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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  नवंबर 2014

‘अब तुम परमेश्वर के लोग हो’

‘अब तुम परमेश्वर के लोग हो’

“एक वक्‍त ऐसा था जब तुम परमेश्वर के खास लोग नहीं थे, मगर अब उसके लोग हो।”—1 पत. 2:10.

1, 2. (क) ईसवी सन्‌ 33 के पिन्तेकुस्त के दिन क्या बड़ा बदलाव हुआ? (ख) यहोवा के चुने हुए नए लोग कौन बने? (लेख की शुरूआत में दी तसवीर देखिए।)

ईसवी सन्‌ 33 का पिन्तेकुस्त का दिन यहोवा के चुने हुए लोगों के लिए एक बहुत ही खास दिन था। उस दिन यहोवा के लोगों के इतिहास में एक बहुत बड़ा बदलाव हुआ। उस दिन यहोवा ने अपने चुने हुए लोगों पर अपनी पवित्र शक्‍ति उँडेलकर एक नए राष्ट्र की शुरूआत की। वह राष्ट्र था, आत्मिक इसराएल या ‘परमेश्वर का इसराएल।’ (गला. 6:16) अब से परमेश्वर के लोगों को खतना कराने की ज़रूरत नहीं थी, जैसे अब्राहम के ज़माने से होता आया था। इसके बजाय, पौलुस ने कहा कि अब से उनका खतना पवित्र शक्‍ति के हिसाब से “दिल का खतना होता।”—रोमि. 2:29.

2 परमेश्वर का यह नया राष्ट्र शुरू-शुरू में प्रेषितों और उन 100 से भी ज़्यादा चेलों से मिलकर बना था, जो पिन्तेकुस्त के दिन यरूशलेम में एक ऊपर के कमरे में इकट्ठा हुए थे। (प्रेषि. 1:12-15) वहाँ परमेश्वर ने उन पर अपनी पवित्र शक्‍ति उँडेली और इस तरह वे परमेश्वर के बेटे बन गए। (रोमि. 8:15, 16; 2 कुरिं. 1:21) इससे यह साबित हो गया कि यहोवा ने मसीह का बलिदान कबूल कर लिया है और नए करार ने मूसा के कानून की जगह ले ली है। (लूका 22:20; इब्रानियों 9:15 पढ़िए।) इस तरह, ये अभिषिक्‍त चेले यहोवा के नए राष्ट्र के सदस्य, या उसके चुने हुए नए लोग, बन गए। पवित्र शक्‍ति ने उन्हें कई भाषाएँ  बोलने और समझने के, साथ ही, “परमेश्वर के शानदार कामों” के बारे में दूसरों को सिखाने के काबिल बनाया।—प्रेषि. 2:1-11.

परमेश्वर के चुने हुए नए लोग

3-5. (क) पिन्तेकुस्त के दिन, पतरस ने यहूदियों से क्या कहा? (ख) परमेश्वर का नया राष्ट्र कैसे धीरे-धीरे बढ़ता गया?

3 यहोवा ने प्रेषित पतरस के ज़रिए यहूदियों और यहूदी धर्म अपनानेवालों को इस नए राष्ट्र, यानी अभिषिक्‍त जनों से मिलकर बनी मसीही मंडली का सदस्य बनने का न्यौता दिया। पिन्तेकुस्त के दिन, पतरस ने बेधड़क होकर यहूदियों से कहा कि वे यीशु की मौत के ज़िम्मेदार हैं और अब अगर वे इस नए राष्ट्र का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो उन्हें यीशु को “प्रभु और मसीह” के तौर पर कबूल करना होगा। जब भीड़ ने पूछा कि उन्हें क्या करना चाहिए, तो पतरस ने उनसे कहा: “पश्‍चाताप करो, और तुममें से हरेक अपने पापों की माफी के लिए यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले और तब तुम पवित्र शक्‍ति का मुफ्त वरदान पाओगे।” (प्रेषि. 2:22, 23, 36-38) उस दिन करीब 3,000 लोग इस नए राष्ट्र का हिस्सा बन गए। (प्रेषि. 2:41) इसके बाद, प्रेषित जोश के साथ प्रचार करते रहे। नतीजा, और भी कई लोग सच्चाई कबूल करने लगे। (प्रेषि. 6:7) जी हाँ, यह नया राष्ट्र बढ़ता जा रहा था।

