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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  दिसंबर 2014

“सुनो और इसके मायने समझो”

“सुनो और इसके मायने समझो”

“तुम सब मेरी बात ध्यान से सुनो और इसके मायने समझो।”—मर. 7:14.

1, 2. कई लोग क्यों यीशु की बातों के मायने नहीं समझ पाए?

एक व्यक्‍ति जब हमसे बात करता है, तो हम उसकी आवाज़ सुन सकते हैं, यहाँ तक कि उसके बात करने का लहज़ा भी पहचान सकते हैं। लेकिन अगर हम उसकी बात समझने की कोशिश ही न करें, तो उसकी बात सुनने या लहज़ा पहचानने का क्या फायदा? (1 कुरिं. 14:9) यीशु के ज़माने में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। जब यीशु लोगों से बात कर रहा था, तब हज़ारों लोग उसकी बात सुन रहे थे। और यीशु तो उनकी अपनी भाषा में ही बात कर रहा था। मगर फिर भी, उनमें से कई ऐसे थे, जिन्होंने उसकी बात को ध्यान से नहीं सुना और उसके मायने नहीं समझे। इसलिए यीशु ने लोगों से कहा: “तुम सब मेरी बात ध्यान से सुनो और इसके मायने समझो।”—मर. 7:14.

2 आखिर क्यों कई लोग यीशु की बातों के मायने नहीं समझ पाए? क्योंकि उन बातों के बारे में कुछ लोगों ने पहले से ही राय कायम की हुई थी और कुछ लोग गलत इरादे से वहाँ आए थे। यीशु ने ऐसे लोगों के बारे में कहा: “तुम अपनी परंपरा को बनाए रखने के लिए, कितनी चतुराई से परमेश्वर की आज्ञा को ताक पर रख देते हो।” (मर. 7:9) उन्होंने यीशु के शब्दों के मायने समझने की कभी कोशिश ही नहीं की। वे न तो अपने तौर-तरीके बदलना चाहते थे और न ही अपनी सोच। वे एक कान से यीशु की बातें सुन रहे थे, मगर दूसरे कान से उसे निकाल रहे थे। उसकी कोई भी बात उनके दिल तक नहीं पहुँच रही थी। (मत्ती 13:13-15  पढ़िए।) आज हम कैसे पक्का कर सकते हैं कि यीशु की बातें हमारे दिल तक पहुँचें, ताकि हम उसकी शिक्षाओं से फायदा पा सकें?

हम यीशु की शिक्षाओं से कैसे फायदा पा सकते हैं

3. यीशु के नम्र चेले क्यों उसकी कही बातों के मायने समझ पाए?

3 हमें यीशु के नम्र चेलों की मिसाल पर चलना चाहिए। यीशु ने उनसे कहा था: “सुखी हो तुम क्योंकि तुम्हारी आँखें देखती हैं और तुम्हारे कान सुनते हैं।” (मत्ती 13:16) क्या वजह है कि वे यीशु की बातों के मायने समझ पाए, जबकि दूसरे नहीं समझ पाए? क्योंकि उन्होंने तीन कदम उठाए थे। पहला, वे सवाल पूछने और यह जानने के लिए तैयार रहते थे कि यीशु के कहने का असल में क्या मतलब है। (मत्ती 13:36; मर. 7:17) दूसरा, जो ज्ञान उनके पास पहले से था, उसमें वे उन नयी शिक्षाओं को भी शामिल करने के लिए तैयार रहते थे, जो यीशु उन्हें सिखा रहा था। (मत्ती 13:11, 12 पढ़िए।) और तीसरा, जो बातें उन्होंने सुनीं और समझी थीं, उन्हें वे न सिर्फ अपनी ज़िंदगी में लागू करने, बल्कि दूसरों को सिखाने के लिए भी तैयार रहते थे।—मत्ती 13:51, 52.

4. यीशु की मिसालें समझने के लिए हमें कौन-से तीन कदम उठाने की ज़रूरत है?

