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यहोवा के साक्षी

हिंदी

ऑनलाइन बाइबल | पवित्र शास्त्र का नयी दुनिया अनुवाद

 क4

इब्रानी शास्त्र में परमेश्वर का नाम

बैबिलोन की बँधुआई में इसराएलियों के जाने से पहले, ‘यहोवा’ नाम के लिए इब्रानी अक्षर

बैबिलोन की बँधुआई से इसराएलियों के लौटने के बाद, ‘यहोवा’ नाम के लिए इब्रानी अक्षर

इब्रानी शास्त्र में परमेश्वर का नाम करीब 7,000 बार आता है। यह नाम इन चार इब्रानी अक्षरों से लिखा जाता है, יהוה (य-ह-व-ह)। इस नयी दुनिया अनुवाद बाइबल में इन इब्रानी अक्षरों का अनुवाद “यहोवा” किया गया है। बाइबल में जितने भी नाम दिए गए हैं, उनमें सबसे ज़्यादा बार “यहोवा” का नाम आया है। बाइबल के लेखकों ने परमेश्वर के लिए “सर्वशक्‍तिमान,” “परम-प्रधान” और “प्रभु” जैसी कई उपाधियाँ इस्तेमाल की हैं, लेकिन परमेश्वर का नाम बताने के लिए उन्होंने इब्रानी के इन चार अक्षरों का ही इस्तेमाल किया।

यहोवा परमेश्वर ने खुद बाइबल के लेखकों को प्रेरित किया कि वे उसके नाम का इस्तेमाल करें। उदाहरण के लिए, उसने भविष्यवक्ता योएल को पवित्र शक्‍ति से उभारा और यह लिखवाया, “जो कोई यहोवा का नाम पुकारता है वह उद्धार पाएगा।” (योएल 2:32) परमेश्वर ने भजन के एक लेखक से लिखवाया, “लोग जानें कि सिर्फ तू जिसका नाम यहोवा है, सारी धरती के ऊपर परम-प्रधान है।” (भजन 83:18) अगर सिर्फ भजनों की किताब की बात करें, तो इसमें परमेश्वर का नाम करीब 700 बार आता है। यह किताब कविता की शैली में लिखी गयी थी और परमेश्वर के लोग इसमें दिए गीत गाते और मुँह-ज़बानी सुनाते थे। तो फिर सवाल उठता है कि बाइबल के कई अनुवादों में परमेश्वर का नाम क्यों नहीं दिया गया? नयी दुनिया अनुवाद (अँग्रेज़ी) में परमेश्वर के नाम के लिए अँग्रेज़ी उच्चारण “जेहोवा” क्यों इस्तेमाल किया गया है? और परमेश्वर के नाम का क्या मतलब है?

मृत सागर के पास मिले खर्रों में से भजन की किताब का एक हिस्सा, जो ईसवी सन्‌ 50 से पहले का है। इसकी लेखन-शैली बैबिलोन की बँधुआई से लौटने के बाद की है। मगर हर जगह परमेश्वर का नाम उसी इब्रानी शैली में दिया गया है जो बँधुआई से पहले के दौर में इस्तेमाल होती थी

बाइबल के कई अनुवादों में परमेश्वर का नाम क्यों नहीं दिया गया? इसकी कई वजह हैं। कुछ लोगों को लगता है कि सर्वशक्‍तिमान परमेश्वर को अपनी पहचान बताने के लिए किसी खास नाम की ज़रूरत नहीं। दूसरों ने प्राचीन यहूदी परंपरा मानते हुए परमेश्वर का नाम नहीं लिखा क्योंकि शायद उन्हें डर था कि ऐसा करने से वे उस नाम को अपवित्र कर रहे होंगे। और कुछ लोगों का मानना है कि “प्रभु” या “परमेश्वर” जैसी उपाधियाँ इस्तेमाल करना ज़्यादा सही है क्योंकि परमेश्वर के नाम का सही-सही उच्चारण कोई नहीं जानता। लेकिन इन दलीलों का कोई ठोस आधार नहीं, जैसे कि आगे बताया गया है:

