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यहोवा के साक्षी

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ऑनलाइन बाइबल | मसीही यूनानी शास्त्र पवित्र शास्त्र का नयी दुनिया अनुवाद देखिए

मरकुस 12:1-44

12  साथ ही, यीशु उन्हें ये मिसालें देने लगा: “किसी आदमी ने अंगूरों का बाग लगाया और उसके चारों तरफ एक बाड़ा बनाया। उसने अंगूर रौंदने का हौद खोदा और एक बुर्ज खड़ा किया। फिर वह अंगूरों का बाग बागबानों को ठेके पर देकर परदेस चला गया।  अंगूरों की कटाई का मौसम आने पर उसने एक दास को बागबानों के पास भेजा, ताकि वह अंगूरों की फसल में से उसका हिस्सा उनसे ले आए।  मगर बागबानों ने उस दास को पकड़ लिया, उसे पीटा और खाली हाथ भेज दिया।  फिर बाग के मालिक ने उनके पास एक और दास भेजा। बागबानों ने उसका सिर फोड़ दिया और उसे बेइज़्ज़त किया।  फिर मालिक ने एक और दास को भेजा और उन्होंने उसे मार डाला। मालिक ने और भी बहुतों को भेजा, मगर कुछ को उन्होंने पीटा तो कुछ को मार डाला।  अब मालिक के पास एक ही रह गया था, उसका प्यारा बेटा। उसने आखिर में यह सोचकर बागबानों के पास उसे भेजा, ‘वे मेरे बेटे की ज़रूर इज़्ज़त करेंगे।’  मगर वे बागबान आपस में कहने लगे, ‘यह तो वारिस है। आओ हम इसे मार डालें, तब इसकी विरासत हमारी हो जाएगी।’  तब उन्होंने उसे पकड़ लिया और मार डाला और उसे अंगूरों के बाग के बाहर फेंक दिया।  अब बाग का मालिक क्या करेगा? वह आकर उन बागबानों का खात्मा करेगा और अंगूरों का बाग दूसरों को ठेके पर दे देगा। 10  क्या तुमने शास्त्र के ये वचन कभी नहीं पढ़े, ‘जिस पत्थर को राजमिस्त्रियों ने ठुकराया, वही कोने का मुख्य पत्थर बन गया है।’ 11  क्या तुमने यह भी नहीं पढ़ा, ‘यह यहोवा की तरफ से हुआ है और हमारी नज़र में लाजवाब है’?” 12  यह सुनकर धर्मगुरु उसे पकड़ने का कोई तरीका ढूँढ़ने लगे, क्योंकि वे जान गए थे कि उसने यह मिसाल उन्हीं को मन में रखकर दी थी। लेकिन वे भीड़ से डरते थे। इसलिए वे उसे छोड़कर चले गए। 13  इसके बाद उन्होंने कुछ फरीसियों और हेरोदियों के दल के लोगों को यीशु के पास भेजा ताकि वे उसकी बातों में उसे पकड़ सकें। 14  वे उसके पास आए और बोले: “गुरु, हम जानते हैं कि तू सच्चा है और किसी की परवाह नहीं करता, क्योंकि तू इंसान की सूरत देखकर बात नहीं करता बल्कि सच्चाई के मुताबिक परमेश्‍वर का मार्ग सिखाता है: हमें बता कि सम्राट* को कर देना सही है या नहीं? 15  हमें कर देना चाहिए या नहीं?” उनका कपट भाँपकर यीशु ने उनसे कहा: “तुम मेरी परीक्षा क्यों लेते हो? एक दीनार लाकर मुझे दिखाओ।” 16  वे एक दीनार लाए। उसने उनसे कहा: “इस पर किसकी सूरत और किसके नाम की छाप है?” उन्होंने कहा: “सम्राट की।” 17  तब यीशु ने कहा: “जो सम्राट का है वह सम्राट को चुकाओ, मगर जो परमेश्‍वर का है वह परमेश्‍वर को।” यह जवाब सुनकर वे उस पर बहुत ताज्जुब करने लगे। 18  अब सदूकी लोग उसके पास आए। सदूकी कहते हैं कि मरे हुओं के फिर से जी उठने की शिक्षा सच नहीं है। इन सदूकियों ने यीशु से यह सवाल किया: 19  “गुरु, मूसा ने हमारे लिए लिखा है कि अगर कोई आदमी बेऔलाद मर जाए और अपनी पत्नी छोड़ जाए, तो उसके भाई को चाहिए कि वह अपने मरे हुए भाई की पत्नी से शादी कर ले और अपने भाई के लिए उससे औलाद पैदा करे। 20  सात भाई थे। पहले ने शादी की मगर बेऔलाद मर गया। 21  तब दूसरे भाई ने उसकी पत्नी से शादी कर ली, मगर वह भी बेऔलाद मर गया। तीसरे के साथ भी ऐसा ही हुआ। 22  सातों भाई बेऔलाद मर गए। आखिर में वह स्त्री भी मर गयी। 23  तो फिर, जब मरे हुए जी उठेंगे, तब वह उन सातों में से किसकी पत्नी होगी? क्योंकि सातों उसे अपनी पत्नी बना चुके थे।” 