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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  नवंबर 2014

‘वे लोग जिनका परमेश्वर यहोवा है’

‘वे लोग जिनका परमेश्वर यहोवा है’

“जिनका परमेश्वर यहोवा है, वे लोग अति प्रसन्न हैं।”—भज. 144:15, हिंदी ईज़ी-टू-रीड वर्शन।

1. परमेश्वर किन्हें अपने उपासकों के तौर पर कबूल करता है इस बारे में कई लोग क्या मानते हैं?

आज कई लोग इस बात को कबूल करते हैं कि दुनिया के जाने-माने धर्म लोगों की मदद करने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं करते। वे मानते हैं कि ये धर्म दरअसल अपनी बातों और अपने कामों से परमेश्वर को बदनाम करते हैं, इसलिए परमेश्वर इन धर्मों को कबूल कर ही नहीं सकता। लेकिन वे यह भी मानते हैं कि इन धर्मों में कुछ अच्छे लोग भी हैं, जिन्हें परमेश्वर देखता है और अपने उपासकों के तौर पर कबूल करता है, फिर चाहे वे किसी भी धर्म को मानते हों। उनका मानना है कि ऐसे लोगों को झूठे धर्मों को छोड़कर अलग ठहराए गए लोगों के तौर पर परमेश्वर की उपासना करने की कोई ज़रूरत नहीं। क्या यह वाकई सच है? क्या परमेश्वर वाकई सभी धर्म के लोगों को कबूल करता है? या क्या वह चाहता है कि उसकी भक्‍ति करनेवाले, झूठे धर्मों से दूर रहें और अलग ठहराए गए लोगों के तौर पर उसकी उपासना करें? जवाब जानने के लिए आइए बाइबल में दिए यहोवा के सच्चे उपासकों के इतिहास पर गौर करें।

 परमेश्वर का अपने लोगों के साथ करार

2. वक्‍त के चलते कौन यहोवा के अलग से ठहराए गए लोग बने, और इस बात की क्या निशानी थी कि सिर्फ उन्हीं का यहोवा के साथ एक खास रिश्ता था? (लेख की शुरूआत में दी तसवीर देखिए।)

2 आज से करीब 4,000 साल पहले से ही, धरती पर यहोवा के अलग से ठहराए गए लोग थे। बात उस वक्‍त की है, जब अब्राहम एक बहुत बड़े परिवार का मुखिया था, जिसमें सैकड़ों सेवक थे। (उत्प. 14:14) अब्राहम “उन सबका पिता” कहलाता था, जो “विश्वास दिखाते” थे और कनान में उसे ‘बड़े प्रधान’ के नाते इज़्ज़त दी जाती थी। (रोमि. 4:11; उत्प. 21:22; 23:6) उस वक्‍त, यहोवा ने अब्राहम और उसके वंशजों के साथ एक करार किया। (उत्प. 17:1, 2, 19) परमेश्वर ने अब्राहम से कहा: “मेरे साथ बान्धी हुई वाचा, जो तुझे और तेरे पश्‍चात्‌ तेरे वंश को पालनी पड़ेगी, सो यह है, कि तुम में से एक एक पुरुष का ख़तना हो। . . . जो वाचा मेरे और तुम्हारे बीच में है, उसका यही चिन्ह होगा।” (उत्प. 17:10, 11) इसलिए अब्राहम और उसके घराने के सभी पुरुषों का खतना किया गया। (उत्प. 17:24-27) इस तरह, वक्‍त के चलते अब्राहम और उसके वंशज यहोवा के अलग से ठहराए गए लोग बने। और खतना एक ऐसी निशानी बनी, जिससे यह साफ हो गया कि सिर्फ अब्राहम के वंशज ही वे लोग थे, जिनका यहोवा के साथ एक खास रिश्ता था।

3. अब्राहम के वंशज किस तरह परमेश्वर के अलग से ठहराए गए लोगों के तौर पर बढ़ते गए?

