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यहोवा के साक्षी

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ऑनलाइन बाइबल | मसीही यूनानी शास्त्र पवित्र शास्त्र का नयी दुनिया अनुवाद देखिए

लूका 2:1-52

2  उन दिनों सम्राट* औगूस्तुस की तरफ से एक फरमान जारी हुआ कि सारे साम्राज्य* के लोग अपना-अपना नाम दर्ज़ कराएँ।  (यह पहली नाम-लिखाई तब हुई जब क्विरिनियुस, सीरिया का राज्यपाल था।)  इसलिए सब लोग नाम लिखवाने के लिए अपने-अपने शहर जाने लगे, जहाँ वे पैदा हुए थे।  यूसुफ गलील के नासरत शहर में रहता था। वह दाविद के खानदान और उसके वंश का था, इसलिए वह भी यहूदिया में दाविद के शहर गया जो बेतलेहेम कहलाता है,  ताकि मरियम के साथ अपना नाम लिखवाए। मरियम अब उसकी पत्नी बन चुकी थी और इस वक्‍त पूरे दिनों पेट से थी।  जब वे बेतलेहेम में थे, तब मरियम का बच्चे को जन्म देने का समय आ गया।  उसने अपने बेटे को जन्म दिया, जो उसका पहलौठा था। उन्हें ठहरने के लिए सराय में कोई कमरा नहीं मिला था, इसलिए मरियम ने बच्चे को कपड़ों की पट्टियों में लपेटकर एक चरनी में रखा।  उसी इलाके में कुछ चरवाहे भी थे जो मैदानों में रह रहे थे। वे रात के एक-एक पहर में बारी-बारी से अपने झुंडों की पहरेदारी कर रहे थे  कि तभी अचानक यहोवा का दूत उनके सामने आकर खड़ा हो गया, और यहोवा की महिमा का तेज उनके चारों तरफ चमक उठा, और वे बहुत डर गए। 10  मगर स्वर्गदूत ने उनसे कहा: “डरो मत, क्योंकि देखो! मैं तुम्हें एक बड़ी खुशखबरी सुना रहा हूँ जिससे सब लोगों को बेहद खुशी मिलेगी। 11  क्योंकि आज दाविद के शहर में तुम्हारे लिए एक उद्धार करनेवाले का जन्म हो चुका है। यही मसीह* प्रभु है। 12  उसे पहचानने की तुम्हारे लिए यह निशानी है: तुम एक शिशु को कपड़े की पट्टियों में लिपटा और चरनी में लेटा हुआ पाओगे।” 13  तभी अचानक उस स्वर्गदूत के साथ, स्वर्ग की एक बड़ी सेना परमेश्‍वर की महिमा करती और यह कहती दिखायी दी: 14  “स्वर्ग में परमेश्‍वर की महिमा हो, और धरती पर उन लोगों को शांति मिले जिनसे परमेश्‍वर खुश है।” 15  जब स्वर्गदूत चरवाहों के पास से स्वर्ग चले गए, तो चरवाहे एक-दूसरे से कहने लगे: “आओ हम फौरन बेतलेहेम चलें और यह जो बात वहाँ हुई है और जिसके बारे में यहोवा ने हम पर ज़ाहिर किया है उसे देखें।” 16  तब वे जल्दी-जल्दी गए और उन्होंने वहाँ मरियम और उसके साथ यूसुफ को देखा, साथ ही उस शिशु को चरनी में लेटा हुआ पाया। 17  जब चरवाहों ने उस शिशु को देखा, तो उन्होंने वे सारी बातें बतायीं जो स्वर्गदूत ने शिशु के बारे में कही थीं। 18  जितनों ने चरवाहों की ये बातें सुनीं, वे सब ताज्जुब करने लगे। 19  मगर मरियम इन सब बातों को अपने दिल में संजोकर रखती और इनके मतलब के बारे में गहराई से सोचती थी। 20  तब चरवाहे, परमेश्‍वर की बड़ाई और उसका गुणगान करते हुए लौट गए। जैसा उन्हें बताया गया था उन्होंने सबकुछ वैसा ही सुना और देखा था। 21  जब आठ दिन पूरे हुए और शिशु का खतना करने का समय आया, तो उसका नाम यीशु रखा गया। यह वही नाम था जो स्वर्गदूत ने उसके गर्भ में पड़ने से पहले बताया था। 22  साथ ही, जब मूसा के कानून के मुताबिक उनके शुद्ध होने के दिन पूरे हुए, तो वे उसे यहोवा के सामने पेश करने के लिए यरूशलेम ले आए, 23  ताकि ठीक वैसा ही करें जैसा यहोवा के कानून में लिखा है: “हरेक पहलौठे को यहोवा के लिए पवित्र ठहराया जाना चाहिए,” 24  साथ ही वह बलिदान चढ़ाएँ जो यहोवा के कानून में बताया गया है: “फाख्ता का एक जोड़ा या कबूतर के दो बच्चे।” 25  और देखो! यरूशलेम में शमौन नाम का एक आदमी था, जो नेक और परमेश्‍वर का भक्‍त था। पवित्र शक्‍ति उस पर थी और वह इस इंतज़ार में था कि परमेश्‍वर इस्राएल को दिलासा देगा। 26  साथ ही, परमेश्‍वर ने पवित्र शक्‍ति से उस पर ज़ाहिर किया था कि जब तक वह यहोवा के मसीह को न देख ले, तब तक मौत का मुँह न देखेगा। 