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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  अक्टूबर 2014

“अपना मन स्वर्ग की बातों पर ही लगाए रखो”

“अपना मन स्वर्ग की बातों पर ही लगाए रखो”

“अपना मन स्वर्ग की बातों पर ही लगाए रखो, न कि धरती की बातों पर।”—कुलु. 3:2.

1, 2. (क) कुलुस्से की मंडली खतरे में क्यों थी? (ख) किस सलाह ने कुलुस्से के भाइयों को परमेश्वर के साथ दोस्ती बनाए रखने में मदद दी?

पहली सदी में कुलुस्से की मंडली की एकता खतरे में थी! कुछ भाई कह रहे थे कि सभी को मूसा का कानून मानना चाहिए। दूसरे ऐसे थे जो बैरागी बनने और अपनी इच्छाओं को पूरी तरह से त्याग देने का बढ़ावा दे रहे थे। पौलुस ने उन्हें इस तरह की गलत सोच अपनाने के खतरे के बारे में आगाह करते हुए लिखा: “खबरदार रहो: कहीं ऐसा न हो कि कोई तुम्हें दुनियावी फलसफों और छलनेवाली उन खोखली बातों से अपना शिकार बनाकर ले जाए, जो इंसानों की परंपराओं और दुनियादारी के उसूलों के मुताबिक हैं और मसीह की शिक्षाओं के मुताबिक नहीं।”—कुलु. 2:8.

2 अगर ये अभिषिक्‍त मसीही “दुनियादारी के उसूलों” पर अपना मन लगाते, तो वे परमेश्वर के बेटे कहलाने के सम्मान को ठुकरा रहे होते। (कुलु. 2:20-23) उन्हें परमेश्वर के साथ अपनी अनमोल दोस्ती बनाए रखने में मदद देने के लिए, पौलुस ने उनसे कहा: “अपना मन स्वर्ग की बातों पर ही लगाए रखो, न कि धरती की बातों पर।” (कुलु. 3:2) उन मसीहियों को स्वर्ग में हमेशा तक जीने की अपनी  खास आशा पर अपना मन लगाए रखने की ज़रूरत थी।—कुलु. 1:4, 5.

3. (क) अभिषिक्‍त मसीही अपना मन किस आशा पर लगाए रखते हैं? (ख) हम इस लेख में किन सवालों पर गौर करेंगे?

3 आज के अभिषिक्‍त मसीही भी अपना मन परमेश्वर के राज पर और स्वर्ग में “मसीह के संगी वारिस” होने की आशा पर लगाए रखते हैं। (रोमि. 8:14-17) मगर उनके बारे में क्या जिन्हें धरती पर रहने की आशा है? पौलुस के शब्द उन पर कैसे लागू होते हैं? ये “दूसरी भेड़ें” अपना मन “स्वर्ग की बातों” पर कैसे लगाए रख सकती हैं? (यूह. 10:16) और हम अब्राहम और मूसा की मिसाल पर कैसे चल सकते हैं, जिन्होंने मुश्किलों के बावजूद अपना मन स्वर्ग की बातों पर लगाए रखा?

अपना मन स्वर्ग की बातों पर लगाए रखने का मतलब क्या है?

4. दूसरी भेड़ें अपना मन स्वर्ग की बातों पर कैसे लगाए रख सकती हैं?

4 हालाँकि दूसरी भेड़ों के पास स्वर्ग में जीने की आशा नहीं है, लेकिन वे भी अपना मन स्वर्ग की बातों पर लगाए रख सकती हैं। कैसे? यहोवा परमेश्वर और उसके राज को अपनी ज़िंदगी में पहली जगह देकर। (लूका 10:25-27) मसीह ने यही किया था और हमें भी ऐसा ही करने की ज़रूरत है। (1 पत. 2:21) पहली सदी के मसीहियों की तरह, आज हम भी शैतान की दुनिया में देखते हैं कि कैसे लोग झूठी दलीलें देते हैं, धन-दौलत और ऐशो-आराम की चीज़ें बटोरते हैं और दुनियावी ज्ञान फैलाते हैं। (2 कुरिंथियों 10:5 पढ़िए।) हमें यीशु की मिसाल पर चलने और ऐसी हर चीज़ से दूर रहने की ज़रूरत है, जो यहोवा के साथ हमारे रिश्ते को तबाह कर सकती है।

5. दौलत और ऐशो-आराम की चीज़ों के बारे में हमारा नज़रिया क्या है यह जानने के लिए हम खुद से क्या सवाल पूछ सकते हैं?

