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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  सितंबर 2015

क्या आपका ज़मीर आपको सही राह दिखाता है?

क्या आपका ज़मीर आपको सही राह दिखाता है?

“इस आदेश का मकसद यह है कि हम एक साफ दिल और साफ ज़मीर से . . . प्यार करें।”—1 तीमु. 1:5.

गीत: 22, 48

1, 2. (क) हमें ज़मीर किसने दिया? (ख) इसके लिए हमें क्यों शुक्रगुज़ार होना चाहिए?

यहोवा परमेश्वर ने इंसान को आज़ाद मरज़ी का मालिक बनाया, यानी उसे खुद फैसले लेने की आज़ादी दी। और उसने सही फैसले लेने में हमारी मदद के लिए एक राह दिखानेवाला भी दिया है। वह है, हमारे अंदर सही-गलत का फर्क करने की काबिलीयत। इसे हम विवेक या ज़मीर कहते हैं। अगर हम सही विवेक से काम लेंगे, तो हम अच्छे काम करने के लिए उभारे जाएँगे और गलत काम करने से बचेंगे। हमारा ज़मीर इस बात का सबूत है कि यहोवा हमसे प्यार करता है और चाहता है कि हम कामयाब हों।

2 आज कुछ लोग भले ही बाइबल के स्तरों के बारे में नहीं जानते, फिर भी वे अच्छे काम करना पसंद करते हैं और बुरे कामों से नफरत करते हैं। (रोमियों 2:14, 15 पढ़िए।) वह कैसे? वे अपने ज़मीर की वजह से ऐसा करते हैं। बहुत-से लोगों का ज़मीर उन्हें बुरे काम करने से रोकता है। ज़रा सोचिए, अगर किसी में भी ज़मीर न होता तो दुनिया का क्या हाल होता! आज हमें जितनी बुरी-बुरी खबरें सुनने को मिलती हैं, उससे भी बदतर खबरें सुनने को मिलतीं। हमें यहोवा का कितना शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि उसने इंसान को ज़मीर दिया!

3. हमारा ज़मीर मंडली के लिए कैसे मददगार हो सकता है?

 3 अगर इंसान चाहता है कि उसका ज़मीर अच्छे से काम करे, तो उसे अपने ज़मीर को सही तरह से ढालने की ज़रूरत है। लेकिन ज़्यादातर लोग इस बारे में सोचते ही नहीं। वहीं दूसरी तरफ यहोवा के लोग अपने ज़मीर को ढालना चाहते हैं, क्योंकि यह मंडली की एकता बनाए रखने में बहुत मददगार हो सकता है। वे चाहते हैं कि उनका ज़मीर उन्हें बाइबल में दिए गए सही-गलत और अच्छे-बुरे के स्तर याद दिलाता रहे। लेकिन अपने ज़मीर को ढालने और उसके मुताबिक काम करने के लिए बाइबल की शिक्षाएँ समझना ही काफी नहीं है। हमें परमेश्वर के स्तरों से गहरा लगाव होना चाहिए, साथ ही यह विश्वास होना चाहिए कि वे हमारी भलाई के लिए हैं। पौलुस ने कहा, “इस आदेश का मकसद यह है कि हम एक साफ दिल और साफ ज़मीर से और ऐसे विश्वास के साथ प्यार करें जिसमें कोई कपट न हो।” (1 तीमु. 1:5) जब हम अपने ज़मीर को सही तरह से ढालते हैं और उसके मुताबिक काम करते हैं, तो यहोवा के लिए हमारा प्यार और उस पर हमारा विश्वास बढ़ता है। हम जिस तरह अपने विवेक या ज़मीर से काम लेते हैं उससे साबित होता है कि यहोवा के साथ हमारा कितना करीबी रिश्ता है, हमारा दिल कैसा है और यहोवा को खुश करने की हमारी कितनी इच्छा है। जी हाँ, हमारे अंदर से आनेवाली यह आवाज़ ज़ाहिर करती है कि हम किस तरह के इंसान हैं!

4. हम अपने ज़मीर को कैसे ढाल सकते हैं?

