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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  दिसंबर 2015

यहोवा—ऐसा परमेश्वर जो हमसे बातचीत करता है

यहोवा—ऐसा परमेश्वर जो हमसे बातचीत करता है

“मैं निवेदन करता हूँ सुन, मैं कुछ कहूँगा।”अय्यू. 42:4.

गीत: 48, 52

1-3. (क) परमेश्वर की भाषा और बातचीत करने की काबिलीयत, इंसानों की भाषा और काबिलीयत से क्यों बहुत महान है? (ख) इस लेख में हम किन बातों पर गौर करेंगे?

अनंतकाल के परमेश्वर ने अरबों-खरबों बुद्धिमान प्राणियों की सृष्टि की। उन्हें न सिर्फ उसने जीवन दिया, बल्कि वह उन्हें खुशियाँ भी देता है। (भज. 36:9; 1 तीमु. 1:11) जो प्राणी परमेश्वर का सबसे पहला साथी था, उसे प्रेषित यूहन्ना ने “वचन” और “परमेश्वर की बनायी सृष्टि की शुरूआत” कहा। (यूह. 1:1; प्रका. 3:14) अपने इस साथी यानी पहलौठे बेटे को परमेश्वर यहोवा अपने विचार और अपनी भावनाएँ बताता था। (यूह. 1:14, 17; कुलु. 1:15) दिलचस्पी की बात है, प्रेषित पौलुस ने ‘स्वर्गदूतों की भाषाओं’ का ज़िक्र किया, ऐसी भाषाओं का जो इंसानों की भाषाओं से कहीं ऊँचे दर्ज़े की हैं।1 कुरिं. 13:1.

2 यहोवा ने धरती पर और स्वर्ग में, जो अनगिनत बुद्धिमान प्राणी बनाएँ हैं, उन सबको वह बहुत अच्छी तरह जानता है। एक ही समय पर, अनगिनत लोग उससे बहुत-सी भाषाओं में प्रार्थना करते होंगे और वह उन सबकी प्रार्थनाएँ सुनता है। साथ-ही-साथ, वह स्वर्ग में रहनेवाले प्राणियों को निर्देश देता है और उनसे बातचीत भी करता है। यह सब एक साथ करने के लिए ज़रूर उसकी सोच, उसकी भाषा और बातचीत करने की उसकी काबिलीयत, इंसानों की सोच, भाषा और काबिलीयत से कहीं महान होगी! (यशायाह 55:8, 9 पढ़िए।) तो ज़ाहिर है कि जब यहोवा इंसानों से बात करता है, तो वह अपने विचार बड़े ही आसान तरीके से बताता है ताकि वे उन्हें समझ सकें।

 3 अब हम गौर करेंगे कि जिस परमेश्वर के पास अथाह बुद्धि है, उसने अपने लोगों से साफ-साफ और आसान तरीके से बात करने के लिए इंसान की शुरूआत से लेकर अब तक कौन-से कदम उठाएँ हैं। हम यह भी गौर करेंगे कि वह लोगों की ज़रूरत और हालात के मुताबिक उनसे बातचीत करने के लिए कौन-से ज़रिए अपनाता है।

परमेश्वर की इंसानों से बातचीत

4. (क) यहोवा ने मूसा, शमूएल और दाविद से कौन-सी भाषा में बात की? (ख) बाइबल में क्या-क्या जानकारी पायी जाती है?

4 यहोवा जब अदन के बाग में आदम से बात करता था, तो वह इंसानों की भाषा में बात करता था। वह भाषा शायद प्राचीन इब्रानी थी। आगे चलकर उसने अपने विचार इब्रानी बोलनेवाले बाइबल के लेखकों को बताए जैसे, मूसा, शमूएल और दाविद। फिर उन्होंने उसके विचार अपने शब्दों में और अपने ढंग से लिखे। उन्होंने वे बातें दर्ज़ कीं जो परमेश्वर ने उन्हें सीधे-सीधे बतायीं। इसके अलावा, उन्होंने यह भी लिखा कि वह अपने लोगों के साथ कैसे पेश आया। साथ ही, उन लेखकों ने ऐसे ब्यौरे भी दर्ज़ किए जिनमें उनका विश्वास और प्यार झलकता है। यही नहीं, उन्होंने अपनी गलतियों और नाकामियों के बारे में भी लिखा। यह सारी जानकारी आज हमारे बड़े काम की है।रोमि. 15:4.

