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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  नवंबर 2015

 अतीत के झरोखे से

‘दुनिया की किसी भी चीज़ को अपने आड़े मत आने दीजिए!’

‘दुनिया की किसी भी चीज़ को अपने आड़े मत आने दीजिए!’

सन्‌ 1931 के वसंत का मौसम है। तेईस देशों से आयी लोगों की भीड़ पैरिस के मशहूर प्लेयेल संगीत हॉल में उमड़ रही है। सजे-धजे लोग बड़ी-बड़ी टैक्सियों से हॉल के बाहर उतर रहे हैं। देखते-ही-देखते करीब 3,000 लोगों से हॉल खचाखच भर जाता है। वे कोई संगीत सुनने नहीं आए हैं, बल्कि भाई जोसेफ एफ. रदरफर्ड के भाषण सुनने आए हैं। उस वक्‍त भाई रदरफर्ड हमारे प्रचार काम की निगरानी करते थे। वे भाषण दे रहे हैं और साथ-साथ इन दमदार भाषणों को फ्रेंच, जर्मन और पोलिश भाषा में अनुवाद करके समझाया जा रहा है। भाई रदरफर्ड की ज़ोरदार आवाज़ पूरे हॉल में गूँज रही है।

पैरिस में हुए इस अधिवेशन से फ्राँस में हो रहे प्रचार काम में एक नया मोड़ आया। भाई रदरफर्ड ने अलग-अलग देशों से आए लोगों को बढ़ावा दिया कि वे फ्राँस में कॉलपोर्टर (पायनियर) के नाते सेवा करें। और यह बात उन्होंने खास तौर से मसीही जवानों से कही। इंग्लैंड का एक नौजवान भाई जॉन कुक, इन जोश भरे शब्दों को कभी भूल नहीं पाया, ‘प्यारे नौजवानो, यह काम करने के लिए दुनिया की किसी भी चीज़ को अपने आड़े मत आने दीजिए!’ *

फ्राँस आकर कॉलपोर्टर बनने का यह बढ़ावा, मकिदुनिया जाने के बुलावे की तरह था। (प्रेषि. 16:9, 10) जॉन कुक आगे चलकर एक मिशनरी बना। उसके साथ-साथ और लोगों ने भी कॉलपोर्टर बनने के बुलावे को स्वीकार किया। दरअसल, फ्राँस में कॉलपोर्टरों की गिनती 1930 में सिर्फ 27 थी, जबकि 1931 में यह गिनती बढ़कर 104 हो गयी। सिर्फ एक साल में ऐसी बढ़ोतरी कोई मामूली बात नहीं थी! इन अलग-अलग देशों से फ्राँस आए बहुत-से पायनियर उस वक्‍त फ्रेंच भाषा नहीं जानते थे, तो फिर वे कैसे भाषा की रुकावट का सामना कर पाते? वे कैसे कम पैसों में गुज़ारा चला पाते? और वे भाई-बहनों से दूर होने की वजह से अकेलेपन का सामना कैसे कर पाते?

भाषा की रुकावट का सामना करना

विदेशी पायनियर गवाही देने के लिए कार्ड का इस्तेमाल करते थे जिसमें फ्रेंच भाषा में राज का संदेश लिखा होता था। इस कार्ड की मदद से वे फ्रेंच भाषा में आसानी से गवाही दे पाते थे। जर्मन बोलनेवाला एक भाई, जिसने पैरिस में बड़ी हिम्मत से गवाही दी, कहता है, ‘हम जानते थे कि हमारा परमेश्वर एक शक्‍तिशाली परमेश्वर है। प्रचार में जब हमारे दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती थीं, तो यह किसी इंसान के डर की वजह से नहीं होता था बल्कि इसलिए कि कहीं हम फ्रेंच में यह छोटा-सा वाक्य कहना भूल न जाएँ, “क्या आप ज़रा यह कार्ड पढ़ेंगे?” हमें पूरा यकीन था कि हमारा काम बहुत ज़रूरी है।’

शुरूआत के कॉलपोर्टरों ने साइकिल और मोटरसाइकिल की मदद से फ्राँस में खुशखबरी फैलायी

जब कॉलपोर्टर इमारतों में गवाही देते थे, तो अकसर वहाँ के चौकीदार उन्हें भगा देते थे। इंग्लैंड से दो पायनियर बहनें आयी थीं, जिन्हें फ्रेंच बहुत कम आती थी। एक दिन उन्हें एक चौकीदार मिला जो बहुत गुस्से में था। उसने उनसे पूछा कि वे किससे मिलने आयी हैं। बहनें चौकीदार को शांत करने की सोच ही रही थीं कि तभी एक बहन का ध्यान दरवाज़े पर लगी एक छोटी पट्टी पर गया। उस पट्टी पर यह लिखा था, ‘घंटी बजाइए।’ बहन ने सोचा कि यह घर-मालिक का नाम है, इसलिए उसने मुसकराकर चौकीदार से कहा, ‘हम मैडम घंटी बजाइए से मिलने आए हैं।’ मज़ाकिया स्वभाव होने की वजह से इन जोशीली पायनियर बहनों को बहुत मदद मिली!