4 लेकिन हम अपने ज़मीर को कैसे ढाल सकते हैं? हमें नियमित तौर पर बाइबल का अध्ययन करना चाहिए, हम जो पढ़ते हैं उस पर गहराई से सोचना चाहिए और यहोवा से मदद माँगकर सीखी हुई बातें लागू करनी चाहिए। इसका मतलब सिर्फ बाइबल की सच्चाई और उसमें दिए कायदे-कानून से वाकिफ होना काफी नहीं है। बाइबल का अध्ययन करते वक्‍त हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हम यहोवा को अच्छी तरह जानें। हम यह जानें कि वह किस तरह का शख्स है और वह क्या पसंद करता है और क्या नहीं। हम जितना अच्छी तरह यहोवा को जानेंगे, उतना ही अच्छी तरह हमारा ज़मीर काम करेगा। एक वक्‍त ऐसा आएगा कि हमारा ज़मीर फौरन पहचान लेगा कि यहोवा की नज़र में क्या सही है और क्या गलत। जी हाँ, हमारा ज़मीर यहोवा की सोच के मुताबिक काम करने लगेगा। नतीजा, हमारा दिल हमें यहोवा की तरह बनने के लिए उकसाएगा।

5. इस लेख में हम क्या चर्चा करेंगे?

5 लेकिन हम शायद कहें, ‘सही तरह से ढाला हुआ ज़मीर फैसले लेने में कैसे हमारी मदद कर सकता है? हम दूसरों के ज़मीर के लिए कैसे लिहाज़ दिखा सकते हैं? और हमारा ज़मीर हमें सही काम करने के लिए कैसे उभार सकता है?’ तो आइए ऐसे तीन पहलुओं पर गौर करें जिनमें हमें सही तरह से ढाले हुए विवेक से काम लेना होता है: (1) सेहत की देखभाल, (2) मनोरंजन और (3) हमारी प्रचार सेवा।

सूझ-बूझ से काम लीजिए

6. हमें सेहत से जुड़े कौन-से फैसले लेने पड़ते हैं?

6 बाइबल हमें बढ़ावा देती है कि हम ऐसे काम न करें जिनसे हमें नुकसान हो सकता है। साथ ही, हमें अपनी आदतों पर भी काबू रखना चाहिए, जैसे कि खाने-पीने में। (नीति. 23:20; 2 कुरिं. 7:1) जब हम बाइबल की सलाह मानते हैं तो हमारी सेहत काफी हद तक अच्छी रह सकती है। फिर भी हम कभी-न-कभी बीमार पड़ते हैं और एक दिन बूढ़े भी होते हैं। ऐसे में हमें क्या फैसले लेने पड़ सकते हैं? कुछ देशों में, लोग यह तय कर सकते हैं कि वे जाने-माने डॉक्टर या अस्पताल से इलाज करवाएँगे या किसी ऐसे डॉक्टर के पास जाएँगे जो आयुर्वेदिक इलाज या जड़ी-बूटियाँ वगैरह देता है। इसलिए शाखा-दफ्तरों के पास अकसर भाई-बहनों से खत आते रहते हैं कि वे कौन-सा इलाज चुनें। उनमें से कई पूछते हैं, “यहोवा के एक सेवक के लिए कौन-सा इलाज करवाना सही रहेगा?”

7. हम इलाज के मामले में फैसला कैसे ले सकते हैं?

7 शाखा-दफ्तर या मंडली के प्राचीनों के पास यह अधिकार नहीं है कि वे एक मसीही के लिए इलाज के बारे में फैसले लें। तब भी जब वह पूछता है कि मुझे क्या करना चाहिए। (गला. 6:5) मगर प्राचीन यह ज़रूर बता सकते हैं कि इस बारे में यहोवा क्या सोचता है ताकि एक मसीही सही  फैसला ले सके। उदाहरण के लिए, परमेश्वर ने हमें आज्ञा दी है कि हम खून न लें। (प्रेषि. 15:29) यह आज्ञा मसीहियों को यह समझने में मदद करती है कि वह ऐसे इलाज नहीं करवा सकता जिनमें खून लेना या उसके चार खास तत्व लेना शामिल हो। यह जानकारी एक मसीही को यह फैसला लेने में भी मदद देती है कि क्या वह खून के चार खास तत्वों से निकाले गए दूसरे छोटे तत्व लेगा या नहीं। * बाइबल की और कौन-सी सलाहें हमें इलाज के मामले में सही फैसले लेने में मदद दे सकती हैं?

8. सेहत के मामले में, फिलिप्पियों 4:5 सही फैसले लेने में कैसे हमारी मदद करेगा?