5. क्या यहोवा यह चाहता था कि उसके लोग सिर्फ इब्रानी भाषा का इस्तेमाल करें? समझाइए।

5 इंसानों से बातचीत करने के मामले में, परमेश्वर सिर्फ इब्रानी भाषा तक ही सीमित नहीं रहा। हालात बदलने के साथ-साथ, उसने दूसरी भाषा इस्तेमाल करने की भी इजाज़त दी। जब यहूदी बैबिलोन के गुलाम बन गए, तब परमेश्वर के कुछ लोग अरामी भाषा में बातचीत करने लगे। भविष्य में क्या-क्या होनेवाला है, यह बताने के लिए यहोवा ने भविष्यवक्ता दानिय्येल, यिर्मयाह और एज्रा याजक को बाइबल के कुछ हिस्से अरामी भाषा में लिखने के लिए उभारा। *–फुटनोट देखिए।

6. परमेश्वर का वचन इब्रानी भाषा के अलावा, दूसरी भाषाओं में लोगों को कैसे मिल पाया?

6 आगे चलकर सिकंदर महान ने उस ज़माने की दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों पर जीत हासिल कर ली। उस समय बोलचाल की जो यूनानी भाषा थी उसे कीनी कहा जाता था। यही बोलचाल की यूनानी भाषा अंतर्राष्ट्रीय भाषा बन गयी थी। बहुत-से यहूदी भी यही भाषा बोलने लगे थे। इस वजह से इब्रानी शास्त्र का यूनानी भाषा में अनुवाद किया गया। माना जाता है कि यह अनुवाद 72 लोगों ने मिलकर किया था, इसलिए उसे सेप्टुआजेंट के नाम से जाना जाता है। यह बाइबल का पहला अनुवाद था और बहुत मायने रखता था। * (फुटनोट देखिए।) इतने सारे लोगों के अनुवाद करने की वजह से यह अलग-अलग शैली में लिखा गया। जैसे, किसी ने शब्द-ब-शब्द अनुवाद किया, तो किसी ने मतलब समझकर अपने हिसाब से अनुवाद किया। इसके बावजूद, यूनानी भाषा बोलनेवाले यहूदी और बाद में मसीही भी सेप्टुआजेंट को परमेश्वर का वचन ही मानते थे।

7. यीशु ने अपने चेलों को शायद किस भाषा में सिखाया था?

7 ऐसा लगता है कि परमेश्वर का पहलौठा बेटा जब धरती पर आया, तो उसने उसी भाषा में बात की और लोगों को सिखाया जिसे बाइबल इब्रानी भाषा कहती है। (यूह. 19:20; 20:16; प्रेषि. 26:14) पहली सदी की इब्रानी भाषा पर अरामी भाषा का काफी असर था। इसलिए शायद यीशु ने भी कुछ अरामी शब्द इस्तेमाल किए होंगे। लेकिन वह मूसा और भविष्यवक्ताओं के ज़माने की इब्रानी भाषा भी जानता था, जिस भाषा में हर हफ्ते सभा-घरों में शास्त्र पढ़कर सुनाया जाता था। (लूका 4:17-19; 24:44, 45; प्रेषि. 15:21) इसके अलावा, इसराएल में यूनानी और लातीनी भाषाएँ भी बोली जाती थीं। इन भाषाओं में यीशु ने बात की या नहीं, इस बारे में बाइबल कुछ नहीं कहती।

8, 9. (क) जैसे-जैसे मसीही धर्म फैलता गया, परमेश्वर के लोगों के बीच यूनानी भाषा क्यों बातचीत करने का मुख्य ज़रिया बन गयी? (ख) इससे यहोवा के बारे में क्या पता चलता है?

