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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  सितंबर 2015

हम यहोवा के लिए अपना प्यार कैसे दिखा सकते हैं?

हम यहोवा के लिए अपना प्यार कैसे दिखा सकते हैं?

“हम इसलिए प्यार करते हैं क्योंकि पहले परमेश्वर ने हमसे प्यार किया।”—1 यूह. 4:19.

गीत: 6, 138

1, 2. यहोवा ने हमें उससे प्यार करना कैसे सिखाया?

कहा जाता है कि एक पिता अपनी मिसाल से अपने बच्चों को सबसे अच्छी तरह सिखा सकता है। जब वह अपने बच्चों के लिए प्यार ज़ाहिर करता है, तो दरअसल वह उन्हें प्यार करना सिखा रहा होता है। हमारा प्यारा पिता यहोवा हमसे जितना प्यार करता है, उतना प्यार अब तक किसी ने नहीं किया। और हम प्यार करना इसलिए सीख पाते हैं क्योंकि “पहले परमेश्वर ने हमसे प्यार किया।”—1 यूह. 4:19.

2 यहोवा ने कैसे दिखाया कि ‘पहले उसने हमसे प्यार किया’? बाइबल कहती है, “परमेश्वर ने अपने प्यार की अच्छाई हम पर इस तरह ज़ाहिर की है कि जब हम पापी ही थे, तब मसीह हमारे लिए मरा।” (रोमि. 5:8) कितना बड़ा बलिदान! हम इंसानों की खातिर यहोवा ने अपना इकलौता बेटा फिरौती के तौर पर दे दिया ताकि हमें पाप और मौत से छुटकारा मिल सके। फिरौती बलिदान की वजह से ही हमारे लिए यहोवा के करीब आना और यह दिखाना मुमकिन हो पाया है कि हम उससे प्यार करते हैं। यहोवा ने सच्चे प्यार की बेहतरीन मिसाल कायम की है। अपनी मिसाल से उसने हमें सिखाया कि हमें बिना किसी स्वार्थ के और दिल खोलकर प्यार करना चाहिए।—1 यूह. 4:10.

3, 4. हमें परमेश्वर के लिए अपना प्यार कैसे दिखाना चाहिए?

3 प्यार यहोवा का खास गुण है। इसलिए हम समझ सकते हैं कि क्यों यीशु ने कहा,  सबसे ज़रूरी आज्ञा यह है कि “तुझे अपने परमेश्वर यहोवा से अपने पूरे दिल, अपनी पूरी जान, अपने पूरे दिमाग और अपनी पूरी ताकत से प्यार करना है।” (मर. 12:30) यहोवा चाहता है कि हम उसे “पूरे दिल” से प्यार करें। अगर हम यहोवा से ज़्यादा किसी और व्यक्‍ति से या किसी और चीज़ से प्यार करेंगे तो इससे यहोवा को दुख होगा। लेकिन यहोवा के लिए हमारा प्यार सिर्फ दिल में ही नहीं होना चाहिए। यहोवा हमसे यह भी उम्मीद करता है कि हम अपने “पूरे दिमाग” और अपनी “पूरी ताकत” से उससे प्यार करें। इसका मतलब, हमें अपने सोच-विचार और अपने कामों से भी उसके लिए अपना प्यार दिखाना चाहिए।—मीका 6:8 पढ़िए।

4 जी हाँ, हमें स्वर्ग में रहनेवाले अपने पिता यहोवा से पूरे दिलो-जान से प्यार करना चाहिए। उसे अपनी ज़िंदगी में पहली जगह देकर हम दिखाते हैं कि हम उससे वाकई प्यार करते हैं। पिछले लेख में, हमने ऐसे चार तरीकों पर गौर किया जिनसे ज़ाहिर होता है कि यहोवा हमसे कितना प्यार करता है। अब आइए देखें कि हम यहोवा के लिए अपना प्यार कैसे बढ़ा सकते हैं और कैसे दिखा सकते हैं कि हम उससे प्यार करते हैं।

यहोवा के भले कामों के लिए कदरदानी दिखाइए

5. यहोवा ने हमारे लिए जो किया है, उस बारे में सोचने पर हमारा दिल हमें क्या करने के लिए उभारता है?