4 आगे चलकर यीशु के चेलों ने सामरियों को भी प्रचार करना शुरू कर दिया। उनमें से भी कई लोगों ने सच्चाई कबूल की और बपतिस्मा लिया, मगर उस वक्‍त उनका पवित्र शक्‍ति से अभिषेक नहीं किया गया। लेकिन जब यरूशलेम में शासी निकाय ने प्रेषित पतरस और प्रेषित यूहन्ना को इन नए सामरी भाई-बहनों के पास भेजा, तो प्रेषितों ने “उन पर हाथ रखे और वे पवित्र शक्‍ति पाने लगे।” (प्रेषि. 8:5, 6, 14-17) इस तरह, इन सामरी भाई-बहनों का भी अभिषेक किया गया और वे भी आत्मिक इसराएल के सदस्य बन गए।

पतरस ने कुरनेलियुस और उसके घराने को प्रचार किया (पैराग्राफ 5 देखिए)

5 ईसवी सन्‌ 36 में परमेश्वर ने प्रेषित पतरस के ज़रिए एक और समूह को नए राष्ट्र का हिस्सा बनने का न्यौता दिया। किन्हें? खतना-रहित गैर-यहूदियों को। यह तब हुआ जब पतरस ने रोमी सेना-अफसर कुरनेलियुस और उसके रिश्तेदारों और दोस्तों को प्रचार किया। (प्रेषि. 10:22, 24, 34, 35) बाइबल बताती है: “जब पतरस . . . बोल ही रहा था तभी पवित्र शक्‍ति इस वचन को सुननेवाले सभी [खतना-रहित गैर-यहूदी] लोगों पर उतरी। और यहूदियों में से जो विश्वासी भाई पतरस के साथ आए थे वे दंग रह गए, क्योंकि पवित्र शक्‍ति का मुफ्त वरदान, गैर-यहूदियों को भी दिया जा रहा था।” (प्रेषि. 10:44, 45) उस वक्‍त से, आत्मिक इसराएल का हिस्सा बनने का न्यौता खतना-रहित गैर-यहूदियों को भी दिया जाने लगा।

‘परमेश्वर के नाम से पहचाने जानेवाले लोग’

6, 7. (क) ‘परमेश्वर के नाम से पहचाने जानेवाले लोगों’ के नाते नए राष्ट्र के सदस्यों को क्या करना था? (ख) और उन्होंने ऐसा किस हद तक किया?

6 ईसवी सन्‌ 49 में शासी निकाय की एक बैठक में चेले याकूब ने कहा: “पतरस ने पूरा ब्यौरा देकर बताया है कि परमेश्वर ने कैसे पहली बार गैर-यहूदी राष्ट्रों की तरफ ध्यान दिया कि उनके बीच से वे लोग चुन ले जो परमेश्वर के नाम से पहचाने जाएँ।” (प्रेषि. 15:14) परमेश्वर के नाम से पहचाने जानेवाले इन नए लोगों में यहूदी और गैर-यहूदी राष्ट्रों के लोग जो मसीही बन गए थे, वे  सभी शामिल थे। (रोमि. 11:25, 26क) आगे चलकर पतरस ने लिखा: “एक वक्‍त ऐसा था जब तुम परमेश्वर के खास लोग नहीं थे, मगर अब उसके लोग हो।” पतरस ने समझाया कि इस नए राष्ट्र को बनाने का मकसद क्या था। उसने कहा: “तुम एक चुना हुआ वंश, शाही याजकों का दल और एक पवित्र राष्ट्र हो और परमेश्वर की खास संपत्ति बनने के लिए चुने गए लोग हो, ताकि तुम सारी दुनिया में उसके महान गुणों का ऐलान करो जिसने तुम्हें अंधकार से निकालकर अपनी शानदार रौशनी में बुलाया है।” (1 पत. 2:9, 10) जी हाँ, उन लोगों को हिम्मत के साथ यहोवा के बारे में गवाही देनी थी और सारे जहान के महाराजा और मालिक के तौर पर सरेआम उसकी महिमा करनी थी।

7 अब आत्मिक इसराएल से बना नया राष्ट्र यहोवा की चुनी हुई नयी प्रजा था। यहोवा ने जो बात पहले इसराएल राष्ट्र के बारे में कही थी, वही बात अब वह आत्मिक इसराएल के बारे में कह सकता था: “इस प्रजा को मैं ने अपने लिये बनाया है कि वे मेरा गुणानुवाद करें।” (यशा. 43:21) पहली सदी के उन मसीहियों ने सभी झूठे देवी-देवताओं का परदाफाश किया और हिम्मत के साथ सरेआम ऐलान किया कि सिर्फ यहोवा ही सच्चा परमेश्वर है। (1 थिस्स. 1:9) उन्होंने “यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया देश में यहाँ तक कि दुनिया के सबसे दूर के इलाकों में” यहोवा और यीशु के बारे में गवाही दी।—प्रेषि. 1:8; कुलु. 1:23.