3 अब्राहम के वंशज धीरे-धीरे परमेश्वर के अलग से ठहराए गए लोगों के तौर पर बढ़ते गए। कैसे? अब्राहम के पोते याकूब, या इसराएल, के 12 बेटे थे। (उत्प. 35:10, 23-26) आगे चलकर, इन बेटों से जो वंशज आए वे इसराएल राष्ट्र कहलाए। और ये 12 बेटे, इसराएल राष्ट्र के 12 गोत्रों के कुलपिता बने। (प्रेषि. 7:8) इन 12 बेटों में से एक बेटे, यूसुफ को मिस्र ले जाया गया, जो आगे चलकर फिरौन का खास आदमी बना। जब मिस्र में अकाल पड़ा, तो फिरौन ने यूसुफ को पूरे देश के अनाज के भंडारों का अधिकारी बना दिया। अकाल की वजह से याकूब और उसके खानदान ने मिस्र में पनाह ली। (उत्प. 41:39-41; 42:6) इस तरह, वक्‍त के चलते याकूब के वंशज, बढ़ते गए और वे “लोगों की मंडली” कहलाए।—उत्प. 48:4, एन.डब्ल्यू.; प्रेषितों 7:17 पढ़िए।

यहोवा अपने लोगों को छुड़ाता है

4. शुरू-शुरू में इसराएलियों और मिस्रियों के बीच कैसा रिश्ता था?

4 याकूब के वंशज मिस्र के गोशेन में 200 से भी ज़्यादा सालों तक रहे। (उत्प. 45:9, 10) फिरौन ने खुशी-खुशी इसराएलियों को मिस्र में रहने का न्यौता दिया था, क्योंकि वह यूसुफ को जानता था और उसकी इज़्ज़त करता था। (उत्प. 47:1-6) करीब 100 साल तक इसराएलियों और मिस्रियों के बीच एक शांति-भरा रिश्ता रहा। इसराएली छोटे-छोटे नगरों में रहते थे और मवेशी पालते थे। हालाँकि मिस्रियों को चरवाहों से घिन थी, लेकिन फिरौन की वजह से उन्होंने इसराएलियों को मिस्र में रहने दिया।—उत्प. 46:31-34.

5, 6. (क) मिस्र में परमेश्वर के लोगों के हालात कैसे बदल गए? (ख) मूसा की जान कैसे बच गयी? (ग) यहोवा ने अपने लोगों के लिए क्या किया?

5 मगर कुछ वक्‍त बाद, इसराएलियों के हालात बदल गए। बाइबल कहती है: “मिस्र में एक नया राजा गद्दी पर बैठा जो यूसुफ को नहीं जानता था। और उस ने अपनी प्रजा से कहा, देखो, इस्राएली हम से गिनती और सामर्थ्य में अधिक बढ़ गए हैं।” नतीजा, मिस्रियों ने उन्हें अपना गुलाम बना लिया। उन्होंने इसराएलियों से कोल्हू के बैल की तरह काम करवाया। उन्होंने उनसे ईंटें बनवायीं, खेत जुतवाए और उनसे कड़ी मज़दूरी करवायी। वे इसराएलियों के साथ बहुत ही बेरहमी से पेश आए।—निर्ग. 1:8, 9, 13, 14.

6 इस नए फिरौन ने यह भी हुक्म दिया कि सारे इसराएली लड़कों को पैदा होते ही मार डाला जाए। (निर्ग. 1:15, 16) उस वक्‍त योकेबेद नाम की एक इसराएली स्त्री ने मूसा को जन्म दिया। जब मूसा तीन महीने का था, तब उसकी माँ ने उसे नील नदी के पास सरकंडों के बीच छिपा दिया। थोड़ी देर बाद, फिरौन की बेटी वहाँ आयी और उसने मूसा को देखा। आगे चलकर उसने उसे गोद ले लिया। ताज्जुब की बात है कि उसने मूसा के थोड़े बड़े होने तक उसकी देखभाल करने की ज़िम्मेदारी उसी की माँ, योकेबेद  को दी। आगे चलकर मूसा यहोवा का एक वफादार सेवक बना। (निर्ग. 2:1-10; इब्रा. 11:23-25) यहोवा ने देखा कि उसके लोग मिस्र में बहुत तकलीफें झेल रहे हैं। इसलिए उसने फैसला किया कि वह मूसा के ज़रिए उन्हें मिस्र की गुलामी से छुड़ाएगा। (निर्ग. 2:24, 25; 3:9, 10) इस तरह, यहोवा ने अपने लोगों को ‘छुड़ाया।’—निर्ग. 15:13; व्यवस्थाविवरण 15:15 पढ़िए।

