इस जानकारी को छोड़ दें

सैकेंडरी मैन्यू को छोड़ दें

विषय-सूची को छोड़ दें

यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  अक्टूबर 2015

बिना ध्यान भटकाए यहोवा की सेवा कीजिए

बिना ध्यान भटकाए यहोवा की सेवा कीजिए

‘मरियम यीशु के वचन सुनती रही। मारथा का ध्यान बहुत-सी तैयारियाँ करने में बँटा हुआ था।’—लूका 10:39, 40.

गीत: 40, 55

1, 2. (क) क्या वजह थी कि यीशु को मारथा से गहरा लगाव था? (ख) मारथा से ऐसी क्या गलती हुई, जिससे पता चलता है कि वह सिद्ध नहीं थी?

जब आप लाज़र की बहन मारथा के बारे में सोचते हैं, तो आपके मन में किस तरह के इंसान की तसवीर आती है? मारथा के बारे में बाइबल बताती है कि वह यीशु की अच्छी दोस्त थी और यीशु को उससे लगाव था। ऐसा नहीं कि यीशु को सिर्फ मारथा से लगाव था, और भी कई स्त्रियाँ थीं, जिनसे उसे लगाव था और वह उनकी इज़्ज़त करता था। मारथा की बहन मरियम को ही ले लीजिए। वह भी यीशु की अच्छी दोस्त थी। और यीशु अपनी माँ मरियम से भी बहुत प्यार करता था। (यूह. 11:5; 19:25-27) क्या वजह थी कि यीशु को मारथा से लगाव था?

2 मारथा का स्वभाव अच्छा था, वह दरियादिल थी और बड़ी मेहनती भी थी। सबसे बड़ी बात, उसे यीशु पर अटूट विश्वास था। उसे यीशु की सिखायी बातों पर पूरा यकीन था। उसे ज़रा भी शक नहीं था कि यीशु ही वादा किया गया मसीहा है। यही वजह थी कि यीशु को मारथा से गहरा लगाव था। (यूह. 11:21-27) लेकिन ऐसा नहीं कि मारथा सिद्ध थी। वह भी हम सबके जैसी थी, उससे भी गलतियाँ हो जाती थीं। एक बार जब यीशु उनके घर आया हुआ था, तब मारथा ने यीशु से कहा कि वह उसकी बहन मरियम को समझाए, क्योंकि मारथा अपनी बहन से नाराज़ हो गयी थी। उसने  कहा, “प्रभु, क्या तुझे खयाल नहीं कि मेरी बहन ने सारा काम मुझ अकेली पर छोड़ दिया है? इसलिए उससे कह कि वह काम में मेरा हाथ बँटाए।” (लूका 10:38-42 पढ़िए।) यीशु ने मारथा को जो जवाब दिया उससे हम क्या सीख सकते हैं?

मारथा का ध्यान भटक गया था

3, 4. (क) यीशु ने किस बात के लिए मरियम की तारीफ की? (ख) मारथा ने यीशु की बातों से क्या सीखा? (लेख की शुरूआत में दी तसवीर देखिए।)

3 यीशु ने इस बात की कदर की कि मारथा और मरियम ने उसे अपने घर बुलाया है। वह इस मौके पर उन्हें अनमोल सच्चाइयाँ सिखाना चाहता था। मरियम फौरन उसके पास बैठ गयी और “उसके वचन” सुनने लगी। वह महान शिक्षक से ज़्यादा-से-ज़्यादा सीखना चाहती थी। चाहती तो मारथा भी ऐसा कर सकती थी। अपना काम रोककर वह भी यीशु की बातों पर ध्यान दे सकती थी। और अगर वह ऐसा करती तो इसके लिए यीशु उसकी भी तारीफ करता।

