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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग  |  जुलाई 2014

 उनके विश्वास की मिसाल पर चलिए | मरियम

वह तलवार जैसे दुख के ज़ख्म सह पायी

वह तलवार जैसे दुख के ज़ख्म सह पायी

म रियम घुटनों के बल बैठी रो रही है, उसका दुख शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। उसके कानों में अब-भी अपने बेटे के कराहने की आवाज़ गूँज रही है। बस थोड़ी देर पहले ही उसके बेटे को घंटों तड़पाकर मार डाला गया। दोपहर का समय था लेकिन बादलों में अंधेरा छा गया, धरती काँप उठी। (मत्ती 27:45, 51) शायद मरियम को लगा होगा कि इस तरह पूरे जहान का मालिक यहोवा, दुनिया को बताना चाहता है कि यीशु के मरने से उसे कितना दर्द हुआ है!

मरियम घंटों या कहें तो जब तक अँधेरा छट नहीं गया तब तक गुलगुता यानी खोपड़ी स्थान पर बैठकर रोती रही। (यूहन्ना 19:17, 25) सारी यादें उसके ज़हन में घूमने लगीं। खास तौर पर एक घटना जो 33 साल पहले घटी थी, उसे याद आने लगी। मरियम अपने पति यूसुफ के साथ नन्हे यीशु को लेकर यरूशलेम के मंदिर गए। वहाँ यीशु को देखकर बुज़ुर्ग शिमोन ने जो एक भविष्यवक्ता था, परमेश्वर की प्रेरणा से एक भविष्यवाणी की। उसने कहा कि यीशु बड़े-बड़े काम करेगा, मगर मरियम के लिए उसने कहा, एक दिन उसे ऐसा महसूस होगा मानो कोई लंबी तलवार उसके आर-पार हो गयी है। (लूका 2:25-35) अब इस मुश्किल घड़ी में आने के बाद, मरियम को भविष्यवक्ता के कहे वे शब्द समझ में आए।

दुख की वजह से मरियम का कलेजा छलनी हो गया

कहा जाता है कि इंसान को सबसे ज़्यादा दर्द तब होता है, जब उसका अपना बच्चा, अपना कलेजे का टुकड़ा मौत के मुँह में चला जाता है। मौत एक ऐसी बेरहम दुश्मन है, जो किसी-न-किसी तरीके से हम सभी को चोट पहुँचाती है। (रोमियों 5:12; 1 कुरिंथियों 15:26) क्या इससे होनेवाले ज़ख्म सहना मुमकिन है? जब हम मरियम की ज़िंदगी के उस दौर के बारे में जानेंगे, जो यीशु की प्रचार सेवा की शुरुआत से लेकर उसकी मौत तक, यहाँ तक कि उसके बाद तक चला, तब हम गौर करेंगे कि कैसे विश्वास ने मरियम की मदद की। हम जान पाएँगे कि कैसे वह उन सभी ज़ख्मों को बरदाश्त कर पायी जो इतने गहरे थे मानो तलवार उसके आर-पार हो गयी हो।

“वह तुमसे जो कुछ कहे, वही करना”

आइए यीशु की मौत के साढ़े तीन साल पहले चलें। मरियम देख सकती थी कि कुछ बदलाव होनेवाला है। नासरत जैसे छोटे शहर में, लोग यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले और कायल कर देनेवाले उसके पश्चाताप के संदेश के बारे में बातें करने लगे थे। उसका यह संदेश लोगों को कायल कर देता था। मरियम अच्छी तरह जानती थी कि उसका बड़ा बेटा इन सारी बातों को एक निशानी के तौर पर देख रहा है, अब वह घड़ी आ गयी थी, जब यीशु को प्रचार सेवा शुरु करनी थी। (मत्ती 3:1, 13) मरियम और उसके घराने के लिए यीशु की गैर-मौजूदगी एक बहुत बड़ा बदलाव लानेवाली थी। हम ऐसा क्यों कह सकते हैं?

