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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  जुलाई 2015

‘विपत्ति के दिनों’ में यहोवा की सेवा करना

‘विपत्ति के दिनों’ में यहोवा की सेवा करना

करीब 75 साल के आनंद * ने दुखी मन से कहा, ‘मेरी सेहत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है।’ क्या आप भी कुछ ऐसा ही महसूस करते हैं? अगर आपकी उम्र ढलने लगी है, सेहत खराब हो रही है और आप कमज़ोर होने लगे हैं, तो आप शायद सभोपदेशक अध्याय 12 में कही बात अच्छे से समझेंगे। उसी अध्याय की आयत 1 में, ढलती उम्र के दिनों को “विपत्ति के दिन” कहा गया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अब आपकी ज़िंदगी दुखों में कटेगी। आप ढलती उम्र में भी संतोष-भरी ज़िंदगी जी सकते हैं और खुशी-से यहोवा की सेवा कर सकते हैं।

विश्वास मज़बूत बनाए रखिए

हमारे प्यारे बुज़ुर्ग भाई-बहनो, आज़माइशों का सामना करनेवाले आप अकेले नहीं हैं। आपकी तरह ही, बीते ज़माने के यहोवा के बुज़ुर्ग सेवकों ने भी चुनौतियों का सामना किया था। कुछ उदाहरणों पर गौर कीजिए। उम्र ढलने पर इसहाक, याकूब और अहिय्याह की आँखों की रौशनी चली गयी थी। (उत्प. 27:1; 48:10; 1 राजा 14:4) राजा दाविद का शरीर “गर्म न होता था।” (1 राजा 1:1) अमीर बर्जिल्लै बुज़ुर्ग होने की वजह से अब न तो खाने का स्वाद ले सकता था और न संगीत का मज़ा ले सकता था। (2 शमू. 19:32-35) अब्राहम और नाओमी दोनों ने अपने जीवन-साथी को खोने का गम सहा।—उत्प. 23:1, 2; रूत 1:3, 12.

यहोवा के वफादार बने रहने और खुशी बनाए रखने में किस बात ने उनकी मदद की? परमेश्वर के वादों पर यकीन करने की वजह से अब्राहम बूढ़ा होते हुए भी “अपने विश्वास के ज़रिए शक्‍तिशाली साबित हुआ।” (रोमि. 4:19, 20) हमारा विश्वास भी मज़बूत होना चाहिए। ऐसा विश्वास हमारी उम्र, काबिलीयतों या हमारे हालात पर निर्भर नहीं करता। कुलपिता याकूब पर गौर कीजिए। जब वह कमज़ोर हो गया था, उसकी आँखों की रौशनी चली गयी थी और उसने बिस्तर पकड़ लिया था, तब भी उसने परमेश्वर के वादों पर मज़बूत विश्वास दिखाया। (उत्प. 48:1-4, 10; इब्रा. 11:21) आज, 93 साल की इंद्रानी एक ऐसी बीमारी से जूझ रही है, जिसमें मांस-पेशियाँ कमज़ोर पड़ जाती हैं। फिर भी वह कहती है, ‘हर दिन मुझे एहसास होता है कि यहोवा ने मुझे ढेरों आशीषें दी हैं। ऐसा एक भी दिन नहीं जाता जब मैं फिरदौस के बारे में न सोचूँ। इससे मेरा हौसला बना रहता है।’ सही नज़रिया रखने की क्या ही बढ़िया मिसाल!

हम प्रार्थना करके, परमेश्वर के वचन का गहराई से अध्ययन करके और मसीही सभाओं में हाज़िर होकर अपना विश्वास मज़बूत करते हैं। बुज़ुर्ग भविष्यवक्ता दानिय्येल हर दिन तीन बार प्रार्थना करता था और परमेश्वर के वचन का अध्ययन करता था। (दानि. 6:10; 9:2) हन्ना नाम की बुज़ुर्ग विधवा “मंदिर से कभी गैर-हाज़िर नहीं रहती थी।” (लूका 2:36, 37) उसी तरह, जब आप हर मुमकिन हालात में सभाओं में हाज़िर होते हैं और उनमें हिस्सा लेने की पूरी कोशिश करते हैं, तो आप तरो-ताज़ा महसूस करेंगे। साथ ही, इससे हाज़िर दूसरे लोग भी तरो-ताज़ा महसूस करेंगे। और यकीन मानिए, जब आप उतना नहीं कर पाते जितना आप चाहते हैं, तो भी यहोवा आपकी प्रार्थनाओं से खुश होता है।—नीति. 15:8.

