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यहोवा के साक्षी

हिंदी

ऑनलाइन बाइबल | मसीही यूनानी शास्त्र पवित्र शास्त्र का नयी दुनिया अनुवाद देखिए

मरकुस 4:1-41

4  एक बार फिर वह झील के किनारे सिखाने लगा। मगर वहाँ उसके पास लोगों की बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी। इसलिए वह एक नाव पर चढ़ गया और झील में किनारे से थोड़ी दूरी पर नाव में बैठकर भीड़ को सिखाने लगा, लेकिन सारी भीड़ किनारे पर थी।  तब वह उन्हें मिसालें देकर कई बातें सिखाने लगा और उन्हें शिक्षा देते हुए यह कहा:  “ध्यान से सुनो। एक बीज बोनेवाला बीज बोने निकला।  जब वह बो रहा था, तो कुछ बीज रास्ते के किनारे गिरे और पंछी आकर उन्हें खा गए।  कुछ बीज ऐसी जगह गिरे जहाँ ज़्यादा मिट्टी नहीं थी, क्योंकि मिट्टी के नीचे चट्टान थी। इन बीजों के अंकुर फौरन दिखायी देने लगे, क्योंकि वहाँ मिट्टी गहरी नहीं थी।  लेकिन जब सूरज निकला, तो वे झुलस गए और जड़ न पकड़ने की वजह से सूख गए।  कुछ और बीज काँटों में गिरे और कंटीले पौधों ने बढ़कर उन्हें दबा लिया और वे फल नहीं लाए।  मगर कुछ और बीज बढ़िया मिट्टी पर गिरे, और वे उगे और बढ़े और उनमें फल आना शुरू हुआ। किसी में तीस गुना, किसी में साठ गुना और किसी में सौ गुना।”  यीशु ने आगे कहा: “कान लगाकर सुनो और मैं जो कह रहा हूँ उसे समझने की कोशिश करो।” 10  भीड़ के जाने के बाद जब यीशु अकेला था, तो जो चेले उसके पास थे वे उन बारहों के साथ उससे इन मिसालों के बारे में सवाल पूछने लगे। 11  यीशु ने उनसे कहा: “परमेश्‍वर के राज के पवित्र रहस्य की समझ तुम्हें दी गयी है, मगर बाहरवालों के लिए सब बातें मिसालें ही हैं, 12  ताकि वे देखें, और देखते हुए भी देख न पाएँ और सुनें और सुनते हुए भी इसके मायने न समझ पाएँ, न ही कभी पलटकर लौट आएँ और उन्हें माफी दी जाए।” 13  फिर उसने उनसे कहा: “तुम यह मिसाल नहीं समझते तो फिर बाकी सब मिसालों का मतलब कैसे समझोगे? 14  बोनेवाला वचन बोता है। 15  रास्ते के किनारे जहाँ वचन बोया गया: ये वे लोग हैं जो वचन सुनते हैं, मगर फौरन शैतान आता है और उनमें बोया गया वचन ले जाता है। 16  वैसे ही जो चट्टानी जगहों में बोए जाते हैं: ये वे लोग हैं जो वचन को सुनते ही उसे खुशी-खुशी स्वीकार करते हैं। 17  मगर उन लोगों में जड़ नहीं होती, इसलिए वे थोड़े वक्‍त के लिए कायम रहते हैं। फिर जैसे ही वचन की वजह से उन पर क्लेश आता है या ज़ुल्म होता है, तो वे वचन पर विश्‍वास करना छोड़ देते हैं। 18  कुछ और बीज हैं जो काँटों के बीच बोए गए हैं: ये वे लोग हैं जिन्होंने वचन सुना तो है, 19  मगर इस ज़माने* की ज़िंदगी की चिंताएँ और भ्रम में डालनेवाली पैसे की ताकत और बाकी सब चीज़ों की चाहतें उनमें समा जाती हैं और वचन को दबा देती हैं और वे फल नहीं लाते। 20  आखिर में, जो बढ़िया मिट्टी में बोए गए हैं: ये वे लोग हैं जो वचन को सुनते हैं और इसे खुशी-खुशी मानते हैं और तीस गुना, साठ गुना और सौ गुना फल लाते हैं।” 