5 क्या हम भी दौलत और ऐशो-आराम की चीज़ों के मामले में इस दुनिया के रवैए को अपनाने लगे हैं? हम जिस बारे में सोचते हैं और जो करते हैं, उससे दिखाते हैं कि हम असल में किन चीज़ों से प्यार करते हैं। यीशु ने इस बात को समझाते हुए कहा: “जहाँ तेरा धन होगा, वहीं तेरा दिल भी होगा।” (मत्ती 6:21) हमें खुद से पूछने की ज़रूरत है कि हमारे लिए क्या बात सबसे ज़्यादा मायने रखती है। क्या हम बस यही सोचते रहते हैं कि हम पैसे किस तरह जोड़ सकते हैं, मोटी तनख्वाहवाली नौकरी कैसे पा सकते हैं, या आराम की ज़िंदगी कैसे बिता सकते हैं? या फिर क्या हम एक सादगी-भरी ज़िंदगी जीने की कोशिश करते हैं और यहोवा के साथ अपने रिश्ते पर ध्यान देते हैं? (मत्ती 6:22) यीशु ने कहा था कि अगर हम अपना ध्यान “पृथ्वी पर धन” जमा करने में लगाएँगे, तो यहोवा के साथ हमारा रिश्ता टूट सकता है।—मत्ती 6:19, 20, 24.

6. हम पापी फितरत के खिलाफ अपनी लड़ाई में कैसे जीत सकते हैं?

6 हम असिद्ध हैं, इसलिए हमारे लिए गलत काम करना बहुत आसान है। (रोमियों 7:21-25 पढ़िए।) अगर हम परमेश्वर की पवित्र शक्‍ति के मार्गदर्शन पर न चलें, तो हो सकता है हम ‘रंग-रलियाँ मनाने और नशेबाज़ी के दौर चलाने,’ अनैतिक काम करने, यहाँ तक कि परमेश्वर के कानूनों को पूरी तरह ठुकराकर “बदचलनी” करने लग सकते हैं। (रोमि. 13:12, 13) हम हर वक्‍त अपनी पापी फितरत से लड़ते रहते हैं। हम इस लड़ाई में सिर्फ तभी जीत सकते हैं, जब हम अपना मन स्वर्ग की बातों पर लगाए रखें। इसके लिए मेहनत करने की ज़रूरत है, तभी पौलुस ने कहा: “मैं अपने शरीर को मारता-कूटता हूँ और उसे एक दास बनाकर काबू में रखता हूँ।” (1 कुरिं. 9:27) अगर हम ज़िंदगी की दौड़ में बने रहना चाहते हैं, तो हमें भी खुद के साथ सख्ती बरतनी होगी। आइए हम दो वफादार इंसानों की मिसाल पर चर्चा करें और देखें कि उन्होंने किस तरह ‘परमेश्वर को खुश किया’ था।—इब्रा. 11:6.

अब्राहम ने “यहोवा पर विश्वास किया”

7, 8. (क) अब्राहम और सारा को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा? (ख) अब्राहम लगातार किस बारे में मनन करता रहा?

7 जब यहोवा ने अब्राहम से कहा कि वह अपने परिवार  के साथ कनान देश चला जाए, तो उसने खुशी-खुशी यहोवा की आज्ञा मानी। यहोवा ने अब्राहम के विश्वास और आज्ञा मानने के रवैए के लिए उसे इनाम दिया। यहोवा ने यह कहकर उसके साथ एक करार किया: “मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊंगा, और तुझे आशीष दूंगा।” (उत्प. 12:2) कई साल गुज़र गए, लेकिन अब्राहम और सारा के कोई बच्चा नहीं हुआ। क्या यहोवा अपना वादा भूल गया था? और-तो-और, कनान में ज़िंदगी आसान नहीं थी। अब्राहम और उसका परिवार फलते-फूलते ऊर शहर की सुख-सुविधाएँ छोड़कर, 1,600 किलोमीटर (1,000 मील) से भी ज़्यादा लंबा सफर तय करके कनान देश आया था। वे तंबुओं में रहते थे, उनके पास कभी-कभी खाने के लिए नहीं होता था और कभी-कभी लुटेरों की वजह से उनकी जान को भी खतरा होता था। (उत्प. 12:5, 10; 13:18; 14:10-16) इसके बावजूद, वे ऊर की ऐशो-आराम की ज़िंदगी में लौटना नहीं चाहते थे।—इब्रानियों 11:8-12, 15 पढ़िए।

