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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग  |  अक्टूबर 2014

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अच्छे लोगों के साथ बुरा क्यों होता है?

अच्छे लोगों के साथ बुरा क्यों होता है?

परमेश्वर यहोवा * सारी चीज़ों का सृष्टिकर्ता है और वह सर्वशक्‍तिमान है। इसलिए बहुत-से लोग शायद कहें, दुनिया में अच्छा या बुरा जो भी होता है सब उसी का किया-कराया है, वही सब बातों के लिए ज़िम्मेदार है। लेकिन गौर कीजिए कि सच्चे परमेश्वर यहोवा के बारे में बाइबल क्या कहती है:

  • “यहोवा जो भी करता है, अच्छा ही करता है।”—भजन 145:17, हिंदी ईज़ी-टू-रीड वर्शन।

  • ‘परमेश्वर की सारी गति या काम न्याय के हैं। वह सच्चा ईश्वर है, उस में कुटिलता नहीं, वह धर्मी और सीधा या खरा है।’—व्यवस्थाविवरण 32:4.

  • “यहोवा गहरी करुणा दिखाता है और दयालु परमेश्वर है।”—याकूब 5:11.

परमेश्वर कभी किसी के साथ बुरा नहीं करता। लेकिन क्या वह दूसरों को बुरे काम करने के लिए उकसाता है? हरगिज़ नहीं! शास्त्र वचन कहता है, “जब किसी की परीक्षा हो रही हो तो वह यह न कहे: ‘परमेश्वर मेरी परीक्षा ले रहा है।’” क्यों? क्योंकि “न तो बुरी बातों से परमेश्वर को परीक्षा में डाला जा सकता है, न ही वह खुद बुरी बातों से किसी की परीक्षा लेता है।” (याकूब 1:13) परमेश्वर कभी किसी की परीक्षा लेने या उसे परखने के लिए उससे बुरे काम नहीं करवाता। वह न तो खुद किसी के साथ बुरा करता है और न दूसरों को बुरा करने के लिए उकसाता है। तो फिर जब कुछ बुरा होता है, तो कौन उसके लिए कसूरवार या ज़िम्मेदार होता है?

गलत समय पर गलत जगह होना

इंसानों को दुख-तकलीफें क्यों सहनी पड़ती हैं इसकी एक वजह बाइबल बताती है कि “सब समय और संयोग के वश में” हैं। (सभोपदेशक 9:11) जब अचानक कोई हादसा या दुर्घटना होती है तो किसी को नुकसान होगा या नहीं, यह काफी हद तक इस पर निर्भर करता है कि दुर्घटना या हादसे की जगह कोई मौजूद था या नहीं। करीब 2,000 साल पहले यीशु मसीह ने एक ऐसी घटना के बारे में बताया जिसमें एक बुर्ज के गिरने से 18 लोगों की मौत हो गयी। (लूका 13:1-5) उन लोगों ने अपनी जान इसलिए नहीं गवाँयी कि उन्होंने ज़िंदगी में बुरे काम किए थे। यह बस इसलिए हुआ क्योंकि बुर्ज गिरते समय वे वहाँ मौजूद थे। हाल ही में, जून 2013 में आयी ज़बरदस्त बाढ़ और चट्टानों के खिसकने से भारत का उत्तराखंड राज्य तबाह हो गया। रिपोर्ट बताती हैं कि सरकार ने 4,000 लोगों की मौत घोषित की और इससे 1,00,000 से ज़्यादा ज़िंदगियों पर बुरा असर हुआ। जनवरी 2010 में हैती में एक ज़बरदस्त भूकंप आया। वहाँ की सरकार का कहना है कि उस भूकंप ने 3,00,000 से ज़्यादा लोगों की जान ले ली। इन विपत्तियों ने अच्छे-बुरे सबको अपनी आगोश में ले लिया। उसी तरह बीमारियाँ किसी को भी हो सकती हैं और कभी-भी लोगों की मौत हो सकती है।

परमेश्वर अच्छे लोगों पर मुसीबतें क्यों आने देता है?