ऐसा लगता है कि मरियम के पति यूसुफ की पहले ही मौत हो चुकी थी। अगर हाँ, तो मरियम के लिए इस तरह का दुख सहना पहली बार नहीं था। * यीशु को अब सिर्फ “बढ़ई का बेटा” नहीं बल्कि “बढ़ई” कहा जाने लगा। इससे पता चलता है कि यीशु ने अपने पिता का कारोबार सँभाल लिया था और परिवार की ज़रूरतों को पूरा करनेवाला बन गया था, एक ऐसे परिवार की जिसमें उसके अलावा छ: और सदस्य थे। (मत्ती 13:55, 56; मरकुस 6:3) हालाँकि यीशु अपने भाई याकूब को जो उससे छोटा था, बढ़ई के कारोबार की तालीम दे रहा था, लेकिन बड़े बेटे का घर छोड़ना वाकई परिवार के लिए मुश्किलों-भरा रहा होगा। मरियम पहले से ही दुखों के बोझ से दबी हुई थी, तो क्या अब वह इस नयी परेशानी से डर गयी थी? इस बारे में शायद हम अंदाज़ा ही लगा सकते हैं। मगर इससे भी ज़्यादा, मरियम को एक दूसरा बदलाव अपनाना था। वह उस वक्‍त कैसे पेश आती, जब उसका बेटा यीशु नासरी से यीशु  मसीह बन जाता, वही मसीहा जिसके बारे में सालों पहले वादा किया गया था? बाइबल में दर्ज़ एक ब्यौरा हमें इस बारे में ज़्यादा जानकारी देता है।—यूहन्ना 2:1-12.

यीशु बपतिस्मा लेने के लिए यूहन्ना के पास गया, इसके बाद वह परमेश्वर का अभिषिक्‍त जन या मसीहा बन गया। (लूका 3:21, 22) फिर उसने अपने चेलों को चुनना शुरु किया। हालाँकि यीशु वक्‍त की नज़ाकत को अच्छी तरह समझता था, फिर भी वह परिवार और दोस्तों के लिए समय निकालता था। वह अपनी माँ, अपने चेलों और भाई-बहनों के साथ, शादी की एक दावत में शामिल हुआ। यह शादी काना शहर में थी जो नासरत से लगभग 8 मील (13 किलोमीटर) दूर एक पहाड़ पर था। शादी के इस अवसर पर एक समस्या खड़ी हो गयी, जिसे मरियम ने भाँप लिया। शायद उसने देखा कि परिवारवाले घबराए हुए एक दूसरे को देख रहे हैं और आपस में फुसफुसा रहे हैं। वहाँ दाखरस खत्म हो गया था! इसराएली परिवारों में मेहमान-नवाज़ी के दौरान अगर कोई चीज़ कम पड़ जाती थी तो वह परिवार के लिए बेइज़्ज़ती की बात थी, इतना ही नहीं इससे पूरा माहौल बिगड़ जाता था। मरियम ने उनकी तकलीफ महसूस की, इसलिए वह यीशु के पास गयी।

उसने कहा, “उनके पास दाख-मदिरा नहीं है।” वह यीशु से क्या उम्मीद कर रही थी? हम सिर्फ इसकी कल्पना कर सकते हैं। लेकिन एक बात मरियम ज़रूर जानती थी कि उसका बेटा बहुत महान है जो बड़े-बड़े काम करता है। शायद उसे लगा कि यीशु तुरंत कुछ करेगा। दूसरे शब्दों में कहें तो वह उससे कह रही थी, “बेटा तुम कुछ करते क्यों नहीं!” मगर यीशु के जवाब ने उसे चौका दिया। यीशु ने कहा: “हे स्त्री, मुझे तुझसे क्या काम?” यीशु के शब्दों में मरियम के लिए अनादर नहीं था, जैसा कि कुछ लोग समझते हैं। लेकिन हाँ, वह प्यार से मरियम को ताड़ना दे रहा था। दरअसल वह अपनी माँ को याद दिला रहा था कि उसे अपनी प्रचार सेवा कैसे करनी है, इस बारे में मरियम को कुछ कहने का हक नहीं है, वह तो उसके पिता यहोवा परमेश्वर का काम है।