  • जिन लोगों का कहना है कि सर्वशक्‍तिमान परमेश्वर को किसी खास नाम की ज़रूरत नहीं, वे इस बात को नज़रअंदाज़ करते हैं कि परमेश्वर के वचन की शुरू  की हस्तलिपियों में उसका नाम मिलता है, जिनमें से कुछ हस्तलिपियाँ मसीह के ज़माने से भी पहले की हैं। जैसा कि शुरू में बताया गया है, परमेश्वर ने ही बाइबल के लेखकों को उभारा कि उसका नाम करीब 7,000 बार लिखा जाए। इससे साफ पता चलता है कि परमेश्वर चाहता है कि हम उसका नाम जानें और उसे इस्तेमाल करें।

  • जिन अनुवादकों ने यहूदी परंपरा को मानते हुए परमेश्वर का नाम अपने अनुवादों से हटा दिया वे एक अहम बात समझने से चूक गए। वह यह कि कुछ यहूदी शास्त्री भले ही परमेश्वर का नाम अपनी ज़बान पर नहीं लाते थे, मगर उन्होंने बाइबल की नकलें तैयार करते वक्‍त परमेश्वर का नाम नहीं हटाया था। मृत सागर के पास कुमरान की गुफाओं में मिले प्राचीन खर्रों में यह नाम कई जगहों पर आया है। कुछ अँग्रेज़ी बाइबलों में जहाँ-जहाँ “यहोवा” नाम आना चाहिए वहाँ अनुवादकों ने “प्रभु” शब्द बड़े अक्षरों में लिख दिया और इस तरह एक सुराग दिया कि उन जगहों पर मूल पाठ में यहोवा नाम दिया गया है। मगर अब भी एक सवाल बाकी है: जब अनुवादक खुद कबूल करते हैं कि बाइबल के मूल पाठ में यहोवा का नाम हज़ारों बार आता है, तो फिर उन्होंने अपनी मरज़ी से परमेश्वर का नाम क्यों हटा दिया या उसकी जगह उपाधियाँ क्यों डाल दीं? किसने उन्हें ऐसा करने का अधिकार दिया? जवाब सिर्फ वे ही दे सकते हैं।

  • जो लोग कहते हैं कि परमेश्वर के नाम का सही-सही उच्चारण कोई नहीं जानता इसलिए उसका इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, उन्हें यीशु का नाम लेने में कोई एतराज़ नहीं है जबकि ज़्यादातर ईसाई यीशु नाम का जिस तरह उच्चारण करते हैं वह पहली सदी के उच्चारण से बिलकुल अलग है। यहूदी मसीही शायद यीशु के नाम का उच्चारण येशुआ करते थे और उपाधि “ख्रिस्त” का उच्चारण मशीआक यानी “मसीहा” करते थे। वहीं यूनानी बोलनेवाले मसीही उसे ईसुअस ख्रिस्तौस और लातिनी बोलनेवाले मसीही यासुस क्रिस्तुस कहते थे। परमेश्वर की प्रेरणा से लिखी बाइबल में यीशु के नाम का यूनानी उच्चारण दर्ज़ किया गया क्योंकि उस समय यूनानी आम भाषा थी। इससे पता चलता है कि पहली सदी के मसीहियों ने वही उच्चारण इस्तेमाल किया जो उस ज़माने में आम था और ऐसा करके उन्होंने समझदारी का काम किया। उसी तरह ‘नयी दुनिया बाइबल अनुवाद समिति’ को भी अँग्रेज़ी में “जेहोवा” इस्तेमाल करना सही लगता है, फिर चाहे प्राचीन इब्रानी भाषा में उसका उच्चारण ठीक इसी तरह न किया गया हो।

नयी दुनिया अनुवाद (अँग्रेज़ी) में परमेश्वर के नाम के लिए अँग्रेज़ी उच्चारण “जेहोवा” क्यों इस्तेमाल किया गया है? इब्रानी के इन चार अक्षरों יהוה के लिए हिंदी में ये चार व्यंजन लिखे जाते हैं, य-ह-व-ह। प्राचीन इब्रानी भाषा लिखते वक्‍त इसमें स्वर नहीं जोड़े जाते थे, इसलिए इन चार इब्रानी अक्षरों में भी कोई स्वर नहीं जोड़ा गया। जब यह भाषा हर दिन इस्तेमाल में थी, तब पढ़नेवाले जानते थे कि किस शब्द में कौन-सा स्वर लगाना है।