4 यीशु की मिसालों को समझने के लिए, हमें भी उसके चेलों की तरह तीन कदम उठाने की ज़रूरत है। पहला, हमें यीशु की बातों का अध्ययन करने, उन पर खोजबीन करने, मनन करने और सही सवाल पूछने के लिए वक्‍त निकालने की ज़रूरत है। जैसे, यीशु की दी मिसाल का क्या मतलब है? उसने यह मिसाल क्यों दी? और हम इस मिसाल से क्या सीख सकते हैं? ऐसा करके हम ज्ञान लेते हैं। (नीति. 2:4, 5) दूसरा, हमें यह देखने की ज़रूरत है कि अध्ययन और खोजबीन करके जो ज्ञान हम ले रहे हैं, उसका उन बातों के साथ क्या ताल्लुक है, जो हम पहले से ही जानते हैं और इस नए ज्ञान से हमें कैसे फायदा हो सकता है। ऐसा करके हम समझ हासिल करते हैं। (नीति. 2:2, 3) तीसरा, जो बातें हमने सीखी और समझी हैं, उनका हमें खुद को और दूसरों को फायदा पहुँचाने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसा करके हम बुद्धि से काम लेते हैं।—नीति. 2:6, 7.

5. ज्ञान, समझ और बुद्धि के बीच फर्क बताने के लिए एक मिसाल दीजिए।

5 ज्ञान, समझ और बुद्धि के बीच क्या फर्क है? इसे समझने के लिए एक मिसाल पर गौर कीजिए: सोचिए आप बीच सड़क पर खड़े हैं और एक बस तेज़ी से आपकी तरफ आ रही है। पहले, आप देखते हैं कि सामने से एक बस आ रही है। यह ज्ञान है। फिर, आपको एहसास होता है कि अगर आप वहीं खड़े रहे, तो आपकी जान जा सकती है। यह समझ है। इसलिए आप फौरन रास्ते से हट जाते हैं। यह बुद्धि है। यही वजह है कि बाइबल हमें ‘खरी बुद्धि की रक्षा करने’ का बढ़ावा देती है, क्योंकि इससे हमारी जान बच सकती है!—नीति. 3:21, 22; 1 तीमु. 4:16.

6. यीशु की सात मिसालों पर गौर करते वक्‍त, हम किन चार सवालों पर चर्चा करेंगे? (बक्स देखिए।)

6 इस और अगले लेख में, हम यीशु के ज़रिए इस्तेमाल की गयी सात मिसालों पर गौर करेंगे। ऐसा करते वक्‍त, हम इन सवालों पर चर्चा करेंगे: इस मिसाल का क्या मतलब है? (इससे हमारा ज्ञान बढ़ेगा।) यीशु ने यह मिसाल क्यों दी? (इससे हमारी समझ बढ़ेगी।) हम इस मिसाल से क्या सीख सकते हैं? (ऐसा करके हम बुद्धि से काम ले रहे होंगे।) और यह मिसाल हमें यहोवा और यीशु के बारे में क्या सिखाती है?

राई का दाना

7. राई के दाने की मिसाल का मतलब क्या है?

7 मत्ती 13:31, 32 पढ़िए। यीशु के ज़रिए दी गयी राई के दाने की मिसाल का क्या मतलब है? राई का दाना, राज की खुशखबरी और मसीही मंडली दोनों को दर्शाता है। जिस तरह राई का दाना “सब बीजों में सबसे छोटा होता है,” उसी तरह ईसवी सन्‌ 33 में जब मसीही मंडली की शुरूआत हुई, तब वह बहुत छोटी थी। लेकिन देखते-ही-देखते, राज की खुशखबरी दूर-दूर तक फैलने लगी और मसीही मंडली इतनी तेज़ी से तरक्की करने लगी कि लोग दाँतों तले उँगली दबाने लगे। (कुलु. 1:23) इस तरक्की का नतीजा क्या हुआ? यीशु ने कहा, “आकाश के पंछी  आकर उसकी डालियों पर बसेरा” करने लगे। “पंछी” नेकदिल लोगों को दर्शाते हैं। जैसे-जैसे मसीही मंडली बढ़ती गयी, नेकदिल लोगों को उसमें आध्यात्मिक भोजन, ताज़गी और पनाह मिलने लगी।—यहेजकेल 17:23 से तुलना कीजिए।

8. यीशु ने राई के दाने की मिसाल क्यों दी?