मरियम ने अपने बेटे की ताड़ना कबूल की, क्योंकि वह उस ताड़ना की वजह जानती थी और दिल से नम्र थी। वह शादी में काम करनेवालों की तरफ देखकर कहती है: “वह तुमसे जो कुछ कहे, वही करना।” मरियम समझ गयी कि अब उसे यीशु को निर्देशन देने का हक नहीं रहा, बल्कि अब उसे और दूसरों को यीशु से निर्देशन पाने की ज़रूरत है। बेशक यीशु ने यह ज़ाहिर किया कि उसकी माँ के दिल में नए जोड़े के लिए जो भावनाएँ हैं उनकी वह कदर करता है। उसने अपना सबसे पहला चमत्कार किया, पानी को सबसे बढ़िया दाखरस में बदल दिया। इसका नतीजा क्या हुआ? “उसके चेलों ने उस पर विश्वास किया।” यहाँ तक कि मरियम ने भी यीशु पर अपना विश्वास ज़ाहिर किया। अब वह उसे सिर्फ बेटे की नज़र से नहीं, बल्कि उसे प्रभु और उद्धारकर्ता की नज़र से देख रही थी।

आज माता-पिता, मरियम के विश्वास से बहुत कुछ सीख सकते हैं। माना कि कोई भी अपने बच्चे की परवरिश वैसे नहीं कर सकता, जैसे यीशु की हुई थी। लेकिन जब एक बच्चा बड़ा हो जाता है, तब हमारी लाख कोशिशों के बावजूद उसकी परवरिश में चुनौतियाँ आती ही हैं। हो सकता है, एक माता-पिता अपने उन बच्चों को अब भी छोटा ही समझें जो बड़े हो गए हैं और उनके साथ छोटों जैसा ही व्यवहार करें। मगर याद रखिए, अब उनके साथ इस तरह पेश आने का वक्‍त नहीं रहा। (1 कुरिंथियों 13:11) माता-पिता कैसे अपने बढ़ते बच्चों की मदद कर सकते हैं? एक तरीका है उनमें अपना पूरा विश्वास दिखाना, यानी यह भरोसा रखना कि आपका बेटा या बेटी ज़रूर बाइबल की शिक्षाओं को अपनी ज़िंदगी में लागू करेगी। और इससे उन्हें यहोवा की आशीषें मिलेंगी। इस तरह जब माँ-बाप अपने बच्चों में विश्वास ज़ाहिर करते हैं, तो इसका उन पर अच्छा असर होता है। इसमें कोई शक नहीं कि यीशु को आगे के सालों में मरियम का सहयोग पाकर फायदा हुआ होगा।

“उसके भाई उस पर विश्वास नहीं दिखाते थे”

खुशखबरी की किताबों में जब यीशु के साढ़े तीन साल की सेवा का ज़िक्र किया गया, तो उसमें मरियम के बारे में सिर्फ कुछ ही जगहों पर बताया गया है। ध्यान रखिए कि इस वक्‍त तक मरियम की हालत कुछ ऐसी थी, उसके पति की मौत हो चुकी थी और वह अकेली अपने बढ़ते बच्चों की परवरिश कर रही थी। (1 तीमुथियुस 5:8) फिर भी वह हमेशा आध्यात्मिक बातों पर मनन करती थी जो  उसने मसीहा के बारे में सीखी थीं। अपने परिवार के दस्तूर के मुताबिक वह हमेशा सभा-घरों में रखी जानेवाली सभाओं में हाज़िर होती थी।—लूका 2:19, 51; 4:16.