8 नीतिवचन 14:15 में बताया गया है, “भोला तो हर एक बात को सच मानता है, परन्तु चतुर मनुष्य समझ बूझकर चलता है।” आज शायद कुछ बीमारियों का कोई जाना-माना इलाज नहीं है। इसलिए हमें ऐसे इलाज करवाने से बचना चाहिए जिनमें यह वादा तो किया जाता है कि उससे बीमारी ठीक हो जाएगी, लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं होता कि ऐसा हुआ है। पौलुस ने लिखा, “सब लोग यह जान जाएँ कि तुम लिहाज़ करनेवाले [या, सूझ-बूझ से काम लेनेवाले] इंसान हो।” (फिलि. 4:5) सूझ-बूझ से काम लेनेवाला इंसान सेहत से जुड़ी बातों के बजाय यहोवा की उपासना पर ज़्यादा ध्यान देगा। अगर सेहत का खयाल रखना हमारी ज़िंदगी में सबसे ज़रूरी बात बन जाती है, तो हम सिर्फ खुद के बारे में सोचने लगेंगे। (फिलि. 2:4) हम जानते हैं कि इस दुनिया में हमारी सेहत पूरी तरह ठीक नहीं रह सकती। इसलिए यह ठान लीजिए कि यहोवा की सेवा करना ही आपकी ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा अहमियत रखता हो।फिलिप्पियों 1:10 पढ़िए।

क्या आप दूसरों पर अपनी राय थोपने की कोशिश करते हैं? (पैराग्राफ 9 देखिए)

9. (क) रोमियों 14:13, 19 से हमें सेहत से जुड़े फैसले लेने में कैसे मदद मिल सकती है? (ख) हमारे बीच की एकता कैसे खतरे में पड़ सकती है?

9 सूझ-बूझ से काम लेनेवाला एक मसीही दूसरों को कभी ज़बरदस्ती वह काम करने के लिए नहीं कहेगा, जो उसे सबसे बढ़िया लगता है। एक देश में, एक शादीशुदा जोड़ा दूसरों को सेहत बनानेवाली कोई चीज़ खाने का बढ़ावा दे रहे थे। कुछ भाई-बहनों को उन्होंने इसके लिए कायल भी कर दिया। लेकिन दूसरे उनकी बातों में नहीं आए। जब वह सेहत बनानेवाली चीज़ खाने से अच्छे नतीजे नहीं निकले, तो बहुत-से भाई-बहन उनसे नाराज़ हो गए। उस जोड़े को यह फैसला करने का हक था कि वे खुद सेहत बनानेवाली वह चीज़ लेंगे या नहीं। लेकिन क्या उस चीज़ से मंडली की एकता खतरे में डालना समझदारी थी? क्या ऐसा करना लिहाज़ दिखाना था? पुराने ज़माने में रोम के कुछ मसीही खाने-पीने की कुछ चीज़ों और कुछ समारोहों के बारे में अलग-अलग राय रखते थे। उन्हें पौलुस ने क्या सलाह दी? उसने कहा, “कोई आदमी, एक दिन को दूसरे दिन से बड़ा मानता है, तो दूसरा सभी दिनों को एक बराबर मानता है। हर एक इंसान वह करे जिस पर उसे पूरे मन से यकीन है।” तो आइए हम ऐसा कोई काम न करें जिससे दूसरों को ठेस पहुँचे।—रोमियों 14:5, 13, 15, 19, 20 पढ़िए।

10. हमें दूसरों के निजी फैसलों के लिए क्यों लिहाज़ दिखाना चाहिए? (लेख की शुरूआत में दी तसवीर देखिए।)

10 कभी-कभी मंडली में एक मसीही निजी मामले में ऐसा फैसला लेता है जिस बारे में हम शायद समझ न पाएँ कि  उसने ऐसा क्यों किया। ऐसे में हमें क्या करना चाहिए? हमें उसके बारे में फौरन कोई राय नहीं बना लेनी चाहिए और न ही फैसला बदलने के लिए उस पर कोई दबाव डालना चाहिए। शायद उसे अपना ज़मीर और अच्छी तरह ढालने की ज़रूरत हो, या शायद उसका ज़मीर बहुत “कमज़ोर” हो। (1 कुरिं. 8:11, 12) या फिर हो सकता है हमारा ही ज़मीर अभी अच्छी तरह न ढला हो। सेहत के मामले में हममें से हरेक को खुद फैसला लेना चाहिए और उसके फायदे या नुकसान के लिए हमें खुद ज़िम्मेदार होना चाहिए।

अच्छे मनोरंजन का मज़ा लीजिए

11, 12. बाइबल मनोरंजन का चुनाव करने में कैसे हमारी मदद करती है?

