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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग  |  अक्टूबर 2010

 सुखी परिवार का राज़

अपने बच्चों को एक ज़िम्मेदार इंसान बनना सिखाइए

अपने बच्चों को एक ज़िम्मेदार इंसान बनना सिखाइए

जयवंत: * “हर शाम यही होता था। मेरा चार साल का बेटा, मुकुल पूरे घर में खिलौने बिखेर देता था। सोने से पहले, मैं बार-बार उसे सारे खिलौने बटोरकर एक जगह रखने के लिए कहता। लेकिन वह गुस्से से पागल हो जाता और ज़ोर-ज़ोर से चीखता। कभी-कभी मैं उसकी इस हरकत से खीज उठता और उस पर चिल्लाने लगता। बाद में, हम दोनों को ही बुरा लगता था। मैं रात को चैन की नींद सोना चाहता था इसलिए मैंने थक-हारकर उससे बोलना ही छोड़ दिया और खिलौने खुद ही बटोरने लगा।”

नीलीमा: “जब मेरी बेटी ज्योति 13 साल की हुई, तब से मुश्किलों का सिलसिला शुरू हो गया। एक बार स्कूल में टीचर ने उसे कुछ होमवर्क दिया और उसे समझ नहीं आया कि वह उसे कैसे करे। घर आकर वह एक घंटे तक रोती रही। मैंने उसे समझाया कि वह अपनी टीचर की मदद ले। लेकिन वह कहने लगी कि उसकी टीचर एक नंबर की खडूस है और उसे टीचर से बात करने में भी डर लगता है। मेरा दिल किया कि जाकर टीचर को झाड़ दूँ। मैं सोचने लगी कि वह होती कौन है मेरी बिटिया को डाँटनेवाली।”

क्या आप भी कभी-कभी जयवंत और नीलीमा की तरह महसूस करते हैं? कई माँ-बाप उनकी तरह अपने बच्चों को किसी मुश्किल का सामना करते देख परेशान हो उठते हैं। ऐसे में लाज़िमी है कि वे अपने बच्चों की मदद के लिए फौरन कदम उठाएँ। लेकिन ऊपर बताए हालात में जयवंत और नीलीमा के आगे एक बढ़िया मौका है कि वे अपने बच्चों को ज़िम्मेदार बनना सिखाएँ। हाँ, यह सच है कि एक 4 साल के और एक 13 साल के बच्चे के सीखने में फर्क होगा।

सच्चाई तो यह है कि आपका बच्चा हमेशा आपका दामन थामे नहीं रह सकता। आज नहीं तो कल उसे जीवन में आनेवाली चुनौतियों का सामना करना ही पड़ेगा। एक दिन ऐसा आएगा जब उसे घर छोड़कर जाना होगा और “अपनी ज़िम्मेदारी का बोझ खुद” उठाना होगा। (गलातियों 6:5; उत्पत्ति 2:24) माँ-बाप बच्चों को खुद की ज़िम्मेदारी उठाने के काबिल बनने में मदद कर सकते हैं। उनका लक्ष्य होना चाहिए कि अपने बच्चे को निस्वार्थ, परवाह करनेवाला और एक ज़िम्मेदार इंसान बनाना। लेकिन ऐसा करना लोहे के चने चबाने से कम नहीं!

 खुशी की बात है कि माँ-बाप अपना यह लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। बशर्ते वे यीशु की शानदार मिसाल से सीखें कि वह कैसे अपने चेलों के साथ पेश आया। यीशु का कोई बच्चा नहीं था, लेकिन उसने कुछ लोगों को चेलों के तौर पर चुना और उन्हें सीखाने और चेला बनाने के काम की बढ़िया तालीम दी, ताकि उसके स्वर्ग जाने के बाद भी वे उस काम को जारी रख सकें। (मत्ती 28:19, 20) यीशु अपने चेलों को ज़िम्मेदारी सँभालने के काबिल बनाने में कामयाब हुआ। हर माँ-बाप की भी यही तमन्ना होती है कि उनका बच्चा अपने पैरों पर खड़ा हो और एक ज़िम्मेदार इंसान बने। माँ-बाप इसमें कैसे कामयाब हो सकते हैं? इसके लिए आइए ऐसे तीन पहलुओं पर गौर करें जिसमें यीशु ने माँ-बाप के लिए एक बढ़िया मिसाल रखी।

अपने बच्चों के लिए “नमूना” रखिए

अपनी ज़िंदगी के आखिरी वक्‍त में यीशु ने अपने चेलों से कहा: “मैंने तुम्हारे लिए नमूना छोड़ा है कि जैसे मैंने तुम्हारे साथ किया, वैसे ही तुम्हें भी करना चाहिए।” (यूहन्ना 13:15) यीशु की तरह, माँ-बाप को चाहिए कि वे बच्चों को समझाएँ और खुद अपनी मिसाल से दिखाएँ कि ज़िम्मेदार इंसान बनने में क्या शामिल है।

खुद से पूछिए: क्या मैं अपनी ज़िम्मेदारी उठाने के बारे में इस तरह बात करता हूँ कि दूसरों पर इसका अच्छा असर हो? दूसरों की मदद करने से जो संतुष्टि मिलती है क्या मैं उस बारे में बात करता हूँ? या क्या मैं अकसर अपना दुखड़ा रोता हूँ और उन लोगों से अपनी तुलना करता हूँ जो आरामतलब ज़िंदगी जीते हैं?

