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यहोवा के साक्षी

हिंदी

ऑनलाइन बाइबल | पवित्र शास्त्र का नयी दुनिया अनुवाद

गिनती 35:1-34

सारांश

  • लेवियों के लिए शहर (1-8)

  • शरण नगर (9-34)

35  यहोवा ने मूसा को और भी कुछ आज्ञाएँ दीं। इस वक्‍त इसराएली यरीहो के सामने यरदन के पास मोआब के वीरानों में थे।+ परमेश्‍वर ने मूसा से कहा,  “इसराएलियों को हिदायत दे कि जो देश उन्हें विरासत में मिलनेवाला है, उसमें से कुछ शहर वे लेवियों को दें ताकि लेवी उनमें रह सकें।+ साथ ही, उन शहरों के आस-पास के चरागाह भी उन्हें दें।+  लेवी उन शहरों में रहेंगे और उनके चरागाह की ज़मीन उनके मवेशियों और दूसरे जानवरों के लिए और उनकी देखभाल की ज़रूरी चीज़ों के लिए होगी।  चरागाह की यह ज़मीन जो तुम लेवियों को दोगे, शहर के चारों तरफ दीवार से एक-एक हज़ार हाथ* की हो।  तुम शहर के बाहर पूरब की तरफ 2,000 हाथ, दक्षिण की तरफ 2,000 हाथ, पश्‍चिम की तरफ 2,000 हाथ और उत्तर की तरफ 2,000 हाथ नापना और शहर बीच में होगा। ये उनके शहरों के चरागाह होंगे।  तुम लेवियों को जो शहर दोगे उनमें से 6 शरण नगर होंगे।+ अगर कोई किसी का खून कर देता है, तो वह भागकर उनमें से किसी शरण नगर में जा सकता है।+ इनके अलावा, तुम लेवियों को 42 और शहर दोगे।  तुम उन्हें कुल मिलाकर 48 शहर और उनके आस-पास के चरागाह देना।+  ये शहर तुम अपनी विरासत की ज़मीन में से देना।+ इसराएलियों में से जो समूह बड़ा है वह ज़्यादा शहर दे और जो समूह छोटा है वह कम शहर दे।+ एक समूह को विरासत में कितनी बड़ी या कितनी छोटी ज़मीन मिलती है, उस हिसाब से वह अपने कुछ शहर लेवियों को देगा।”  यहोवा ने मूसा से यह भी कहा, 10  “इसराएलियों से कहना, ‘तुम यरदन पार करके कनान देश जानेवाले हो।+ 11  तुम ऐसे शहरों को शरण नगर चुनना जहाँ अनजाने में खून करनेवाले के लिए भागकर जाना आसान हो।+ 12  ये शहर तुम्हें खून का बदला लेनेवाले से बचाने के लिए होंगे+ ताकि अगर कोई किसी का खून कर दे तो वह मंडली के सामने मुकदमे के लिए पेश होने से पहले मार न डाला जाए।+ 13  जो छ: शरण नगर तुम दोगे वे इसी मकसद के लिए होंगे। 14  इनमें से तीन शरण नगर यरदन के इस पार+ और तीन उस पार कनान देश में होने चाहिए।+ 15  ये छ: शहर इसराएलियों, उनके बीच रहनेवाले परदेसियों और प्रवासियों को शरण देने के लिए होंगे+ ताकि अगर उनमें से कोई अनजाने में किसी का खून कर देता है तो वह वहाँ भाग सके।+ 16  लेकिन अगर कोई किसी आदमी को लोहे की किसी चीज़ से मारता है जिससे वह मर जाता है, तो मारनेवाला खूनी है। उस खूनी को हर हाल में मौत की सज़ा दी जाए।+ 17  अगर कोई ऐसा पत्थर हाथ में लेता है जिससे मारने पर कोई मर सकता है और वह उस पत्थर से किसी आदमी को मारता है जिससे वह मर जाता है तो मारनेवाला खूनी है। उस खूनी को हर हाल में मौत की सज़ा दी जाए। 18  अगर कोई लकड़ी की ऐसी चीज़ हाथ में लेता है जिससे मारने पर कोई मर सकता है और वह उस चीज़ से किसी आदमी को मारता है जिससे वह मर जाता है, तो मारनेवाला खूनी है। उस खूनी को हर हाल में मौत की सज़ा दी जाए। 