21  फिर यीशु ने उनसे आगे कहा: “क्या दीपक जलाने के बाद कोई उसे टोकरी* से ढककर या पलंग के नीचे रखता है? क्या उसे लाकर एक दीवट के ऊपर नहीं रखा जाता? 22  ऐसा कुछ भी नहीं जो छिपाया गया हो और बेनकाब न किया जाए। ऐसी कोई भी चीज़ नहीं जिसे बड़ी सावधानी से छिपाया गया हो और जो निकलकर खुले में न आए। 23  कान लगाकर सुनो और मैं जो कह रहा हूँ उसे समझने की कोशिश करो।” 24  फिर यीशु ने उनसे यह भी कहा: “तुम जो सुनते हो, उस पर ध्यान दो। जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए भी नापा जाएगा, हाँ, तुम्हें उससे भी ज़्यादा दिया जाएगा। 25  क्योंकि जिसके पास है उसे और दिया जाएगा। लेकिन जिसके पास नहीं है, उससे वह भी ले लिया जाएगा जो उसके पास है।” 26  फिर उसने आगे कहा: “परमेश्‍वर का राज ऐसा है जैसे कोई आदमी ज़मीन पर बीज छितराता है। 27  वह आदमी रात होने पर सो जाता है और सुबह होने पर उठ जाता है। इस दौरान, जैसे-जैसे दिन बीतते हैं, बीज में अंकुर फूटते हैं और वह अपने-आप बढ़ता है लेकिन कैसे यह वह आदमी नहीं जानता।  28  ज़मीन अपने-आप धीरे-धीरे फल लाती है, पहले घास जैसा अंकुर निकलता है, फिर डंठल और आखिरकार तैयार दाने की बाल। 29  मगर जैसे ही दाना पक जाता है, वह आदमी हँसिया चलाता है, क्योंकि कटाई का वक्‍त आ गया है।” 30  यीशु ने उनसे आगे कहा: “हम परमेश्‍वर के राज को किसके जैसा बताएँ, या क्या मिसाल देकर उसे समझाएँ? 31  वह राई के दाने की तरह है, जो ज़मीन में बोए जाने के वक्‍त धरती के सारे बीजों में सबसे छोटा था— 32  लेकिन बोए जाने के बाद जब वह उगता है, तो सभी साग-सब्ज़ियों से बड़ा हो जाता है। उसमें ऐसी बड़ी-बड़ी डालियाँ लगती हैं कि उसकी छाँव में आकाश के पंछी आकर बसेरा करते हैं।” 33  तो इस तरह की कई मिसालें देकर, जितना वे समझ सकते थे, उसके मुताबिक यीशु उनको परमेश्‍वर का वचन सुनाया करता था। 34  वाकई, वह बगैर मिसाल के लोगों से बात नहीं करता था, मगर अपने चेलों को अकेले में उन सब बातों का मतलब समझाता था। 35  उस दिन, जब शाम ढल गयी तो यीशु ने चेलों से कहा: “आओ हम उस पार चलें।” 36  इसलिए, भीड़ को विदा करने के बाद, वे उसे नाव में जिस तरह वह था, उसी तरह ले चले और वहाँ उसके साथ दूसरी नौकाएँ भी थीं। 37  अब एक ज़ोरदार आँधी चलने लगी और लहरें नाव से इतनी ज़ोर से टकराने लगीं कि नाव पानी से पूरी तरह भरने पर थी। 38  मगर यीशु नाव के पिछले हिस्से में, एक बड़े तकिए पर सिर रखकर सो रहा था। इसलिए चेलों ने उसे जगाया और उससे कहा: “गुरु, क्या तुझे फिक्र नहीं कि हम नाश होनेवाले हैं?” 39  यह सुनकर वह उठा और उसने आँधी को डाँटा और लहरों से कहा: “श्‍श्‍श! खामोश हो जाओ!” तब आँधी थम गयी और बड़ा सन्‍नाटा छा गया। 40  फिर यीशु ने उनसे कहा: “तुम्हारे दिल क्यों काँप रहे हैं? क्या अब तक तुममें ज़रा भी विश्‍वास नहीं?” 41  मगर उनमें अजीब-सा डर समा गया और वे एक-दूसरे से कहने लगे: “आखिर यह कौन है कि आँधी और समुद्र तक इसका हुक्म मानते हैं?”

कई फुटनोट

मर 4:19 या, “दुनिया की व्यवस्था।”
मर 4:21 या, “नापने की टोकरी।”