8 यीशु के शुरू के चेले इब्रानी जानते थे, लेकिन उसकी मौत  के बाद उसके और भी चेले बने जो दूसरी भाषाएँ बोलते थे। (प्रेषितों 6:1 पढ़िए।) जैसे-जैसे मसीही धर्म फैलता गया, मसीही ज़्यादातर आपस में यूनानी भाषा में बात करने लगे। दरअसल, मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना नाम की खुशखबरी की किताबें यूनानी भाषा में लिखी गयीं और इन्हें बड़े पैमाने पर बाँटा गया। इनमें परमेश्वर ने वह सब लिखवाया, जो यीशु ने सिखाया और किया था। ज़ाहिर है कई चेलों की भाषा इब्रानी के बजाय यूनानी थी। * (फुटनोट देखिए।) प्रेषित पौलुस की चिट्ठियाँ और दूसरी किताबें भी यूनानी भाषा में लिखी गयीं और बाँटी गयी थीं ।

9 गौर करने लायक बात यह है कि मसीही यूनानी शास्त्र के लेखक जब बाइबल लिख रहे थे, तो उन्होंने कई जगहों पर इब्रानी शास्त्र की बातें लिखीं। ये बातें अकसर उन्होंने सेप्टुआजेंट अनुवाद से लिखीं। सेप्टुआजेंट अनुवाद से ली गयी ये बातें कभी-कभी, सबसे पुराने इब्रानी शास्त्र में लिखी बातों से थोड़ी अलग होती थीं। लेकिन असिद्ध इंसानों के ज़रिए किए गए सेप्टुआजेंट अनुवाद की ये बातें आज परमेश्वर के वचन का हिस्सा हैं। यहोवा ऐसा परमेश्वर है जो किसी एक संस्कृति या भाषा को दूसरी संस्कृति या भाषा से बेहतर नहीं समझता।प्रेषितों 10:34 पढ़िए।

10. यहोवा ने अपना वचन अलग-अलग भाषा बोलनेवाले लोगों तक पहुँचाया है, इससे हमें यहोवा के बारे में क्या पता चलता है?

10 परमेश्वर इंसानों से कैसे बातचीत करता है, इस बारे में अब तक हमने बस थोड़ी-बहुत चर्चा की। इससे हम यह सीखते हैं कि यहोवा लोगों की ज़रूरत और हालात को ध्यान में रखकर उनसे बातचीत करता है। वह इस बात पर ज़ोर नहीं देता कि उसे या उसके मकसदों को जानने के लिए हम कोई खास भाषा सीखें। (जकर्याह 8:23; प्रकाशितवाक्य 7:9, 10 पढ़िए।) यहोवा ने बाइबल को लिखने की प्रेरणा ज़रूर दी, मगर उसने बाइबल के लेखकों को इसे अपने-अपने ढंग से लिखने से नहीं रोका।

परमेश्वर ने अपना संदेश मिटने नहीं दिया

11. बहुत सारी भाषाएँ होने के बावजूद परमेश्वर और इंसानों के बीच बातचीत में क्यों अड़चन नहीं आयी?

11 इंसान आज अलग-अलग भाषाएँ बोलता है। लेकिन क्या इस वजह से परमेश्वर की इंसानों के साथ बातचीत में कोई रुकावट आयी है? बिलकुल नहीं। इसे समझने के लिए ज़रा इस बात पर ध्यान दीजिए। यीशु जो भाषा बोलता था, उस भाषा के यीशु के कुछ ही शब्द आज बाइबल में पाए जाते हैं। (मत्ती 27:46; मर. 5:41; 7:34; 14:36) लेकिन यहोवा ने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि यीशु ने जो सिखाया उसे लिखा जाए और उसका यूनानी भाषा में और आगे चलकर दूसरी भाषाओं में अनुवाद किया जाए। बाद में, यहूदियों और मसीहियों ने परमेश्वर के वचन की बार-बार नकल करके और कॉपियाँ बनायीं। इस तरह पवित्र शास्त्र को बचाए रखा। फिर नकल की गयी इन कॉपियों का बहुत-सी भाषाओं में अनुवाद किया गया। मसीह की मौत के करीब 400 साल बाद, लेखक जॉन क्रिस्सौस्टम ने कहा कि उसके दिनों तक, यीशु की शिक्षाओं का सीरिया, मिस्र, हिंदुस्तान, फारस और इथियोपिया के लोगों की, साथ ही दूसरे अनगिनत लोगों की भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है।

12. बाइबल पर किस तरह हमले किए गए?