11 यहोवा ने हमें इस तरह बनाया है कि हम मनोरंजन का मज़ा ले सकते हैं और उससे फायदा पा सकते हैं। सुलैमान ने कहा कि “हँसने का भी समय” और “नाचने का भी समय है।” (सभो. 3:4) मगर हर तरह का मनोरंजन फायदेमंद, थकावट दूर करनेवाला या ताज़गी पहुँचानेवाला नहीं होता। साथ ही, मनोरंजन में हद-से-ज़्यादा समय बिताना भी अच्छा नहीं होता। लेकिन ऐसा मनोरंजन करने और उससे फायदा पाने में हमारा विवेक कैसे हमारी मदद कर सकता है, जो यहोवा को मंज़ूर हो?

12 बाइबल हमें “शरीर के काम” करने से खबरदार करती है। ये काम हैं, “व्यभिचार, अशुद्धता, बदचलनी, मूर्तिपूजा, भूत-विद्या, दुश्मनी, तकरार, जलन, गुस्से से उबलना, झगड़े, फूट, गुटबंदी, ईर्ष्या, नशेबाज़ी के दौर, रंगरलियाँ और ऐसी ही और बुराइयाँ।” पौलुस ने लिखा, “जो लोग ऐसे कामों में लगे रहते हैं वे परमेश्वर के राज के वारिस न होंगे।” (गला. 5:19-21) इसलिए हमें अपने आपसे पूछना चाहिए, ‘क्या मेरा ज़मीर मुझे ऐसे खेल खेलने से रोकता है जिनमें मार-धाड़, खून-खराबा, एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ या देश-भक्‍ति शामिल होती है? जब ऐसी फिल्म देखने का मेरा मन ललचाता है या मुझ पर कोई दबाव डालता है जिसमें गंदे सीन हैं या जिसमें अनैतिकता, नशेबाज़ी या जादू-टोने को बढ़ावा दिया गया है, तब क्या मेरा ज़मीर मुझे खबरदार करता है?’

13. मनोरंजन के मामले में 1 तीमुथियुस 4:8 और नीतिवचन 13:20 कैसे हमारी मदद कर सकते हैं?

13 बाइबल में दिए सिद्धांत हमें अपने ज़मीर को इस तरह ढालने में मदद कर सकते हैं जिससे हम सही मनोरंजन का चुनाव कर सकें। उदाहरण के लिए, बाइबल में बताया गया है, “शरीर की कसरत . . . कुछ हद तक फायदेमंद होती है।” (1 तीमु. 4:8) बहुत-से लोग मानते हैं कि लगातार कसरत करने से उनकी सेहत अच्छी रहती है और उनके तन और मन को ताज़गी मिलती है। लेकिन तब क्या अगर हम कुछ लोगों के साथ कसरत करना चाहें? क्या इससे कोई फर्क पड़ता है कि हम किसके साथ कसरत करते हैं? नीतिवचन 13:20 में लिखा है, “बुद्धिमानों की संगति कर, तब तू भी बुद्धिमान हो जाएगा, परन्तु मूर्खों का साथी नष्ट हो जाएगा।” क्या इससे साफ पता नहीं चलता कि मनोरंजन का चुनाव करते वक्‍त हमें बाइबल के आधार पर ढाले गए अपने विवेक से काम लेना चाहिए?

14. एक परिवार ने रोमियों 14:2-4 में दिए सिद्धांत कैसे लागू किए?

14 क्रिस्टिआन और डानिएला की दो जवान बेटियाँ हैं। क्रिस्टिआन कहता है, “हमने अपनी पारिवारिक उपासना में मनोरंजन पर चर्चा की। हम सबकी इस बारे एक राय थी कि मौज-मस्ती करने के कुछ तरीके सही हैं और कुछ नहीं। किसकी संगति को अच्छा कहा जा सकता है? हमारी एक बेटी ने शिकायत की कि उसके स्कूल में लंच के दौरान कुछ साक्षी बच्चे ऐसा बरताव करते हैं जो उसे ठीक नहीं लगता। और इस वजह से उसे भी उनकी तरह बरताव करने का दबाव महसूस होता है। हमने उसे समझाया कि हम सबका अपना-अपना ज़मीर है और हमें क्या करना चाहिए और किसके साथ उठना-बैठना चाहिए इस बारे में हमें अपने ज़मीर की सुननी चाहिए।”रोमियों 14:2-4 पढ़िए।

बाइबल के आधार पर ढाला हुआ ज़मीर खतरों से बचने में आपकी मदद कर सकता है (पैराग्राफ 14 देखिए)

15. मनोरंजन करने की योजना बनाते वक्‍त मत्ती 6:33 कैसे हमारी मदद कर सकता है?