माना कि हममें से कोई भी सिद्ध नहीं है। हम सभी कभी-न-कभी अपने आपको बोझ से दबा हुआ महसूस करते हैं। लेकिन याद रखिए आपकी मिसाल का आपके बच्चों पर ज़बरदस्त असर हो सकता है और वे ज़िम्मेदार बनने की ज़रूरत और अहमियत समझ सकते हैं।

इसे आज़माइए: अगर मुमकिन हो तो कभी-कभार बच्चे को अपने साथ काम की जगह ले जाइए और दिखाइए कि आप परिवार का पेट पालने के लिए कितनी मेहनत करते हैं। दूसरों की मदद के लिए कोई काम करते वक्‍त अपने बच्चे को भी उसमें शामिल कीजिए और इससे मिलनेवाली खुशी के बारे में अपने बच्चे से चर्चा कीजिए।—प्रेषितों 20:35.

सही उम्मीदें बाँधिए

यीशु अपने चेलों को कुछ ज़िम्मेदारी सौंपना चाहता था, लेकिन वह यह बखूबी समझता था कि उसके चेलों को अपनी ज़िम्मेदारी समझने और उसे उठाने के काबिल बनने में वक्‍त लगेगा। उसने एक बार अपने चेलों से कहा: “मुझे तुमसे और भी बहुत-सी बातें कहनी हैं, मगर इस वक्‍त तुम इन्हें समझ नहीं सकते।” (यूहन्ना 16:12) यीशु ने तुरंत अपने चेलों पर ज़िम्मेदारी का बोझ नहीं लाद दिया। इसके बजाय, उसने वक्‍त लेकर पहले उन्हें बहुत-सी बातें सिखायीं। फिर जब उसे लगा कि वे ज़िम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हैं तब उसने उन्हें अकेले काम करने के लिए भेजा।

माता-पिता के लिए अपने बच्चे से यह उम्मीद करना सही नहीं होगा कि ज़िम्मेदारी उठाने के लायक बनने से पहले ही वे उसे अपने कंधों पर ले लें। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, माँ-बाप को यह तय करना चाहिए कि उन्हें कौन-सा काम या ज़िम्मेदारी देना सही होगा। मिसाल के लिए, उन्हें अपने बच्चों को शारीरिक स्वच्छता, अपने कमरे की साफ-सफाई, वक्‍त के पाबंद रहना और पैसों का सोच-समझकर इस्तेमाल करना सिखाना चाहिए। जब बच्चे स्कूल जाने लगते हैं तो माँ-बाप को चाहिए कि वे अपने बच्चों को सिखाएँ कि स्कूल का होमवर्क पूरा करने की ज़िम्मेदारी उनकी अपनी है।

ज़िम्मेदारी सौंपने के साथ-साथ माँ-बाप को अपने बच्चों की मदद भी करनी चाहिए ताकि वे ज़िम्मेदारी उठा सकें। जयवंत, जिसका लेख की शुरूआत में ज़िक्र किया है, उसे एहसास हुआ कि उसके बेटे मुकुल के रूठने की एक वजह शायद यह है कि उसे खिलौने बटोरने का काम पहाड़-सा लगता है। वह कहता है “अपने बेटे पर बरसने के बजाए मैंने उसे सिखाया कि वह इस काम को कैसे तरतीब से पूरा कर सकता है।”

जयवंत ने क्या किया? वह कहता है, “सबसे पहले मैंने खिलौने बटोरने का एक समय तय किया। फिर मैं मुकुल के साथ मिलकर कमरे के एक कोने से खिलौने उठाना शुरू करता था। मैंने इस काम को एक खेल बना दिया कि देखते हैं कौन सबसे जल्दी खिलौने बटोरता है। देखते-ही-देखते यह रोज़ की बात हो गयी। मैंने मुकुल से वादा किया कि अगर वह काम जल्दी खत्म करेगा, तो सोते वक्‍त मैं उसे एक और कहानी पढ़कर सुनाऊँगा।  लेकिन अगर वह देर करेगा तो कहानी सुनाने के समय में कटौती कर दी जाएगी।”