12 इतिहास दिखाता है कि बाइबल पर और उसका अनुवाद  करनेवालों और बाँटनेवालों पर बहुत-से हमले किए गए। यीशु के जन्म के करीब 300 साल बाद, रोमी सम्राट डायक्लीशन ने आदेश दिया कि बाइबल की सभी कॉपियाँ नष्ट कर दी जाएँ। फिर करीब 1,200 साल बाद, विलियम टिंडेल ने तय किया कि वह बाइबल का इब्रानी और यूनानी भाषा से अँग्रेज़ी में अनुवाद करेगा। उसने एक पढ़े-लिखे आदमी से कहा, “अगर परमेश्वर मेरी जान बख्श दे, तो कुछ ही सालों में मैं ऐसा करूँगा कि एक हल जोतनेवाले लड़के के पास आपसे ज़्यादा शास्त्र का ज्ञान होगा।” ज़ुल्मों की वजह से टिंडेल को बाइबल का अनुवाद करने और उसकी छपाई करने के लिए इंग्लैंड से यूरोप भागना पड़ा। चर्च के पादरियों ने ठान लिया था कि उन्हें जितनी भी बाइबल मिल सकती हैं, उन सबको वे सरेआम जला देंगे। इसके बावजूद टिंडेल ने बाइबल का जो अनुवाद किया, उसकी कॉपियाँ बहुत-से लोगों में बाँटी गयीं। आगे चलकर टिंडेल को धोखे से पकड़वा दिया गया और उसे सूली पर चढ़ा दिया गया। फिर उसे गला कसकर मार डाला गया और जला दिया गया। लेकिन उसने जो अनुवाद किया, उसे पादरी मिटा नहीं पाए। इस अनुवाद की मदद से अँग्रेज़ी में एक और अनुवाद तैयार किया गया, जिसे किंग जेम्स वर्शन कहा जाता है।2 तीमुथियुस 2:9 पढ़िए।

13. बाइबल की प्राचीन हस्तलिपियों का अध्ययन करने से क्या पता चला है?

13 बाइबल की कुछ प्राचीन कॉपियाँ अब भी मौजूद हैं। हाँ, यह सच है कि उनमें कुछ छोटी-मोटी गलतियाँ हैं और थोड़ा फर्क भी है। लेकिन बाइबल के विद्वानों ने बाइबल की हज़ारों हस्तलिपियों का, उनके कुछ हिस्सों का और पुराने बाइबल के अनुवादों का बड़े ध्यान से अध्ययन किया। इनकी आपस में तुलना करने पर उन्होंने पाया कि सिर्फ कुछ आयतें ऐसी हैं जिनमें मामूली-सा फर्क है। लेकिन इससे बाइबल का संदेश बदला नहीं है। इन अध्ययनों से सच्चे बाइबल विद्यार्थियों को यकीन हो जाता है कि आज उनके पास जो बाइबल है, वह यहोवा का लिखवाया हुआ वचन है।यशा. 40:8. * (फुटनोट देखिए।)

14. आज बाइबल कितनी भाषाओं में पायी जाती है?

14 दुश्मनों ने बाइबल पर इतने सारे हमले किए, फिर भी इसका 2,800 से भी ज़्यादा भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। इतनी भाषाओं में आज और कोई किताब नहीं पायी जाती। हालाँकि बहुत-से लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, फिर भी उसका वचन इतिहास में सबसे ज़्यादा बाँटी जानेवाली किताब रही है। माना कि बाइबल के कुछ अनुवाद (यानी, कुछ बाइबल) पढ़ने में इतने आसान नहीं हैं या उनका मतलब पूरी तरह सही नहीं है, लेकिन करीब-करीब इन सभी में एक अहम संदेश दिया गया है। वह संदेश है, शानदार आशा का और हमेशा की ज़िंदगी का।

बाइबल के एक नए अनुवाद की ज़रूरत

15. (क) लोगों तक ज़्यादा-से-ज़्यादा भाषाओं में किताबें-पत्रिकाएँ पहुँचाना कैसे मुमकिन हुआ है? (ख) हमारी किताबें-पत्रिकाएँ पहले अँग्रेज़ी में क्यों लिखी जाती हैं?