15 मनोरंजन की बात कर रहे हैं, तो ज़रा इन सवालों पर गौर कीजिए। आप मनोरंजन में कितना समय बिताते हैं? जब आप मनोरंजन करने की योजना बनाते हैं, तो आप किन बातों के लिए पहले समय निकालते हैं? सभाओं, प्रचार सेवा,  निजी अध्ययन और ऐसी ही दूसरी बातों के लिए? या फिर मनोरंजन के लिए? आपके लिए कौन-सी बातें सबसे ज़्यादा मायने रखती हैं? यीशु ने कहा था, “तुम पहले उसके राज और उसके स्तरों के मुताबिक जो सही है उसकी खोज में लगे रहो और ये बाकी सारी चीज़ें भी तुम्हें दे दी जाएँगी।” (मत्ती 6:33) जब यह तय करने की बात आती है कि आप अपना समय कैसे बिताएँगे, तो क्या आपका ज़मीर आपको यह सलाह याद दिलाता है?

अच्छी तरह ढाला हुआ ज़मीर प्रचार सेवा के लिए उभारता है

16. हमारा ज़मीर हमें क्या करने के लिए उभारता है?

16 सही तरह से ढाला हुआ ज़मीर हमें न सिर्फ बुरे काम करने से रोकता है, बल्कि अच्छे काम करने के लिए भी उभारता है। इनमें से सबसे ज़रूरी काम है, घर-घर जाकर प्रचार करना और मौके ढूँढ़कर गवाही देना। ऐसा ही पौलुस ने भी किया था। उसने लिखा, “यह मेरी ज़िम्मेदारी है। वाकई, धिक्कार है मुझ पर अगर मैं खुशखबरी न सुनाऊँ!” (1 कुरिं. 9:16) पौलुस की तरह जब हम खुशखबरी का ऐलान करते हैं, तो हमारा ज़मीर साफ रहता है। इसलिए कि हमें यकीन होता है, हम सही काम कर रहे हैं। खुशखबरी सुनाकर हम दूसरों के ज़मीर से भी सही काम करने की गुज़ारिश कर रहे होते हैं। पौलुस ने कहा, “हम सच्चाई ज़ाहिर करते हैं और परमेश्वर के सामने हर इंसान के ज़मीर को भानेवाली अच्छी मिसाल रखते हैं।”—2 कुरिं. 4:2.

17. एक जवान बहन ने, बाइबल के आधार पर ढाले गए अपने ज़मीर के मुताबिक कैसे काम किया?

17 जब जाकलीन 16 साल की थी, तब वह स्कूल में जीव-विज्ञान पढ़ती थी। उसकी क्लास में थोड़ा-बहुत विकासवाद के बारे में भी सिखाया जाता था। वह कहती है, ‘मेरा ज़मीर मुझे इस विषय पर क्लास में होनेवाली चर्चा में उस तरह हिस्सा लेने की इजाज़त नहीं देता था, जिस तरह मैं आम तौर पर लेती थी। मैं विकासवाद की शिक्षा का साथ नहीं दे सकती थी। मैंने इस बारे में अपने टीचर को बताया। मैं हैरान रह गयी कि वे मेरे साथ बड़े दोस्ताना तरीके से पेश आए और उन्होंने मुझे पूरी क्लास के सामने सृष्टि के विषय पर बोलने का मौका दिया।’ जाकलीन इस बात से खुश थी कि उसने बाइबल के आधार पर ढाले गए अपने ज़मीर की आवाज़ सुनी और उसके मुताबिक काम किया। क्या आपका ज़मीर आपको सही काम करने के लिए उभारता है?

18. हममें एक अच्छा और भरोसेमंद ज़मीर पाने की चाहत क्यों होनी चाहिए?

18 हमारा लक्ष्य है कि हम परमेश्वर के सिद्धांतों और स्तरों के मुताबिक ज़िंदगी जीएँ। और यह लक्ष्य पाने में हमारा ज़मीर हमारी मदद कर सकता है। जब हम नियमित तौर पर बाइबल का अध्ययन करते हैं, हमने जो पढ़ा है उस पर गहराई से सोचते हैं और सीखी हुई बातें लागू करते हैं, तब हम अपने ज़मीर को अच्छी तरह से ढाल रहे होते हैं। तब यह शानदार तोहफा हमारी मसीही ज़िंदगी के लिए एक भरोसेमंद राह दिखानेवाला साबित होता है!

^ पैरा. 7 15 जून, 2004 की प्रहरीदुर्ग के पेज 29-31 पर दिया “पाठकों के प्रश्न” देखिए।