8 “धरती की बातों पर” मन लगाने के बजाय, अब्राहम ने “यहोवा पर विश्वास किया।” (उत्प. 15:6) जी हाँ, वह लगातार परमेश्वर के वादों पर मनन करता रहा। इस तरह, उसने स्वर्ग की बातों पर अपना मन लगाए रखा। यहोवा ने अब्राहम का विश्वास देखा और उससे कहा: “आकाश की ओर दृष्टि करके तारागण को गिन, क्या तू उनको गिन सकता है? फिर उस ने उस से कहा, तेरा वंश ऐसा ही होगा।” (उत्प. 15:5) जब अब्राहम ने यह बात सुनी, तो वह जान गया कि यहोवा अपना वादा भूला नहीं है। हर बार जब वह आसमान में तारों को देखता, तो उसे यहोवा का वादा याद आता कि वह उसके वंश को बढ़ाएगा। और जब यहोवा का ठहराया वक्‍त आया, तो अब्राहम के वाकई एक बेटा हुआ, ठीक जैसे यहोवा ने वादा किया था।—उत्प. 21:1, 2.

9. हम अब्राहम की मिसाल पर कैसे चल सकते हैं?

9 अब्राहम की तरह, हम भी यहोवा के वादों के पूरा होने का इंतज़ार कर रहे हैं। (2 पत. 3:13) अगर हम अपना मन स्वर्ग की बातों पर लगाए न रखें, तो हमें शायद लगने लग सकता है कि यहोवा अपने वादे पूरे करने में देर कर रहा है। और हम शायद यहोवा की सेवा में ढीले पड़ जाएँ। मिसाल के लिए, हो सकता है पहले आपने यहोवा की सेवा में त्याग किए हों, ताकि आप पायनियर बन सकें या किसी और खास तरीके से अपनी सेवा बढ़ा सकें। अगर ऐसा है, तो इसके लिए हम आपकी तारीफ करते हैं। लेकिन आज आप क्या कर रहे हैं? क्या आप अब्राहम की मिसाल पर चल रहे हैं, जिसने यहोवा की सेवा करने में अपनी तरफ से हर मुमकिन कोशिश की और भविष्य में मिलनेवाली आशीषों की आस लगाए रखी? (इब्रा. 11:10) अब्राहम ने “यहोवा पर विश्वास किया और यह उसके लिए नेकी गिना गया।”—रोमि. 4:3.

मूसा “अदृश्य परमेश्वर” को देखता रहा

10. मूसा की परवरिश किस तरह हुई थी?

10 एक और शख्स जिसने अपना मन स्वर्ग की बातों पर लगाए रखा, वह था मूसा। उसकी परवरिश मिस्र के शाही घराने में हुई थी, और वह भी तब जब मिस्र दुनिया का सबसे ताकतवर देश था। बाइबल कहती है कि उसे मिस्रियों की “हर तरह की शिक्षा दी गयी” थी। यह कोई मामूली शिक्षा नहीं थी। इस ऊँची शिक्षा ने मूसा को “अपने कामों में शक्‍तिशाली और बातों में दमदार” बना दिया था। (प्रेषि. 7:22) अपनी इस परवरिश की वजह से, मूसा के पास मिस्र की एक बड़ी हस्ती बनने के कई मौके थे! लेकिन एक और तरह की शिक्षा थी, जो मूसा के लिए इन सबसे कहीं ज़्यादा मायने रखती थी।

11, 12. (क) मूसा के लिए कौन-सा ज्ञान सबसे बढ़कर था? (ख) हम यह कैसे जानते हैं?