4 लेकिन इस मौके पर मारथा का ध्यान भटक गया। वह यीशु के खाने के लिए कुछ खास बनाना चाहती थी और उसकी तैयारी में लग गयी। वह चाहती थी कि यीशु उसके घर आराम से रहे, इसलिए वह बहुत कुछ करने में जुट गयी। लेकिन जब उसने देखा कि मरियम उसकी मदद नहीं कर रही है, तो वह खीझ उठी और उसने यीशु से उसकी शिकायत की। यीशु जानता था कि मारथा बहुत कुछ करने में लगी हुई है, इसलिए उसने प्यार से उससे कहा, “मारथा, मारथा, तू बहुत बातों को लेकर चिंता कर रही है और परेशान हो रही है।” उसने यह भी कहा कि कुछ हलका-फुलका ठीक है, या बस एक ही चीज़ काफी है। फिर उसने मरियम की तारीफ की, जो ध्यान से उसकी बातें सुन रही थी। उसने कहा, “मरियम ने अच्छा भाग चुना है और वह उससे छीना नहीं जाएगा।” उस दिन मरियम ने खाने में जो खाया वह उसे शायद याद न रहा हो, लेकिन उसने यीशु से जो बातें सीखीं और यीशु ने उसकी जो तारीफ की, वह सब वह कभी नहीं भूली होगी। करीब 60 साल बाद, प्रेषित यूहन्ना ने लिखा, “यीशु को मारथा और उसकी बहन . . . से प्यार था।” (यूह. 11:5) इससे पता चलता है कि मारथा ने ज़रूर यीशु की बातों से सीखा होगा कि उसे किन बातों पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए और यह भी पता चलता है कि वह अपनी बाकी ज़िंदगी वफादारी से यहोवा की सेवा करती रही।

5. (क) खासकर आज, ज़्यादा अहमियत रखनेवाली बातों पर ध्यान लगाए रखना क्यों मुश्किल हो गया है? (ख) इस लेख में किस सवाल का जवाब दिया जाएगा?

5 हम जानते हैं कि पुराने ज़माने में ध्यान भटकानेवाली जितनी चीज़ें थीं, आज उससे भी ज़्यादा ऐसी चीज़ें हैं, जो यहोवा की सेवा से हमारा ध्यान भटका सकती हैं। पंद्रह सितंबर, 1958 की प्रहरीदुर्ग (अँग्रेज़ी) में भाई-बहनों को समझाया गया था कि दुनिया की तकनीक उनके लिए खतरनाक हो सकती है। इसलिए उन्हें सावधान रहना चाहिए कि कहीं तकनीकी चीज़ें यहोवा की सेवा से उनका ध्यान भटका न दें। उस वक्‍त भी ऐसा लगता था कि यह दुनिया हर दिन कुछ-न-कुछ नया परोसती है, जैसे, रंगीन और चमकदार तसवीरोंवाली पत्रिकाएँ, रेडियो, टी.वी. और फिल्में। इन सबका मानो लोगों पर नशा चढ़ गया था। प्रहरीदुर्ग में बताया गया था कि ‘जैसे-जैसे अंत करीब आ रहा है ध्यान भटकानेवाली चीज़ें भी बढ़ती जाएँगी।’ कितना सही कहा था! आज ध्यान भटकानेवाली इतनी सारी चीज़ें हैं, जितनी पहले कभी नहीं थीं! इससे एक ज़रूरी सवाल उठता है: हम मरियम की तरह बनने, यानी यहोवा की उपासना पर ध्यान लगाए रखने के लिए क्या कर सकते हैं?

दुनिया की चीज़ों का इस्तेमाल करें, पर हद-से-ज़्यादा नहीं

6. यहोवा के लोगों ने तकनीकी चीज़ों का कैसे अच्छा इस्तेमाल किया है?