8 यीशु ने यह मिसाल क्यों दी? यीशु यह बताना चाहता था कि ठीक जैसे राई के दाने में ज़बरदस्त तरीके से बढ़ने की ताकत है, उसी तरह परमेश्वर के राज में भी तरक्की करने, लोगों की हिफाज़त करने और रास्ते में आनेवाली हर रुकावट को पार करने की ज़बरदस्त ताकत है। क्या वाकई ये तीन चीज़ें आज देखी जा सकती हैं? सन्‌ 1914 से परमेश्वर के संगठन के धरती पर मौजूद हिस्से में, यानी मसीही मंडली में, दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की हुई है। (यशा. 60:22) साथ ही, जो इस संगठन का हिस्सा हैं, वे आध्यात्मिक हिफाज़त का लुत्फ उठा रहे हैं। (नीति. 2:7; यशा. 32:1, 2) इतना ही नहीं, संगठन का लगातार तरक्की करना दिखाता है कि दुनिया की कोई भी ताकत उसे आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।—यशा. 54:17.

9. (क) हम राई के दाने की मिसाल से क्या सीख सकते हैं? (ख) यह मिसाल हमें यहोवा और यीशु के बारे में क्या सिखाती है?

9 हम राई के दाने की मिसाल से क्या सीख सकते हैं? हम शायद ऐसे इलाके में रहते हों, जहाँ बहुत कम साक्षी हैं या जहाँ प्रचार काम में इतनी तरक्की नहीं हो रही है। लेकिन अगर हम यह याद रखें कि परमेश्वर का राज किसी भी रुकावट को पार कर सकता है, तो यह बात हमें प्रचार में लगे रहने में मदद देगी। मिसाल के लिए, 1926 में जब भाई एडविन स्किनर ने भारत में कदम रखा था, तब वहाँ बहुत कम साक्षी थे। शुरू-शुरू में वहाँ राज के काम में इतनी तरक्की नहीं हो रही थी और प्रचार काम भी “बहुत मुश्किल-भरा” था। लेकिन भाई स्किनर ने हार नहीं मानी। वे अपने काम में लगे रहे और उन्होंने देखा कि कैसे परमेश्वर का राज बड़ी-बड़ी रुकावटों को पार कर रहा है। आज भारत में 40,000 से ज़्यादा यहोवा के साक्षी हैं और 2013 में 1,08,000 से ज़्यादा लोग स्मारक में हाज़िर हुए थे। एक और मिसाल पर गौर कीजिए, जो दिखाती है कि परमेश्वर के राज में तरक्की करने की कितनी ज़बरदस्त ताकत है। जिस साल भाई स्किनर ने भारत में कदम रखा था, उस साल ज़ाम्बिया में राज का काम बस शुरू ही हुआ था। आज ज़ाम्बिया में 1,70,000 से ज़्यादा यहोवा के साक्षी हैं और 2013 में 7,63,915 लोग स्मारक में हाज़िर हुए थे। इसका मतलब है कि ज़ाम्बिया में हर 18 लोगों में से 1 व्यक्‍ति स्मारक में हाज़िर हुआ था। यह क्या ही कमाल की तरक्की है!

 खमीर

10. खमीर की मिसाल का क्या मतलब है?