24  यीशु ने उनसे कहा: “तुम बड़ी गलतफहमी में हो। क्या इसकी वजह यह नहीं कि तुम न तो शास्त्र को जानते हो, न ही परमेश्‍वर की शक्‍ति को? 25  क्योंकि मरे हुओं के जी उठने पर उनमें न तो पुरुष शादी करेंगे न स्त्रियाँ ब्याही जाएँगी, मगर वे स्वर्गदूतों की तरह होंगे। 26  क्या तुमने मरे हुओं के जी उठने के बारे में, मूसा की किताब में झाड़ी के किस्से में नहीं पढ़ा कि कैसे परमेश्‍वर ने उससे कहा, ‘मैं अब्राहम का परमेश्‍वर और इसहाक का परमेश्‍वर और याकूब का परमेश्‍वर हूँ’? 27  वह मरे हुओं का नहीं बल्कि जीवितों का परमेश्‍वर है। तुम बड़ी गलतफहमी में हो।” 28  वहाँ आए शास्त्रियों में से एक उनकी बहस सुन रहा था। उसने यह देखकर कि यीशु ने उन्हें क्या ही बेहतरीन ढंग से जवाब दिया है, उससे पूछा: “सब आज्ञाओं में सबसे पहले कौन-सी आज्ञा आती है?” 29  यीशु ने जवाब दिया: “सबसे पहली यह है, ‘हे इस्राएल, सुन, हमारा परमेश्‍वर यहोवा एक ही यहोवा है। 30  और तुझे अपने परमेश्‍वर यहोवा से अपने पूरे दिल, अपनी पूरी जान, अपने पूरे दिमाग और अपनी पूरी ताकत से प्यार करना है।’ 31  और दूसरी यह है, ‘तुझे अपने पड़ोसी से वैसे ही प्यार करना है जैसे तू खुद से करता है।’ और कोई आज्ञा इनसे बढ़कर नहीं।” 32  तब उस शास्त्री ने उससे कहा: “गुरु, तू ने बिलकुल सही कहा। तेरी बात सच्चाई के मुताबिक है कि ‘वह एक ही है और उसको छोड़ कोई दूसरा नहीं है।’ 33  और उसे अपने पूरे दिल और अपनी पूरी समझ और अपनी पूरी ताकत से प्यार करना और अपने पड़ोसी से वैसे ही प्यार करना जैसे हम खुद से करते हैं, सारी होमबलियों और बलिदानों से कहीं बढ़कर है।” 34  यीशु ने यह जानकर कि उस शास्त्री ने समझदारी के साथ जवाब दिया है, उससे कहा: “तू परमेश्‍वर के राज से ज़्यादा दूर नहीं।” इसके बाद किसी की भी हिम्मत नहीं हुई कि यीशु से कोई और सवाल करे। 35  लेकिन, मंदिर में सिखाते वक्‍त यीशु ने उनसे यह कहा: “शास्त्री यह कैसे कहते हैं कि मसीह, दाविद का महज़ एक वंशज है? 36  दाविद ने खुद पवित्र शक्‍ति से उभारे जाने पर यह कहा है, ‘यहोवा ने मेरे प्रभु से कहा: “मेरी दायीं तरफ बैठ जब तक कि मैं तेरे दुश्‍मनों को तेरे पैरों तले न कर दूँ।”’ 37  दाविद तो खुद मसीह को ‘प्रभु’ कहकर पुकारता है, फिर वह दाविद का वंशज कैसे हुआ?” लोगों की बड़ी भीड़ खुशी से उसकी सुन रही थी। 38  और सिखाते हुए उसने आगे यह कहा: “शास्त्रियों से खबरदार रहो। जिन्हें लंबे-लंबे चोगे पहनकर घूमना और बाज़ारों के चौक में लोगों से नमस्कार सुनना अच्छा लगता है। 39  और सभा घरों में सबसे आगे की जगहों पर बैठना और शाम की दावतों में सबसे खास जगह लेना उन्हें पसंद है। 40  मगर यही हैं वे जो विधवाओं के घर हड़प जाते हैं और दिखावे के लिए लंबी-लंबी प्रार्थनाएँ करते हैं। ये बहुत भारी दंड पाएँगे।” 41  फिर यीशु दान-पात्रों के सामने बैठ गया और देखने लगा कि लोगों की भीड़ कैसे इन दान-पात्रों में पैसे डाल रही है। वहाँ बहुत-से धनवान ढेरों सिक्के डाल रहे थे। 42  फिर एक गरीब विधवा आयी और उसने दो पैसे* डाले। 43  तब यीशु ने अपने चेलों को पास बुलाया और उनसे कहा: “मैं तुमसे सच कहता हूँ कि जो लोग दान-पात्रों में पैसे डाल रहे हैं उनमें इस गरीब विधवा ने सबसे ज़्यादा डाला है। 44  क्योंकि उन सभी ने अपनी बहुतायत में से डाला है, मगर इसने अपनी तंगी में से, जो कुछ उसके पास था यानी अपनी सारी जीविका डाल दी है।”

कई फुटनोट

मर 12:14 यूनानी में “कैसर।”
मर 12:42 शाब्दिक, “दो लेप्टा।” एक लेप्टा यहूदियों का सबसे छोटा सिक्का था, जो पीतल या ताँबे का हुआ करता था। दो लेप्टा एक दिन की मज़दूरी का 1/64वाँ हिस्सा था।