6 यहोवा के लोगों ने राज की खुशखबरी फैलाने के लिए तकनीकी चीज़ों का इस्तेमाल किया है। जैसे, पहले विश्व युद्ध से पहले और उसके दौरान उन्होंने “फोटो-ड्रामा ऑफ क्रिएशन” नाम की फिल्म दिखायी। इसमें वे चलचित्रों और रंगीन तसवीरों का इस्तेमाल करते थे और साथ-साथ इसमें  आवाज़ भी सुनायी देती थी। इस फिल्म के ज़रिए बहुत-से देशों में लाखों लोगों को खुशखबरी सुनायी गयी। इस फिल्म के आखिर में उस समय के बारे में बताया जाता था, जब यीशु मसीह धरती पर राज करेगा और चारों तरफ अमन-चैन होगा। उसके बाद आया रेडियो का ज़माना। अब यहोवा के लोग दुनिया-भर में राज की खुशखबरी सुनाने के लिए रेडियो इस्तेमाल करने लगे, जिसे लाखों लोगों ने सुना। आज हम खुशखबरी सुनाने के लिए कंप्यूटर और इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं। इस वजह से आज सच्चाई धरती के कोने-कोने तक पहुँच रही है, ऐसे इलाकों तक भी जहाँ इंसानों का पहुँचना मुश्किल है।

गैर-ज़रूरी बातों को यहोवा की उपासना के आड़े मत आने दीजिए (पैराग्राफ 7 देखिए)

7. (क) दुनिया की चीज़ों का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करने में क्यों खतरा है? (ख) हमें किस बात का खास ध्यान रखना चाहिए? (फुटनोट देखिए।)

7 लेकिन बाइबल बताती है कि अगर हम दुनिया की चीज़ों का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करेंगे, तो इसमें खतरा है। (1 कुरिंथियों 7:29-31 पढ़िए।) इनमें से कुछ चीज़ें अपने आप में गलत नहीं हैं, लेकिन ये हमारा बहुत सारा वक्‍त चुरा सकती हैं। जैसे, किताबें पढ़ने, टी.वी. देखने, अच्छी-अच्छी जगह घूमने, खरीददारी करने और नयी-नयी तकनीकी चीज़ों या ऐशो-आराम की चीज़ों की जानकारी लेने में हमें शायद बड़ा मज़ा आता हो। और हममें से कइयों को शायद इंटरनेट पर बातें करना, मैसेज या ई-मेल भेजना या हर समय खेल से जुड़ी या दूसरी ताज़ा-तरीन खबरें बार-बार देखना अच्छा लगता हो। लेकिन कुछ लोगों के यही शौक लत में बदल सकते हैं। * (सभो. 3:1, 6) हमें ध्यान रखना चाहिए कि हम गैर-ज़रूरी बातों में बहुत ज़्यादा वक्‍त न बिताएँ। नहीं तो हम सबसे ज़रूरी बात पर उतना ध्यान नहीं दे पाएँगे, जितना देना चाहिए। और वह है यहोवा की उपासना।इफिसियों 5:15-17 पढ़िए।

8. यह क्यों ज़रूरी है कि हम “दुनिया की चीज़ों से प्यार करनेवाले” न बनें?

8 शैतान इस दुनिया की तरफ हमारा ध्यान खींचने और यहोवा की सेवा से हमारा ध्यान भटकाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। उसने पहली सदी में ऐसा किया और आज भी ऐसा कर रहा है, बल्कि आज और भी ज़्यादा कर रहा है। (2 तीमु. 4:10) इसलिए हमें लगातार जाँचते रहना चाहिए कि हम दुनिया की चीज़ों को किस नज़र से देखते हैं। अगर हमें अपने अंदर कोई फेरबदल करना है, तो हमें ऐसा करने में देर नहीं करनी चाहिए। बाइबल बताती है कि हमें “दुनिया की चीज़ों से प्यार करनेवाले” नहीं बनना चाहिए, बल्कि हमें ‘यहोवा के लिए अपना प्यार’ बढ़ाते जाना चाहिए। अगर हम ऐसा करेंगे, तो हमारे लिए यहोवा की बात मानना और उसके करीब बने रहना आसान होगा।—1 यूह. 2:15-17.

 ज़्यादा अहमियत रखनेवाली बातों पर ध्यान लगाए रखें

9. (क) यीशु ने अपने चेलों को किस बात पर ध्यान देना सिखाया? (ख) यीशु खुद कैसे एक अच्छी मिसाल था?

