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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  अक्टूबर 2015

“हमारा विश्वास बढ़ा”

“हमारा विश्वास बढ़ा”

“जहाँ मेरे विश्वास में कमी है, वहाँ मेरी मदद कर!”—मर. 9:24.

गीत: 54, 24

1. विश्वास कितना ज़रूरी है? (लेख की शुरूआत में दी तसवीर देखिए।)

क्या आपने कभी खुद से यह पूछा है, ‘क्या मैं ऐसा इंसान हूँ जिसे यहोवा महा-संकट से बचाना चाहेगा?’ प्रेषित पौलुस ने बताया कि हमारे बचाव के लिए जो बहुत ज़रूरी गुण है, वह है विश्वास। उसने कहा, “विश्वास के बिना परमेश्वर को खुश करना नामुमकिन है।” (इब्रा. 11:6) यह बात हमें शायद मामूली-सी लगे, लेकिन सच तो यह है कि “विश्वास हर किसी में नहीं होता।” (2 थिस्स. 3:2) इन दो आयतों से हम समझ सकते हैं कि अपना विश्वास मज़बूत करना कितना ज़रूरी है!

2, 3. (क) प्रेषित पतरस से हम विश्वास की अहमियत के बारे में क्या सीखते हैं? (ख) हम किन सवालों पर गौर करेंगे?

2 “परखे हुए” विश्वास का ज़िक्र करके प्रेषित पतरस ने भी इस गुण की अहमियत पर ज़ोर दिया। उसने कहा कि ऐसा विश्वास “यीशु मसीह के प्रकट होने के वक्‍त [हमारे] लिए बड़ाई, महिमा और आदर पाने की वजह” बन सकता है। तो क्या हम उन लोगों में से नहीं होना चाहेंगे, जिन्हें हमारा राजा यीशु मसीह प्रकट होने पर इनाम देगा? (1 पतरस 1:7 पढ़िए।) महा-संकट बहुत करीब है और हम ‘उनमें से होना चाहते हैं जो विश्वास रखते हैं ताकि अपना जीवन बचा सकें।’ (इब्रा. 10:39) इसलिए हमें अपना विश्वास मज़बूत करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। और जैसे एक आदमी ने यीशु से और विश्वास पाने की गुज़ारिश की थी, वैसे ही हमें भी यह गुज़ारिश करनी होगी, “जहाँ मेरे विश्वास में कमी है, वहाँ मेरी मदद कर!” (मर. 9:24) या प्रेषितों की तरह, हम शायद यह भी कहें, “हमारा विश्वास बढ़ा।”—लूका 17:5.

 3 इस लेख में हम आगे दिए सवालों पर गौर करेंगे। हम अपना विश्वास कैसे मज़बूत कर सकते हैं? हम कैसे दिखा सकते हैं कि हमारा विश्वास मज़बूत है? और हम क्यों यकीन रख सकते हैं कि जब हम अपना विश्वास बढ़ाने के लिए परमेश्वर से गुज़ारिश करेंगे, तो वह हमारी सुनेगा?

विश्वास मज़बूत करने से परमेश्वर खुश होता है

4. किनकी मिसालें हमें अपना विश्वास मज़बूत करने के लिए उभार सकती हैं?

4 विश्वास का होना बहुत ज़रूरी है, इसीलिए तो यहोवा ने बाइबल में विश्वास की कई मिसालें दर्ज़ करवायी हैं। ये मिसालें “हमारी हिदायत के लिए लिखी गयी थीं।” (रोमि. 15:4) अब्राहम, सारा, इसहाक, याकूब, मूसा, राहाब, गिदोन, बाराक और इनके जैसे कई लोगों की मिसालें हमें अपना विश्वास मज़बूत करने के लिए उभार सकती हैं। (इब्रा. 11:32-35) इनके अलावा आज भी हमारे बीच ऐसे भाई-बहन हैं, जो विश्वास की बेहतरीन मिसाल हैं। *

5. (क) एलिय्याह ने कैसे दिखाया कि उसे यहोवा पर मज़बूत विश्वास था? (ख) हमें खुद से क्या पूछना चाहिए?

