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यहोवा के साक्षी

हिंदी

ऑनलाइन बाइबल | पवित्र शास्त्र का नयी दुनिया अनुवाद

लैव्यव्यवस्था 19:1-37

सारांश

  • पवित्रता के नियम (1-37)

    • कटाई का सही तरीका (9, 10)

    • बधिरों और अंधों का लिहाज़ (14)

    • झूठी बातें फैलाकर बदनाम न करना (16)

    • दुश्‍मनी मत पालना (18)

    • जादू-टोने की मनाही (26, 31)

    • शरीर गुदवाने की मनाही (28)

    • बुज़ुर्गों का आदर करना (32)

    • परदेसियों के साथ कैसा सलूक (33, 34)

19  यहोवा ने मूसा से यह भी कहा,  “इसराएलियों की पूरी मंडली से कहना, ‘तुम पवित्र बने रहो क्योंकि मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा पवित्र हूँ।+  तुममें से हर कोई अपनी माँ और अपने पिता का आदर करे।*+ तुम मेरे सब्तों को मानना।+ मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा हूँ।  तुम निकम्मे देवताओं की तरफ न फिरना+ और न ही अपने लिए देवताओं की मूरतें ढालकर बनाना।+ मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा हूँ।  जब भी तुम यहोवा को शांति-बलि अर्पित करते हो,+ तो बलि इस तरह अर्पित करना कि तुम परमेश्‍वर की मंज़ूरी पा सको।+  जिस दिन तुम बलि देते हो, उस दिन और उसके अगले दिन तुम्हें उसका गोश्‍त खाना चाहिए। अगर तीसरे दिन तक कुछ बच जाता है तो उसे आग में जला देना चाहिए।+  अगर तीसरे दिन बलि में से कुछ खाया जाता है, तो यह घिनौना काम है जिसे परमेश्‍वर मंज़ूर नहीं करेगा।  जो उसे खाता है उसे अपने गुनाह का हिसाब देना होगा क्योंकि उसने यहोवा की पवित्र चीज़ को तुच्छ जाना है। ऐसे इंसान को मौत की सज़ा दी जाए।  जब तुम अपने खेत की फसल काटोगे तो उसका कोना-कोना साफ मत कर देना और कटाई के वक्‍त जो बालें रह जाती हैं उन्हें मत बीनना।+ 10  उसी तरह, जब तुम अपने अंगूरों के बाग से फल इकट्ठा करते हो तो बेलों पर छूटे हुए अंगूर मत तोड़ना और न ही बाग में बिखरे अंगूर उठाना। यह सब तुम गरीबों* और अपने बीच रहनेवाले परदेसियों के लिए छोड़ देना।+ मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा हूँ। 11  तुम चोरी न करना,+ किसी के साथ धोखा न करना+ और एक-दूसरे के साथ बेईमानी न करना। 12  तुम मेरे नाम से झूठी शपथ न खाना+ और इस तरह अपने परमेश्‍वर के नाम का अपमान न करना। मैं यहोवा हूँ। 13  तुम अपने संगी-साथी को न ठगना+ और उसे न लूटना।+ तुम दिहाड़ी के मज़दूर की मज़दूरी रात-भर, अगली सुबह तक अपने पास मत रखना।+ 14  तुम किसी बधिर को बददुआ मत देना और न ही किसी अंधे के रास्ते में रोड़ा अटकाना।+ तुम अपने परमेश्‍वर का डर मानना।+ मैं यहोवा हूँ। 15  तुम मुकदमे में अन्याय न करना। न किसी गरीब की तरफदारी करना और न ही किसी अमीर का पक्ष लेना।+ तुम अपने संगी-साथी का न्याय सच्चाई से करना। 16  तुम किसी के बारे में झूठी बातें फैलाकर उसे अपने लोगों के बीच बदनाम न करना।+ तुम अपने संगी-साथी की जान* के दुश्‍मन न बनना।*+ मैं यहोवा हूँ। 17  तुम मन-ही-मन अपने भाई से नफरत न करना।+ अगर तुम्हारे संगी-साथी ने कोई पाप किया है, तो उसे सुधारने के लिए ज़रूर फटकारना+ ताकि तुम उसके पाप में साझेदार न बनो। 18  तुम अपने किसी जाति भाई से बदला न लेना,+ न ही उसके खिलाफ दुश्‍मनी पालना। तुम अपने संगी-साथी से वैसे ही प्यार करना जैसे तुम खुद से करते हो।+ मैं यहोवा हूँ। 