परमेश्वर के चुने हुए लोग एक राष्ट्र बनते हैं

7, 8. यहोवा ने अपने चुने हुए लोगों को एक पवित्र राष्ट्र के तौर पर कैसे संगठित किया?

7 यहोवा ने अब तक इसराएलियों को एक राष्ट्र के तौर पर संगठित नहीं किया था। उसने उन्हें कोई कानून नहीं दिए थे, न ही याजकों का इंतज़ाम किया था। लेकिन यहोवा ने उन्हें अपने लोगों के तौर पर चुन ज़रूर लिया था। गौर कीजिए कि उसने मूसा और हारून से फिरौन को क्या कहने के लिए कहा: ‘इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, कि मेरे लोगों को जाने दे, कि वे जंगल में मेरे लिये पब्र्ब करें।’—निर्ग. 5:1.

8 लेकिन फिरौन ने इसराएलियों को जाने नहीं दिया। इसलिए यहोवा अपने चुने हुए लोगों को छुड़ाने के लिए मिस्र पर दस विपत्तियाँ लाया और बाद में उसने लाल सागर में फिरौन और उसकी सेना का नाश कर दिया। (निर्ग. 15:1-4) इस घटना के लगभग ढाई-तीन महीने बाद, यहोवा ने इसराएलियों के साथ सीनै पहाड़ पर एक करार किया। उसने कहा: “यदि तुम निश्चय मेरी मानोगे, और मेरी वाचा को पालन करोगे, तो सब लोगों में से तुम ही मेरा निज धन ठहरोगे।” इस तरह, यहोवा ने अपने चुने हुए लोगों को एक “पवित्र राष्ट्र” (एन.डब्ल्यू.) के तौर पर संगठित किया।—निर्ग. 19:5, 6.

9, 10. (क) व्यवस्थाविवरण 4:5-8 के मुताबिक, मूसा के कानून ने इसराएलियों को बाकी सभी राष्ट्रों से अलग कैसे ठहराया? (ख) इसराएली किस तरह दिखा सकते थे कि वे यहोवा के “पवित्र लोग” हैं?

9 यहोवा ने इसराएलियों को संगठित करने के लिए और क्या किया? इसराएली जब मिस्र में थे, तब शुरूआती करीब 100 सालों के दौरान, यानी गुलाम बनने से पहले, उनके बीच कुलपिता हुआ करते थे। ये कुलपिता अपने घराने की अगुवाई किया करते थे और उनसे पहले रह चुके यहोवा के वफादार लोगों की तरह, राजाओं, न्यायियों और याजकों के तौर पर सेवा किया करते थे। (उत्प. 8:20; 18:19; अय्यू. 1:4, 5) लेकिन अब सीनै पहाड़ पर, यहोवा ने मूसा के ज़रिए उन्हें कानून दिए, जो उन्हें बाकी सभी राष्ट्रों से अलग ठहराते। (व्यवस्थाविवरण 4:5-8 पढ़िए; भज. 147:19, 20.) मूसा के कानून के तहत, उनमें से एक गोत्र को याजक ठहराया गया। साथ ही, न्याय करने के लिए “वृद्ध लोग” भी ठहराए गए, जिनके पास ज्ञान और बुद्धि थी और जिनकी लोग इज़्ज़त करते थे। (व्यव. 25:7, 8) मूसा के कानून में उपासना और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़े ज़रूरी नियम दिए गए थे, जो इस नए राष्ट्र को मानने थे।