27  अब वह पवित्र शक्‍ति* से उभारे जाने पर मंदिर में आया। जब नन्हे यीशु को उसके माता-पिता अंदर ला रहे थे ताकि मूसा के कानून के मुताबिक रिवाज़ पूरा करें, 28  तब शमौन ने बच्चे को अपनी बाँहों में लिया और परमेश्‍वर का धन्यवाद करते हुए कहा: 29  “हे सारे जहान के महाराजा और मालिक, अब तू अपने वचन के मुताबिक अपने दास को शांति से विदा करता है। 30  क्योंकि मेरी आँखों ने उद्धार का तेरा ज़रिया देख लिया है 31  जिसे तू ने सब लोगों के सामने खड़ा किया है। 32  वह राष्ट्रों की आँखों पर पड़े परदे को हटाने के लिए एक रौशनी और तेरी प्रजा, इस्राएल की महिमा है।” 33  उस बच्चे के माता-पिता उसके बारे में कही जा रही बातों पर ताज्जुब करते रहे। 34  फिर शमौन ने उन्हें भी आशीष दी, मगर उसकी माँ मरियम से कहा: “देख! यह इस्राएल में बहुतों के गिरने और बहुतों के फिर से उठने का कारण होगा और एक ऐसी निशानी होगा जिसके खिलाफ बातें की जाएँगी 35  (और जहाँ तक तेरी बात है, एक लंबी तलवार तेरे आर-पार हो जाएगी), ताकि बहुतों के दिलों के विचार खुलकर सामने आएँ।” 36  वहाँ हन्‍ना नाम की एक भविष्यवक्‍तिन थी, जो आशेर के गोत्र के फनूएल की बेटी थी (यह स्त्री बहुत बूढ़ी थी। वह अपने कुँवारेपन के बाद शादी के सिर्फ सात साल अपने पति के साथ रह पायी थी। 37  वह विधवा थी और अब उसकी उम्र चौरासी साल थी।) वह मंदिर से कभी गैर-हाज़िर नहीं रहती थी, बल्कि उपवास और मिन्‍नतों के साथ रात-दिन परमेश्‍वर की पवित्र सेवा में लगी रहती थी। 38  वह ठीक उसी घड़ी वहाँ आयी और परमेश्‍वर का धन्यवाद करने लगी और उन सबको जो यरूशलेम के छुटकारे का इंतज़ार कर रहे थे, उस बच्चे के बारे में बताने लगी। 39  जब यूसुफ और मरियम यहोवा के कानून के मुताबिक सारे काम पूरे कर चुके, तो गलील में अपने शहर नासरत लौट गए। 40  वह बच्चा बढ़ता और बलवंत होता गया। वह बुद्धिमान होता गया और परमेश्‍वर की आशीष लगातार उस पर थी। 41  उसके माता-पिता अपने दस्तूर के मुताबिक हर साल फसह के त्योहार के लिए यरूशलेम जाया करते थे। 42  जब वह बारह साल का हुआ, तो वे त्योहार के दस्तूर के मुताबिक यरूशलेम गए। 43  मगर त्योहार के दिन पूरे होने के बाद जब वे लौट रहे थे, तो वह लड़का यीशु, पीछे यरूशलेम में ही रह गया। मगर उसके माता-पिता का इस बात पर ध्यान नहीं गया। 44  उन्होंने यह समझा कि वह दूसरे मुसाफिरों के संग होगा। इसलिए उन्होंने एक दिन का सफर तय कर लिया। मगर इसके बाद वे उसे अपने रिश्‍तेदारों और जान-पहचानवालों में ढूँढ़ने लगे। 45  लेकिन जब वह नहीं मिला, तो वे और भी ज़्यादा उसकी तलाश करते-करते वापस यरूशलेम आ गए। 46  फिर तीन दिन बाद उन्होंने उसे मंदिर में पाया, जहाँ वह शिक्षकों के बीच बैठा उनकी सुन रहा था और उनसे सवाल कर रहा था। 47  जितने लोग उसकी सुन रहे थे, वे सभी उसकी समझ और उसके जवाबों से रह-रहकर दंग हो रहे थे। 48  जब उसके माता-पिता ने उसे वहाँ देखा, तो वे बेहद हैरान हो गए, और उसकी माँ ने उससे कहा: “बेटा, तू ने हमारे साथ ऐसा क्यों किया? देख, तेरा पिता और मैं तुझे ढूँढ़-ढूँढ़कर कितने बेहाल हो गए हैं।” 49  लेकिन उसने उनसे कहा: “तुम मुझे यहाँ-वहाँ क्यों ढूँढ़ते रहे? क्या तुम्हें मालूम नहीं था कि मैं अपने पिता के घर में होऊँगा?” 50  मगर वे उसकी इस बात का मतलब नहीं समझ सके। 51  तब वह उनके साथ चला गया और नासरत आ गया और लगातार उनके अधीन रहा। उसकी माँ ने बड़े ध्यान से इन सारी बातों को अपने दिल में संजोकर रखा। 52  यीशु डील-डौल और बुद्धि में बढ़ता और तरक्की करता गया और दिनोंदिन उस पर परमेश्‍वर की आशीष और लोगों का अनुग्रह बढ़ता गया।

कई फुटनोट

लूका 2:1 यूनानी में “कैसर।”
लूका 2:1 या, “पूरी दुनिया।”
लूका 2:11 यानी “परमेश्‍वर का अभिषिक्‍त जन।”
लूका 2:27 यूनानी नफ्मा। अतिरिक्‍त लेख 7 देखें।