15 सन्‌ 1919 में, बाइबल विद्यार्थियों के एक छोटे-से समूह को ‘विश्वासयोग्य और सूझ-बूझ से काम लेनेवाले दास’ के तौर पर नियुक्‍त किया गया। उस समय, विश्वासयोग्य  दास ज़्यादातर अँग्रेज़ी में किताबों-पत्रिकाओं के ज़रिए परमेश्वर के लोगों से बातचीत करता था। (मत्ती 24:45) लेकिन इस दास ने बाइबल पर आधारित किताबें-पत्रिकाएँ ज़्यादा-से-ज़्यादा भाषाओं में लोगों तक पहुँचाने में कड़ी मेहनत की है। नतीजा, आज ये किताबें-पत्रिकाएँ 700 से भी ज़्यादा भाषाओं में मौजूद हैं। जैसे पहली सदी में यूनानी भाषा आम थी, वैसे ही आज अँग्रेज़ी व्यापार और शिक्षा जगत में आम भाषा बन गयी है और आज ज़्यादातर लोग अँग्रेज़ी जानते हैं। इसलिए हमारी किताबें-पत्रिकाएँ पहले अँग्रेज़ी में लिखी जाती हैं। फिर इनका अनुवाद दूसरी भाषाओं में किया जाता है।

16, 17. (क) परमेश्वर के लोगों को क्या चाहिए था? (ख) उनकी यह ज़रूरत कैसे पूरी की गयी? (ग) भाई नॉर को क्या उम्मीद थी?

16 हमारी सभी किताबें-पत्रिकाएँ बाइबल पर आधारित होती हैं। पहले परमेश्वर के लोग किंग जेम्स वर्शन बाइबल इस्तेमाल करते थे, जिसका अनुवाद 1611 में पूरा हुआ था। लेकिन इसकी भाषा पुरानी और समझने में मुश्किल थी। इसमें परमेश्वर का नाम बहुत कम जगहों पर था, जबकि पुरानी हस्तलिपियों में उसका नाम हज़ारों बार आया था। किंग जेम्स वर्शन बाइबल में गलतियाँ भी थीं और उसमें ऐसी आयतें भी जोड़ी गयी थीं जो सबसे पुरानी हस्तलिपियों में नहीं पायी जातीं। बाइबल के दूसरे अँग्रेज़ी अनुवादों में भी कुछ इसी तरह की गलतियाँ थीं।

17 इसलिए परमेश्वर के लोगों को बाइबल का एक ऐसा अनुवाद चाहिए था (यानी ऐसी बाइबल), जिसका मतलब पूरी तरह सही हो और समझने में आसान हो। इस वजह से नयी दुनिया बाइबल अनुवाद समिति बनायी गयी। इस समिति में काम करनेवाले भाइयों ने 1950 से 1960 के दौरान बाइबल के अलग-अलग हिस्से छ: भागों में रिलीज़ किए। उनमें से पहला भाग 2 अगस्त, 1950 में एक अधिवेशन में रिलीज़ किया गया। उस अधिवेशन में, भाई नॉर ने कहा कि परमेश्वर के लोगों को बाइबल का ऐसा अनुवाद चाहिए जो आजकल की भाषा में लिखा गया हो, जिसका मतलब पूरी तरह सही हो, समझने में आसान हो और जिससे वे सच्चाई को अच्छी तरह समझ सकें। जी हाँ, उन्हें एक ऐसा अनुवाद चाहिए जो पढ़ने और समझने में उतना ही आसान हो जितना आसान मसीह के चेलों का लिखा सबसे पुराना शास्त्र था। भाई नॉर को उम्मीद थी कि नयी दुनिया अनुवाद (अँग्रेज़ी) से लाखों लोग यहोवा को जान पाएँगे।

18. बाइबल के अनुवाद काम में मदद करने के लिए क्या किया गया?