9 यीशु ने मारथा को प्यार से जो सलाह दी थी, ठीक वैसी ही सलाह उसने अपने चेलों को दी। उसने उन्हें सिखाया कि वे बहुत-सी बातों से अपना ध्यान न भटकाएँ, बल्कि यहोवा की सेवा करने पर और उसके राज पर पूरा ध्यान लगाए रखें। (मत्ती 6:22, 33 पढ़िए।) इस मामले में यीशु खुद एक अच्छी मिसाल था। उसके पास दुनिया की बहुत सारी चीज़ें नहीं थीं। उसने न कोई अपना घर बनाया और न ही ज़मीन-जायदाद।—लूका 9:58; 19:33-35.

10. यीशु ने हमारे लिए क्या बढ़िया मिसाल रखी?

10 यीशु की प्रचार सेवा के दौरान बहुत-सी घटनाएँ घटीं, लेकिन उसने किसी भी हाल में प्रचार काम से अपना ध्यान भटकने नहीं दिया। जैसे प्रचार सेवा की शुरूआत के कुछ ही समय बाद उसने कफरनहूम में लोगों की भीड़ को सिखाया और वहाँ चमत्कार किए। लोगों ने उससे बिनती की कि वह उनके शहर में कुछ वक्‍त और रुके। लेकिन उसने क्या किया? उसने अपनी सेवा से अपना ध्यान भटकने नहीं दिया। उसने कहा, “मुझे दूसरे शहरों में भी परमेश्वर के राज की खुशखबरी सुनानी है, क्योंकि मुझे इसीलिए भेजा गया है।” (लूका 4:42-44) यीशु खुशखबरी का प्रचार करने के लिए दूर-दूर तक पैदल चलकर जाता था और ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों को सिखाने की कोशिश करता था। हालाँकि वह सिद्ध था, पर हम सब की तरह वह भी थक जाता था। और कड़ी मेहनत करने की वजह से उसे भी आराम करने की ज़रूरत पड़ती थी।—लूका 8:23; यूह. 4:6.

11. (क) यीशु ने एक आदमी की समस्या क्यों नहीं सुलझायी? (ख) यीशु ने अपने चेलों को क्या सिखाया?

11 एक बार जब यीशु अपने चेलों को एक ज़रूरी सीख दे रहा था, तभी एक आदमी ने आकर उससे कहा, “गुरु, मेरे भाई से कह कि वह हमारी विरासत का बँटवारा कर दे।” लेकिन यीशु उस झमेले में नहीं पड़ा। उसने अपना ध्यान चेलों को सिखाने में ही लगाए रखा। उसने उन्हें सिखाया कि अगर वे बहुत कुछ हासिल करने में लग जाएँगे, तो यहोवा की सेवा से उनका ध्यान भटक सकता है।—लूका 12:13-15.

12, 13. (क) यीशु ने यरूशलेम में ऐसा क्या किया, जिसका कुछ यूनानी लोगों पर गहरा असर हुआ? (ख) जब फिलिप्पुस ने यीशु से कहा कि वह यूनानी लोगों से मिले, तो यीशु ने क्या कहा?

12 यीशु की ज़िंदगी के आखिरी कुछ दिन बहुत तनाव भरे थे। (मत्ती 26:38; यूह. 12:27) वह जानता था कि उसे बहुत दुख झेलने पड़ेंगे और फिर उसकी मौत हो जाएगी। वह यह जानता था कि मरने से पहले उसे बहुत-सारा काम पूरा करना है। जैसे रविवार, निसान 9 को यीशु एक गधे पर सवार यरूशलेम में दाखिल हुआ। लोगों की भीड़ ने एक राजा के तौर पर उसका स्वागत किया। (लूका 19:38) अगले दिन, यीशु ने हिम्मत से लालची व्यापारियों को मंदिर से खदेड़ दिया, जो ऊँचे दामों पर चीज़ें बेचकर लोगों को लूट रहे थे।—लूका 19:45, 46.