8. प्रेषित पौलुस ने पहली सदी में परमेश्वर के नाम से पहचाने जानेवाले लोगों को क्या चेतावनी दी?

8 पहली सदी में ‘[यहोवा] के नाम से पहचाने जानेवाले लोगों’ में से एक शख्स, जिसने हिम्मत के साथ खुशखबरी का ऐलान किया, वह था प्रेषित पौलुस। उसने दार्शनिकों के आगे यहोवा की हुकूमत के पक्ष में बात करते हुए कहा कि यहोवा ही ने “पूरे विश्व और उसकी सब चीज़ों को बनाया” और वही “आकाश और धरती का मालिक है।” (प्रेषि. 17:18, 23-25) अपने तीसरे मिशनरी दौरे के आखिर में पौलुस ने परमेश्वर के नाम से पहचाने जानेवाले लोगों को चेतावनी दी: “मैं जानता हूँ कि मेरे जाने के बाद अत्याचारी भेड़िए तुम्हारे बीच घुस आएँगे और झुंड के साथ कोमलता से पेश नहीं आएँगे, और तुम्हारे ही बीच में से ऐसे आदमी उठ खड़े होंगे जो चेलों को अपने पीछे खींच लेने के लिए टेढ़ी-मेढ़ी बातें कहेंगे।” (प्रेषि. 20:29, 30) पहली सदी के खत्म होते-होते, सच्चे मसीही धर्म के खिलाफ बगावत करनेवालों की तादाद काफी बढ़ चुकी थी।—1 यूह. 2:18, 19.

9. प्रेषितों की मौत के बाद, परमेश्वर के नाम से पहचाने जानेवाले लोगों का क्या हुआ?

9 प्रेषितों की मौत के बाद, मंडलियों में सच्चे मसीही धर्म के खिलाफ बगावत करनेवालों की तादाद बढ़ती चली गयी, जिससे ईसाईजगत के कई चर्च शुरू हो गए। ‘यहोवा के नाम से पहचाने जानेवाले लोग’ होना तो दूर, इन झूठे मसीहियों ने अपनी बाइबल के कई अनुवादों में से भी परमेश्वर का नाम निकाल दिया है। उन्होंने कई झूठे धार्मिक रीति-रिवाज़ों को अपना लिया है। यहाँ तक कि उन्होंने झूठी शिक्षाएँ फैलाकर, धर्म के नाम पर युद्ध लड़कर और अनैतिक ज़िंदगी जीकर परमेश्वर के नाम पर कलंक लगाया है। इसलिए सदियों तक, धरती पर यहोवा के सिर्फ गिने-चुने वफादार उपासक ही थे, लेकिन ‘परमेश्वर के नाम से पहचाना जानेवाला’ कोई संगठित समूह नहीं था।

परमेश्वर के चुने हुए लोगों का दोबारा जन्म

10, 11. (क) यीशु ने गेहूँ और जंगली पौधों के बारे में क्या भविष्यवाणी की? (ख) 1914 के बाद यीशु की मिसाल कैसे पूरी हुई, और इसका क्या नतीजा हुआ?

10 यीशु ने अपनी भविष्यवाणी में गेहूँ और जंगली पौधों की मिसाल देकर बताया था कि आगे चलकर सच्चे मसीही धर्म के खिलाफ होनेवाली बगावत की वजह से सच्चे धर्म को पहचानना बहुत मुश्किल हो जाएगा। उसने कहा कि “जब लोग रात को सो रहे” होंगे, तब जिस खेत में इंसान के बेटे ने गेहूँ के बीज बोए थे, उसी खेत में इब्लीस जंगली पौधे के बीज बो देगा। गेहूँ और जंगली पौधे दोनों साथ-साथ बढ़ेंगे, जब तक कि “दुनिया की व्यवस्था का आखिरी वक्‍त” नहीं आ जाता। यीशु ने समझाया कि “बढ़िया बीज” “राज के बेटे” हैं, और “जंगली दाने के पौधे” “दुष्ट के बेटे” हैं। अंत के समय में, इंसान का बेटा ‘कटाई  करनेवालों’ को, यानी अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा, ताकि वे जंगली पौधों को गेहूँ से अलग कर दें। फिर स्वर्गदूत राज के बेटों को इकट्ठा करेंगे। (मत्ती 13:24-30, 36-43) यीशु की यह भविष्यवाणी कैसे पूरी हुई? इस भविष्यवाणी से परमेश्वर के लिए अपने नाम से पहचाने जानेवाले लोगों को संगठित करना कैसे मुमकिन हुआ?