5 जब कोई आपको तोहफा देता है, तो आप क्या करते हैं? आप किसी-न-किसी तरह से उसके लिए अपनी कदरदानी दिखाते होंगे। आप उस तोहफे की कदर करते हैं, इसलिए आप उसका अच्छा इस्तेमाल भी करेंगे। याकूब ने लिखा, “हरेक अच्छा तोहफा और हरेक उत्तम देन ऊपर से मिलती है, क्योंकि यह आकाश की ज्योतियों के पिता की तरफ से आती है। उस पिता में कभी कोई बदलाव नहीं होता, न ही कुछ घट-बढ़ होती है, जैसे रौशनी के घटने-बढ़ने से छाया घटती-बढ़ती है।” (याकू. 1:17) हम यहोवा के कितने एहसानमंद हैं कि वह हमें ज़िंदा रहने और हमारी खुशी के लिए हर ज़रूरी चीज़ देता है। यह दिखाता है कि वह हमसे कितना प्यार करता है। क्या यह बात हमें उससे प्यार करने के लिए नहीं उभारती?

6. यहोवा की आशीषें हमेशा पाने के लिए इसराएलियों को क्या करना था?

6 यहोवा ने इसराएलियों को बहुत-सी अच्छी चीज़ें दी थीं। उन्हें अपना नियम-कानून देकर उसने सैकड़ों साल तक उनकी अगुवाई की और ज़िंदा रहने के लिए उन्हें हर ज़रूरी चीज़ दी। (व्यव. 4:7, 8) इसराएली यहोवा का कानून मानकर उसके लिए अपनी कदरदानी दिखा सकते थे। इस कानून में एक नियम था कि जब भी वे यहोवा को कोई भेंट चढ़ाते, तो उन्हें ज़मीन की “पहिली उपज का पहिला भाग” देना था। (निर्ग. 23:19) इसराएली जानते थे कि अगर वे यहोवा का कानून मानें और उसे अपना बढ़िया-से-बढ़िया दें तो यहोवा उन्हें हमेशा आशीष देता रहेगा।—व्यवस्थाविवरण 8:7-11 पढ़िए।

7. हम अपनी “संपत्ति” का इस्तेमाल करके यहोवा के लिए अपना प्यार कैसे दिखा सकते हैं?

7 हम यहोवा के लिए अपना प्यार कैसे जता सकते हैं? आज हमसे भेंट चढ़ाने की तो उम्मीद नहीं की जाती, लेकिन हम अपनी “संपत्ति” यानी कीमती चीज़ें देकर यहोवा के लिए अपना प्यार जता सकते हैं। (नीति. 3:9) वह कैसे? जब हम अपनी चीज़ें इस तरह इस्तेमाल करते हैं कि उनसे यहोवा की महिमा हो, तो हम उसके लिए अपना प्यार दिखा रहे होते हैं। जैसे, हम अपनी मंडली के इलाके में और दुनिया-भर में हो रहे राज के काम को बढ़ाने के लिए दान दे सकते हैं। हमारे पास चाहे थोड़ा हो या ज़्यादा, हम सब अपनी चीज़ों से यहोवा के लिए प्यार दिखा सकते हैं। (2 कुरिं. 8:12) लेकिन कुछ और तरीकों से भी हम दिखा सकते हैं कि हमें यहोवा से प्यार है।

8, 9. यहोवा के लिए अपना प्यार दिखाने का एक और तरीका क्या है? माइक और उसके परिवार ने क्या किया?