10 मत्ती 13:33 पढ़िए। खमीर की मिसाल का क्या मतलब है? यह मिसाल राज की खुशखबरी को और इस बात को दर्शाती है कि कैसे इससे लोगों की ज़िंदगियाँ बदल रही हैं। “सारा आटा” सभी राष्ट्रों को दर्शाता है और खमीरा होने की प्रक्रिया, खुशखबरी फैलाने के काम को दर्शाती है। राई के दाने की बढ़ोतरी साफ दिखायी देती है, जबकि आटे में खमीर का फैलना शुरू-शुरू में नज़र नहीं आता। कुछ वक्‍त बाद जब आटा फूलने लगता है, तब जाकर हमें पता चलता है कि आटा खमीरा हो गया है।

11. यीशु ने खमीर की मिसाल क्यों दी?

11 यीशु ने यह मिसाल क्यों दी? खमीर की मिसाल देकर यीशु यह बताना चाहता था कि राज की खुशखबरी “दुनिया के सबसे दूर के इलाकों” तक पहुँचने और लोगों की शख्सियत को बदलने की ज़बरदस्त ताकत रखती है। (प्रेषि. 1:8) हो सकता है हमें शुरू-शुरू में पता न चले कि खुशखबरी किस हद तक फैल रही है या इसका लोगों पर किस तरह असर हो रहा है, लेकिन सच तो यह है कि ऐसा हो ज़रूर रहा है। आज दुनिया के कोने-कोने में लोग राज की खुशखबरी कबूल कर रहे हैं और इस खुशखबरी की मदद से अपनी शख्सियत में बदलाव ला रहे हैं।—रोमि. 12:2; इफि. 4:22, 23.

12, 13. कुछ उदाहरण देकर समझाइए कि खमीर की तरह, राज की खुशखबरी कैसे दूर-दूर के इलाकों तक पहुँची है।

12 प्रचार काम के नतीजे अकसर गवाही देने के सालों बाद नज़र आते हैं। फ्रांज़ और मार्गिट के अनुभव पर गौर कीजिए, जो आज यहोवा के साक्षियों के एक शाखा दफ्तर में सेवा कर रहे हैं। सन्‌ 1982 में जब वे ब्राज़ील के शाखा दफ्तर में सेवा कर रहे थे, तब उन्होंने एक छोटे-से कसबे में गवाही दी थी। वहाँ उन्होंने कई बाइबल अध्ययन शुरू किए थे। उनमें से एक अध्ययन वे एक माँ और उसके चार बच्चों के साथ चलाते थे। सबसे बड़ा बेटा उस वक्‍त सिर्फ 12 साल का था। शर्मीले स्वभाव का होने की वजह से अकसर वह अध्ययन शुरू होने से पहले छिपने की कोशिश करता था। कुछ समय बाद, फ्रांज़ और मार्गिट को दूसरी जगह सेवा करने के लिए भेजा गया, जिस वजह से वे यह अध्ययन जारी नहीं रख पाए। लेकिन 25 साल बाद, जब वे दोबारा वहाँ के लोगों से मिलने गए, तो उन्होंने क्या पाया? उन्हें यह देखकर बहुत हैरानी हुई कि अब वहाँ 69 प्रचारकों से बनी एक मंडली थी, जिनमें से 13 पायनियर थे! इस मंडली का अब अपना एक नया राज-घर भी था। और उस शर्मीले लड़के के बारे में क्या? अब वह उस मंडली में प्राचीनों के निकाय के संयोजक के तौर पर सेवा कर रहा है! यीशु की मिसाल में बताए खमीर की तरह, राज की खुशखबरी इस दूर के इलाके में भी पहुँच गयी थी और यहाँ के कई लोगों की ज़िंदगियाँ बदल चुकी थी।