10 इसराएलियों के वादा किए गए देश में कदम रखने से पहले, यहोवा ने उनके आगे अपने नियम दोहराए। मूसा ने उनसे कहा: “आज यहोवा ने तुम्हें अपने लोग चुन लिया और अपना मूल्यवान आश्रय प्रदान करने का वचन भी दिया है। यहोवा ने यह कहा है कि तुम्हें उसके सभी आदेशों का पालन करना चाहिए। यहोवा तुम्हें उन सभी राष्ट्रों से महान बनाएगा जिन्हें उसने बनाया है। वह तुमको प्रशंसा, यश और गौरव देगा और तुम उसके [“पवित्र लोग,” एन.डब्ल्यू.] होगे।”—व्यव. 26:18, 19, हिंदी ईज़ी-टू-रीड वर्शन।

गैर-इसराएली भी परमेश्वर के चुने हुए लोगों के साथ उसकी उपासना कर सकते थे

11-13. (क) कौन यहोवा के चुने हुए लोगों के साथ उसकी उपासना करने लगे? (ख) अगर एक गैर-इसराएली यहोवा की उपासना करना चाहता, तो उसे क्या करने की ज़रूरत थी?

11 हालाँकि अब धरती पर यहोवा का एक चुना हुआ राष्ट्र था, लेकिन उसने दूसरे राष्ट्र के लोगों को अपने चुने हुए लोगों में शामिल होने से मना नहीं किया। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर इसराएलियों को मिस्र से निकाल ले आया, तब उनके साथ गैर-इसराएलियों की “मिली जुली हुई एक भीड़” भी थी, जिसमें मिस्र के लोग भी शामिल थे। (निर्ग. 12:38) हो सकता है मिस्र के इन लोगों में फिरौन के कुछ सेवक भी रहे हों, जिन्होंने सातवीं विपत्ति के समय मूसा की चेतावनी को माना था।—निर्ग. 9:20.

12 यरदन नदी पार करके कनान देश में दाखिल होने से  बस कुछ ही वक्‍त पहले, मूसा ने इसराएलियों को एक आज्ञा दी। उसने कहा कि उन्हें उनके बीच रह रहे गैर-इसराएलियों से, यानी “परदेशियों से प्रेम भाव रखना” है। (व्यव. 10:17-19) परमेश्वर के चुने हुए लोगों को हिदायत दी गयी थी कि अगर एक गैर-इसराएली, मूसा के कानून में दिए बुनियादी नियमों को मानता, तो उन्हें उस इंसान को अपनी बिरादरी में शामिल करना था। (लैव्य. 24:22) कुछ गैर-इसराएली तो यहोवा के उपासक भी बन गए थे। उदाहरण के लिए, रूत नाम की एक मोआबी स्त्री यहोवा की उपासक बन गयी थी। उसने अपनी इसराएली सास, नाओमी से कहा: “तेरे लोग मेरे लोग होंगे, और तेरा परमेश्वर मेरा परमेश्वर होगा।” (रूत 1:16) इन गैर-इसराएलियों को यहूदी धर्म अपनानेवाले कहा जाता था और इनमें से पुरुषों का खतना किया जाता था। (निर्ग. 12:48, 49) इस तरह, गैर-इसराएली भी यहोवा के चुने हुए लोगों की बिरादरी में शामिल होते गए और यहोवा की मंज़ूरी उन पर थी।—गिन. 15:14, 15.

इसराएली अपने बीच रहनेवाले दूसरे राष्ट्रों के लोगों से प्यार करते थे (पैराग्राफ 11-13 देखिए)