तो फिर क्या यह कहना सही नहीं होगा कि जब यीशु नासरत के सभा-घरों में सिखाता था, तब वहाँ हाज़िर भीड़ में मरियम शामिल होती होगी? यह देखकर वह क्या ही खुशी से भर गयी होगी कि उसका बेटा खर्रे को पढ़कर कहता है कि सालों पहले मसीहा के बारे में की गयी भविष्यवाणी मुझ पर पूरी होती है! दूसरी तरफ, मरियम को यह देखकर कितना बुरा लग रहा होगा कि उसके अपने नासरी भाई-बहन, उसके बेटे यीशु को नहीं अपना रहे हैं, यहाँ तक कि उन्होंने उसे मार डालने की साज़िश रची।—लूका 4:17-30.

सबसे ज़्यादा दुख उसे यह देखकर होता होगा कि उसके अपने बच्चे यीशु के साथ किस तरह पेश आते हैं। यूहन्ना 7:5 में हम पढ़ते हैं कि यीशु के चार भाइयों ने अपनी माँ की तरह विश्वास नहीं दिखाया। आयत कहती है, “उसके भाई उस पर विश्वास नहीं दिखाते थे।” यीशु की बहनों के बारे में क्या? शायद उसकी दो बहनें रही हों लेकिन बाइबल उस बारे में कुछ नहीं बताती। * ऐसे में हर मौके पर मरियम को उस दर्द से गुज़रना पड़ता होगा, जब घर के सदस्य धर्म को लेकर अलग-अलग नज़रिया रखते हैं। बेशक मरियम को आध्यात्मिक बातों के लिए अपनी वफादारी दिखाते वक्‍त, एक संतुलन बनाए रखने में मेहनत करनी पड़ी होगी, ताकि वह बिना ज़ोर-ज़बरदस्ती या बहस किए अपने परिवारवालों का दिल जीत सके।

एक मौके पर यीशु के रिश्तेदार, जिनमें उसके भाई भी शामिल थे, उसे “पकड़कर” ले जाने आए। दरअसल वे कह रहे थे, “उसका दिमाग फिर गया है।” (मरकुस 3:21, 31) मरियम के मन में ऐसी कोई बात नहीं थी। वह बस यह उम्मीद लेकर अपने बेटों के साथ गयी थी कि शायद वे उस घटना से कुछ सीखेंगे, जो उन्हें विश्वास में बढ़ने में मदद करेगी। क्या ऐसा हुआ? हालाँकि यीशु बड़े-बड़े काम और बढ़िया शिक्षाएँ सिखाता रहा, मगर मरियम के दूसरे बेटों ने यीशु पर विश्वास नहीं दिखाया। हताश होकर क्या मरियम सोचने लगी कि आखिर कौन-सी बात उनके दिल को छू जाएगी?

क्या आप भी ऐसे घर में रहते हैं जहाँ लोगों के अलग-अलग विश्वास हैं? आप मरियम से बहुत कुछ सीख सकते हैं। मरियम ने कभी-भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। उसे यकीन था कि एक-न-एक दिन उसके बाकी परिवारवाले ज़रूर विश्वासी बनेंगे। इसके अलावा, उसने अपने रिश्तेदारों को यह देखने का मौका दिया कि कैसे उसके विश्वास की वजह से उसे खुशी और मन की शांति मिलती है। क्या उसे यीशु की कमी खलती थी? क्या कभी उसे ऐसा लगता था कि यीशु को घर पर रहकर माँ और भाई-बहनों के साथ वक्‍त बिताना चाहिए? अगर ऐसा था, तो उसने ज़रूर अपनी भावनाओं को काबू में रखा होगा। क्या आप अपने बच्चों की मदद कर सकते हैं, ताकि वे परमेश्वर को ज़िंदगी में पहली जगह दें?