19  एक खूनी को मौत की सज़ा देने की ज़िम्मेदारी खून का बदला लेनेवाले की है। जब उसका सामना खूनी से होगा तो वह खुद उसे मार डालेगा। 20  अगर कोई किसी से नफरत करने की वजह से उसे धकेल देता है जिससे वह मर जाता है या उसकी जान लेने के इरादे से* उस पर कुछ फेंकता है जिससे वह मर जाता है,+ 21  या नफरत की वजह से उसे घूँसा मारता है जिससे वह मर जाता है तो मारनेवाला खूनी है। उस खूनी को हर हाल में मौत की सज़ा दी जाएगी। जब खून का बदला लेनेवाले का सामना उस खूनी से होगा तो उसे खूनी को मार डालना चाहिए। 22  ऐसा भी हो सकता है कि एक इंसान नफरत की वजह से नहीं बल्कि गलती से किसी को धकेल देता है जिससे वह मर जाता है। या वह उस पर कोई ऐसी चीज़ फेंकता है जिसके लगने से वह मर जाता है, जबकि उसकी जान लेने का उसका कोई इरादा नहीं था।*+ 23  या यह भी हो सकता है कि उसने दूसरे आदमी को देखा नहीं और वह गलती से उस पर पत्थर गिरा देता है जिससे वह मर जाता है। अगर ऐसा होता है और उस इंसान की उस आदमी से कोई दुश्‍मनी नहीं थी जो मर गया है और न ही उसे चोट पहुँचाने का कोई इरादा था, 24  मंडली को इन नियमों के मुताबिक, मारनेवाले और खून का बदला लेनेवाले के मुकदमे का फैसला करना चाहिए।+ 25  इसके बाद मंडली को चाहिए कि वह उस आदमी को, जिसने अनजाने में खून किया है, खून का बदला लेनेवाले से बचाए और उसे वापस उस शरण नगर में भेज दे जहाँ वह भाग गया था। उसे तब तक शरण नगर में रहना चाहिए जब तक कि महायाजक की मौत नहीं हो जाती, जिसका पवित्र तेल से अभिषेक किया गया है।+ 26  अगर वह आदमी, जिसने अनजाने में खून किया है, कभी शरण नगर की सीमा लाँघकर बाहर जाता है 27  और वहाँ खून का बदला लेनेवाला उसे देख लेता है और उसे मार डालता है तो बदला लेनेवाला खून का दोषी नहीं ठहरेगा। 28  जो अनजाने में खून कर देता है उसे महायाजक की मौत तक अपने शरण नगर के अंदर ही रहना है। मगर वह महायाजक की मौत के बाद अपनी ज़मीन पर लौट सकता है।+ 29  तुम जहाँ कहीं भी रहते हो, तुम और तुम्हारी आनेवाली पीढ़ियाँ इन नियमों के मुताबिक ऐसे मामलों का न्याय करें। 30  अगर कोई किसी को मार डालता है, तो उसे गवाहों के बयान पर+ ही कातिल ठहराकर मौत की सज़ा दी जाए।+ लेकिन किसी को भी सिर्फ एक गवाह के बयान पर मौत की सज़ा न दी जाए। 31  जो खूनी मौत की सज़ा के लायक है उसके लिए तुम कोई फिरौती की कीमत लेकर उसे ज़िंदा मत छोड़ना। उसे हर हाल में मौत की सज़ा दी जाए।+ 32  तुम ऐसे इंसान के लिए भी फिरौती की कीमत न लेना जो भागकर अपने शरण नगर में आया है और इस तरह उसे महायाजक की मौत से पहले अपनी ज़मीन पर लौटने की इजाज़त मत देना। 33  तुम जिस देश में रहते हो उसकी ज़मीन दूषित मत करना, क्योंकि जब खून बहाया जाता है तो देश दूषित हो जाता है।+ और देश में जो खून बहाया जाता है उसके लिए कोई प्रायश्‍चित नहीं, सिवा इसके कि जिसने खून बहाया है उसका खून बहाया जाए।+ 34  तुम जिस देश में रहते हो उसे दूषित मत करना क्योंकि मैं वहाँ निवास करता हूँ। मैं यहोवा, इसराएल के लोगों के बीच निवास करता हूँ।’”+

कई फुटनोट

एक हाथ 44.5 सें.मी. (17.5 इंच) के बराबर था। अति. ख14 देखें।
शा., “घात लगाकर।”
शा., “उसने घात नहीं लगायी थी।”