11 “दुनिया की व्यवस्था का आखिरी वक्‍त” 1914 में शुरू हुआ। उस वक्‍त धरती पर लगभग 5,000 “राज के बेटे,” यानी अभिषिक्‍त जन थे। उस साल शुरू हुए पहले विश्व युद्ध के दौरान, ये अभिषिक्‍त जन महानगरी बैबिलोन की गुलामी में ही थे। लेकिन 1919 में यहोवा ने उन्हें इस आध्यात्मिक बंधुआई से आज़ाद किया, जिससे सच्चे मसीहियों और झूठे मसीहियों के बीच का फर्क बिलकुल साफ हो गया। इसके बाद, यहोवा ने इन ‘राज के बेटों’ को इकट्ठा करके उन्हें अपने नाम से पहचाने जानेवाले लोगों के तौर पर संगठित किया। इससे यशायाह की यह भविष्यवाणी पूरी हुई: “क्या कोई देश एक दिन में उत्पन्न हो सकता है? क्या कोई राष्ट्र एक क्षण में जन्म ले सकता है? सियोन को जब प्रसव-पीड़ा हुई थी, उस क्षण ही उसने अपने पुत्रों को जन्म दिया था।” (यशा. 66:8, हिंदी—कॉमन लैंग्वेज) इस आयत में सिय्योन, स्वर्गदूतों से बने यहोवा के संगठन को दर्शाता है। सिय्योन ने उस वक्‍त “जन्म दिया,” जब 1919 में अभिषिक्‍त जनों को एक राष्ट्र के तौर पर संगठित किया गया।

12. अभिषिक्‍त जन आज कैसे ‘[यहोवा] के नाम से पहचाने जानेवाले लोग’ साबित हुए हैं?

12 पहली सदी के मसीहियों की तरह, आज भी “राज के बेटे,” यानी अभिषिक्‍त मसीही, यहोवा के बारे में साक्षी देते हैं। (यशायाह 43:1, 10, 11 पढ़िए।) वे मसीही चालचलन बनाए रखते हैं और राज की खुशखबरी का प्रचार करते हैं, “ताकि सब राष्ट्रों पर गवाही हो।” इन दो वजहों से वे दुनिया के लोगों से अलग नज़र आते हैं। (मत्ती 24:14; फिलि. 2:15) इस तरह, उन्होंने लाखों लोगों को यहोवा के साथ करीबी रिश्ता बनाने में मदद दी है।—दानिय्येल 12:3 पढ़िए।

“हम तुम्हारे संग चलेंगे”

13, 14. (क) आज जो अभिषिक्‍त नहीं हैं, अगर वे चाहते हैं कि यहोवा उनकी उपासना कबूल करे, तो उन्हें क्या करना होगा? (ख) बाइबल में इस बारे में क्या भविष्यवाणियाँ की गयी थीं?

13 हमने पिछले लेख में देखा था कि जब गैर-इसराएलियों ने यहोवा के चुने हुए लोगों के साथ मिलकर उसकी  उपासना की, तो यहोवा ने उनकी उपासना कबूल की। (1 राजा 8:41-43) उसी तरह, आज जो अभिषिक्‍त नहीं हैं, अगर वे चाहते हैं कि यहोवा उनकी उपासना कबूल करे, तो ज़रूरी है कि वे ‘राज के बेटों,’ यानी यहोवा के अभिषिक्‍त साक्षियों के साथ मिलकर उसकी उपासना करें।

14 सदियों पहले, दो नबियों ने भविष्यवाणी की थी कि इस अंत के समय में बहुत-से लोग यहोवा के चुने हुए लोगों के साथ मिलकर उसकी उपासना करेंगे। यशायाह नबी ने कहा था: “बहुत देशों के लोग आएंगे, और आपस में कहेंगे: आओ, हम यहोवा के पर्वत पर चढ़कर, याकूब के परमेश्वर के भवन में जाएं; तब वह हमको अपने मार्ग सिखाएगा, और हम उसके पथों पर चलेंगे। क्योंकि यहोवा की व्यवस्था सिय्योन से, और उसका वचन यरूशलेम से निकलेगा।” (यशा. 2:2, 3) उसी तरह, जकर्याह नबी ने भी भविष्यवाणी की थी: “बहुत से देशों के वरन सामर्थी जातियों के लोग यरूशलेम में सेनाओं के यहोवा को ढ़ूंढ़ने और यहोवा से बिनती करने के लिये आएंगे।” जकर्याह नबी ने उन्हें “दस मनुष्य” के रूप में दर्शाया, जो “भांति भांति की भाषा बोलनेवाली सब जातियों में से” निकलेंगे। उसने कहा कि वे आत्मिक इसराएल के साथ मिलकर परमेश्वर की उपासना करेंगे और कहेंगे: “हम तुम्हारे संग चलेंगे, क्योंकि हम ने सुना है कि परमेश्वर तुम्हारे साथ है।”—जक. 8:20-23.