18 सन्‌ 1963 के आते-आते, भाई नॉर की उम्मीद हकीकत बन गयी। नयी दुनिया अनुवाद मसीही यूनानी शास्त्र, डच, फ्रेंच, जर्मन, इटैलियन, पॉर्चुगीस और स्पैनिश में तैयार किया गया। सन्‌ 1989 में, यहोवा के साक्षियों के शासी निकाय ने बाइबल के अनुवादकों की मदद करने के लिए विश्व मुख्यालय में एक नया विभाग बनाया। फिर 2005 में, उन भाषाओं में बाइबल का अनुवाद करने की मंज़ूरी दी गयी जिनमें पहले से प्रहरीदुर्ग पत्रिका अनुवाद की जाती थी। इस वजह से, आज नयी दुनिया अनुवाद बाइबल के कुछ हिस्से या पूरी बाइबल 130 से भी ज़्यादा भाषाओं में मौजूद है।

19. (क) सन्‌ 2013 में क्या खास घटना घटी? (ख) हम अगले लेख में किस बारे में सीखेंगे?

19 जब नयी दुनिया अनुवाद का सबसे पहला संस्करण रिलीज़ किया गया था, तब से अँग्रेज़ी भाषा काफी बदल गयी है। इसलिए यह ज़रूरी हो गया कि इस अनुवाद में बदलाव किए जाएँ। पाँच और छ: अक्टूबर, 2013 को वॉच टावर बाइबल एण्ड ट्रैक्ट सोसाइटी ऑफ पेन्सिलवेनिया की 129वीं सालाना सभा रखी गयी। इस सभा का कार्यक्रम 31 देशों से 14,13,676 लोगों ने देखा। कुछ लोग वहाँ हाज़िर हुए थे, तो कुछ ने इसे वीडियो के ज़रिए देखा। इसी सभा में शासी निकाय के एक सदस्य ने अँग्रेज़ी में नयी दुनिया अनुवाद का नया संस्करण रिलीज़ किया। जब लोगों को इस नए अनुवाद की कॉपी मिली, तो सभी उमंग से भर गए और बहुत-से लोगों की आँखों में आँसू आ गए। जब भाषण देनेवाले भाइयों ने नए अनुवाद से आयतें पढ़ीं, तो सभी साफ देख पा रहे थे कि यह अनुवाद पढ़ने और समझने में कितना आसान है। अगले लेख में, हम इस नए अनुवाद के बारे में और सीखेंगे। साथ ही, यह भी सीखेंगे कि इसका अनुवाद कैसे दूसरी भाषाओं में किया जा रहा है।

^ पैरा. 5 फुटनोट: एज्रा 4:8-6:18; 7:12-26; यिर्मयाह 10:11 और दानिय्येल 2:4ख-7:28 मूल रूप से अरामी भाषा में लिखे गए थे।

^ पैरा. 6 फुटनोट: सेप्टुआजेंट का मतलब है, सत्तर। माना जाता है कि सेप्टुआजेंट बाइबल का अनुवाद काम मिस्र में, यीशु के जन्म से करीब 300 साल पहले शुरू हुआ था और शायद इसके 150 साल बाद पूरा हुआ। यह अनुवाद अब भी बहुत अहमियत रखता है, क्योंकि इसकी मदद से विद्वान इब्रानी शास्त्र के कुछ ऐसे शब्दों और हिस्सों का मतलब अच्छी तरह समझ पाते हैं, जिनका मतलब समझना मुश्किल है।

^ पैरा. 8 फुटनोट: कुछ लोगों को लगता है कि मत्ती ने खुशखबरी की किताब इब्रानी में लिखी और फिर शायद उसी ने उसे यूनानी में अनुवाद किया।

^ पैरा. 13 फुटनोट: अँग्रेज़ी की नयी दुनिया अनुवाद बाइबल में दिया अतिरिक्‍त लेख ए3 और सब लोगों के लिए एक किताब, ब्रोशर के पेज 7-9 पर दिया अध्याय “यह किताब कैसे बची?” देखिए।