13 मंदिर के समर्पण के वक्‍त सुलैमान ने जो प्रार्थना की थी, उससे भी ज़ाहिर होता है कि यहोवा को गैर-इसराएलियों का उसके चुने हुए लोगों के साथ उपासना करना मंज़ूर था। अपनी प्रार्थना में सुलैमान ने कहा था: “परदेशी भी जो तेरी प्रजा इस्राएल का न हो, जब वह तेरे बड़े नाम और बलवन्त हाथ और बढ़ाई हुई भुजा के कारण दूर देश से आए, और आकर इस भवन की ओर मुंह किए हुए प्रार्थना करे, तब तू अपने स्वर्गीय निवासस्थान में से सुने, और जिस बात के लिये ऐसा परदेशी तुझे पुकारे, उसके अनुसार करना; जिस से पृथ्वी के सब देशों के लोग तेरा नाम जानकर, तेरी प्रजा इस्राएल की नाईं तेरा भय मानें; और निश्चय करें, कि यह भवन जो मैं ने बनाया है, वह तेरा ही कहलाता है।” (2 इति. 6:32, 33) यीशु के दिनों में भी अगर एक गैर-इसराएली यहोवा की उपासना करना चाहता, तो उसे यहोवा के चुने हुए लोगों के साथ उसकी उपासना करने की ज़रूरत थी। सिर्फ तभी यहोवा उसकी उपासना कबूल करता।—यूह. 12:20; प्रेषि. 8:27.

साक्षियों से मिलकर बना राष्ट्र

14-16. (क) इसराएली किस तरह यहोवा के लिए साक्षियों से मिलकर बना राष्ट्र साबित हो सकते थे? (ख) यहोवा आज अपने लोगों से क्या उम्मीद करता है?

14 इसराएली अपने परमेश्वर यहोवा की उपासना करते थे, जबकि दूसरे राष्ट्र के लोग अपने-अपने ईश्वरों को पूज रहे थे। इसलिए एक अहम सवाल का जवाब दिया जाना बहुत ही ज़रूरी था, और वह यह कि सच्चा परमेश्वर कौन है? यशायाह नबी के दिनों में यहोवा ने कहा कि इस सवाल का जवाब उसी तरह दिया जाना होगा, जैसे किसी मुकद्दमे में उठाए गए सवाल का जवाब दिया जाता है। उसने कहा कि  अगर राष्ट्रों के ईश्वर सच्चे हैं, तो उन्हें यह साबित करने के लिए अपने साक्षियों को पेश करना होगा। उसने कहा: “वे अपने साक्षी ले आएं जिस से वे सच्चे ठहरें, वे सुन लें और कहें, यह सत्य है।”—यशा. 43:9.

15 राष्ट्रों के ईश्वर साबित नहीं कर पाए कि वे सच्चे हैं। और करते भी कैसे? आखिर वे बेजान मूर्तियाँ ही तो थे। साक्षियों को इकट्ठा करना तो दूर, वे खुद न तो बोल सकते थे, न चल-फिर सकते थे। (यशा. 46:5-7) मगर यहोवा के बारे में क्या? उसने अपने चुने हुए लोगों से, यानी इसराएल राष्ट्र से कहा: “तुम मेरे साक्षी हो और मेरे दास हो, जिन्हें मैं ने इसलिये चुना है कि समझकर मेरी प्रतीति करो और यह जान लो कि मैं वही हूं। मुझ से पहिले कोई ईश्वर न हुआ और न मेरे बाद भी कोई होगा। मैं ही यहोवा हूं और मुझे छोड़ कोई उद्धारकर्त्ता नहीं। . . . इसलिये तुम ही मेरे साक्षी हो, . . . [और] मैं ही ईश्वर हूं।”—यशा. 43:10-13.

16 इस विश्व के सबसे बड़े मुकद्दमे में, जो इस मसले को लेकर उठा था कि “सच्चा परमेश्वर कौन है?,” यहोवा की प्रजा, या उसके चुने हुए लोगों को साफ और बुलंद आवाज़ में यह साक्षी देने का सम्मान मिला था कि सिर्फ यहोवा ही सच्चा परमेश्वर है। उनके बारे में यहोवा ने कहा: “इस प्रजा को मैं ने अपने लिये बनाया है कि वे मेरा गुणानुवाद करें।” (यशा. 43:21) वे यहोवा के नाम से पहचाने जानेवाले लोग कहलाते थे। यहोवा ने उन्हें मिस्र से छुड़ाया था, इसलिए वह उनसे उम्मीद करता था कि वे खुशी-खुशी उसकी आज्ञा मानें और सारे जहान के महाराजा और मालिक के तौर पर उसकी महिमा करें। यहोवा आज भी अपने लोगों से यही उम्मीद करता है। भविष्यवक्ता मीका बताता है कि परमेश्वर के लोगों को कैसा रवैया दिखाना चाहिए: “सब राज्यों के लोग तो अपने अपने देवता का नाम लेकर चलते हैं, परन्तु हम लोग अपने परमेश्वर यहोवा का नाम लेकर सदा सर्वदा चलते रहेंगे।”—मीका 4:5.