इब्रानी शास्त्र के लिखे जाने के करीब 1,000 साल बाद, यहूदी विद्वानों ने सही स्वरों के साथ इसे पढ़ने का एक तरीका निकाला। उन्होंने स्वर-चिन्ह तैयार किए ताकि पता चले कि फलाँ शब्दों में कौन-से स्वर लगाकर पढ़ना है। मगर उसी दौरान कई  यहूदियों में यह अंधविश्वास फैल गया कि परमेश्वर का नाम ज़बान पर लाना गलत है और वे परमेश्वर के नाम की जगह उपाधियाँ वगैरह इस्तेमाल करने लगे। इसलिए ऐसा मालूम होता है कि विद्वानों ने इब्रानी के चार व्यंजनों की नकल बनाते वक्‍त उनमें वे स्वर जोड़ दिए जो उपाधियों में आते थे। इसलिए उन हस्तलिपियों में दिए स्वर-चिन्हों से हमें पता नहीं चल पाता कि इब्रानी में परमेश्वर के नाम का सही-सही उच्चारण क्या था। कुछ विद्वानों को लगता है कि परमेश्वर के नाम का सही उच्चारण “याहवे” है, जबकि दूसरे कुछ और उच्चारण बताते हैं। मृत सागर के पास लैव्यव्यवस्था की किताब का एक छोटा हिस्सा मिला जो यूनानी में लिखा गया था। उसमें परमेश्वर के नाम का लिप्यांतरण करके याऔ लिखा था यानी इब्रानी उच्चारण को यूनानी अक्षरों में लिखा गया था। इसके अलावा, प्राचीन समय के यूनानी लेखकों के हिसाब से परमेश्वर के नाम का उच्चारण याए, याबे या याऊवे किया जा सकता है। लेकिन इसका सही उच्चारण क्या है, इस बारे में दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। दरअसल हम नहीं जानते कि पुराने समय में परमेश्वर के सेवक इब्रानी में उसके नाम का उच्चारण कैसे करते थे। (उत्पत्ति 13:4; निर्गमन 3:15) लेकिन हम यह ज़रूर जानते हैं कि परमेश्वर ने अपने लोगों से बात करते वक्‍त बार-बार अपने नाम का इस्तेमाल किया था। उसके सेवक भी उसका नाम लेकर उसे बुलाते थे और दूसरों से बात करते वक्‍त भी बेझिझक उसका नाम लेते थे।—निर्गमन 6:2; 1 राजा 8:23; भजन 99:9.

तो फिर अँग्रेज़ी नयी दुनिया अनुवाद में परमेश्वर के नाम के लिए “जेहोवा” क्यों इस्तेमाल किया गया है? क्योंकि अँग्रेज़ी में यह उच्चारण लंबे अरसे से इस्तेमाल होता आया है।

विलियम टिंडेल का अनुवाद जिसमें उत्पत्ति 15:2 में परमेश्वर का नाम आता है। बाइबल की पहली पाँच किताबों का यह अनुवाद 1530 में छपा था

सन्‌ 1530 में जब विलियम टिंडेल ने बाइबल की पहली पाँच किताबों का अँग्रेज़ी में अनुवाद किया तो पहली बार अँग्रेज़ी में परमेश्वर का नाम लिखा गया। टिंडेल ने परमेश्वर के नाम के लिए यह वर्तनी इस्तेमाल की: “येऊवा।” समय के गुज़रते अँग्रेज़ी भाषा बदलती गयी और परमेश्वर के नाम की वर्तनी में भी नयापन आता गया। मिसाल के लिए, 1612 में हेनरी आइंस्वर्थ ने भजन की किताब के अपने अनुवाद में हर जगह “येहोवा” इस्तेमाल किया। फिर 1639 में, जब उसके अनुवाद का नया संस्करण निकाला गया और बाइबल की पाँच शुरूआती किताबों  के साथ उसे छापा गया तो परमेश्वर के नाम के लिए “जेहोवा” इस्तेमाल किया गया। सन्‌ 1901 में अमेरिकन स्टैंडर्ड वर्शन बाइबल निकाली गयी तो उसमें अनुवादकों ने उन सभी जगहों पर “जेहोवा” इस्तेमाल किया जहाँ मूल इब्रानी पाठ में परमेश्वर का नाम आता है।

