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यहोवा के साक्षी

हिंदी

ऑनलाइन बाइबल | पवित्र शास्त्र का नयी दुनिया अनुवाद

भजन 102:1-28

सारांश

  • एक सताए हुए इंसान की प्रार्थना

    • ‘मैं तनहा पंछी की तरह हूँ’ (7)

    • ‘मेरे दिन घटती छाया जैसे हैं’ (11)

    • “यहोवा सिय्योन को दोबारा बसाएगा” (16)

    • यहोवा सदा कायम रहता है (26, 27)

एक सताए हुए इंसान की उस समय की प्रार्थना जब वह दुख से बेहाल होता है* और अपनी सारी चिंताएँ यहोवा को बताता है।+ 102  हे यहोवा, मेरी प्रार्थना सुन,+मेरी मदद की पुकार तेरे पास पहुँचे।+   मैं बड़ी मुसीबत में हूँ, मुझसे मुँह न फेर।+ मेरी तरफ कान लगा,*जब मैं पुकारूँ तो फौरन जवाब दे।+   क्योंकि मेरी ज़िंदगी के दिन धुएँ की तरह गायब हो रहे हैं,मेरी हड्डियाँ मानो भट्ठी की तरह जल रही हैं।+   मेरे दिल का हाल उस घास जैसा है,जो धूप की मार से मुरझा गयी है,+मेरी भूख मर गयी है।   मैं ज़ोर-ज़ोर से कराहता रहता हूँ,+इसलिए मेरी चमड़ी हड्डियों से चिपक गयी है।+   मैं वीराने के हवासिल जैसा दिख रहा हूँ,मैं खंडहरों में रहनेवाले छोटे उल्लू जैसा बन गया हूँ।   मैं लेटे-लेटे जागता रहता हूँ,*मैं उस पंछी की तरह हूँ जो छत पर तनहा बैठा रहता है।+   मेरे दुश्‍मन सारा दिन मुझे ताना मारते हैं।+ मेरी खिल्ली उड़ानेवाले* मेरा नाम लेकर शाप देते हैं।   राख मेरी रोटी है,+मैं आँसू मिला पानी पीता हूँ।+ 10  क्योंकि तेरा क्रोध और तेरी जलजलाहट मुझ पर भड़की है,तूने मुझे उठाकर फेंक दिया है। 11  मेरी ज़िंदगी के दिन घटती* छाया जैसे हो गए हैं+और मैं घास की तरह मुरझा रहा हूँ।+ 12  मगर हे यहोवा, तू सदा बना रहता है,+तेरा यश* पीढ़ी-पीढ़ी तक कायम रहेगा।+ 13  बेशक तू उठेगा और सिय्योन पर दया करेगा,+क्योंकि वह घड़ी आ गयी है कि तू उस पर कृपा करे,+तय वक्‍त आ चुका है।+ 14  तेरे सेवकों को उसके पत्थरों से खुशी मिलती है+और वे उसकी धूल तक से लगाव रखते हैं।+ 15  राष्ट्र यहोवा के नाम का डर मानेंगे,धरती के सभी राजा तेरी महिमा देखकर तेरा डर मानेंगे।+ 16  क्योंकि यहोवा सिय्योन को दोबारा बसाएगा,+वह पूरी महिमा के साथ प्रकट होगा।+ 17  वह बेसहारा लोगों की प्रार्थना पर ध्यान देगा,+उनकी प्रार्थना को तुच्छ नहीं जानेगा।+ 18  यह बात आनेवाली पीढ़ी के लिए लिखी गयी है+ताकि वह राष्ट्र जो पैदा होगा,* याह की तारीफ करे। 19  वह अपने ऊँचे पवित्र-स्थान से नीचे देखता है,+यहोवा स्वर्ग से धरती पर नज़र डालता है 20  ताकि कैदियों का कराहना सुने,+जिन्हें मौत की सज़ा सुनायी गयी है, उन्हें छुड़ाए।+ 21  इससे सिय्योन में यहोवा के नाम का ऐलान किया जाएगा+यरूशलेम में उसकी तारीफ की जाएगी, 22  जब देश-देश और राज्य-राज्य के लोगयहोवा की सेवा करने के लिए इकट्ठा होंगे।+ 23  उसने वक्‍त से पहले ही मेरी ताकत छीन ली,मेरे दिन घटा दिए। 24  मैंने कहा, “हे मेरे परमेश्‍वर,तू जिसका वजूद पीढ़ी-पीढ़ी तक कायम रहता है,+मुझे मिटा न देना, अभी तो मैंने आधी उम्र ही जी है। 25  मुद्दतों पहले तूने पृथ्वी की बुनियाद डाली थी,आकाश तेरे हाथ की रचना है।+ 26  वे तो नाश हो जाएँगे, मगर तू सदा कायम रहेगा। एक कपड़े की तरह वे सब पुराने हो जाएँगे,एक कपड़े की तरह तू उन्हें बदल देगा और वे मिट जाएँगे। 27  मगर तू हमेशा से जैसा था वैसा ही है,तेरी उम्र के साल कभी खत्म न होंगे।+ 28  तेरे सेवकों के बच्चे महफूज़ बसे रहेंगे,उनकी संतान तेरे सामने बनी रहेगी।”+

कई फुटनोट

या “वह कमज़ोर होता है।”
या “झुककर मेरी सुन।”
या शायद, “मैं सूखकर काँटा हो गया हूँ।”
या “मुझे बेवकूफ बनानेवाले।”
या “बढ़ती।”
या “नाम।” शा., “तेरी यादगार।”
शा., “जो सिरजा जाएगा।”