विश्वासघाती लोग

17. इसराएली क्यों यहोवा की नज़र में बेकार अंगूर की बेल की तरह हो गए थे?

17 लेकिन अफसोस, इसराएली यहोवा के वफादार नहीं रहे। लकड़ी-पत्थर के ईश्वरों को पूजनेवालों की देखा-देखी, वे भी झूठी उपासना करने लगे और झूठे देवी-देवताओं के लिए वेदियाँ बनाने लगे। करीब 2,800 साल पहले, भविष्यवक्ता होशे ने इसराएल की तुलना एक ऐसे अंगूर की बेल से की थी, जो अब अच्छा फल नहीं दे रही थी। उसने यह भी कहा था: “उनका मन बटा हुआ है; अब वे दोषी ठहरेंगे।” (होशे 10:1, 2) इसके करीब 150 साल बाद, यिर्मयाह ने भी विश्वासघाती इसराएलियों की तुलना अंगूर की बेल से की। उसने कहा कि वे पहले एक बेहतरीन अंगूर की बेल की तरह थे, मगर अब वे किसी काम के नहीं रहे। यिर्मयाह के ज़रिए यहोवा ने कहा: “जो देवता तू ने बना लिए हैं, वे कहां रहे? यदि वे तेरी विपत्ति के समय तुझे बचा सकते हैं तो अभी उठें।” फिर उसने अपने इन चुने हुए लोगों के बारे में कहा: “मेरे लोग मुझे . . . भूल गए हैं।”—यिर्म. 2:21, 28, 32, हिंदी ईज़ी-टू-रीड वर्शन।

18, 19. (क) यहोवा ने कैसे पहले से बताया था कि धरती पर उसके नाम से पहचाना जानेवाला एक नया राष्ट्र होगा? (ख) अगले लेख में किस बारे में चर्चा की जाएगी?

18 जी हाँ, इसराएल राष्ट्र अच्छे फल पैदा करने में नाकाम रहा। उन्होंने न तो शुद्ध उपासना की और न ही वे यहोवा के वफादार साक्षी साबित हुए। इसके बजाय, वे मूर्तिपूजा में लगे रहकर बुरे फल ही पैदा करते रहे। इसलिए यीशु ने अपने ज़माने के कपटी यहूदी धर्म-गुरुओं से कहा: “परमेश्वर का राज तुमसे ले लिया जाएगा और उस जाति को, जो इसके योग्य फल पैदा करती है, दे दिया जाएगा।” (मत्ती 21:43) इस नयी जाति, या नए राष्ट्र, यानी आत्मिक इसराएल में सिर्फ वे लोग शामिल होते, जो यिर्मयाह के ज़रिए भविष्यवाणी की गयी “नई वाचा” का हिस्सा होते। इस वाचा में शामिल होनेवाले आत्मिक इसराएल के सदस्यों के बारे में यहोवा ने भविष्यवाणी की थी: “मैं उनका परमेश्वर होऊँगा और वे मेरे लोग होंगे।”—यिर्म. 31:31-33, हिंदी ईज़ी-टू-रीड वर्शन।

19 जब इसराएलियों ने यहोवा के साथ विश्वासघात किया, तो उसने पहली सदी में आत्मिक इसराएल को अपने नाम से पहचाने जानेवाले लोगों के तौर पर चुना। लेकिन आज धरती पर उसके चुने हुए लोग कौन हैं? नेकदिल लोग परमेश्वर के सच्चे उपासकों को कैसे पहचान सकते हैं? इस बारे में हम अगले लेख में चर्चा करेंगे।