8 यीशु ने हमें सिखाया कि हम पहले राज की खोज में लगे रहें और रोटी-कपड़े जैसी चीज़ों की चिंता न करें। हमारा पिता यहोवा जानता है कि हमें किन चीज़ों की ज़रूरत है और वादा करता है कि वह हमारी ज़रूरतें पूरी करेगा। (मत्ती 6:31-33) हमें यहोवा पर भरोसा है कि वह अपना वादा ज़रूर पूरा करेगा। और क्यों न हो, आखिर हम जिससे सच्चा प्यार करते हैं, उस पर भरोसा भी तो करते हैं। भरोसे और प्यार का गहरा नाता है। कहने का मतलब यह है कि जितना  ज़्यादा हम यहोवा पर भरोसा करेंगे उतना ही उसके लिए हमारे दिल में प्यार होगा। (भज. 143:8) हम खुद से पूछ सकते हैं, ‘क्या मेरे लक्ष्यों से और मैं अपना समय और ताकत जिन कामों में लगाता हूँ उससे यह पता चलता है कि मैं सच में यहोवा से प्यार करता हूँ? क्या मेरे हर दिन के कामों से यह दिखता है कि मुझे भरोसा है यहोवा मेरी ज़रूरतें पूरी करेगा?’

9 माइक नाम के एक मसीही और उसके परिवार को यहोवा पर पूरा भरोसा था। छोटी उम्र से ही माइक की बड़ी इच्छा थी कि वह किसी दूसरे देश में जाकर प्रचार करे। बड़े होकर उसकी शादी हो गयी और दो बच्चे हो गए, फिर भी उसकी यह इच्छा कम नहीं हुई। माइक और उसका परिवार उन भाई-बहनों के अनुभव पढ़ा करते थे जिन्होंने ऐसे इलाकों में जाकर सेवा की जहाँ प्रचारकों की ज़्यादा ज़रूरत है। इससे उन्हें इतना हौसला मिला कि उन्होंने सादगी-भरी ज़िंदगी जीने का फैसला कर लिया। उन्होंने अपना घर बेच दिया और साफ-सफाई का अपना कारोबार भी कम कर दिया। माइक ने एक ऐसा उपाय ढूँढ़ा जिससे वह दूसरे देश में रहकर इंटरनेट के ज़रिए अपना कारोबार सँभाल सकता है। फिर वे दूसरे देश में जाकर बस गए और एक छोटे घर में रहने लगे। वहाँ उन्हें प्रचार में बहुत मज़ा आता था। माइक का कहना है, “मत्ती 6:33 में दर्ज़ यीशु की बात वाकई सच है। हमने इसका खुद अनुभव किया है!”

यहोवा जो सिखाता है उस पर गहराई से सोचिए

10. राजा दाविद की तरह हम यहोवा के बारे में जो सीखते हैं, उस पर गहराई से सोचना हमारे लिए क्यों ज़रूरी है?

10 आज से करीब 3,000 साल पहले जब राजा दाविद ने आसमान को देखा तो वह यह कहने से खुद को रोक नहीं पाया, “आकाश परमेश्वर की महिमा का वर्णन कर रहा है; और आकाशमण्डल उसकी हस्तकला को प्रगट कर रहा है।” इतना ही नहीं, जब उसने यह सोचा कि परमेश्वर के कानून में लिखी बातें क्या ही बुद्धि-भरी हैं तो उसने कहा, “यहोवा की व्यवस्था खरी है, वह प्राण को बहाल कर देती है; यहोवा के नियम विश्वासयोग्य हैं, साधारण लोगों को बुद्धिमान बना देते हैं।” इस तरह गहराई से सोचने और अपने दिल में यहोवा के लिए कदर बढ़ाने का क्या नतीजा निकला? दाविद ने कहा, “मेरे मुँह के वचन ओर मेरे हृदय का ध्यान [या, मन का सोच-विचार] तेरे सम्मुख ग्रहण योग्य हों, हे यहोवा परमेश्वर, मेरी चट्टान और मेरे उद्धार करनेवाले!” इससे साफ पता चलता है कि दाविद का परमेश्वर के साथ जो प्यार-भरा रिश्ता था वह और भी मज़बूत हुआ।—भज. 19:1, 7, 14.