इसे आज़माइए: पता लगाइए कि आपका हरेक बच्चा घर का कामकाज पूरा करने में किस तरह आपका हाथ बँटा सकता है। खुद से पूछिए, ‘क्या ऐसा कोई काम है जो बच्चे खुद कर सकते हैं लेकिन मैं उनके लिए करता हूँ?’ अगर हाँ, तो बच्चों के साथ मिलकर वह काम कीजिए जब तक कि वे उन्हें खुद करना न सीख जाएँ। साफ-साफ बताइए कि उन्हें जो काम दिया गया है अगर वे उसे अच्छी तरह पूरा करेंगे, तो उन्हें इनाम दिया जाएगा और अगर नहीं तो उन्हें इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ेगा। फिर खुद तय कीजिए कि आप उन्हें क्या इनाम देंगे या उन्हें क्या खामियाज़ा भुगतना पड़ेगा।

साफ-साफ हिदायतें दीजिए

हर अच्छे शिक्षक की तरह यीशु जानता था कि कोई भी काम सीखने का सबसे बढ़िया तरीका है उस काम को खुद करके देखना। जब यीशु को लगा कि उसके चेले ज़िम्मेदारी उठाने के काबिल हैं, तो उसने “जिस-जिस शहर और इलाके में वह खुद जानेवाला था, वहाँ उन्हें दो-दो की जोड़ियों में अपने आगे भेजा।” (लूका 10:1) उसने उन्हें यूँ ही बिना कुछ सिखाए नहीं भेज दिया बल्कि भेजने से पहले उसने उन्हें खास हिदायतें दीं। (लूका 10:2-12) और जब चेलों ने वापस लौटकर प्रचार में मिली कामयाबी के बारे में यीशु को बताया, तो उसने उन्हें शाबाशी दी और उनकी हौसला-अफज़ाई की। (लूका 10:17-24) उसने उन पर भरोसा दिखाया कि वे इस ज़िम्मेदारी के काबिल हैं और उनके काम पर मंजूरी दी।

जब आपके बच्चे पर चुनौती-भरी कोई ज़िम्मेदारी आती है तो आप क्या करते हैं? क्या आप इस डर से उन्हें बचाने की कोशिश करते हैं कि कहीं वे निराश न हो जाएँ या हार न मान लें? आप शायद दूसरे माँ-बाप की तरह अपने बच्चे को बचाने की कोशिश करें और उनका बोझ अपने सिर ले लें।

लेकिन ज़रा सोचिए, अगर आप हर बार बच्चे को बचाएँगे और उसका बोझ अपने सिर पर ले लेंगे तो वह खुद के बारे में क्या सोचेगा? क्या उसे लगेगा कि आपको उस पर भरोसा है और वह अपनी ज़िम्मेदारी उठा सकता है? या आप यह दिखा रहे होंगे कि वह अभी-भी दूध पीता बच्चा है जिसे हर चीज़ के लिए आप पर निर्भर रहना पड़ता है?

उदाहरण के लिए, नीलीमा जिसका पहले ज़िक्र किया गया था उसने कैसे अपनी बेटी की समस्या सुलझायी? मामले में दखल देने के बजाय, उसने अपनी बेटी ज्योती को सुझाया कि वह खुद टीचर से बात करे। नीलीमा ने ज्योति के साथ मिलकर उन सवालों की एक सूची तैयार की, जो वह टीचर से पूछना चाहती थी। फिर उन्होंने तय किया कि टीचर से कब मिलना सही रहेगा। इसके बाद, माँ-बेटी ने रिहर्सल की कि किस तरह टीचर से बात की जानी चाहिए। नीलीमा कहती है, “मेरी बेटी ने हिम्मत जुटायी और अपनी टीचर से बात की। पहल करने के लिए टीचर ने उसकी तारीफ की। ज्योति को खुद पर गर्व महसूस हुआ और मुझे भी अपनी बेटी पर फख्र हुआ।”

इसे आज़माइए: आपका बच्चा जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है, उसे लिख लीजिए। और हर चुनौती के आगे यह भी लिखिए कि आप उसका सामना करने में कैसे उसे मदद देंगे बजाय उसे बचाने के। अपने बच्चे के साथ रिहर्सल कीजिए कि वह चुनौती का सामना करने के लिए क्या कदम उठाएगा। बच्चे पर भरोसा दिखाइए कि वह चुनौती का सामना कर सकता है।

अगर आप हमेशा अपने बच्चों को मुश्किलों से बचाने की कोशिश करेंगे, तो दरअसल आप जीवन में आनेवाली चुनौतियों का सामना करने में उनके लिए एक बाधा बन रहे होंगे। इसके बजाय, अपने बच्चों को ज़िम्मेदारी सँभालने के काबिल बनाइए। इस तरह आप उन्हें जीवन का सबसे बेहतरीन तोहफा दे रहे होंगे। (w10-E 05/01)

^ पैरा. 3 नाम बदल दिए गए हैं।

खुद से पूछिए . . .

  • क्या मैं अपने बच्चों से सही उम्मीदें रखता हूँ?

  • क्या मैं अपनी बातों और कामों से दिखाता हूँ कि बच्चों को कामयाब होने के लिए क्या करना ज़रूरी है?

  • आखिरी बार मैंने कब अपने बच्चों को शाबाशी दी और उनकी हौसला-अफज़ाई की?