5 भविष्यवक्ता एलिय्याह की मिसाल लीजिए। उसके बारे में गहराई से सोचते वक्‍त ऐसे पाँच हालात पर ध्यान दीजिए, जिनमें उसने यहोवा पर अटूट भरोसा रखा। (1) जब एलिय्याह ने राजा अहाब को बताया कि यहोवा अकाल लानेवाला है, तो उसने पूरे यकीन से कहा, “इस्राएल का परमेश्वर यहोवा जिसके सम्मुख मैं उपस्थित रहता हूँ, उसके जीवन की शपथ इन वर्षों में मेरे बिना कहे, न तो मेंह बरसेगा [बारिश होगी], और न ओस पड़ेगी।” (1 राजा 17:1) (2) एलिय्याह को भरोसा था कि अकाल के दौरान यहोवा उसकी और दूसरों की ज़रूरतें पूरी करेगा। (1 राजा 17:4, 5, 13, 14) (3) एलिय्याह को यकीन था कि यहोवा विधवा के बेटे को दोबारा ज़िंदा कर सकता है। (1 राजा 17:21) (4) उसे ज़रा भी इस बात पर शक नहीं था कि कर्मेल पहाड़ पर चढ़ाए उसके बलिदान को यहोवा की आग भस्म कर देगी। (1 राजा 18:24, 37) (5) बारिश होने से पहले ही एलिय्याह ने दावे के साथ अहाब से कहा, “उठकर खा पी, क्योंकि भारी वर्षा की सनसनाहट सुन पड़ती है।” (1 राजा 18:41) एलिय्याह की ज़िंदगी के इन अनुभवों पर गौर करने के बाद हम खुद से पूछ सकते हैं, ‘क्या मेरा विश्वास एलिय्याह के जितना मज़बूत है?’

हम अपना विश्वास कैसे मज़बूत कर सकते हैं?

6. विश्वास बढ़ाने के लिए हमें यहोवा से किस बात की गुज़ारिश करनी चाहिए?

6 हम अपने बल पर अपना विश्वास मज़बूत नहीं कर सकते। इसलिए हमें परमेश्वर से पवित्र शक्‍ति की गुज़ारिश करनी चाहिए। पवित्र शक्‍ति के लिए क्यों? क्योंकि विश्वास, पवित्र शक्‍ति के फल का एक पहलू है। (गला. 5:22) जब हम यीशु की हिदायत मानकर पवित्र शक्‍ति के लिए प्रार्थना करते हैं, तो हम बुद्धि से काम ले रहे होते हैं। यीशु ने वादा किया था कि यहोवा ‘अपने माँगनेवालों को पवित्र शक्‍ति देगा।’—लूका 11:13.

7. समझाइए कि हम अपना विश्वास कैसे मज़बूत बनाए रख सकते हैं।

7 एक बार जब परमेश्वर पर हमारा विश्वास मज़बूत हो जाता है, तो हमें उसे बरकरार रखने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। हम विश्वास की तुलना आग से कर सकते हैं। जब हम आग जलाते हैं, तो शुरू-शुरू में उसकी लपटें बहुत तेज़ होती हैं। लेकिन अगर हम आग में लकड़ी न डालें, तो वह कुछ देर बाद बुझ जाएगी। वहीं अगर हम बीच-बीच में लकड़ी डालते रहें, तो आग जलती रहेगी। यही बात हमारे विश्वास के बारे में भी सच है। अगर हम परमेश्वर का वचन लगातार पढ़ते और अध्ययन करते रहें, तो बाइबल के लिए और यहोवा के लिए हमारा प्यार बढ़ता जाएगा। नतीजा, हमारा विश्वास बना रहेगा और मज़बूत होता जाएगा।

8. अपना विश्वास बढ़ाने और उसे मज़बूत बनाए रखने के लिए आप क्या कर सकते हैं?

 8 अपना विश्वास बढ़ाने और उसे मज़बूत बनाए रखने के लिए आप और क्या कर सकते हैं? आपने बपतिस्मा लेने तक जो बातें सीखीं, सिर्फ उन्हीं पर टिके मत रहिए। (इब्रा. 6:1, 2) इसके बजाय बाइबल की उन भविष्यवाणियों पर सोचते रहिए, जो पूरी हो गयी हैं। इससे आपको अपना विश्वास मज़बूत करने की ठोस वजह मिलेंगी। इसके अलावा आप परमेश्वर के वचन से खुद की जाँच कर सकते हैं कि आपका विश्वास मज़बूत है या नहीं।—याकूब 1:25; 2:24, 26 पढ़िए।

9, 10. हमारा विश्वास (क) अच्छी संगति से कैसे मज़बूत होता है? (ख) लगातार सभाओं में जाने से कैसे मज़बूत होता है? और (ग) प्रचार काम से कैसे मज़बूत होता है?

