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यहोवा के साक्षी

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प्रहरीदुर्ग  |  2010-04-01

 अपने बच्चों को सिखाइए

यीशु ने भी आज्ञा माननी सीखी

यीशु ने भी आज्ञा माननी सीखी

क्या कभी-कभी आपको आज्ञा मानना मुश्किल लगता है?— * अगर हाँ, तो इसमें हैरान होनेवाली कोई बात नहीं। क्योंकि हम सभी को कभी-कभी आज्ञा मानना बड़ा मुश्किल लगता है। क्या आपको मालूम है, यीशु को भी आज्ञा मानना सीखना पड़ा?—

क्या आप जानते हो आपको किस-किस का कहा मानना चाहिए?— जी हाँ, अपने माता-पिता का। क्योंकि बाइबल कहती है: “प्रभु में अपने माता-पिता का कहना माननेवाले बनो।” (इफिसियों 6:1) जानते हो, यीशु का पिता कौन है?— यहोवा परमेश्वर। और हमारा पिता भी वही है। (मत्ती 6:9, 10) लेकिन अगर आपका कहना है कि यीशु का पिता यूसुफ और उसकी माँ मरियम थी, तब भी आपका जवाब सही है। पर क्या आप जानते हैं ये दोनों यीशु के माता-पिता कैसे बने?—

परमेश्वर के एक स्वर्गदूत जिब्राईल ने मरियम से कहा कि वह माँ बनेगी, जबकि उसकी शादी भी नहीं हुई थी और ना ही वह किसी आदमी के साथ रही थी। तो फिर मरियम माँ कैसे बनी? यहोवा ने एक बड़ा चमत्कार किया। मरियम को यह बात समझाने के लिए जिब्राईल ने उससे कहा: “परम-प्रधान की सामर्थ तुझ पर छा जाएगी। इसी वजह से, जो पैदा होगा वह पवित्र और परमेश्वर का बेटा कहलाएगा।”—लूका 1:30-35.

यहोवा ने स्वर्ग में रहनेवाले अपने बेटे की जान को लेकर मरियम के पेट में डाल दिया था। उसी पल से वह धीरे-धीरे बढ़ने लगा, ठीक जैसे एक बच्चा अपनी माँ के पेट में बढ़ता है। करीब नौ महीने बाद यीशु पैदा हुआ। तब तक यूसुफ ने मरियम से शादी कर ली थी और इसलिए सभी को लगा कि यूसुफ ही यीशु का असली पिता है। लेकिन दरअसल यूसुफ, यीशु का दत्तक पिता था। इसलिए यह कहना सही होगा कि यीशु के दो पिता थे!

चलो अब एक ऐसी घटना पढ़ते हैं जिससे हमें पता चलेगा कि यीशु स्वर्ग में रहनेवाले अपने पिता यहोवा से कितना प्यार करता था। जब यीशु 12 साल का था, तब वह और उसका पूरा परिवार हर साल की तरह इस बार भी फसह का त्योहार मनाने यरूशलेम गए थे। जब वे त्योहार मनाकर वापस अपने घर नासरत लौट रहे थे, तो यूसुफ और मरियम को एहसास हुआ कि यीशु उनके साथ नहीं है। यह पढ़कर आप ज़रूर सोच रहे होंगे कि आखिर उसके माता-पिता अपने बेटे को भूल कैसे गए?—

क्योंकि यीशु के अलावा यूसुफ और मरियम के और भी कई बच्चे थे जो उनके साथ यरूशलेम गए थे। (मत्ती 13:55, 56) बच्चों के अलावा शायद कुछ रिश्तेदार भी उनके साथ यह त्योहार मनाने गए थे, जैसे याकूब और यूहन्ना, उनका पिता जब्दी और माँ सलोमी, जो शायद यीशु की मौसी थी। इसलिए मरियम को शायद लगा हो कि यीशु दूसरे रिश्तेदारों के साथ होगा।—मत्ती 27:56; मरकुस 15:40; यूहन्ना 19:25.

लेकिन जब यूसुफ और मरियम को पता चला कि यीशु किसी के साथ नहीं है, तो वे दोनों उसे ढूँढ़ते हुए वापस यरूशलेम गए। उन्होंने उसकी हर जगह तलाश की। आखिर में वह तीन दिन बाद उन्हें मंदिर में मिला। मरियम ने उससे कहा: “बेटा, तू ने हमारे साथ ऐसा क्यों किया? देख, तेरा पिता और मैं तुझे ढूँढ़-ढूँढ़कर कितने बेहाल हो गए हैं।” लेकिन यीशु ने उनसे कहा: “तुम मुझे यहाँ-वहाँ क्यों ढूँढ़ते रहे? क्या तुम्हें मालूम नहीं था कि मैं अपने पिता के घर में होऊँगा?”—लूका 2:45-50.

आपको क्या लगता है, अपनी माँ को इस तरह जवाब देकर क्या यीशु ने गलत किया?— यीशु के माता-पिता  यह बात अच्छी तरह जानते थे कि उसे परमेश्वर के घर में रहकर उसकी उपासना करना बहुत अच्छा लगता था। (भजन 122:1) तो फिर, यीशु का यह कहना एकदम सही था कि उसके माँ-बाप को उसे सबसे पहले वहीं आकर खोजना चाहिए था, है ना?— यीशु ने अपनी माँ को जो जवाब दिया, उसके बारे में वह काफी सोचती रही।

यह सब होने के बाद, यीशु अपने माता-पिता के साथ कैसे पेश आया?— बाइबल कहती है: “[यीशु] उनके साथ चला गया और नासरत आ गया और लगातार उनके अधीन रहा।” (लूका 2:51, 52) तो यीशु की इस मिसाल से हम क्या सीख सकते हैं?— जी हाँ, हमें भी अपने माता-पिता की आज्ञा माननी चाहिए।

लेकिन क्या आपको पता है, आज्ञा मानना यीशु के लिए आसान नहीं था। यहाँ तक कि स्वर्ग में रहनेवाले अपने पिता यहोवा की आज्ञा मानना भी। आइए देखें कैसे।

अपनी मौत से पहलेवाली रात, यीशु ने यहोवा से प्रार्थना में कहा कि वह उससे जो करवाना चाहता था, उस बारे में यहोवा अपना इरादा बदल दे। (लूका 22:42) इससे पता चलता है कि यहोवा का कहा मानना यीशु के लिए आसान नहीं था, फिर भी उसने माना। बाइबल बताती है कि “उसने दुःख सह-सहकर आज्ञा माननी सीखी।” (इब्रानियों 5:8) क्या आपको नहीं लगता हमें भी यीशु की तरह आज्ञा माननेवाला बनना चाहिए?— (w10-E 04/01)

^ पैरा. 3 अगर आप बच्चों को यह लेख पढ़कर सुना रहे हैं, तो सवाल के बाद जहाँ डैश (—) है, वहाँ थोड़ी देर रुकिए और उन्हें जवाब देने के लिए कहिए।