“एक लंबी तलवार तेरे आर-पार हो जाएगी”

क्या मरियम को यीशु पर विश्वास दिखाने का फल मिला? यहोवा विश्वास दिखानेवालों को इनाम देना कभी नहीं भूलता और मरियम उनमें से एक है। (इब्रानियों 11:6) ज़रा सोचिए, उस वक्‍त उसे कैसा लगा होगा जब उसने अपने बेटे को सिखाते हुए सुना या फिर जब पहली बार किसी ने यीशु का पहाड़ी उपदेश सुनकर उसे बताया होगा।

यीशु की ज़्यादातर मिसालों में यूसुफ और मरियम से मिली तालीम की झलक दिखती है

क्या मरियम अपने बेटे के दृष्टांतों में उन बातों को महसूस कर पाती थी, जो नासरत में रहते वक्‍त यीशु ने बचपन में देखी थीं, जैसे: एक स्त्री जो घर में तब तक झाड़ू लगाती रहती है जब तक कि उसे सिक्का नहीं मिल जाता, चक्की पीसती हुई स्त्रियाँ या दीपक जलाकर दीवट पर रखना? क्या इन मिसालों को सुनकर मरियम को उस बेटे की याद आयी होगी, जो हर दिन उसके पास खड़े होकर उसे ये सारे काम करते हुए देखा करता था? (लूका 11:33; 15:8, 9; 17:35) जब यीशु ने कहा कि मेरा जुआ आरामदायक और मेरा बोझ हल्का है, तो क्या इससे मरियम को वह सुनहरा पल याद आया होगा, जब यूसुफ जवान यीशु को ऐसा जुआ बनाना और आकार देना सिखा रहा था जिसका बोझ जानवर को हल्का लगे? (मत्ती 11:30) जी हाँ, मरियम को यह सोचकर क्या ही खुशी हुई  होगी कि यहोवा ने उसे एक ऐसे बेटे की परवरिश करने और तालीम देने का सम्मान दिया जो आगे चलकर मसीहा बनता। बेशक वह महान शिक्षक की बातें सुनकर फूली नहीं समाती होगी, जब वह ज़िंदगी की मामूली चीज़ों और नज़ारों का इस्तेमाल करके लोगों को ज़बरदस्त सबक सिखाता था।

इन सबके बावजूद मरियम नम्र थी। बेटे ने कभी हद-से-ज़्यादा अपनी माँ की तारीफ नहीं की, तो क्या वह खुद कभी उसकी उपासना करने के बारे में सोच सकता था? यीशु की प्रचार सेवा के दौरान भीड़ में से एक औरत चिल्लाकर कहती है कि यीशु की माँ को उसे जन्म देकर ज़रूर बहुत सुखी होगी। यीशु ने जवाब में कहा: “नहीं, इसके बजाय सुखी हैं वे जो परमेश्वर का वचन सुनते हैं और उस पर चलते हैं!” (लूका 11:27, 28) एक और मौके पर जब भीड़ में से कुछ लोगों ने यीशु का ध्यान पास खड़ी उसकी माँ और भाइयों पर दिलाया, तो जवाब में यीशु ने कहा, जो उस पर विश्वास करते हैं वही असल में उसकी माँ और भाई हैं। इन सब बातों का मरियम को बुरा नहीं लगा, बल्कि वह अच्छी तरह समझती थी कि यीशु क्या कहना चाहता है। इंसानी रिश्तों से ज़्यादा परमेश्वर की सेवा में जुड़े लोगों का साथ, हमारे लिए ज़्यादा अहमियत रखता है।—मरकुस 3:32-35.