9 प्रेषित पौलुस ने मसीहियों से कहा कि वे “अपने-अपने विश्वास के ज़रिए, आपस में एक-दूसरे का हौसला बढ़ा” सकते हैं। (रोमि. 1:12) इसका क्या मतलब है? जब हम अपने भाई-बहनों के साथ वक्‍त बिताते हैं, खासकर उनके साथ जिनका विश्वास ‘परखा’ हुआ है, तो हम एक-दूसरे का विश्वास मज़बूत कर सकते हैं। (याकू. 1:3) बुरी संगति हमारा विश्वास तबाह कर सकती है, लेकिन अच्छी संगति हमारा विश्वास मज़बूत कर सकती है। (1 कुरिं. 15:33) इसीलिए तो हमें यह सलाह दी जाती है कि हम “एक-दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें,” बल्कि ‘एक-दूसरे की हिम्मत बँधाते’ रहें। (इब्रानियों 10:24, 25 पढ़िए।) इसके अलावा सभाओं में मिलनेवाली हिदायतों से भी हमारा विश्वास मज़बूत होता है। बाइबल कहती है, “संदेश सुनने के बाद ही विश्वास किया जाता है।” (रोमि. 10:17) इसलिए खुद से पूछिए, ‘क्या मैं लगातार मसीही सभाओं में जाता हूँ?’

10 जब हम लोगों को बाइबल से खुशखबरी सुनाते और उन्हें इस बारे में सिखाते हैं, तो इससे न सिर्फ उनका विश्वास बल्कि हमारा विश्वास भी बढ़ता है। पहली सदी के मसीहियों की तरह हम यहोवा पर भरोसा करना सीखते हैं और हर हाल में निडर होकर बात करते हैं।—प्रेषि. 4:17-20; 13:46.

11. (क) कालेब और यहोशू का विश्वास कैसे मज़बूत हुआ? (ख) उनकी तरह हम कैसे अपना विश्वास मज़बूत कर सकते हैं?

11 जब हम देखते हैं कि कैसे यहोवा हमारी मदद करता है और हमारी प्रार्थनाएँ सुनता है, तो यहोवा पर हमारा विश्वास बढ़ता है। कालेब और यहोशू का विश्वास ऐसे ही बढ़ा। वे यहोवा पर विश्वास रखकर ही वादा किए हुए देश की जासूसी करने गए थे। फिर जैसे-जैसे समय बीतता गया, उन्होंने देखा कि कैसे ज़िंदगी के हर मोड़ पर यहोवा ने उनकी मदद की। इससे उनका विश्वास और भी मज़बूत होता गया। यहोशू ने पूरे यकीन के साथ इसराएलियों से कहा, “जितनी भलाई की बातें हमारे परमेश्वर यहोवा ने हमारे विषय में कहीं उनमें से एक भी बिना पूरी हुए नहीं रही।” उसने यह भी कहा, “इसलिये अब यहोवा का भय मानकर उसकी सेवा खराई और सच्चाई से करो; . . . मैं तो अपने घराने समेत यहोवा ही की सेवा नित करूँगा।” (यहो. 23:14; 24:14, 15) जब हममें से हर एक यह परखकर देखता है कि यहोवा कितना भला है, तो हमारा भी विश्वास मज़बूत होता है।—भज. 34:8.

हम अपना विश्वास कैसे दिखा सकते हैं?

12. हम कैसे दिखा सकते हैं कि हमारा विश्वास मज़बूत है?

12 हम कैसे दिखा सकते हैं कि हमारा विश्वास मज़बूत है? शिष्य याकूब ने कहा, “मैं अपना विश्वास अपने कामों से दिखाऊँगा।” (याकू. 2:18) हमारे कामों से पता चलता है कि हमारा विश्वास कितना मज़बूत है। आइए देखें कैसे।

जो प्रचार में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं, वे दिखाते हैं कि उनका विश्वास मज़बूत है (पैराग्राफ 13 देखिए)

13. प्रचार काम करके हम अपना विश्वास कैसे दिखाते हैं?

