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यहोवा के साक्षी

हिंदी

ऑनलाइन बाइबल | पवित्र शास्त्र का नयी दुनिया अनुवाद

लूका के मुताबिक खुशखबरी 4:1-44

सारांश

  • शैतान ने यीशु को फुसलाने की कोशिश की (1-13)

  • यीशु ने गलील में प्रचार शुरू किया (14, 15)

  • नासरत में यीशु ठुकराया गया (16-30)

  • कफरनहूम के सभा-घर में (31-37)

  • शमौन की सास और बाकी लोगों को ठीक करता है (38-41)

  • जब यीशु एकांत में होता है तो भीड़ उसे ढूँढ़ लेती है (42-44)

4  यीशु पवित्र शक्‍ति से भरा हुआ यरदन से चला गया। पवित्र शक्‍ति उसे वीराने में ले गयी+  और वह 40 दिन तक वहाँ रहा। इस दौरान यीशु ने कुछ नहीं खाया और जब वे दिन खत्म हुए, तो उसे भूख लगी। तब शैतान* ने उसे फुसलाने की कोशिश की।+  उसने यीशु से कहा, “अगर तू परमेश्‍वर का एक बेटा है, तो इस पत्थर से बोल कि यह रोटी बन जाए।”  मगर यीशु ने उसे जवाब दिया, “लिखा है, ‘इंसान को सिर्फ रोटी से ज़िंदा नहीं रहना है।’”+  फिर शैतान उसे एक ऊँची जगह ले आया और पल-भर में उसे दुनिया के सारे राज्य दिखाए।+  शैतान ने उससे कहा, “मैं इन सबका अधिकार और इनकी शानो-शौकत तुझे दे दूँगा क्योंकि यह सब मेरे हवाले किया गया है+ और मैं जिसे चाहूँ उसे देता हूँ।  इसलिए अगर तू बस एक बार मेरे सामने मेरी उपासना करे, तो यह सबकुछ तेरा हो जाएगा।”  यीशु ने उसे जवाब दिया, “लिखा है, ‘तू सिर्फ अपने परमेश्‍वर यहोवा* की उपासना कर और उसी की पवित्र सेवा कर।’”+  फिर शैतान, यीशु को यरूशलेम ले गया और मंदिर की छत की मुँडेर* पर लाकर खड़ा किया और उससे कहा, “अगर तू परमेश्‍वर का एक बेटा है, तो यहाँ से नीचे छलाँग लगा दे+ 10  क्योंकि लिखा है, ‘परमेश्‍वर अपने स्वर्गदूतों को हुक्म देगा कि वे तुझे बचाएँ,’ 11  और ‘वे तुझे हाथों-हाथ उठा लेंगे ताकि तेरा पैर किसी पत्थर से चोट न खाए।’”+ 12  तब यीशु ने उससे कहा, “यह कहा गया है, ‘तू अपने परमेश्‍वर यहोवा* की परीक्षा न लेना।’”+ 13  जब शैतान ये सारी परीक्षाएँ ले चुका, तब कोई और सही मौका मिलने तक वह उसके पास से चला गया।+ 14  फिर यीशु पवित्र शक्‍ति से भरा हुआ गलील लौटा+ और आस-पास के सारे इलाकों में उसके बारे में अच्छी खबरें फैल गयीं। 15  वह उनके सभा-घरों में सिखाने लगा और सब लोग उसका आदर करने लगे। 16  फिर वह नासरत गया+ जहाँ उसकी परवरिश हुई थी। और अपने दस्तूर के मुताबिक वह सब्त के दिन वहाँ के सभा-घर में गया+ और पढ़ने के लिए खड़ा हुआ। 17  भविष्यवक्‍ता यशायाह का खर्रा उसके हाथ में दिया गया और उसने खर्रा खोला और वह जगह ढूँढ़कर निकाली जहाँ यह लिखा था, 18  “यहोवा* की पवित्र शक्‍ति मुझ पर है क्योंकि उसने मेरा अभिषेक किया है कि मैं गरीबों को खुशखबरी सुनाऊँ। उसने मुझे भेजा है ताकि मैं बंदियों को रिहाई का, अंधों को आँखों की रौशनी पाने का और कुचले हुओं को आज़ादी का संदेश दूँ+ 19  और यहोवा* की मंज़ूरी पाने के साल का प्रचार करूँ।”+ 20  फिर उसने खर्रा लपेटकर सेवक को दे दिया और बैठ गया। सभा-घर में सब लोगों की नज़रें उस पर जमी हुई थीं। 21  तब उसने कहा, “यह वचन जो तुमने अभी-अभी सुना, आज पूरा हुआ है।”+ 22  वे सभी उसकी तारीफ करने लगे और उसकी दिल जीतनेवाली बातों पर ताज्जुब करने+ और यह कहने लगे, “क्या यह यूसुफ का बेटा नहीं है?”