कुछ लोग शायद कहें: ‘क्या परमेश्वर इन तबाहियों को रोक नहीं सकता? क्या वह अच्छे लोगों को बचा नहीं सकता?’ ऐसी तबाहियों या हादसों में परमेश्वर का दखल देने का मतलब होगा कि वह इनके होने से पहले ही इनके बारे में जानता है। पर क्या ऐसा है? माना कि परमेश्वर के पास भविष्य जानने की काबिलीयत है, लेकिन सवाल उठता है, “क्या परमेश्वर किसी बात को पहले से जानने की अपनी काबिलीयत का इस्तेमाल हर बात जानने के लिए करता है, या फिर वह चुनाव करता है कि वह अपनी इस काबिलीयत का इस्तेमाल कब करेगा और कब नहीं?”—यशायाह 42:9.

पवित्र शास्त्र कहता है: “हमारा परमेश्वर तो स्वर्ग में है; जो कुछ वह चाहता है, करता है।” (भजन 115:3, अ न्यू हिंदी ट्रांस्लेशन)  जी हाँ, यहोवा परमेश्वर वही काम करता है जो उसे सही या ज़रूरी लगता है, न कि हर वह काम जिसे करने के वह काबिल है। उसी तरह यहोवा यह तय करता है कि वह भविष्य जानने की अपनी काबिलीयत कब-कब इस्तेमाल करेगा। उदाहरण के लिए, जब प्राचीन शहर सदोम और अमोरा में चारों तरफ बुराई फैल गयी थी, तो परमेश्वर ने अपने एक वफादार सेवक अब्राहम से कहा, ‘मैं उतरकर देखूँगा कि जैसी चिल्लाहट मेरे कान तक पहुँची है, वहाँ के लोगों ने वैसा ही काम किया है कि नहीं। और अगर न किया हो तो मैं उसे जान लूंगा।’ (उत्पत्ति 18:20, 21) इससे साफ ज़ाहिर है कुछ समय के लिए यहोवा ने यह चुनाव किया कि उन शहरों में किस हद तक बुराई बढ़ जाएगी, यह वह नहीं जानेगा। इससे पता चलता है कि यहोवा यह चुनाव कर सकता है कि वह किन बातों को पहले से जानेगा और किन बातों को नहीं। (उत्पत्ति 22:12) लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि वह असिद्ध है, या किसी तरह से कमज़ोर है। शास्त्र कहता है, “[परमेश्वर का] काम खरा है” यानी उसमें कोई कमी नहीं। वह भविष्य जानने की अपनी काबिलीयत का सोच-समझकर इस्तेमाल करता है और देखता है कि वह उसके मकसद के मुताबिक है या नहीं। वह इंसानों को भी कोई काम करने के लिए मजबूर नहीं करता। * (व्यवस्थाविवरण 32:4) तो फिर हम किस नतीजे पर पहुँच सकते हैं? यही कि परमेश्वर किसी बात को पहले से जानने की अपनी काबिलीयत का सोच-समझकर और चुनी हुई बातों के लिए इस्तेमाल करता है।

परमेश्वर अच्छे लोगों को जुर्म से क्यों नहीं बचाता?

क्या इंसान ज़िम्मेदार है?

दुनिया में फैली बुराई के लिए कुछ हद तक इंसान ज़िम्मेदार है। गौर कीजिए एक इंसान कैसे धीरे-धीरे गलत काम कर बैठता है और देखिए बाइबल इस बारे में क्या कहती है: “हर कोई अपनी ही इच्छाओं से खिंचकर परीक्षाओं के जाल में फँसता है। फिर इच्छा गर्भवती होती है और पाप को जन्म देती है, और जब पाप कर लिया जाता है तो यह मौत लाता है।” (याकूब 1:14, 15) जब एक इंसान गलत इच्छाओं के मुताबिक कदम उठाता है या अपनी बुरी ख्वाहिशों के आगे हार मान लेता है, तो लाज़िमी है उसे बुरे अंजाम भुगतने पड़ेंगे। (रोमियों 7:21-23) इतिहास गवाह है कि जब इंसानों ने खौफनाक काम किए हैं, तो उसका नतीजा ज़बरदस्त तबाही और दुख-तकलीफें रही हैं। इतना ही नहीं, दुष्ट लोग दूसरों को भी अपने जैसा बना देते हैं जिससे बुराई बढ़ती चली जाती है।—नीतिवचन 1:10-16.