19  तुम मेरी इन विधियों का पालन किया करना: तुम दो अलग-अलग तरह के पालतू जानवरों का आपस में सहवास कराकर दोगले जानवर न पैदा कराना। तुम अपने खेत में दो अलग-अलग तरह के बीज न बोना।+ तुम ऐसी पोशाक न पहनना जो दो अलग-अलग किस्म के धागों से बुनकर तैयार की गयी हो।+ 20  अगर एक आदमी ऐसी दासी के साथ यौन-संबंध रखता है जिसकी किसी और आदमी से शादी तय हुई है, मगर अभी तक वह आज़ाद नहीं हुई है या रकम देकर छुड़ायी नहीं गयी है, तो उन दोनों को सज़ा दी जाए। मगर उन्हें मौत की सज़ा न दी जाए क्योंकि वह दासी अभी तक आज़ाद नहीं हुई थी। 21  उस आदमी को दोष-बलि के लिए एक मेढ़ा लेकर भेंट के तंबू के द्वार पर यहोवा के पास जाना चाहिए।+ 22  याजक उस आदमी की दोष-बलि का मेढ़ा यहोवा के सामने अर्पित करेगा और उसके पाप के लिए प्रायश्‍चित करेगा। और उसका पाप माफ कर दिया जाएगा। 23  जब तुम उस देश में जाकर बस जाओगे जो मैं तुम्हें देनेवाला हूँ और वहाँ कोई पेड़ लगाओगे तो उस पर शुरू में लगनेवाले फलों को अशुद्ध मानना और उन्हें मत खाना।* तीन साल तक तुम्हारे लिए उसका फल खाना मना है।* 24  मगर चौथे साल उसके सभी फल शुद्ध होंगे और तुम खुशी मनाते हुए उसके फल यहोवा को अर्पित करोगे।+ 25  फिर पाँचवें साल तुम उसका फल खाओगे और बढ़िया पैदावार पाओगे। मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा हूँ। 26  तुम ऐसी कोई भी चीज़ न खाना जिसमें खून मिला हो।+ तुम शकुन न विचारना और न ही जादू-टोना करना।+ 27  तुम अपनी कलमें न मुँड़वाना और अपनी दाढ़ी के किनारे काटकर उसका आकार न बिगाड़ना।+ 28  तुम अपने शरीर पर कोई निशान न गुदवाना और न ही किसी की मौत का मातम मनाने के लिए अपने शरीर पर घाव करना।+ मैं यहोवा हूँ। 29  तुम अपनी बेटी को वेश्‍या बनाकर उसका अपमान मत करना+ ताकि वेश्‍याओं के काम न हों और देश बदचलनी से न भर जाए।+ 30  तुम मेरे सब्तों को मानना+ और मेरे पवित्र-स्थान का गहरा आदर करना।* मैं यहोवा हूँ। 31  तुम उनके पास न जाना जो मरे हुओं से संपर्क करने का दावा करते हैं+ और न ही भविष्य बतानेवालों से पूछताछ करना+ ताकि तुम उनकी वजह से अशुद्ध न हो जाओ। मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा हूँ। 32  तुम पके बालवालों के सामने उठ खड़े होना+ और बुज़ुर्गों का आदर करना।+ इस तरह तुम अपने परमेश्‍वर का डर मानना।+ मैं यहोवा हूँ। 33  अगर तुम्हारे यहाँ कोई परदेसी रहता है तो उसके साथ बदसलूकी न करना।+ 34  तुम अपने बीच रहनेवाले परदेसी के साथ वैसा ही सलूक करना जैसा तुम अपने इसराएली भाई के साथ करते हो।+ तुम उससे वैसा ही प्यार करना जैसा तुम खुद से करते हो, क्योंकि एक वक्‍त तुम भी मिस्र में परदेसी हुआ करते थे।+ मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा हूँ। 35  तुम नापने या तौलने के लिए गलत माप इस्तेमाल न करना।+ 36  तुम सिर्फ ऐसा तराज़ू, बाट-पत्थर और पैमाना इस्तेमाल करना जो बिलकुल सही हो।*+ मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा हूँ, मैं ही तुम्हें मिस्र से निकाल लाया हूँ। 37  इसलिए तुम मेरी सभी विधियों और मेरे सभी न्याय-सिद्धांतों का पालन किया करना और उन पर चलना।+ मैं यहोवा हूँ।’”

कई फुटनोट

शा., “से डरे।”
या “मुसीबत के मारों।”
शा., “खून।”
या शायद, “अपने संगी-साथी की जान खतरे में देखकर यूँ ही खड़े मत रहना।”
शा., “उसकी खलड़ी मानना।”
शा., “खतनारहित ठहरे।”
शा., “डर मानना।”
शा., “सच्चा एपा और सच्चा हीन इस्तेमाल करना।” अति. ख14 देखें।