहोवा तुझसे कहता है, “मैं तुझे तीन तरह के कहर बताता हूँ। तू चुन ले कि मैं तुझ पर कौन-सा कहर ढाऊँ।”’”+ 13  तब गाद ने दाविद के पास जाकर कहा, “तू क्या चाहता है, तेरे देश पर सात साल तक अकाल पड़े+ या तीन महीने तक तेरे दुश्‍मन तेरा पीछा करते रहें और तू उनसे भागता फिरे+ या तीन दिन तक तेरे देश में महामारी फैले?+ अच्छी तरह सोचकर बता कि मैं अपने भेजनेवाले को क्या जवाब दूँ।” 14  दाविद ने गाद से कहा, “मैं बड़े संकट में हूँ। अच्छा है कि हम यहोवा ही के हाथ पड़ जाएँ+ क्योंकि वह बड़ा दयालु है।+ मगर मुझे इंसान के हाथ न पड़ने दे।”+ 15  फिर यहोवा ने इसराएल पर महामारी का कहर ढाया,+ जो सुबह से लेकर तय समय तक फैली रही। इस महामारी की वजह से दान से लेकर बेरशेबा+ तक 70,000 लोग मारे गए।+ 16  जब स्वर्गदूत ने यरूशलेम के लोगों का नाश करने के लिए अपना हाथ बढ़ाया तो यहोवा को इस तबाही पर बड़ा दुख हुआ*+ और उसने लोगों का नाश करनेवाले स्वर्गदूत से कहा, “बस, अब रुक जा! अपना हाथ रोक ले।” उस वक्‍त यहोवा का स्वर्गदूत यबूसी+ अरौना के खलिहान+ के बिलकुल पास था। 17  जब दाविद ने उस स्वर्गदूत को देखा जो लोगों को घात कर रहा था, तो उसने यहोवा से कहा, “पाप तो मैंने किया है, गलती मेरी है। फिर तू इन लोगों को क्यों मार रहा है? इन भेड़ों+ का क्या कसूर है? दया करके इन्हें छोड़ दे और मुझे और मेरे पिता के घराने को सज़ा दे।”+ 18  इसलिए उस दिन गाद दाविद के पास आया और उससे कहा, “ऊपर जा और यबूसी अरौना के खलिहान में यहोवा के लिए एक वेदी खड़ी कर।”+ 19  तब दाविद ऊपर गया, ठीक जैसे यहोवा ने गाद के ज़रिए उसे आज्ञा दी थी। 20  जब अरौना ने राजा और उसके सेवकों को अपनी तरफ आते देखा, तो वह फौरन उनके पास गया और राजा के सामने मुँह के बल ज़मीन पर गिरकर उसे प्रणाम किया। 21  फिर अरौना ने पूछा, “मैं अपने मालिक राजा की क्या सेवा कर सकता हूँ?” दाविद ने कहा, “मैं तुझसे यह खलिहान खरीदने आया हूँ क्योंकि मैं यहाँ यहोवा के लिए एक वेदी बनाना चाहता हूँ ताकि लोगों पर जो कहर आ पड़ा है वह बंद हो जाए।”+ 22  अरौना ने कहा, “मेरा मालिक राजा यह खलिहान ले ले और बलिदान के लिए भी उसे जो कुछ अच्छा लगे* वह ले ले। देख, यहाँ होम-बलि के लिए बैल हैं और जलाने की लकड़ी के लिए दाँवने की पटिया और जुआ भी है। 23  अरौना ये सब राजा को देता है।” इसके बाद अरौना ने राजा से कहा, “तेरा परमेश्‍वर यहोवा तुझ पर कृपा करे।” 24  मगर राजा ने अरौना से कहा, “नहीं, मैं ऐसे नहीं लूँगा। मैं दाम देकर तुझसे यह खरीदूँगा। मैं अपने परमेश्‍वर यहोवा को ऐसी होम-बलियाँ नहीं चढ़ाऊँगा जिनकी मैंने कोई कीमत न चुकायी हो।” तब दाविद ने 50 शेकेल* चाँदी में खलिहान और बैल खरीद लिए।+ 25  फिर दाविद ने उस जगह यहोवा के लिए एक वेदी खड़ी की+ और उस पर होम-बलियाँ और शांति-बलियाँ चढ़ायीं। तब यहोवा ने देश की खातिर की गयी बिनती सुनी+ और इसराएल से महामारी दूर हो गयी।

कई फुटनोट

या “जब दाविद उकसाया गया था और उसने।”
या “के दक्षिण में।”
या “ज़मीर।”
या “पछतावा महसूस हुआ।”
शा., “जो उसकी नज़रों में अच्छा है।”
एक शेकेल का वज़न 11.4 ग्रा. था। अति. ख14 देखें।