+ 23  तब यीशु ने उनसे कहा, “बेशक तुम यह कहावत कहोगे, ‘अरे वैद्य, पहले खुद का इलाज कर’ और मुझ पर यह कहते हुए लागू करोगे, ‘कफरनहूम+ में तूने जो काम किए थे उनके बारे में हमने सुना है, अब वही काम अपने शहर में भी कर।’” 24  यीशु ने कहा, “मैं तुमसे सच कहता हूँ कि किसी भी भविष्यवक्‍ता को उसके अपने इलाके में स्वीकार नहीं किया जाता।+ 25  अब एलियाह के दिनों की ही बात ले लो, साढ़े तीन साल तक बारिश नहीं हुई और पूरे देश में भारी अकाल पड़ा।+ यकीन मानो उस वक्‍त इसराएल में बहुत-सी विधवाएँ थीं 26  मगर एलियाह को उनमें से किसी भी औरत के पास नहीं भेजा गया, बल्कि सिर्फ सीदोन देश के सारपत नगर की एक विधवा के पास भेजा गया।+ 27  यही नहीं, भविष्यवक्‍ता एलीशा के ज़माने में इसराएल में बहुत-से कोढ़ी थे, फिर भी उनमें से किसी को भी शुद्ध नहीं किया गया, बल्कि सीरिया के नामान को शुद्ध* किया गया।”+ 28  सभा-घर में मौजूद लोगों ने जब ये बातें सुनीं, तो वे सब आग-बबूला हो गए।+ 29  वे उठे और फौरन यीशु को शहर के बाहर ले गए ताकि जिस पहाड़ पर उनका शहर बसा था उसकी चोटी से उसे नीचे धकेल दें। 30  मगर वह उनके बीच में से निकलकर अपने रास्ते चला गया।+ 31  यीशु वहाँ से कफरनहूम गया जो गलील का एक शहर था। वह सब्त के दिन लोगों को सिखा रहा था।+ 32  वे उसके सिखाने का तरीका देखकर दंग रह गए+ क्योंकि वह पूरे अधिकार के साथ बोलता था। 33  उस सभा-घर में एक आदमी था, जिसमें एक दुष्ट स्वर्गदूत समाया था और वह ज़ोर से चिल्लाने लगा,+ 34  “ओ यीशु नासरी,+ हमें तुझसे क्या लेना-देना? क्या तू हमें नाश करने आया है? मैं जानता हूँ तू असल में कौन है, तू परमेश्‍वर का पवित्र जन है।”+ 35  मगर यीशु ने उसे फटकारा, “चुप हो जा और उसमें से बाहर निकल जा।” तब उस दुष्ट स्वर्गदूत ने उस आदमी को लोगों के बीच पटक दिया और उसे बिना कोई नुकसान पहुँचाए उसमें से निकल गया। 36  यह देखकर सब हैरान रह गए और एक-दूसरे से कहने लगे, “देखो! यह कितने अधिकार के साथ बात करता है, इसके पास कितनी शक्‍ति है! इसके हुक्म पर तो दुष्ट स्वर्गदूत भी निकल जाते हैं।” 37  इसलिए आस-पास के इलाके में हर तरफ उसकी खबर फैल गयी। 38  सभा-घर से निकलने के बाद, यीशु शमौन के घर आया। शमौन की सास तेज़ बुखार से तप रही थी। उन्होंने यीशु से बिनती की कि वह उसके लिए कुछ करे।+ 39  इसलिए यीशु ने उसके पास खड़े होकर बुखार को डाँटा और उसका बुखार उतर गया। उसी पल वह उठ गयी और उनकी सेवा करने लगी। 40  लेकिन जब सूरज ढलने लगा, तब लोग अपने घर के उन सभी लोगों को उसके पास ले आए, जिन्हें तरह-तरह की बीमारियाँ थीं। उसने हरेक पर अपने हाथ रखकर उन्हें ठीक कर दिया।+ 41  यहाँ तक कि दुष्ट स्वर्गदूत भी यह चिल्लाते हुए बहुतों में से निकल जाते थे, “तू परमेश्‍वर का बेटा है।”+ मगर वह उन्हें डाँट देता और बोलने नहीं देता था,+ क्योंकि वे जानते थे कि वह मसीह है।+ 42  लेकिन जब दिन हुआ, तो वह वहाँ से निकलकर किसी एकांत जगह की तरफ चला गया।+ मगर लोगों की भीड़ उसे तलाशने लगी और ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उसके पास पहुँच गयी और उसे रोकने लगी ताकि वह उनके पास से न जाए। 43  मगर यीशु ने उनसे कहा, “मुझे दूसरे शहरों में भी परमेश्‍वर के राज की खुशखबरी सुनानी है क्योंकि मुझे इसीलिए भेजा गया है।”+ 44  फिर वह जाकर यहूदिया के सभा-घरों में प्रचार करने लगा।

कई फुटनोट

शा., “इबलीस।” शब्दावली देखें।
अति. क5 देखें।
या “सबसे ऊँची जगह।”
अति. क5 देखें।
अति. क5 देखें।
अति. क5 देखें।
या “चंगा।”