एक-दूसरे का हौसला बढ़ाइए

आपमें से बहुत-से वफादार भाई-बहन सोचते हैं, ‘काश मेरी आँखें ठीक हो जाएँ, ताकि मैं पढ़ सकूँ या काश मुझमें इतना दमखम हो कि मैं सभाओं में जा सकूँ।’ लेकिन ऐसा करना आपके लिए मुश्किल होता जा रहा है, शायद नामुमकिन भी। तो आप क्या कर सकते हैं? आपके पास जो है उसका अच्छा इस्तेमाल कीजिए। बहुत-से ऐसे भाई-बहन हैं जो सभाओं में नहीं जा पाते इसलिए वे टेलिफोन पर सभाओं के कार्यक्रम सुनते हैं। अमृता नाम की बहन करीब 79 साल की हैं। उनकी नज़र कमज़ोर होने के बावजूद, वे सभाओं की तैयारी करती हैं। कैसे? उनकी मंडली का एक भाई कंप्यूटर से काफी बड़े अक्षरों वाला प्रिंट निकालकर उन्हें देता है और उससे वे तैयारी करती हैं।

हो सकता है आपके पास वह हो जो दूसरों के पास नहीं है, यानी समय। तो क्यों न आप यह समय बाइबल और बाइबल पर आधारित साहित्य और भाषणों की रिकॉर्डिंग सुनने और ऑडियो ड्रामा सुनने में लगाएँ? आप चाहें तो मंडली के भाई-बहनों को फोन कर सकते हैं और उनसे बाइबल से हिम्मत बँधानेवाली बातें कह सकते हैं और “एक-दूसरे का हौसला बढ़ा” सकते हैं।—रोमि. 1:11, 12.

परमेश्वर की सेवा में जोश बनाए रखिए

वचन का प्रचार कीजिए

करीब 85 साल की विमला अपना दुख ज़ाहिर करते हुए कहती  हैं, “आप पहले जितने जोश से सेवा करते थे, उतने जोश से जब आप नहीं कर पाते तो इससे बहुत दुख होता है।” तो फिर बुज़ुर्ग भाई-बहन कैसे अपनी खुशी बनाए रख सकते हैं? 75 साल के भाई प्रेम कहते हैं, “अपने हालात के बारे में सही नज़रिया रखिए। अब आप जो नहीं कर सकते, उस बारे में लगातार सोचने के बजाय, वे काम करने से खुशी पाइए जो आप कर सकते हैं।”

क्या आप गवाही देने के ऐसे तरीके सोच सकते हैं जिनके ज़रिए आज भी आप खुशखबरी सुना सकते हैं? करीब 85 साल की बहन हेमा पर गौर कीजिए। वे पहले की तरह अब घर-घर जाकर प्रचार नहीं कर पातीं। मगर उन्होंने इस उम्र में कंप्यूटर इस्तेमाल करना सीखा, ताकि वे खत लिख सकें। वहीं कुछ बुज़ुर्ग भाई-बहन ऐसे हैं जो पार्क में बेंच पर बैठे-बैठे या बस स्टैंड पर लोगों को गवाही देते हैं। आप अगर फिलहाल किसी वृद्धाश्रम या नर्सिंग-होम में रहते हैं तो क्या आप वहाँ अपना “प्रचार का इलाका” बना सकते हैं? यानी क्या आप वहाँ के डॉक्टरों, नर्सों और वहाँ रह रहे दूसरे लोगों को गवाही दे सकते हैं?

मेहमान-नवाज़ी दिखाते रहिए

जब राजा दाविद की उम्र ढलने लगी थी, तो भी उसने खुशी-खुशी सच्चे परमेश्वर की उपासना को बढ़ावा दिया। उसने मंदिर के निर्माण के लिए दान दिया और उससे जुड़े ज़रूरी इंतज़ाम किए। (1 इति. 28:11–29:5) उसी तरह आप भी पूरी दुनिया में हो रहे राज के काम में जोश से हिस्सा ले सकते हैं। आपकी मंडली में जो पायनियर या जोशीले प्रचारक सेवा कर रहे हैं, उनका आप हौसला बढ़ा सकते हैं। उन्हें कोई छोटा-सा तोहफा दे सकते हैं या उन्हें चाय-नाश्ते पर बुला सकते हैं। आप जवानों, परिवारवालों, पूरे समय के सेवकों, बीमारी से जूझ रहे भाई-बहनों और जिन पर भारी ज़िम्मेदारी है उन सबके लिए प्रार्थना कर सकते हैं।

आप और आपने अब तक जो सेवा की है वह बहुत अनमोल है! प्यारे बुज़ुर्ग भाई-बहनो, स्वर्ग में रहनेवाला हमारा पिता आपको कभी नहीं त्यागेगा। (भज. 71:9) यहोवा आपसे बहुत प्यार करता है, उसकी नज़र में आप किसी खज़ाने से कम नहीं! जल्द ही, ऐसा वक्‍त आनेवाला है जब हम सबकी उम्र तो बढ़ेगी, मगर हमें विपत्ति के दिन नहीं देखने पड़ेंगे। इसके बजाय हम पूरी तरह सेहतमंद होंगे, हममें खूब दमखम होगा और हम अपने प्यारे परमेश्वर यहोवा की हमेशा-हमेशा सेवा करते रहेंगे!

^ पैरा. 2 कुछ नाम बदल दिए गए हैं।