11. जो ज्ञान हमें यहोवा देता है उसका इस्तेमाल करके हम कैसे उसके लिए अपना प्यार दिखा सकते हैं? (लेख की शुरूआत में दी तसवीर देखिए।)

11 आज यहोवा हमें अपने बारे में, अपने मकसद, अपनी सृष्टि और अपने वचन के बारे में बहुत कुछ सिखाता है। वहीं यह दुनिया भी लोगों को ज़्यादा-से-ज़्यादा ज्ञान हासिल करने का बढ़ावा देती है। लेकिन लोग दुनिया में जो ज्ञान हासिल करते हैं उससे परमेश्वर के लिए उनका प्यार कम हो जाता है और उस पर से उनका विश्वास उठ जाता है। इसके उलट, बाइबल हमसे गुज़ारिश करती है कि हम न सिर्फ ज्ञान हासिल करें, बल्कि बुद्धि और समझ भी हासिल करें। इसका मतलब हमें यह भी सीखना है कि परमेश्वर हमें जो ज्ञान देता है उसका हम कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं ताकि इससे हमें और दूसरों की भी फायदा हो। (नीति. 4:5-7) परमेश्वर की “मरज़ी है कि सब किस्म के लोगों का उद्धार हो और वे सच्चाई का सही ज्ञान हासिल करें।” (1 तीमु. 2:4) जब हम ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों को परमेश्वर के राज के बारे में सिखाते हैं और यह समझाते हैं कि यह राज इंसानों के लिए क्या करेगा तो असल में हम यहोवा और लोगों के लिए अपना प्यार दिखा रहे होते हैं।—भजन 66:16, 17 पढ़िए।

12. यहोवा से मिले एक तोहफे के बारे में एक जवान बहन क्या कहती है?

12 छोटे बच्चे भी उस बारे में गहराई से सोच सकते हैं जो यहोवा ने उन्हें दिया है और सिखाया है। शैनन नाम की एक बहन जब 11 साल की और उसकी बहन 10 साल की थी, तब वे एक अधिवेशन में हाज़िर हुईं। शैनन कहती है कि उसे अब भी याद है, उस अधिवेशन में उसे कैसा महसूस हुआ था। अधिवेशन का विषय था, “ईश्वरीय भक्‍ति।” एक कार्यक्रम के दौरान सभी बच्चों को एक खास जगह बैठने के लिए कहा गया। इन बच्चों में शैनन और उसकी बहन भी थीं। पहले तो शैनन को थोड़ी घबराहट हुई, लेकिन कुछ देर बाद  वह हैरान रह गयी! क्यों? उसने देखा कि हर बच्चे को युवाओं के प्रश्न—व्यावहारिक उत्तर नाम की एक किताब दी जा रही है। यह खूबसूरत तोहफा जब उसे दिया गया, तो उसने यहोवा के बारे में कैसा महसूस किया? वह कहती है, “उस वक्‍त मुझे लगा कि यहोवा वाकई एक असल शख्स है और वह मुझसे बहुत-बहुत प्यार करता है। यह क्या ही खुशी की बात है कि हमारा महान परमेश्वर यहोवा हमें मुफ्त में इतने बढ़िया, इतने खूबसूरत तोहफे देता है!”

यहोवा से मिलनेवाला अनुशासन कबूल कीजिए

13, 14. जब यहोवा हमें अनुशासन देता है तो हमें कैसा रवैया दिखाना चाहिए? और क्यों?