13 कुछ यूनानी लोग यरूशलेम में फसह का त्योहार मनाने आए थे। उन पर यीशु के कामों का गहरा असर पड़ा इसलिए उन्होंने प्रेषित फिलिप्पुस से पूछा कि क्या वे यीशु से मिल सकते हैं। लेकिन यीशु ऐसे लोगों को ढूँढ़ने की कोशिश नहीं कर रहा था, जो उसका साथ दें और उसे उसके दुश्मनों से बचाएँ। वह जानता था कि सबसे ज़रूरी क्या है। उसने यहोवा की मरज़ी पूरी करने पर अपना ध्यान लगाए रखा। और यहोवा की मरज़ी यह थी कि यीशु अपनी जान कुरबान करे। इसलिए, उसने अपने चेलों को याद दिलाया कि जल्द ही उसकी मौत हो जाएगी और उसके चेलों को भी अपनी जान कुरबान करने के लिए तैयार रहना चाहिए। उसने कहा, “जिसे अपनी जान से लगाव है, वह इसे नाश करता है, मगर जो इस दुनिया में अपनी जान से नफरत करता है वह इसे हमेशा की ज़िंदगी के लिए बचाए रखेगा।” मगर यीशु ने यह भी वादा किया कि जो कोई उसके पीछे हो लेगा, “पिता उसका आदर करेगा” और उसे हमेशा की ज़िंदगी देगा। फिलिप्पुस उन यूनानी लोगों को यह हौसला बढ़ानेवाला संदेश दे पाया।—यूह. 12:20-26.

14. हालाँकि यीशु ने अपना पूरा ध्यान प्रचार काम पर लगाया, लेकिन वह और किन बातों के लिए भी समय निकालता था?

14 हालाँकि यीशु ने अपना पूरा ध्यान प्रचार काम पर  लगाया, लेकिन ऐसा नहीं था कि उसने और कुछ नहीं किया। वह एक बार एक शादी में भी गया। उस शादी में उसने पानी को बढ़िया दाख-मदिरा में बदल दिया। (यूह. 2:2, 6-10) वह अपने दोस्तों और खुशखबरी में दिलचस्पी रखनेवालों के घर खाने पर भी गया। (लूका 5:29; यूह. 12:2) सबसे ज़रूरी बात, यीशु आराम करने के लिए समय निकालता था और अकेले में मनन करने और प्रार्थना करने के लिए भी समय निकालता था।—मत्ती 14:23; मर. 1:35; 6:31, 32.

‘हर एक बोझ को उतार फेंकें’

15. (क) प्रेषित पौलुस ने मसीहियों से क्या करने के लिए कहा? (ख) इस मामले में वह खुद कैसे एक अच्छी मिसाल था?

15 प्रेषित पौलुस ने कहा कि मसीही उन लोगों की तरह हैं, जो लंबी दौड़ में दौड़ते हैं। उन्हें अपनी दौड़ पूरी करने के लिए ऐसी हर चीज़ को उतार फेंकना होता है, जो उनकी रफ्तार धीमी कर सकती है या उन्हें रोक सकती है। (इब्रानियों 12:1 पढ़िए।) इस मामले में पौलुस खुद एक अच्छी मिसाल था। यहूदी धर्म का एक अगुवा होने के नाते वह काफी धन-दौलत और नाम कमा सकता था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया, क्योंकि उसने “ज़्यादा अहमियत रखनेवाली” बातों पर पूरा ध्यान लगाया। उसने प्रचार काम में कड़ी मेहनत की और सफर करके कई जगह गया, जैसे सीरिया, एशिया माइनर, मकिदुनिया और यहूदिया। पौलुस ने स्वर्ग में मिलनेवाली हमेशा की ज़िंदगी पर अपनी नज़र टिकाए रखी। उसने कहा, “जो बातें पीछे रह गयी हैं, उन्हें भूलकर मैं खुद को खींचता हुआ आगे की बातों की तरफ बढ़ता जा रहा हूँ। और . . . इनाम के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए उसका पीछा कर रहा हूँ।” (फिलि. 1:10; 3:8, 13, 14) पौलुस शादीशुदा नहीं था और इस वजह से वह “बिना ध्यान भटकाए लगातार प्रभु की सेवा” कर पाया।—1 कुरिं. 7:32-35.