बाइबल के जाने-माने विद्वान जोसफ ब्रायन्ट रॉदरहैम समझाते हैं कि क्यों उन्होंने अपनी किताब भजन संहिता का अध्ययन (अँग्रेज़ी) में “याहवे” की जगह “जेहोवा” इस्तेमाल किया। उनकी यह किताब 1911 में छापी गयी थी। उन्होंने कहा कि वे “इस नाम का ऐसा उच्चारण इस्तेमाल करना” चाहते थे “जिससे बाइबल पढ़नेवाला आम इंसान वाकिफ हो (और इसके इस्तेमाल पर उसे एतराज़ भी न हो)।” सन्‌ 1930 में विद्वान ए. एफ. कर्कपैट्रिक ने भी “जेहोवा” नाम के बारे में इसी से मिलती-जुलती बात कही, “आज के ज़माने के व्याकरण के विद्वान दावा करते हैं कि इस नाम का उच्चारण याहवे या याहावे होना चाहिए। मगर जेहोवा नाम अँग्रेज़ी भाषा में जड़ पकड़ चुका है। देखा जाए तो यह बात इतनी मायने नहीं रखती कि परमेश्वर के नाम का सही उच्चारण क्या है, बल्कि यह कि जेहोवा एक नाम है न कि ‘प्रभु’ जैसी कोई उपाधि।” हिंदी में परमेश्वर के नाम का उच्चारण “यहोवा” किया जाता है। आम तौर पर हिंदी बाइबलों में यही उच्चारण पाया जाता है।

परमेश्वर के नाम के चार इब्रानी अक्षर, य-ह-व-ह: “वह बनने का कारण होता है”

क्रिया ह-व-ह: “बनना”

यहोवा नाम का क्या मतलब है? इब्रानी में यहोवा नाम एक क्रिया से निकला है जिसका मतलब है “बनना।” कई विद्वानों को लगता है कि यह क्रिया बताती है कि कोई है जो बना रहा है। इसलिए ‘नयी दुनिया बाइबल अनुवाद समिति’ परमेश्वर के नाम का यह मतलब बताती है, “वह बनने का कारण होता है।” इस बारे में विद्वानों की अलग-अलग राय है इसलिए हम यह दावा नहीं कर सकते कि इसका सिर्फ यही मतलब है। मगर यह परिभाषा यहोवा पर बिलकुल ठीक बैठती है क्योंकि वह सब चीज़ों का बनानेवाला है और अपने मकसदों को पूरा करनेवाला परमेश्वर है। उसने इस विश्व, इंसानों और स्वर्गदूतों की सृष्टि की है (या उनके बनने का कारण हुआ), साथ ही समय के गुज़रते वह ऐसे काम करता आया है जिससे उसकी मरज़ी और उसका मकसद पूरा हो।

इसलिए यहोवा नाम का सिर्फ वह मतलब नहीं जो निर्गमन 3:14 में दी गयी क्रिया से मिलता है यानी “मैं वह बन जाऊँगा जो मैं बनना चाहता हूँ” या “मैं जो साबित होऊँगा वह साबित होऊँगा।” असल में ये शब्द परमेश्वर के नाम का पूरा-पूरा मतलब नहीं देते, बल्कि परमेश्वर के बारे में सिर्फ इतना बताते हैं कि वह अपने मकसद को पूरा करने के लिए हालात के मुताबिक जो ज़रूरी है वह बन सकता है। यहोवा नाम का मतलब सिर्फ इतना नहीं कि वह जो चाहे बन सकता है बल्कि इसमें यह भी शामिल है कि अपने मकसद को पूरा करने के लिए वह अपनी सृष्टि को भी जो चाहे बना सकता है।