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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  सितंबर 2014

माता-पिताओ—अपने बच्चों की चरवाही कीजिए

माता-पिताओ—अपने बच्चों की चरवाही कीजिए

“[“अपने झुंड,” एन.डब्ल्यू.] की दशा भली-भांति मन लगाकर जान ले।”—नीति. 27:23.

1, 2. (क) इसराएली चरवाहों की क्या-क्या ज़िम्मेदारियाँ होती थीं? (ख) माता-पिता कैसे चरवाहों की तरह होते हैं?

पुराने ज़माने के इसराएल में चरवाहों की ज़िंदगी आसान नहीं होती थी। सर्दी हो या गरमी, उन्हें हर मौसम की मार झेलनी पड़ती थी और अपनी भेड़ों की जंगली जानवरों और चोरों से हिफाज़त भी करनी होती थी। चरवाहे हर दिन अपनी हर भेड़ की जाँच करते थे और जो भेड़ें बीमार होतीं या जिन्हें चोट लगी होती, उनकी वे मरहम-पट्टी करते थे। वे मेम्नों पर खास ध्यान देते थे, क्योंकि वे भेड़ों से कमज़ोर होते थे।—उत्प. 33:13.

2 कुछ मामलों में मसीही माता-पिता भी चरवाहों की तरह हैं। उन्हें भी चरवाहों जैसे गुण दिखाने चाहिए। माता-पिताओं को यह ज़िम्मेदारी दी गयी है कि वे “यहोवा की तरफ से आनेवाला अनुशासन देते हुए और उसी की सोच के मुताबिक उनके मन को ढालते हुए” अपने बच्चों की परवरिश करें। (इफि. 6:4) क्या ऐसा करना हमेशा आसान होता है? नहीं! बच्चों को हर वक्‍त ऐसी बातों का सामना करना पड़ता है, जिनका शैतान बढ़ावा देता है। इसके अलावा, उन्हें अपनी असिद्ध इच्छाओं से भी जूझना पड़ता है। (2 तीमु. 2:22; 1 यूह. 2:16) ऐसे में आप अपने बच्चों की मदद कैसे कर सकते हैं? आइए हम ऐसी तीन बातों पर चर्चा करें, जो आपको अपने बच्चों की चरवाही करने में मदद दे सकती हैं: (1) उन्हें जानिए, (2) उन्हें खिलाइए, और (3) उनका मार्गदर्शन कीजिए।

 अपने बच्चों को जानिए

3. माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी तरह कैसे जान सकते हैं?

3 एक अच्छा चरवाहा यह देखने के लिए बड़े ध्यान से हर भेड़ की जाँच करता है कि वह स्वस्थ है या नहीं। एक मायने में आप भी अपने बच्चों के लिए ऐसा ही कर सकते हैं। बाइबल कहती है: “[“अपने झुंड,” एन.डब्ल्यू.] की दशा भली-भांति मन लगाकर जान ले।” (नीति. 27:23) माता-पिता होने के नाते, बेशक आप “अपने झुंड,” यानी अपने बच्चों को अच्छी तरह जानना चाहेंगे। इसके लिए ज़रूरी है कि आप ध्यान दें कि आपके बच्चे क्या करते हैं, साथ ही, उनकी सोच और भावनाओं को समझें। आप यह कैसे कर सकते हैं? अपने बच्चों के साथ लगातार बातचीत करके।

4, 5. (क) अगर आपके बच्चे आपको अपने दिल की बात बताने से कतराते हैं, तो आप क्या कर सकते हैं? (लेख की शुरूआत में दी तसवीर देखिए।) (ख) अपने बच्चों के लिए आपसे बात करना आसान बनाने के लिए आपने क्या किया है?

4 कुछ माता-पिताओं का अनुभव रहा है कि जब उनके बच्चे जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते हैं, तब उनके साथ बातचीत करना और भी मुश्किल हो जाता है। किशोर बच्चे शायद आपको अपने दिल की बात बताने से कतराएँ। अगर आपके बच्चों के साथ भी ऐसा ही है, तो आप क्या कर सकते हैं? ज़रूरी नहीं कि आप एकदम गंभीर होकर उनके साथ लंबी-चौड़ी चर्चा करें। इसके बजाय, फुरसत के वक्‍त उनके साथ बात करने की कोशिश कीजिए। (व्यव. 6:6, 7) उनके साथ समय बिताइए। साथ मिलकर सैर करने या गाड़ी में कहीं घूमने जाइए। उनके साथ खेलिए या घर में ही उनके साथ मिलकर कुछ काम कीजिए। इस तरह, जब बच्चे फुरसत में आपके साथ वक्‍त बिताते हैं, तो हो सकता है ऐसे में वे खुलकर आपको अपने दिल की बात बता सकें।