इंसान के खौफनाक काम का नतीजा ज़बरदस्त तबाही और दुख-तकलीफें रही हैं

लेकिन जब इंसान बुरे काम करता है, तो क्या परमेश्वर को दखल नहीं देनी चाहिए, उसे रोकना नहीं चाहिए? गौर कीजिए परमेश्वर ने इंसान को किस तरह बनाया। पवित्र शास्त्र कहता है कि इंसान को परमेश्वर ने अपनी छवि में या अपने जैसा बनाया है। यानी परमेश्वर ने उसमें वह गुण ज़ाहिर करने की काबिलीयत डाली है जो गुण परमेश्वर में हैं। (उत्पत्ति 1:26) इंसानों को आज़ाद मरज़ी का तोहफा दिया गया है यानी उन्हें खुद फैसला लेने की आज़ादी है। इसलिए वे चुन सकते हैं कि वे परमेश्वर से प्यार करेंगे और उसके वफादार रहकर वह काम करेंगे जो परमेश्वर की नज़र में सही है। (व्यवस्थाविवरण 30:19, 20) अगर परमेश्वर ज़बरदस्ती लोगों से कोई काम करवाए तो क्या वह उनसे आज़ाद मरज़ी का तोहफा छीन नहीं रहा होगा? ऐसे में तो इंसान बस एक रोबोट बनकर रह जाएगा, सिर्फ वही करना जो उसमें प्रोग्राम डाला गया है। उसी तरह, इंसान जो करता है और उसके साथ जो कुछ होता है, अगर वह पहले से उसके भाग्य या किस्मत में लिखा है, तो भी वह बस एक रोबोट जैसा होगा। लेकिन हम कितने शुक्रगुज़ार हो सकते हैं कि परमेश्वर  ने हमें ऐसा नहीं बनाया, बल्कि हमें खुद फैसला लेने की आज़ादी दी है! मगर इसका मतलब यह नहीं कि इंसान के पापों और गलत चुनावों की वजह से पूरी मानवजाति को हमेशा दुख-तकलीफें झेलनी पड़ेंगी।

क्या दुख-तकलीफों की वजह इंसान के कर्म हैं?

इस पत्रिका के पहले पेज पर जो सवाल दिया है वह अगर लोगों से पूछा जाए, तो मुमकिन है उनका जवाब होगा: “अच्छे लोगों के साथ बुरा उनके कर्मों की वजह से होता है। उन्होंने पिछले जन्म में जो कर्म किए उसी का उन्हें इस जन्म में फल मिलता है।” *

जहाँ तक कर्म की शिक्षा की बात है, तो यह जानना फायदेमंद होगा कि मौत के बारे में बाइबल क्या कहती है। जब सृष्टिकर्ता ने पहले इंसान आदम को बनाया, तो उसे अदन नाम के बगीचे में रखा। वहाँ सृष्टिकर्ता ने आदम से कहा, “तू बाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है: पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाए उसी दिन अवश्य मर जाएगा।” (उत्पत्ति 2:16, 17) अगर आदम ने परमेश्वर की आज्ञा तोड़कर पाप न किया होता, तो वह हमेशा-हमेशा ज़िंदा रहता। दरअसल इंसान ने परमेश्वर की आज्ञा तोड़कर जो पाप किया, उसी पाप की सज़ा मौत है। आगे चलकर जब आदम की संतान हुईं तो “मौत सब इंसानों में फैल गयी।” (रोमियों 5:12) इस तरह यह कहा जा सकता है कि “पाप जो मज़दूरी देता है वह मौत है।” (रोमियों 6:23) बाइबल यह भी कहती है, “जो मर चुका है, वह अपने पाप से बरी हो चुका है।” (रोमियों 6:7) दूसरे शब्दों में कहें तो इंसान को मौत के बाद सज़ा नहीं मिलती रहती।