 गरीबी और अकेलेपन जैसी चुनौतियाँ भी उन्हें रोक नहीं पायीं

सन्‌ 1930 में फ्राँस में ज़्यादातर लोग गरीबी में जी रहे थे। और विदेश से आए पायनियर भाई-बहन भी गरीबी का सामना कर रहे थे। अँग्रेज़ी बोलनेवाली मोना बज़ॉसका नाम की बहन और उसके साथ सेवा करनेवाली एक पायनियर बहन का भी कुछ ऐसा ही अनुभव रहा। इस बारे में मोना कहती है, “हम बहुत ही मामूली-से घर में रहते थे। और सर्दी के मौसम में हमारा कमरा बहुत ही ठंडा हो जाता था। हमारे हाथ-पैर जम जाते थे। सुबह के वक्‍त अकसर मग में पानी पर बर्फ जम जाती थी। इसलिए हमें पहले बर्फ को तोड़ना होता था और फिर हम हाथ-मुँह धो पाते थे।” क्या कम सहूलियत होने की वजह से इन पायनियरों का जोश भी ठंडा पड़ गया? बिलकुल नहीं! उनमें से एक भाई ने उन सभी की भावनाएँ कुछ इस तरह बयान की, “हमारे पास कुछ भी नहीं था, मगर हमें किसी चीज़ की कमी भी नहीं थी।”—मत्ती 6:33.

पैरिस में सन्‌ 1931 के अधिवेशन में इंग्लैंड से आए ये पायनियर हाज़िर हुए थे

कॉलपोर्टर बहुत हिम्मत से काम लेते थे, लेकिन उन्हें एक और समस्या का सामना भी करना था। और वह थी, अकेलेपन की समस्या। सन्‌ 1930 से 1935 के सालों में, फ्राँस में राज के प्रचारकों की गिनती 700 से ज़्यादा नहीं बढ़ी। और उनमें से ज़्यादातर प्रचारक पूरे देश की अलग-अलग जगहों में रह रहे थे। कॉलपोर्टर भी दूर-दूर के इलाकों में रहते थे। ऐसे में किस बात ने इन्हें खुश रहने में मदद दी? मोना ने भी अपनी पायनियर साथी के साथ इस चुनौती का सामना किया। वह कहती है, ‘लगातार संगठन की किताबें-पत्रिकाएँ साथ मिलकर पढ़ने से हम अकेलेपन का सामना कर पाए। उन दिनों हम न तो कोई वापसी भेंट करते थे और न ही बाइबल अध्ययन चलाते थे। शाम को हमारे पास खाली समय होता था, इसलिए हम अपने परिवारवालों को और खासकर दूसरे पायनियरों को खत लिखते थे। हम उन्हें अपने अनुभव बताते थे और एक-दूसरे की हिम्मत बढ़ाते थे।’—1 थिस्स. 5:11.

इतनी सारी रुकावटों के बावजूद इन कॉलपोर्टरों ने कई त्याग किए और एक सही नज़रिया बनाए रखा। उन्होंने फ्राँस के शाखा दफ्तर को जो खत लिखे, उससे हम उनके इस नज़रिए को समझ सकते हैं। कुछ खत तो उन्होंने फ्राँस में पायनियर सेवा करने के दशकों बाद लिखे थे। सन्‌ 1931 से 1935 के दौरान एनी क्रिगिन नाम की एक अभिषिक्‍त बहन ने अपने पति के साथ पूरे फ्राँस में सेवा की। उन सालों को याद करते हुए वे कहती हैं, ‘हमारी ज़िंदगी खुशियों-भरी और रोमांचक रही! हम सब पायनियर एक-दूसरे के बहुत करीब थे। हम पायनियरों ने भी प्रेषित पौलुस की तरह अनुभव किया, “मैंने पौधा लगाया, अप्पुलोस ने पानी देकर सींचा, लेकिन परमेश्वर उसे बढ़ाता रहा।” यह अनुभव हमारे लिए बहुत ही रोमांचक था क्योंकि हमने भी सालों पहले लोगों के दिलों में सच्चाई का बीज बोया था।’—1 कुरिं. 3:6.

फ्राँस में अलग-अलग देशों से आए इन पायनियरों ने धीरज रखा और जोश से प्रचार सेवा की। वे उन सभी के लिए बहुत ही अच्छी मिसाल हैं, जो अपनी प्रचार सेवा बढ़ाना चाहते हैं। आज करीब 14,000 पायनियर फ्राँस में सेवा कर रहे हैं। इनमें से बहुत-से दूसरी भाषा बोलनेवाली मंडलियों में या समूहों में सेवा कर रहे हैं। * उनसे पहले आए पायनियरों की तरह, वे भी दुनिया की किसी चीज़ को अपने आड़े नहीं आने देते हैं।—फ्राँस के अतीत के झरोखे से।

^ पैरा. 4 पोलैंड से फ्राँस आकर बसनेवाले हमारे भाइयों के काम के बारे में 15 अगस्त, 2015 की प्रहरीदुर्ग का लेख “यहोवा आपको सच्चाई सिखाने के लिए फ्राँस ले आया है” देखिए।

^ पैरा. 13 सन्‌ 2014 के दौरान, विदेशी भाषा बोलनेवाली 900 से भी ज़्यादा मंडलियों और समूहों ने 70 अलग-अलग भाषा बोलनेवाले नेकदिल लोगों की मदद की। यह मंडलियाँ और समूह, फ्राँस के शाखा दफ्तर की निगरानी में काम करते थे।