11 जब मूसा छोटा था, तब उसकी माँ योकेबेद ने उसे इब्रियों के परमेश्वर के बारे में सिखाया था। मूसा के लिए यहोवा का ज्ञान दुनिया के किसी भी खज़ाने से कहीं बढ़कर था। उसने खुशी-खुशी धन-दौलत और शोहरत पाने के सभी मौकों को ठुकरा दिया, ताकि वह परमेश्वर की मरज़ी पूरी कर सके। (इब्रानियों 11:24-27 पढ़िए।) अपनी माँ से मिली तालीम और यहोवा पर उसके विश्वास ने मूसा को अपना मन स्वर्ग की बातों पर लगाए रखने में मदद दी।

 12 हालाँकि मूसा को उस वक्‍त मिस्र में सबसे बेहतरीन शिक्षा मिली थी, लेकिन उसने इस शिक्षा का इस्तेमाल एक ताकतवर, मशहूर या अमीर हस्ती बनने के लिए नहीं किया। दरअसल, बाइबल कहती है कि उसने “फिरौन की बेटी का बेटा कहलाने से इनकार कर दिया। और पाप का चंद दिनों का सुख भोगने के बजाय, उसने परमेश्वर के लोगों के साथ ज़ुल्म सहने का चुनाव किया।” सालों बाद, उसने परमेश्वर के लोगों की अगुवाई करने के लिए यहोवा के ज्ञान का इस्तेमाल किया।

13, 14. (क) परमेश्वर के लोगों को मिस्र से छुड़ाने के लिए मूसा को अपने अंदर कौन-से गुण बढ़ाने की ज़रूरत थी? (ख) मूसा की तरह, हमें भी क्या करने की ज़रूरत है?

13 मूसा यहोवा और उसके लोगों से बहुत प्यार करता था। जब मूसा 40 साल का था, तब उसे लगा कि वह परमेश्वर के लोगों को मिस्र की गुलामी से छुटकारा दिलाने के लिए तैयार है। (प्रेषि. 7:23-25) मगर यहोवा जानता था कि मूसा इसके लिए अभी तैयार नहीं है। उसे अब भी अपने अंदर नम्रता, सब्र, कोमलता और संयम जैसे गुण बढ़ाने की ज़रूरत थी। (नीति. 15:33) उसे तालीम की ज़रूरत थी, जो उसे आगे आनेवाली गंभीर समस्याओं का सामना करने के लिए तैयार करती। मूसा ने चरवाहे के नाते जो 40 साल गुज़ारे, उससे उसे अपने अंदर ये गुण बढ़ाने में मदद मिली।

14 एक चरवाहे के नाते मूसा को जो कारगर तालीम मिली थी, क्या उससे मूसा को मदद मिली? जी हाँ, बाइबल कहती है कि वह “पृथ्वी भर के रहने वाले सब मनुष्यों से बहुत अधिक नम्र स्वभाव का” इंसान बना। (गिन. 12:3) उसने नम्र होना सीखा, इसलिए वह अलग-अलग तरह के लोगों के साथ पेश आते वक्‍त सब्र दिखा पाया और उन्हें अपनी परेशानियों से जूझने में मदद दे पाया। (निर्ग. 18:26) मूसा की तरह, हमें भी अपने अंदर कुछ गुण बढ़ाने की ज़रूरत है, जो हमें “महा-संकट” से बच निकलने और परमेश्वर की नयी दुनिया में दाखिल होने में मदद देंगे। (प्रका. 7:14) क्या हम लोगों के साथ अच्छा रिश्ता बनाए रख पाते हैं, उनके साथ भी जिनके बारे में हम सोचते हैं कि वे जल्दी बुरा मान जाते हैं या जिन्हें आसानी से ठेस पहुँचती है? प्रेषित पतरस के इन शब्दों से हमें मदद मिल सकती है: “हर किस्म के इंसान का आदर करो, भाइयों की सारी बिरादरी से प्यार करो।”—1 पत. 2:17.

अपना मन स्वर्ग की बातों पर ही लगाए रखना

15, 16. (क) हमें अपना मन स्वर्ग की बातों पर क्यों लगाए रखना चाहिए? (ख) मसीहियों को बढ़िया चालचलन क्यों बनाए रखना चाहिए?