लेकिन हम किन शब्दों में मरियम का वह दर्द बयान कर पाएँगे जो उसे उस वक्‍त हुआ था जब उसके बेटे को बेरहमी से सूली पर तड़पाया गया और मार डाला गया? यीशु का एक प्रेषित, यूहन्ना जिसने इस पूरी घटना को अपनी आँखों से देखा था, उसने अपनी लिखी किताब में कहा कि जब यीशु पर ज़ुल्म ढाया जा रहा था उस दौरान मरियम “यीशु की यातना की सूली के पास” खड़ी थी। अपने बेटे की आखिरी साँस तक माँ उसके साथ थी, कोई भी बात वफादार मरियम को ऐसा करने से नहीं रोक पायी। उस वक्‍त हालाँकि यीशु की हर साँस में दर्द और हर शब्द में तकलीफ थी, फिर भी जब उसने अपनी माँ को देखा, तो उसने पास खड़े अपने प्रेषित यूहन्ना से कहा कि वह उसका खयाल रखे। तब तक यीशु के बाकी भाई विश्वासी नहीं बने थे इसलिए यीशु ने मरियम की देखभाल की ज़िम्मेदारी अपने एक वफादार चेले को सौंपी। इस तरह यीशु ने दिखाया कि जब एक आदमी विश्वासी बनता है, तो यह उसकी ज़िम्मेदारी बनती है कि वह अपने परिवार की ज़रूरतों का खयाल रखे, खास तौर पर उनकी आध्यात्मिक ज़रूरतों का।—यूहन्ना 19:25-27.

आखिर में, जब यीशु की मौत हुई तब मरियम को उन शब्दों का दर्द महसूस हुआ जो सालों पहले कहे गए थे, एक लंबी तलवार उसके आर-पार हो जाएगी। अगर मरियम के इस दुख को समझना हमारे लिए मुश्किल है तो सोचिए, उसकी इस खुशी का एहसास हम कैसे कर सकते हैं, जो तीन दिन बाद उसे हुई थी! उसने आज तक का सबसे बड़ा चमत्कार देखा, यीशु का ज़िंदा किया जाना। और उस वक्‍त उसकी खुशी और दुगनी हो गयी थी जब उसे पता चला कि यीशु अपने सौतेले भाई याकूब को अकेले में दिखायी दिया। (1 कुरिंथियों 15:7) इस मुलाकात ने याकूब और यीशु के दूसरे सौतेले भाइयों पर गहरी छाप छोड़ी। हम पढ़ते हैं कि आगे चलकर वे विश्वास करने लगे कि यीशु ही मसीहा है। जल्द ही हम देखते हैं कि वे अपनी माँ के साथ मसीही सभाओं में आने लगे और ‘प्रार्थनाओं में लगे’ रहे। (प्रेषितों 1:14) उनमें से याकूब और यहूदा ने बाइबल की किताबें भी लिखीं।

मरियम अपने बेटों को वफादार मसीही बनते देख बहुत खुश हुई

हमें, मरियम का आखिरी ज़िक्र सभाओं में अपने बेटों के साथ प्रार्थना करनेवाले ब्यौरे में मिलता है। मरियम ने हमारे आगे क्या ही बेहतरीन मिसाल रखी है! अपने विश्वास की वजह से वह तलवार जैसे दुख के ज़ख्म सह पायी और इसका उसे शानदार इनाम मिला। अगर हम उसके विश्वास की मिसाल पर चलते हैं तो हम भी इस बेरहम दुनिया के दिए हर ज़ख्म को सह पाएँगे और ऐसे बेहतरीन इनाम पाएँगे जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। ▪ (w14-E 05/01)

^ पैरा. 8 बारह साल के यीशु के साथ घटी जिस घटना का ज़िक्र खुशखबरी की किताब में किया गया है, सिर्फ उसी में यूसुफ का नाम आता है। उसके बाद, जिस किसी वाकए में यीशु की माँ और उसके दूसरे बच्चों के बारे में बताया गया है, वहाँ यूसुफ का ज़िक्र नहीं आता। एक ब्यौरे में यीशु को “मरियम का बेटा” कहा गया जहाँ यूसुफ का ज़िक्र नहीं किया गया है।—मरकुस 6:3.

^ पैरा. 16 यूसुफ, यीशु को जन्म देनेवाला पिता नहीं था बल्कि उसने बस यीशु की परवरिश की थी। इसलिए यूसुफ के जो दूसरे बच्चे हुए वे यीशु के सौतेले भाई-बहन थे।—मत्ती 1:20.