16, 17. (क) हम चाहे शादीशुदा हों या अविवाहित, हम सब कैसे पौलुस की मिसाल पर चल सकते हैं? (ख) मार्क और क्लैर ने यह कैसे किया?

16 पौलुस की तरह, आज भी बहुत-से यहोवा के सेवक शादी नहीं करते, ताकि वे यहोवा की सेवा में और ज़्यादा कर सकें। (मत्ती 19:11, 12) अकसर शादीशुदा लोगों के मुकाबले अविवाहित लोगों पर परिवार की ज़िम्मेदारियाँ कम होती हैं। लेकिन चाहे हम शादीशुदा हों या अविवाहित, हम सब ऐसे “हरेक बोझ को” उतारकर फेंक सकते हैं, जिससे यहोवा की सेवा से हमारा ध्यान भटक सकता है। हो सकता है हमें अपनी आदतें छोड़नी पड़ें, ताकि हमारा वक्‍त ज़ाया न हो और हम यहोवा की सेवा में और ज़्यादा कर सकें।

17 मार्क और क्लैर का उदाहरण लीजिए। वे वेल्स देश में पले-बढ़े थे। उन्होंने स्कूल की पढ़ाई खत्म करते ही पायनियर सेवा शुरू की। फिर शादी के बाद भी वे पायनियर सेवा करते रहे। लेकिन वे और भी ज़्यादा करना चाहते थे। मार्क बताता है, ‘हमने तीन कमरोंवाला अपना घर बेच दिया और पार्ट-टाइम नौकरी भी छोड़ दी। इससे हमारा जीवन और सादा हो गया। इस तरह हम अंतर्राष्ट्रीय निर्माण काम में हाथ बँटा पाए।’ पिछले 20 साल तक उन्होंने अफ्रीका के कई इलाकों में जाकर राज-घर बनाने में सहयोग दिया है। कभी-कभी उनके पास बहुत कम पैसे होते थे, लेकिन यहोवा ने हमेशा उनका खयाल रखा। क्लैर कहती है, “यहोवा की सेवा में हर दिन बिताने से हमें बड़ी खुशी मिलती है। इस दरमियान कई भाई-बहनों से हमारी अच्छी दोस्ती हुई। हमें किसी चीज़ की कोई कमी महसूस नहीं होती। पूरी समय की सेवा के लिए हमने जो त्याग किए वे उस खुशी के आगे फीके पड़ जाते हैं जो हमें इस सेवा से मिलती है।” आज पूरे समय की सेवा करनेवाले बहुत-से यहोवा के साक्षी ऐसा ही महसूस करते हैं। *

18. हम खुद से कौन से सवाल पूछ सकते हैं?

18 लेकिन आप क्या कहेंगे? क्या आपको लगता है कि आपको यहोवा की सेवा में अपना जोश और बढ़ाना चाहिए? क्या ऐसी कुछ बातें हैं जो ज़्यादा अहमियत रखनेवाली बातों से आपका ध्यान भटका रही हैं? अगर हाँ, तो आप क्या कर सकते हैं? शायद आपको बाइबल पढ़ाई और उसका अध्ययन करने में और सुधार करना पड़े। अगले लेख में बताया जाएगा कि आप यह कैसे कर सकते हैं।

^ पैरा. 7 इस अंक में दिया लेख ‘नादान हर एक बात को सच मानता है’ देखिए।

^ पैरा. 17सही क्या है, यह जानना और फिर वही करना” नाम के लेख में हेडन और मैलडी सैंडर्सन की जीवन कहानी भी देखिए। (1 मार्च, 2006 की प्रहरीदुर्ग) ऑस्ट्रेलिया में उनका कारोबार काफी अच्छा चल रहा था, लेकिन उन्होंने पूरे समय की सेवा करने के लिए अपना कारोबार छोड़ दिया। देखिए कि जब वे भारत में मिशनरी के तौर पर सेवा कर रहे थे, उस दौरान जब उनका सारा पैसा खत्म हो गया, तब क्या हुआ।