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यहोवा के साक्षी

हिंदी

ऑनलाइन बाइबल | पवित्र शास्त्र का नयी दुनिया अनुवाद

अय्यूब 4:1-21

सारांश

  • एलीपज का पहला भाषण (1-21)

    • अय्यूब के निर्दोष होने का मज़ाक उड़ाया (7, 8)

    • एक साए का संदेश सुनाया (12-17)

    • “परमेश्‍वर को अपने सेवकों पर भरोसा नहीं” (18)

4  तब तेमानी एलीपज+ ने अय्यूब से कहा,   “अगर कोई तुझसे कुछ कहे तो क्या तू सब्र खो देगा? लेकिन मैं खुद को बोलने से नहीं रोक सकता।   माना तूने सीख देकर बहुतों को सुधारा है,कमज़ोर हाथों को मज़बूत किया है।   अपनी बातों से लड़खड़ाते हुओं को सँभाला है,काँपते घुटनों को मज़बूत किया है।   पर अब जब तुझ पर आफत आ पड़ी, तो कहाँ गया तेरा साहस?*तुझ पर कहर क्या टूटा, तू घबरा गया?   अगर तू परमेश्‍वर की भक्‍ति करता है, तो तुझे किस बात का डर? क्या तुझे अपने निर्दोष+ होने पर भरोसा नहीं?   ज़रा सोच, क्या कभी कोई बेकसूर तबाह हुआ है? कभी कोई सीधा-सच्चा इंसान बरबाद हुआ है?   मैंने तो देखा है कि जो बुराई जोतते हैं*और मुसीबत बोते हैं, वे ही उसे काटते हैं।   परमेश्‍वर एक फूँक मारता है और वे मिट जाते हैं,उसके क्रोध के भड़कने पर वे भस्म हो जाते हैं। 10  शेर चाहे जितना दहाड़े, जवान शेर चाहे जितना गरजे,मगर ताकतवर शेरों के भी दाँत टूट जाते हैं। 11  शिकार न मिलने पर वे भूखे मर जाते हैंऔर उनके बच्चे तितर-बितर हो जाते हैं। 12  अब सुन! मुझे अकेले में एक बात बतायी गयी,उसकी फुसफुसाहट मेरे कानों में पड़ी। 13  रात के उस पहर जब लोग गहरी नींद में होते हैं,मुझे एक ऐसा दर्शन मिला कि मेरी नींद उड़ गयी। 14  मुझ पर इस कदर डर छा गयाकि मेरी हड्डियाँ काँपने लगीं। 15  एक साया* मेरे सामने से होकर गुज़रा,मेरे रोंगटे खड़े हो गए। 16  वह एक जगह जाकर ठहर गया,मैं उसे पहचान न सका। मेरी आँखों के सामने एक परछाईं थी। चारों तरफ सन्‍नाटा था, तभी मुझे एक आवाज़ सुनायी दी, 17  ‘क्या नश्‍वर इंसान परमेश्‍वर से बढ़कर नेक हो सकता है? क्या कोई आदमी अपने बनानेवाले से भी पवित्र हो सकता है?’ 18  देख, परमेश्‍वर को अपने सेवकों पर भरोसा नहीं,वह तो अपने स्वर्गदूतों* में भी गलतियाँ निकालता है, 19  तो फिर माटी के घरौंदे में रहनेवाले की क्या बिसात,जिसकी नींव धरती की धूल से डाली गयी है,+जिसे आसानी से मसला जा सकता है मानो कोई पतंगा* हो। 20  सुबह से शाम तक, एक ही दिन में वह खत्म हो जाता है,हमेशा के लिए मिट जाता है और किसी को पता भी नहीं चलता। 21  वह उस तंबू की तरह है जिसकी रस्सियाँ खोल दी गयी हों, वह बिन बुद्धि के ही मर जाता है।

कई फुटनोट

शा., “तू थक गया?”
या “बुराई करने की सोचते हैं।”
या “अदृश्‍य शक्‍ति।” शब्दावली में “रुआख; नफ्मा” देखें।
या “दूतों।”
या “कपड़-कीड़ा।”