15 हम ‘संकटों से भरे वक्‍त’ में जी रहे हैं, “जिसका सामना करना मुश्किल” है। (2 तीमु. 3:1) इसलिए हमें अपना मन स्वर्ग की बातों पर लगाए रखना चाहिए, ताकि हम परमेश्वर के करीब बने रह सकें। (1 थिस्स. 5:6-9) आइए ऐसा करने के तीन तरीके देखें।

16 हमारा चालचलन: पतरस ने बढ़िया चालचलन बनाए रखने की अहमियत पर ज़ोर देते हुए कहा: ‘दुनिया के लोगों के बीच तुम बढ़िया चालचलन बनाए रखो, ताकि वे तुम्हारे उन अच्छे कामों की वजह से, जो उन्होंने खुद अपनी आँखों से देखे हैं, परमेश्वर की महिमा करें।’ (1 पत. 2:12) हमें अपने चालचलन से यहोवा की महिमा करने की हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए, फिर चाहे हम घर पर हों, नौकरी की जगह पर हों, स्कूल में हों, मनोरंजन कर रहे हों या प्रचार में हों। बेशक, हम सभी असिद्ध हैं और हम सभी गलतियाँ करते हैं। (रोमि. 3:23) लेकिन हमें निराश नहीं होना चाहिए। यहोवा की मदद से हम “विश्वास की अच्छी लड़ाई लड़” सकते हैं।—1 तीमु. 6:12.

17. हम यीशु के मन का स्वभाव कैसे अपना सकते हैं? (लेख की शुरूआत में दी तसवीर देखिए।)

17 हमारा रवैया: अच्छा चालचलन बनाए रखने के लिए ज़रूरी है कि हमारा रवैया सही हो। प्रेषित पौलुस ने कहा: “तुम मन का वैसा स्वभाव पैदा करो जैसा मसीह यीशु का था।” (फिलि. 2:5) यीशु का स्वभाव, या रवैया, कैसा था? वह नम्र था, और इस वजह से वह यहोवा के लिए अपना भरसक करना चाहता था। वह हमेशा  परमेश्वर के राज की खुशखबरी का प्रचार करने के बारे में सोचता था। (मर. 1:38; 13:10) यीशु का मानना था कि परमेश्वर का वचन ही सबसे बेहतरीन मार्गदर्शन दे सकता है। (यूह. 7:16; 8:28) वह बड़े ध्यान से पवित्र शास्त्र का अध्ययन किया करता था, ताकि ज़रूरत पड़ने पर वह उसके पक्ष में बात कर सके, उसमें दी बातों का मतलब समझा सके और उसमें से हवाला दे सके। अगर हम मसीह की सोच अपनाएँ, तो हम भी नम्र बनेंगे, जोश के साथ प्रचार करेंगे और बाइबल का गहराई से अध्ययन करेंगे।

परमेश्वर के राज की खुशखबरी का प्रचार करना यीशु के लिए सबसे ज़रूरी काम था (पैराग्राफ 17 देखिए)

18. हम किन ज़रूरी तरीकों से यहोवा के काम में सहयोग दे सकते हैं?

18 हमारा सहयोग: यह परमेश्वर का मकसद है कि “जो स्वर्ग में हैं और जो धरती पर हैं,” वे यीशु के अधीन हों। (फिलि. 2:9-11) हालाँकि यीशु बहुत ऊँचे पद पर है, लेकिन फिर भी वह नम्रता से अपने पिता के अधीन रहता है। हमें भी ऐसा ही करना चाहिए। (1 कुरिं. 15:28) यह हम कैसे कर सकते हैं? हमें ‘सब राष्ट्रों के लोगों को चेला बनना सिखाने’ का जो काम सौंपा गया है, उसमें अपना पूरा-पूरा सहयोग देकर। (मत्ती 28:19) साथ ही, हम अपने पड़ोसियों और भाइयों के लिए भलाई के काम करके “सबके साथ भलाई” करना चाहते हैं।—गला. 6:10.

19. हमें क्या करने की ठान लेनी चाहिए?

19 हम कितने शुक्रगुज़ार हैं कि यहोवा हमें अपना मन स्वर्ग की बातों पर लगाए रखने के लिए कहता है! इसके लिए ज़रूरी है कि हम “उस दौड़ में जिसमें हमें दौड़ना है धीरज से दौड़ते रहें।” (इब्रा. 12:1) आइए हम ठान लें कि हम यहोवा से मिले काम को ‘तन-मन लगाकर ऐसे करें मानो यहोवा के लिए करते हों,’ और यह भरोसा रखें कि स्वर्ग में रहनेवाला हमारा पिता हमें ढेरों आशीषें देगा।—कुलु. 3:23, 24.