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यहोवा के साक्षी

हिंदी

ऑनलाइन बाइबल | पवित्र शास्त्र का नयी दुनिया अनुवाद

उत्पत्ति 50:1-26

सारांश

  • यूसुफ ने उसे कनान में दफनाया (1-14)

  • यूसुफ ने उन्हें माफ करने का भरोसा दिलाया (15-21)

  • उसके आखिरी दिन; उसकी मौत (22-26)

    • अपनी हड्डियों के बारे में आज्ञा (25)

50  तब यूसुफ अपने पिता की लाश पर गिर गया+ और उससे लिपटकर बहुत रोया और उसे चूमा।  इसके बाद यूसुफ ने वैद्यों को, जो उसके सेवक थे, हुक्म दिया कि वे उसके पिता का शवलेपन करें।+ तब वैद्यों ने इसराएल का शवलेपन किया।  इसमें उन्हें पूरे 40 दिन लगे क्योंकि शवलेपन में इतने दिन लगते हैं। और मिस्री लोग 70 दिन तक इसराएल के लिए आँसू बहाते रहे।  जब मातम के दिन पूरे हुए तो यूसुफ ने फिरौन के दरबारियों* से कहा, “मुझ पर एक मेहरबानी करो, मेरा यह संदेश फिरौन तक पहुँचा दो:  ‘मेरे पिता ने मुझे शपथ दिलाकर कहा था,+ “देख, अब मेरे मरने की घड़ी आ गयी है।+ तू मुझे कनान देश में उस कब्र में दफनाना जो मैंने अपने लिए तैयार करवायी थी।”+ इसलिए मुझे इजाज़त दे कि मैं कनान जाकर अपने पिता को दफना आऊँ।’”  फिरौन ने कहा, “ठीक है, जा और अपने पिता को दफना दे, जैसे उसने तुझे शपथ खिलायी थी।”+  तब यूसुफ अपने पिता को दफनाने निकल पड़ा। उसके साथ फिरौन के सभी सेवक, दरबार के बड़े-बड़े लोग*+ और मिस्र के सभी मुखिया गए।  यूसुफ के घराने के सब लोग, उसके भाई और उसके पिता का घराना+ उसके साथ गया। सिर्फ उनके छोटे-छोटे बच्चे, उनकी भेड़-बकरियाँ और उनके गाय-बैल गोशेन में रह गए।  यूसुफ के साथ बहुत-से रथ+ और घुड़सवार भी गए। इस तरह मिस्र से लोगों का एक बहुत बड़ा दल कनान के लिए निकला। 10  जब वे यरदन के इलाके में आताद के खलिहान में पहुँचे, तो उन्होंने वहाँ रुककर इसराएल के लिए बहुत बड़ा मातम किया। यूसुफ ने अपने पिता के लिए सात दिन तक शोक मनाया। 11  जब वहाँ रहनेवाले कनानियों ने आताद के खलिहान में उनका यह मातम देखा तो वे कहने लगे, “मिस्री लोगों का यह कैसा दर्दनाक मातम है!” इसलिए उस जगह का नाम आबेल-मिसरैम* पड़ा जो यरदन के इलाके में है। 12  याकूब के बेटों ने ठीक वैसा ही किया जैसी उसने उन्हें हिदायत दी थी।+ 13  वे उसकी लाश कनान ले गए और उस गुफा में दफना दी जो ममरे के पास मकपेला की ज़मीन में थी। यह ज़मीन अब्राहम ने हित्ती एप्रोन से खरीदी थी ताकि कब्र के लिए उसकी अपनी ज़मीन हो।+ 14  यूसुफ अपने पिता को दफनाने के बाद अपने भाइयों के साथ मिस्र लौट आया। और वे लोग भी लौट आए जो उसके साथ गए थे। 15  अब जब उनका पिता नहीं रहा, तो यूसुफ के भाई एक-दूसरे से कहने लगे, “क्या पता यूसुफ मन-ही-मन हमसे नफरत करता हो। हमने उसके साथ जो-जो ज़्यादती की थी, हो सकता है अब वह हमसे उसका बदला ले।”+ 16  इसलिए उन्होंने यूसुफ के पास यह संदेश भेजा: “तेरे पिता ने अपनी मौत से पहले यह आज्ञा दी थी, 17  ‘तुम यूसुफ से मेरी यह बात कहना, “मैं तुझसे बिनती करता हूँ कि तेरे भाइयों ने तुझ पर ज़ुल्म करके जो अपराध और पाप किया था, उसे माफ कर दे।”’ अब तेरे पिता के परमेश्‍वर के ये दास भी तुझसे रहम की भीख माँगते हैं, हमारा अपराध माफ कर दे।” जब यूसुफ ने सुना कि उसके भाइयों ने ऐसा कहा है, तो वह रो पड़ा। 18  इसके बाद उसके भाई खुद उसके पास आए और उसके सामने ज़मीन पर गिरकर उससे कहने लगे, “तू हमारे साथ जो चाहे कर, हम तो बस तेरे गुलाम हैं!”+ 19  तब यूसुफ ने उनसे कहा, “डरो मत। भला मैं क्यों तुम्हारा न्याय करूँगा? क्या मैं परमेश्‍वर हूँ? 20  हालाँकि तुमने मेरा बुरा करने की सोची,+ मगर जो भी हुआ उसे परमेश्‍वर ने अच्छे के लिए बदल दिया ताकि बहुतों की जान बच सके, जैसा कि आज तुम खुद देख रहे हो।+ 21  इसलिए अब डरो नहीं। मैं तुम्हें और तुम्हारे बाल-बच्चों के लिए खाना मुहैया कराता रहूँगा।”+ इस तरह यूसुफ ने अपने भाइयों का डर दूर किया और उन्हें भरोसा दिलाया। 22  यूसुफ मिस्र में ही रहा और उसके साथ उसके पिता का घराना भी वहीं रहा। वह कुल मिलाकर 110 साल जीया। 23  वह जीते-जी अपने बेटे एप्रैम के पोतों को भी देख पाया।+ उसने मनश्‍शे के बेटे माकीर के बेटों को भी देखा।+ ये बच्चे यूसुफ के लिए अपने बच्चों जैसे थे।* 24  आखिर में यूसुफ ने अपने भाइयों से कहा, “देखो, अब मेरी मौत की घड़ी आ गयी है। मगर तुम इस बात का यकीन रखना कि परमेश्‍वर तुम पर ध्यान देगा,+ वह तुम्हें इस देश से निकालकर उस देश में ले जाएगा जिसके बारे में उसने अब्राहम, इसहाक और याकूब से शपथ खाकर कहा था।”+ 25  इसलिए यूसुफ ने इसराएल के बेटों को शपथ दिलाकर उनसे कहा, “परमेश्‍वर ज़रूर तुम लोगों पर ध्यान देगा, इसलिए यहाँ से जाते वक्‍त तुम मेरी हड्डियाँ अपने साथ ले जाना।”+ 26  इसके बाद यूसुफ 110 साल की उम्र में मर गया। उसका शवलेपन किया गया+ और उसे मिस्र में एक शव-पेटी में रखा गया।

कई फुटनोट

या “घराने।”
या “उसके घराने के बुज़ुर्ग।”
मतलब “मिस्रियों का मातम।”
शा., “वे यूसुफ के घुटनों पर पैदा हुए थे।” यानी उसने उन्हें अपने बेटे माना और उन पर खास मेहरबान हुआ।