5 लेकिन अगर फिर भी आपका बच्चा बात नहीं करना चाहता, तब क्या? तो कोई और तरीका अपनाइए। मिसाल के लिए, अपनी बेटी से यह पूछने के बजाय कि उसका दिन कैसा गया, उसे बताइए कि आपका दिन कैसा गया। इससे हो सकता है वह बताए कि उसने पूरे दिन में क्या-क्या किया। या अगर आप जानने चाहते हैं कि फलाँ मामले के बारे में वह क्या सोचती है, तो उससे इस तरह सवाल पूछिए जिससे ध्यान उस पर नहीं, बल्कि मामले पर जाए। जैसे आप पूछ सकते हैं कि उसके दोस्त फलाँ विषय के बारे में क्या सोचते हैं। इसके बाद आप अपनी बेटी से पूछ सकते हैं कि वह उस बारे में अपने दोस्तों को क्या सलाह देगी।

6. आपके बच्चों को कैसे महसूस होगा कि आप उनके लिए समय निकालेंगे और वे आपसे बेझिझक बात कर सकते हैं?

6 बेशक, आपके बच्चे आपसे बात करने के लिए तब ज़्यादा तैयार होंगे, जब उन्हें यह महसूस होगा कि आप ज़रूर उनके लिए समय निकालेंगे और यह भी कि वे आपसे बेझिझक बात कर सकते हैं। अगर आप हमेशा व्यस्त नज़र आएँ, तो आपके बच्चे अपनी समस्याएँ लेकर आपके पास शायद कभी नहीं आएँगे। और आप कैसे पक्का कर सकते हैं कि आपके बच्चे आपसे बेझिझक बात कर सकते हैं? सिर्फ इतना कहना काफी नहीं कि “तुम मुझसे कभी-भी बात कर सकते हो।” आपके किशोर बच्चों को यह एहसास भी होना चाहिए कि आप उनकी बात सुनकर गुस्से से भड़क नहीं उठेंगे। उन्हें यह भी एहसास होना चाहिए कि उनकी समस्याएँ आपके लिए अहमियत रखती हैं। कायला नाम की एक 19 साल की बहन कहती है: “मैं अपने पापा से किसी भी बारे में बात कर सकती हूँ। वे मेरी बात कभी नहीं काटते, न ही झट-से कोई राय कायम कर लेते हैं। वे बस ध्यान से मेरी बात सुनते हैं। फिर वे हमेशा मुझे अच्छी-से-अच्छी सलाह देते हैं।”

7. (क) माता-पिता डेटिंग जैसे नाज़ुक विषयों पर बात करते वक्‍त कैसे संतुलन बनाए रख सकते हैं? (ख) माता-पिता अनजाने में अपने बच्चों को चिढ़ कैसे दिला सकते हैं?

7 कभी-कभी आपको अपने बच्चों के साथ कुछ नाज़ुक विषयों पर बात करने की ज़रूरत पड़ सकती है, जैसे डेटिंग के बारे में। ध्यान रखिए कि आप उन्हें चेतावनियाँ देने पर इतना ज़ोर न देने लगें, कि आप उन्हें मामले से निपटने का सही तरीका बताने से ही चूक जाएँ। मिसाल के लिए, मान लीजिए आप किसी रेस्तराँ में जाते हैं और वहाँ पहुँचने पर देखते हैं कि मेन्यू में सिर्फ चेतावनियाँ ही दी हैं कि फलाँ खाना खाने से आपको यह बीमारी हो सकती है, फलाँ खाना खाने से आपको वह बीमारी हो सकती है। ऐसे में आप शायद वहाँ से उठकर किसी और रेस्तराँ में जाना पसंद करेंगे। आपके बच्चों के साथ भी कुछ ऐसा ही हो सकता है। उन्हें सलाह देते वक्‍त अगर आप उन्हें सिर्फ चेतावनियाँ ही देते रहें, तो आपके बच्चे शायद चिढ़ जाएँ और आपसे सलाह लेना ही बंद कर दें। (कुलुस्सियों 3:21 पढ़िए।) इसके बजाय, संतुलन बनाए रखने की कोशिश कीजिए। ऐमिली नाम की एक जवान बहन कहती है: “जब मेरे मम्मी-पापा मुझसे डेटिंग के बारे में बात करते हैं, तो वे यह नहीं जताते कि ऐसा करना गलत है। इसके बजाय, वे एक व्यक्‍ति को जानने और एक जीवन-साथी ढूँढ़ने से मिलनेवाली खुशी पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं। इस वजह से मैं आसानी से उनके साथ इस विषय पर बात कर पाती  हूँ। सच कहूँ तो अगर भविष्य में मैं किसी के साथ कोई रिश्ता जोड़ूँ, तो मैं मम्मी-पापा से कुछ भी छिपाने के बजाय, उन्हें इस बारे में खुलकर बताना चाहूँगी।”

8, 9. (क) सब्र से पेश आने और बिना टोके बच्चों की सुनने से क्या फायदे होते हैं? (ख) आपको अपने बच्चों की सुनने में किस तरह कामयाबी मिली है?