15. “दूसरी भेड़ें” किस मायने में आत्मिक इसराएल के ‘संग चलती’ हैं?

15 “दूसरी भेड़ें” किस मायने में आत्मिक इसराएल के ‘संग चलती’ हैं? राज की खुशखबरी का प्रचार करके। (मर. 13:10) इस तरह, वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों का हिस्सा बन जाती हैं। साथ ही, वे और अभिषिक्‍त जन मिलकर ‘अच्छे चरवाहे,’ मसीह यीशु के अधीन “एक झुंड” बनते हैं।—यूहन्ना 10:14-16 पढ़िए।

यहोवा के चुने हुए लोगों के बीच हिफाज़त पाइए

16. यहोवा ऐसा क्या करेगा, जिससे हर-मगिदोन की शुरूआत होगी?

16 महानगरी बैबिलोन के विनाश के बाद, यहोवा के लोगों पर चौतरफा हमला होगा। उस वक्‍त, गोग “उन लोगों” पर हमला करेगा “जो जातियों में से इकट्ठे हुए थे,” यानी यहोवा के लोगों पर। (यहे. 38:10-12) उस हमले से बचने के लिए हमें यहोवा से मिलनेवाली हिफाज़त की ज़रूरत पड़ेगी। उस हमले से “महा-संकट” के आखिरी भाग, हर-मगिदोन की शुरूआत होगी। इसका मतलब है कि खुद यहोवा इस घटना का समय तय करेगा और इसे अंजाम देगा। (मत्ती 24:21; यहे. 38:2-4) यह हमला होते ही यहोवा दखल देगा और वह गोग और उसकी सेनाओं के खिलाफ युद्ध करके अपने लोगों को बचाएगा। इस युद्ध में यहोवा हमेशा-हमेशा के लिए यह साबित कर देगा कि विश्व पर हुकूमत करने का हक सिर्फ उसी को है और अपने नाम पर लगा हर कलंक मिटा देगा। वह कहता है: “मैं अपने को महान और पवित्र ठहराऊंगा और बहुत सी जातियों के साम्हने अपने को प्रगट करूंगा। तब वे जान लेंगी कि मैं यहोवा हूं।”—यहे. 38:18-23.

“महा-संकट” के दौरान, बहुत ज़रूरी होगा कि हम अपनी मंडली के साथ करीबी से जुड़े रहें (पैराग्राफ 16-18 देखिए)

17, 18. (क) जब गोग यहोवा के लोगों पर हमला करेगा, तो यहोवा उन्हें क्या हिदायतें देगा? (ख) अगर हम यहोवा की हिफाज़त से फायदा पाना चाहते हैं, तो हमें क्या करना होगा?

17 जब गोग हमला करना शुरू करेगा, तो यहोवा अपने सेवकों से कहेगा: “हे मेरे लोगो, आओ, अपनी अपनी कोठरी में प्रवेश करके किवाड़ों को बन्द करो; थोड़ी देर तक जब तक क्रोध शान्त न हो तब तक अपने को छिपा रखो।” (यशा. 26:20) उस वक्‍त यहोवा हमें हिदायतें देगा कि हिफाज़त पाने के लिए हमें क्या करना होगा। ये ‘कोठरियाँ’ शायद हमारे इलाके की मंडलियों से ताल्लुक रखती हैं।

18 अगर हम महा-संकट के दौरान यहोवा की हिफाज़त से फायदा पाना चाहते हैं, तो हमें यह कबूल करना होगा कि इस धरती पर यहोवा के नाम से पहचाने जानेवाले उसके अपने लोग हैं, जिन्हें उसने मंडलियों में संगठित किया है। इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि हम यहोवा के चुने हुए लोगों की तरफ हो लें और अपनी मंडली के साथ करीबी से जुड़े रहें। भजनहार की तरह, आइए हम भी अपने पूरे दिल से कहें: “उद्धार यहोवा ही की ओर से होता है; हे यहोवा तेरी आशीष [“तेरे लोगों,” हिंदी ईज़ी-टू-रीड वर्शन] पर हो।”—भज. 3:8.