13 अपना विश्वास दिखाने का एक बढ़िया तरीका है, प्रचार काम करना। ऐसा क्यों? क्योंकि लोगों को खुशखबरी सुनाकर हम इस बात पर विश्वास दिखा रहे होते हैं कि दुनिया का अंत बहुत करीब है, “उसमें देर न होगी।” (हब. 2:3) क्या आप जानना चाहते हैं कि आपका विश्वास कितना मज़बूत है? तो खुद से पूछिए, ‘प्रचार काम मेरे लिए कितना अहमियत रखता है? क्या मैं दूसरों को परमेश्वर के बारे में बताने की हर मुमकिन कोशिश करता हूँ? क्या मैं यहोवा की सेवा और ज़्यादा करने के लिए मौके ढूँढ़ता रहता हूँ?’ (2 कुरिं. 13:5)  आइए हम ‘उद्धार पाने के लिए सब लोगों के सामने अपने विश्वास का ऐलान करें’ और दिखाएँ कि हमारा विश्वास कितना मज़बूत है!—रोमियों 10:10 पढ़िए।

14, 15. (क) हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में विश्वास कैसे दिखा सकते हैं? (ख) एक ऐसा अनुभव बताइए जिसमें एक मसीही का मज़बूत विश्वास उसके कामों से नज़र आता है?

14 जब हम हर दिन की चुनौतियों से लड़ते हैं, तब भी हम यहोवा पर अपना विश्वास दिखा रहे होते हैं। जब हम तंगी में होते हैं, किसी बीमारी या निराशा से जूझ रहे होते हैं, हमारा जोश ठंडा पड़ जाता है या हम किसी और तकलीफ में होते हैं, तो हमें भरोसा रखना चाहिए कि यहोवा और यीशु ‘सही वक्‍त पर हमारी मदद’ करेंगे। (इब्रा. 4:16) और यह भरोसा हम तब दिखाते हैं, जब हम ऐसे वक्‍त में मदद के लिए यहोवा से प्रार्थना करते हैं। क्योंकि यीशु ने कहा था कि हम अपनी ज़रूरतों के लिए प्रार्थना कर सकते हैं। जैसे हम बिनती कर सकते हैं कि परमेश्वर “आज के दिन की ज़रूरत के मुताबिक हमें आज की रोटी दे।” (लूका 11:3) बाइबल में दिए ब्यौरे यह साबित करते हैं कि परमेश्वर हमारी हर तरह की ज़रूरतें पूरी कर सकता है। मिसाल के लिए, जब इसराएल में ज़बरदस्त अकाल पड़ा तो यहोवा ने एलिय्याह की खाने-पीने की ज़रूरत पूरी की। बाइबल में लिखा है, “कौवे सुबह-शाम उसे रोटी और मांस ला कर देते थे और वह नदी का पानी पीता था।” (1 राजा 17:3-6, वाल्द-बुल्के अनुवाद) हमें विश्वास है कि यहोवा हमारी भी ज़रूरतें पूरी कर सकता है।

जब हम ज़िंदगी की चुनौतियों से लड़ते हैं तब हम यहोवा पर अपना विश्वास दिखा रहे होते हैं (पैराग्राफ 14 देखिए)

15 हमें इस बात का यकीन है कि जब हम बाइबल सिद्धांतों के मुताबिक ज़िंदगी जीते हैं, तो हम अपने परिवार की ज़रूरतें पूरी कर पाते हैं। एशिया की एक बहन रेबेका के परिवार का ऐसा ही अनुभव रहा। उस परिवार ने मत्ती 6:33 और नीतिवचन 10:4 में दिए सिद्धांत लागू किए। वह बताती है कि उसके पति को लगा कि उसकी नौकरी की वजह से यहोवा के साथ उन सबका रिश्ता कमज़ोर हो सकता है। इसलिए उसके पति ने नौकरी छोड़ दी। लेकिन उन्हें अपने चार बच्चों की परवरिश करनी थी, इसलिए वे मीठी चीज़ें बनाकर बेचने लगे। उनकी कड़ी मेहनत की वजह से उन्हें कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ा। रेबेका कहती है, “हमने महसूस किया कि यहोवा ने हमें कभी नहीं छोड़ा। हमें कभी भूखे पेट नहीं रहना पड़ा।” क्या आपका भी कुछ ऐसा अनुभव रहा है जिससे आपका विश्वास मज़बूत हुआ हो?