13 बाइबल हमें याद दिलाती है, “यहोवा जिस से प्रेम रखता है उसको डाँटता है, जैसे कि बाप उस बेटे को जिसे वह अधिक चाहता है।” (नीति. 3:12) जब यहोवा हमें अनुशासन देता है तो हमें कैसा रवैया दिखाना चाहिए? हमें अनुशासन कबूल करना चाहिए और यहोवा को यह मौका देना चाहिए कि वह हमें सिखाए। ऐसा करके हम सही काम करना सीखते हैं और हमारे मन को शांति मिलती है। माना कि “किसी भी तरह का अनुशासन अभी के लिए सुखद नहीं लगता बल्कि दुःखदायी लगता है।” (इब्रा. 12:11) लेकिन अगर हमें यहोवा से प्यार है तो हम कभी-भी उसकी सलाह नहीं ठुकराएँगे, या जब हमें ऐसी सलाह दी जाती है जो हमें पसंद न हो तब भी हम नाराज़गी नहीं पालेंगे। इसके बजाय हम उसकी सलाह सुनेंगे और अपने अंदर ज़रूरी बदलाव करेंगे। हाँ कुछ लोगों के लिए यह एक चुनौती हो सकता है। ऐसे में यहोवा के लिए प्यार उनकी मदद करेगा।

14 भविष्यवक्ता मलाकी के दिनों में, बहुत-से यहूदियों ने यहोवा की नहीं सुनी। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वे जो बलिदान चढ़ा रहे हैं उनसे यहोवा खुश नहीं होता। इसलिए यहोवा ने उन्हें कड़ी फटकार लगायी। (मलाकी 1:12, 13 पढ़िए।) असल में, यहोवा ने उन्हें कई बार फटकार लगायी, मगर उन्होंने एक न सुनी। इसलिए उसने उनसे कहा, “मैं तुम को शाप दूँगा, और जो वस्तुएँ मेरी आशीष से तुम्हें मिली हैं, उन पर मेरा शाप पड़ेगा।” (मला. 2:1, 2) इससे एक बात तो साफ है कि अगर हम लगातार या जान-बूझकर यहोवा की प्यार-भरी सलाह नज़रअंदाज़ करेंगे, तो हम उसकी दोस्ती खो बैठेंगे।

दुनिया के तौर-तरीके अपनाने के बजाय यहोवा की सलाह मानिए (पैराग्राफ 15 देखिए)

15. हमें किस तरह का रवैया नहीं अपनाना चाहिए?

15 घमंड से भरी, मतलबी दुनिया में अनुशासन या सलाह की बात करना आसान नहीं है। कोई भी अनुशासन कबूल  नहीं करना चाहता। और जो सुनते भी हैं वह इसलिए क्योंकि उनके पास और कोई चारा नहीं होता। हमें उनकी तरह नहीं होना चाहिए। बाइबल कहती है, “इस दुनिया की व्यवस्था के मुताबिक खुद को ढालना बंद करो।” इसके बजाय, हमें यह समझना चाहिए कि यहोवा हमसे क्या उम्मीद करता है और क्या करने से वह खुश होता है। (रोमि. 12:2) वह अपने संगठन के ज़रिए हमें सही समय पर सलाह देता है। जैसे, हमें बार-बार याद दिलाया जाता है कि विपरीत लिंग के व्यक्‍ति के साथ कैसे पेश आना चाहिए, कैसे दोस्त चुनने चाहिए और फुरसत का वक्‍त कैसे बिताना चाहिए। जब हम यहोवा से मिलनेवाली हिदायतें खुशी-खुशी मानते हैं और उसे खुश करने के लिए ज़रूरी बदलाव करते हैं, तो हम दिखाते हैं कि हम उसकी सलाह की कदर करते हैं और उससे सच्चा प्यार करते हैं।—यूह. 14:31; रोमि. 6:17.

मदद और हिफाज़त के लिए यहोवा पर भरोसा कीजिए

16, 17. (क) कोई भी फैसला लेने से पहले यह जानना क्यों ज़रूरी है कि उस बारे में यहोवा क्या सोचता है? (ख) इसराएलियों ने यहोवा पर भरोसा करने के बजाय, क्या किया?