13 हमने देखा था कि खमीर की तरह, राज की खुशखबरी लोगों पर किस तरह असर कर रही है यह शुरू-शुरू में दिखायी नहीं देता। यह बात खासकर ऐसे देशों में साफ देखी जा सकती है, जहाँ हमारे भाई-बहन खुलेआम प्रचार नहीं कर सकते। ऐसे देशों में खुशखबरी कहाँ तक पहुँची है यह जानना मुश्किल है। लेकिन जब हमें पता चलता है कि वहाँ कितनी तरक्की हुई है, तो हम हैरान रह जाते हैं। क्यूबा की ही मिसाल लीजिए। इस द्वीप पर राज की खुशखबरी 1910 में पहुँची थी और 1913 में भाई रसल ने उस द्वीप का दौरा किया था। शुरू-शुरू में वहाँ इतनी तरक्की नहीं हुई थी। लेकिन आज के आँकड़े क्या बताते हैं? आज क्यूबा में 96,000 से भी ज़्यादा प्रचारक खुशखबरी का प्रचार कर रहे हैं और 2013 में 2,29,726 लोग स्मारक में हाज़िर हुए थे। इसका मतलब है वहाँ रहनेवाले हर 48 लोगों में से 1 व्यक्‍ति स्मारक में हाज़िर हुआ था। जिन देशों में हमारे काम पर कोई पाबंदी नहीं है, वहाँ पर भी खुशखबरी ऐसे-ऐसे इलाकों में पहुँच रही है जहाँ प्रचारकों ने कभी सोचा भी नहीं था। *सभो. 8:7; 11:5.

14, 15. (क) हम खमीर की मिसाल से क्या सीख सकते हैं? (ख) यह मिसाल हमें यहोवा और यीशु के बारे में क्या सिखाती है?

14 हम खमीर की मिसाल से क्या सीख सकते हैं? जब हम यीशु की इस मिसाल पर मनन करते हैं, तो हम सीखते  हैं कि हमें इस बारे में हद-से-ज़्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए कि राज की खुशखबरी उन लाखों लोगों तक कैसे पहुँचेगी, जिन्हें इसे सुनने का कभी मौका ही नहीं मिला। हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि सब कुछ यहोवा के काबू में है। लेकिन हमारा काम क्या है? परमेश्वर का वचन कहता है: “भोर को अपना बीज बो, और सांझ को भी अपना हाथ न रोक; क्योंकि तू नहीं जानता कि कौन सुफल होगा, यह या वह, वा दोनों के दोनों अच्छे निकलेंगे।” (सभो. 11:6) लेकिन इसके साथ-साथ, हमें यहोवा से प्रार्थना करना कभी नहीं भूलना चाहिए कि वह प्रचार काम पर आशीष दे, खासकर उन देशों में हो रहे काम पर, जहाँ पाबंदी लगी है।—इफि. 6:18-20.

15 इसके अलावा, जब हमें अपने प्रचार काम के नतीजे फौरन दिखायी नहीं देते, तो हमें निराश नहीं होना चाहिए। हमें कभी-भी ‘छोटी बातों के दिन’ को कम नहीं आँकना चाहिए। (जक. 4:10) भले ही हमें अपने काम के नतीजे शुरू-शुरू में दिखायी न दें, लेकिन हो सकता है आगे चलकर इसके इतने बढ़िया नतीजे निकलें कि हमने शायद कभी सोचा भी न हो!—भज. 40:5; जक. 4:7.

व्यापारी और छिपा हुआ खज़ाना

16. व्यापारी की मिसाल और छिपे हुए खज़ाने की मिसाल का क्या मतलब है?