16. अगर हम परमेश्वर पर भरोसा रखें, तो इसका क्या नतीजा होगा?

16 हमें कभी-भी यह शक नहीं करना चाहिए कि अगर  हम यहोवा की हिदायत मानेंगे, तो पता नहीं वह हमारी मदद करेगा या नहीं। पौलुस ने हबक्कूक की बात दोहराते हुए कहा, “जो नेक है, वह अपने विश्वास से ज़िंदा रहेगा।” (गला. 3:11; हब. 2:4) इसलिए हमें परमेश्वर पर अटूट विश्वास रखना चाहिए, उस परमेश्वर पर जो वाकई हमारी मदद कर सकता है। पौलुस हमें याद दिलाता है कि यहोवा ऐसा परमेश्वर है “जिसकी ताकत हमारे अंदर काम कर रही है और जितना हम माँग सकते हैं या जहाँ तक हम सोच सकते हैं, उससे कहीं बढ़कर [वह] हमारे लिए कर सकता है।” (इफि. 3:20) यहोवा के सेवक उसकी मरज़ी पूरी करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि उनकी कुछ सीमाएँ हैं, इसलिए वे यहोवा पर भरोसा रखते हैं कि वह उनकी मेहनत पर आशीष देगा। क्या यह जानकर हमें खुशी नहीं होती कि यहोवा हमारे साथ है और हमें आशीष देता है?

विश्वास के लिए की दुआओं का जवाब मिला

17. (क) यीशु ने प्रेषितों की गुज़ारिश का कैसे जवाब दिया? (ख) हम क्यों उम्मीद कर सकते हैं कि जब हम विश्वास बढ़ाने के लिए प्रार्थना करते हैं, यहोवा उनका जवाब ज़रूर देगा?

17 अब तक की चर्चा से शायद हम वैसा ही महसूस करें जैसा प्रेषितों ने तब महसूस किया था जब उन्होंने यीशु से कहा, “हमारा विश्वास बढ़ा।” (लूका 17:5) उनकी इस गुज़ारिश का जवाब ईसवी सन्‌ 33 के पिन्तेकुस्त के दिन खास तरीके से दिया गया। उस दिन प्रेषितों पर पवित्र शक्‍ति उँडेली गयी और वे परमेश्वर के मकसद को और भी अच्छी तरह समझ पाए। इससे उनका विश्वास मज़बूत हुआ। नतीजा, उन्होंने प्रचार का ऐसा अभियान शुरू किया जैसा उस वक्‍त तक कभी नहीं हुआ था। (कुलु. 1:23) क्या आज हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि हम विश्वास बढ़ाने के लिए जो प्रार्थनाएँ करते हैं, यहोवा उनका जवाब ज़रूर देगा? बेशक! वह हमसे वादा करता है कि “हम उसकी मरज़ी के मुताबिक चाहे जो भी माँगें वह हमारी सुनता है।”—1 यूह. 5:14.

18. जो अपना विश्वास बढ़ाने के लिए कदम उठाते हैं, यहोवा उन्हें कैसे आशीष देता है?

18 जब हम यहोवा पर पूरा भरोसा रखेंगे, तो वह हमसे खुश होगा। विश्वास बढ़ाने के लिए हम जो प्रार्थना करते हैं, उसका वह जवाब देगा। इससे हमारा विश्वास बढ़ता जाएगा और हम ‘परमेश्वर के राज के योग्य ठहराए जाएँगे।’—2 थिस्स. 1:3, 5.

^ पैरा. 4 कुछ उदाहरणों के लिए फॉरेस्ट ली (1 मार्च, 2001 की प्रहरीदुर्ग), आरिस्टोटलीस आपोस्टोलीडीस (1 फरवरी, 2002 की प्रहरीदुर्ग), एनेलेस मज़ांग (1 सितंबर, 2003 की प्रहरीदुर्ग) और जैक योहानसन (11 अगस्त, 1998 की सजग होइए!) की जीवन कहानियाँ पढ़ सकते हैं।