16 छोटे बच्चों को अपने मम्मी-पापा पर पूरा भरोसा होता है कि वे उनकी मदद और हिफाज़त करेंगे। यहाँ तक कि बड़े लोग भी अपने माता-पिता से सलाह लेते हैं। हालाँकि उन्हें लगता है कि वे अपने फैसले खुद ले सकते हैं, लेकिन वे यह भी जानते हैं कि उनके माता-पिता उन्हें ज़्यादा अच्छी सलाह दे सकते हैं। उसी तरह, हमारा पिता यहोवा हमें अपने फैसले खुद लेने की छूट देता है। लेकिन हम यहोवा से प्यार करते हैं और हमें उस पर पूरा भरोसा है, इसलिए हम हमेशा कोई भी फैसला लेने से पहले उससे मदद माँगते हैं। साथ ही, यह जानने की पूरी कोशिश करते हैं कि किसी मामले के बारे में यहोवा क्या सोचता है। अगर हम यहोवा पर भरोसा रखें तो सही काम करने के लिए वह हमें अपनी पवित्र शक्‍ति देगा।—फिलि. 2:13.

17 शमूएल के दिनों में इसराएली एक युद्ध में पलिश्तियों से हार गए। इसराएलियों को यहोवा से पूछना चाहिए था कि अब वे क्या करें। मगर नहीं, उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय उन्होंने तय किया, “आओ, हम यहोवा की वाचा का सन्दूक शीलो से माँग ले आएँ कि वह हमारे बीच में आकर हमें शत्रुओं के हाथ से बचाए।” (1 शमू. 4:2-4) इसका अंजाम क्या हुआ? “उस दिन महा संहार हुआ जिसमें इस्राएल के तीस हज़ार पैदल-सैनिक मार डाले गए। साथ ही परमेश्वर का सन्दूक भी छीन लिया गया।” (1 शमू. 4:10, 11, अ न्यू हिंदी ट्रांस्लेशन) इसराएलियों ने सोचा होगा कि सिर्फ संदूक साथ ले जाना काफी है। इसी से यहोवा उनकी मदद और हिफाज़त करेगा। मगर असल में उन्होंने यहोवा से मदद नहीं माँगी और न यह जानने की कोशिश की कि यहोवा इस बारे में क्या सोचता है। इसके बजाय, उन्होंने वह किया जो उन्हें सही लगा। इसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी!—नीतिवचन 14:12 पढ़िए।

18. यहोवा पर भरोसा रखने के बारे में बाइबल क्या सिखाती है?

18 एक भजनहार यहोवा से बहुत प्यार करता था, उसे यहोवा पर पूरा भरोसा था। उसने लिखा, “परमेश्वर पर आशा लगाए रह; क्योंकि मैं उसके दर्शन से उद्धार पाकर फिर उसका धन्यवाद करूँगा। हे मेरे परमेश्वर; मेरा प्राण मेरे भीतर गिरा जाता है, इसलिये मैं . . . तुझे स्मरण करता हूँ।” (भज. 42:5, 6) क्या आप भी यहोवा के बारे में ऐसा ही महसूस करते हैं? क्या आप उसके करीब महसूस करते हैं और उस पर भरोसा करते हैं? अगर हाँ, तो आप यहोवा पर और भी ज़्यादा भरोसा करना सीख सकते हैं। बाइबल कहती है, “तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन्‌ सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना। उसी को स्मरण करके सब काम करना, तब वह तेरे लिये सीधा मार्ग निकालेगा।”—नीति. 3:5, 6.

19. आप यहोवा को यह कैसे जताएँगे कि आप उससे प्यार करते हैं?

19 जैसा कि हमने देखा, पहले यहोवा ने हमसे प्यार किया। इस तरह उसने हमें उससे प्यार करना सिखाया। आइए हम हमेशा यह सोचते रहें कि यहोवा ने हमारे लिए कितना कुछ किया है और वह हमसे कितना प्यार करता है। आइए हम उसे जताएँ कि हम उससे अपने पूरे दिल, पूरी जान, पूरे दिमाग और पूरी ताकत से प्यार करते हैं।—मर. 12:30.