एक जानकार ने 12 से भी ज़्यादा अलग-अलग धर्मों को माननेवाले करीब 800 नौजवानों से पूछा कि क्या उन्हें लगता है कि यीशु प्रार्थनाओं का जवाब देता है। उनमें से 60 प्रतिशत से भी ज़्यादा नौजवानों ने कहा कि वे मानते हैं कि यीशु प्रार्थनाओं का जवाब देता है। लेकिन एक नौजवान ने पर्चे पर पूछे सवाल में यीशु का नाम काटकर “परमेश्वर” लिख दिया।

इस बारे में आपका क्या मानना है? हमें यीशु से प्रार्थना करनी चाहिए या फिर परमेश्वर से? * इस सवाल का जवाब जानने के लिए आइए पहले हम यह जानें कि यीशु ने अपने शिष्यों को किससे प्रार्थना करना सिखाया।

यीशु ने हमें किससे प्रार्थना करना सिखाया?

यीशु ने न सिर्फ हमें यह सिखाया कि हमें किससे प्रार्थना करनी चाहिए, बल्कि उसने खुद भी उसी से प्रार्थना की।

यीशु ने स्वर्ग में रहनेवाले अपने पिता से प्रार्थना करके हम सबके लिए एक मिसाल रखी

उसने क्या सिखाया: यीशु ने हमें हमारे पिता, यहोवा परमेश्वर से प्रार्थना करना सिखाया, जो उसका भी पिता है। (यूहन्ना 20:17) जब यीशु के एक शिष्य ने उससे कहा कि “हमें सिखा कि प्रार्थना कैसे करें,” तो यीशु ने जवाब दिया कि “जब कभी तुम प्रार्थना करते हो तो कहो, ‘हे पिता।’” (लूका 11:1, 2) यीशु ने अपने शिष्यों के अलावा, दूसरे लोगों को भी प्रार्थना करने का बढ़ावा दिया। उसने कहा, ‘अपने पिता से प्रार्थना करो।’ उसने उनसे यह भी कहा, “परमेश्वर जो तुम्हारा पिता है तुम्हारे माँगने से पहले जानता है कि तुम्हें किन चीज़ों की ज़रूरत है।” (मत्ती 6:6, 8) धरती पर अपनी आखिरी रात को यीशु ने अपने चेलों से कहा, “अगर तुम पिता से कुछ भी माँगोगे तो वह मेरे नाम से तुम्हें देगा।”—यूहन्ना 16:23.

उसने क्या किया: यीशु ने जिस तरह लोगों को प्रार्थना करना सिखाया था, उसने खुद भी उसी तरह प्रार्थना की। मिसाल के लिए, एक बार प्रार्थना में उसने कहा, “हे पिता, स्वर्ग और पृथ्वी के मालिक, मैं सबके सामने तेरी बड़ाई करता हूँ।” (लूका 10:21) एक और मौके पर “यीशु ने आँखें उठाकर स्वर्ग की तरफ देखा और कहा: ‘पिता, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि तू ने मेरी सुनी है।’” (यूहन्ना 11:41) और जब यीशु मरनेवाला था, तब उसने इस तरह प्रार्थना की, “पिता, मैं अपनी जान तेरे हवाले करता हूँ।” (लूका 23:46) यीशु ने “स्वर्ग और पृथ्वी के मालिक,” यानी स्वर्ग में रहनेवाले अपने पिता से प्रार्थना करके हम सबके लिए एक मिसाल रखी। (मत्ती 11:25; 26:41, 42; 1 यूहन्ना 2:6) क्या यीशु के शिष्य भी इसी तरह प्रार्थना करते थे?

शुरू के मसीही किससे प्रार्थना करते थे?

यीशु की मौत के बाद उसे फिर से ज़िंदा किया गया, जिसके बाद वह स्वर्ग लौट गया। उसे स्वर्ग लौटे कुछ ही हफ्ते हुए थे कि विरोधियों ने उसके शिष्यों को डराना-धमकाना और सताना शुरू कर दिया। (प्रेषितों 4:18) जब ऐसा हुआ, तो बेशक उन्होंने मदद के लिए प्रार्थना की। मगर किससे? बाइबल बताती है कि “उन सभी ने एक मन होकर ऊँची आवाज़ में परमेश्वर से यह बिनती की” कि वह उसके “पवित्र सेवक यीशु के नाम के ज़रिए” उनकी मदद करता रहे। (प्रेषितों 4:24, 30) इस तरह वे यीशु की बतायी सलाह पर चले और उन्होंने परमेश्वर से प्रार्थना की, न कि यीशु से।

इसके कुछ सालों बाद, यीशु के एक शिष्य, पौलुस ने बताया कि वह और उसके साथी किस तरह प्रार्थना करते थे। उसने अपने साथियों को लिखा, “हम जब-जब तुम्हारे लिए प्रार्थना करते हैं, तो हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का हमेशा धन्यवाद करते हैं।” (कुलुस्सियों 1:3) पौलुस ने अपने साथियों को यह भी लिखा, “हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से हमेशा सब बातों के  लिए हमारे परमेश्वर और पिता का धन्यवाद करते रहो।” (इफिसियों 5:20) पौलुस के इन शब्दों से पता चलता है कि वह दूसरों को बढ़ावा देता था कि वे “सब बातों के लिए परमेश्वर और पिता” से प्रार्थना करें, पर हाँ, यीशु के नाम से।—कुलुस्सियों 3:17.

शुरू के मसीहियों की तरह, हम भी उसी तरह प्रार्थना कर सकते हैं, जैसा यीशु ने सिखाया था और इस तरह यह ज़ाहिर कर सकते हैं कि हम यीशु से प्यार करते हैं। (यूहन्ना 14:15) जब हम सिर्फ अपने पिता से ही प्रार्थना करते हैं, तो भजन 116:1, 2 में दिए शब्द हमारे लिए और भी मायने रखते हैं, जहाँ लिखा है, “मैं यहोवा से प्रेम रखता हूँ, क्योंकि उसने मेरे गिड़गिड़ाने को सुन लिया है। . . . इसलिए मैं जीवन भर उसको पुकारा करूंगा।” * (अ न्यू हिंदी ट्रांस्लेशन) ▪ (w15-E 01/01)

^ पैरा. 3 बाइबल के मुताबिक, परमेश्वर और यीशु बराबर नहीं हैं। इस बारे में ज़्यादा जानकारी के लिए बाइबल असल में क्या सिखाती है? किताब का अध्याय 4 देखिए। इसे यहोवा के साक्षियों ने प्रकाशित किया है।

^ पैरा. 11 अगर हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमारी प्रार्थनाएँ सुने, तो हमें उसकी माँगों पर खरा उतरने के लिए पूरी कोशिश करनी चाहिए। इस बारे में ज़्यादा जानने के लिए बाइबल असल में क्या सिखाती है? किताब का अध्याय 17 देखिए।