16 मत्ती 13:44-46 पढ़िए। व्यापारी की मिसाल और छिपे हुए खज़ाने की मिसाल का क्या मतलब है? यीशु के ज़माने में व्यापारी बढ़िया-से-बढ़िया मोती पाने की तलाश में हिंद महासागर तक का सफर तय किया करते थे। मिसाल में बताया “बेशकीमती मोती” राज की अनमोल सच्चाई को दर्शाता है। और व्यापारी उन नेकदिल लोगों को दर्शाता है, जो अपनी आध्यात्मिक भूख मिटाने के लिए बड़े-बड़े त्याग करने के लिए तैयार रहते हैं। जैसे ही इस व्यापारी को बेशकीमती मोती मिला, वह उसे खरीदने के लिए “फौरन” अपना सब कुछ बेचने को तैयार हो गया, क्योंकि वह उस मोती की अहमियत जानता था। यीशु ने एक ऐसे आदमी की भी मिसाल दी, जिसे काम करते वक्‍त ज़मीन में ‘छिपा’ हुआ खज़ाना मिला। यह आदमी व्यापारी की तरह, खज़ाने की तलाश में नहीं घूम रहा था। लेकिन जैसे ही उसे यह खज़ाना मिला, तो वह भी उसे हासिल करने के लिए अपना “सबकुछ” बेचने को तैयार हो गया, क्योंकि व्यापारी की तरह वह भी उस खज़ाने की अहमियत जानता था।

17. यीशु ने व्यापारी और छिपे हुए खज़ाने की मिसालें क्यों दीं?

17 यीशु ने ये दो मिसालें क्यों दीं? यीशु यह बताना चाह रहा था कि लोगों को सच्चाई अलग-अलग तरीकों से मिल सकती है। कुछ लोग सच्चाई की तलाश में होते हैं और इसे पाने के लिए बड़े-बड़े त्याग करते हैं। जबकि कुछ लोगों को सच्चाई बगैर तलाश किए ही मिल जाती है, जैसे कि तब जब कोई उन्हें प्रचार करता है। यीशु की दी दोनों मिसालों में एक बात आम है। दोनों आदमियों को खज़ाना चाहे जैसे भी मिला हो, दोनों ने उसकी अहमियत पहचानी और वे उसे हासिल करने के लिए बड़े-बड़े त्याग करने को तैयार हो गए।

18. (क) हम व्यापारी और छिपे हुए खज़ाने की मिसालों से क्या सीख सकते हैं? (ख) ये मिसालें हमें यहोवा और यीशु के बारे में क्या सिखाती हैं?

18 हम इन दो मिसालों से क्या सीख सकते हैं? (मत्ती 6:19-21) खुद से पूछिए: ‘क्या सच्चाई की तरफ मेरा रवैया भी इन दोनों आदमियों की तरह है? क्या मैं भी सच्चाई की अहमियत जानता हूँ और इसे अनमोल समझता हूँ? क्या मैं सच्चाई को अपनाने के लिए त्याग करने को तैयार हूँ? या क्या मैं रोज़मर्रा की चिंताओं में और दूसरी चीज़ों में इतना उलझने लगा हूँ कि सच्चाई से मेरा ध्यान भटकने लगा है?’ (मत्ती 6:22-24, 33; लूका 5:27, 28; फिलि. 3:8) अगर सच्चाई का अनमोल खज़ाना पाने की हमें वाकई खुशी है, तो इसे अपनी ज़िंदगी में पहली जगह देने के लिए हम किसी भी हद तक त्याग करने को तैयार रहेंगे।

19. हम अगले लेख में किस बात पर गौर करेंगे?

19 आइए हम दिखाएँ कि हमने राज से जुड़ी इन मिसालों को ध्यान से सुना है और वाकई इनके मायने समझे हैं। लेकिन याद रखिए कि हमारे लिए सिर्फ इनके मायने समझना काफी नहीं। इन मिसालों से हम जो सबक सीखते हैं, उन पर हमें अमल भी करना चाहिए। अगले लेख में हम और तीन मिसालों पर गौर करेंगे और देखेंगे कि हम उनसे क्या सबक सीख सकते हैं।

^ पैरा. 13 इस तरह के अनुभव, अर्जण्टिना (2001 इयरबुक, पेज 186 पर दिया बक्स); पूर्वी जर्मनी (1999 इयरबुक, पेज 83); पपुआ न्यू गिनी (2005 इयरबुक, पेज 63); और रॉबिनसन क्रूसो द्वीप (प्रहरीदुर्ग, 15 जून, 2000, पेज 9) जैसे देशों में भी हुए हैं।