आज लाखों लोगों का कहना है कि इंसान को जो मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं, वह सब उसके कर्मों का फल हैं। ऐसा माननेवाले लोग खुद की या दूसरों की मुसीबतों को यही सोचकर कबूल कर लेते हैं कि उन्होंने पिछले जन्म में जो बोया था, वही आज काट रहे हैं। इसलिए वे मुसीबतों के बारे में ज़्यादा नहीं सोचते। लेकिन इस शिक्षा से यह नतीजा निकलता है कि दुख-तकलीफें या बुराइयाँ हमेशा रहेंगी, इनसे छुटकारा पाने की कोई उम्मीद नहीं। लोगों का मानना है कि एक इंसान को सिर्फ एक ही हालत में राहत मिल सकती है, वह है पुनर्जन्म के चक्र से मोक्ष या मुक्‍ति पाना और ऐसा वह समाज में धर्म या नेकी के काम करके और खास किस्म का ज्ञान हासिल करके कर सकता है। लेकिन ये सारी शिक्षाएँ बाइबल की शिक्षाओं से बिलकुल अलग हैं। *

दुख-तकलीफों की सबसे बड़ी वजह!

क्या आप जानते हैं, दुनिया में फैली बुराई की सबसे बड़ी वजह “इस दुनिया का राजा” शैतान इब्लीस है?—यूहन्ना 14:30

दुनिया में फैली बुराई या दुख-तकलीफों की सबसे बड़ी वजह इंसान नहीं है। पवित्र शास्त्र बाइबल कहती है, परमेश्वर का एक वफादार स्वर्गदूत “सच्चाई में टिका न रहा” यानी वह परमेश्वर का वफादार न रहा और वह शैतान इब्लीस बन गया। शैतान ही दुनिया में पाप लाया। (यूहन्ना 8:44) उसने अदन बाग में बगावत की चिंगारी लगायी। (उत्पत्ति 3:1-5) यीशु मसीह ने उसे “दुष्ट” और “इस दुनिया का राजा” कहा। (मत्ती 6:13; यूहन्ना 14:30) ज़्यादातर इंसान शैतान की ख्वाहिशें पूरी कर रहे हैं और उसके पीछे चल रहे हैं। ऐसा करके वे दिखाते हैं कि वे यहोवा की अच्छी राहों पर नहीं चलना चाहते। (1 यूहन्ना 2:15, 16) बाइबल में 1 यूहन्ना 5:19 कहता है, “सारी दुनिया शैतान के कब्ज़े में पड़ी हुई है।” ऐसे ही और भी स्वर्गदूत हैं, जो बुरे काम करने लगे और शैतान का साथ देने लगे। बाइबल बताती है कि शैतान और उसके दुष्ट स्वर्गदूत ‘सारे जगत को गुमराह करते हैं’ और उन्होंने इस ‘धरती पर हाय’ यानी तबाही मचा रखी है। (प्रकाशितवाक्य 12:9, 12) इसलिए, दुनिया में फैली बुराई की सबसे बड़ी वजह शैतान इब्लीस है।

इससे साफ ज़ाहिर है कि लोगों के साथ जो बुरा होता है उसके लिए परमेश्वर हरगिज़ ज़िम्मेदार नहीं, न ही वह लोगों पर मुसीबतें लाकर उन्हें तड़पाता है। इसके बजाय, उसने वादा किया है कि वह बुराई को जड़ से मिटा देगा। इस बारे में अगले लेख में चर्चा की जाएगी। (w14-E 07/01)

^ पैरा. 3 यहोवा, परमेश्वर का नाम है जैसा बाइबल में बताया गया है।

^ पैरा. 11 परमेश्वर ने बुराई या दुख-तकलीफें क्यों रहने दीं, इस बारे में ज़्यादा जानने के लिए बाइबल असल में क्या सिखाती है? किताब का अध्याय 11 देखिए। इसे यहोवा के साक्षियों ने प्रकाशित किया है।

^ पैरा. 16 कर्म की शिक्षा की शुरूआत कैसे हुई यह जानने के लिए मरने पर हमारा क्या होता है? अँग्रेज़ी ब्रोशर का पेज 8-12 देखिए। इसे यहोवा के साक्षियों ने प्रकाशित किया है।

^ पैरा. 18 मरे हुए किस हालत में हैं और क्या उनके लिए कोई आशा है, इस बारे में बाइबल क्या कहती है, यह जानने के लिए बाइबल असल में क्या सिखाती है? किताब का अध्याय 6 और 7 देखिए।