8 सब्र रखिए और इत्मीनान से अपने बच्चों की बात सुनिए। ऐसा करके आप उन्हें दिखाएँगे कि वे आपसे बेझिझक बात कर सकते हैं। (याकूब 1:19 पढ़िए।) काटिया नाम की एक माँ, जो अकेले ही अपनी बेटी की परवरिश कर रही है, कहती है: “पहले मैं अपनी बेटी के साथ ज़रा भी सब्र से पेश नहीं आती थी। मैं उसे अपनी बात खत्म करने का मौका ही नहीं देती थी। मैं या तो इतनी थकी हुई होती थी कि मुझमें उसकी बात सुनने के लिए जान ही नहीं होती थी, या फिर मुझे उसकी सुनने में कोई दिलचस्पी ही नहीं होती थी। लेकिन अब जब मैंने अपना व्यवहार बदल दिया है, तो मेरी बेटी ने भी अपना व्यवहार बदल दिया है। अब वह पहले से ज़्यादा खुलकर मुझे अपनी भावनाएँ बताने के लिए तैयार रहती है।”

उन्हें जानने के लिए उनकी सुनिए (पैराग्राफ 3-9 देखिए)

9 रॉनल्ड नाम के एक पिता का भी अपनी किशोर बेटी के साथ इसी तरह का अनुभव रहा। वह बताता है, “जब उसने मुझे बताया कि वह अपने स्कूल के एक लड़के से प्यार करती है, तो पहले तो मुझे बहुत गुस्सा आया। मगर जब मैंने इस बारे में सोचा कि यहोवा अपने सेवकों के साथ पेश आते वक्‍त किस तरह सब्र और लिहाज़ दिखाता है, तो मुझे एहसास हुआ कि अच्छा होगा कि मैं अपनी बेटी को सुधारने से पहले, उसे अपने दिल की बात बताने का मौका दूँ। मुझे खुशी है कि मैंने ऐसा ही किया! ज़िंदगी में पहली बार, मैं अपनी बेटी की भावनाओं को समझ पाया। जब उसने अपनी बात खत्म की, तो मेरे लिए उससे प्यार से बात करना ज़्यादा आसान हो गया। ताज्जुब की बात है कि उसने मेरी सलाह कबूल की। उसने सच्चे दिल से खुद को बदलने की ख्वाहिश ज़ाहिर की।” अपने बच्चों से लगातार बात करते रहने से आपको यह जानने में मदद मिलती है कि आपके बच्चे असल में क्या सोचते और महसूस करते हैं। नतीजा, आप उन्हें अपनी ज़िंदगी के फैसले लेने में और भी अच्छी तरह मदद दे पाएँगे। *

अपने बच्चों को खिलाइए

10, 11. सच्चाई में बने रहने के लिए आप अपने बच्चों की मदद कैसे कर सकते हैं?

10 एक अच्छा चरवाहा जानता है कि उसकी भेड़ झुंड से भटक सकती है। हो सकता है भेड़ झुंड से थोड़ी दूर जाकर घास चरने लगे। फिर धीरे-धीरे वह भेड़ शायद और भी दूर चली जाए और इस तरह वह झुंड से बिलकुल ही अलग हो जाए। बच्चों के साथ भी कुछ ऐसा ही हो सकता है। हो सकता है बुरी संगति या गलत किस्म का मनोरंजन उन्हें अपनी तरफ लुभाने लगे। (नीति. 13:20) नतीजा, वे धीरे-धीरे सच्चाई से दूर जा सकते हैं। आप इस तरह के हालात उठने से पहले ही उनकी मदद कैसे कर सकते हैं?

 11 अपने बच्चों को सिखाते वक्‍त जब आप देखते हैं कि उन्हें कहाँ-कहाँ सुधार करने की ज़रूरत है, तो उनकी मदद करने में देर मत कीजिए। साथ ही, उन्हें अपने मसीही गुणों को बढ़ाते जाने में भी मदद दीजिए। (2 पत. 1:5-8) ऐसा करने का एक सबसे बेहतरीन समय है, पारिवारिक उपासना। अक्टूबर 2008 की हमारी राज-सेवा में बताया गया था: “यहोवा ने परिवार के मुखियाओं को यह ज़िम्मेदारी दी है कि वे अपने परिवार के साथ नियमित तौर पर बाइबल अध्ययन करें, जिससे सभी सदस्यों को फायदा हो। इसलिए मुखियाओं को यह बढ़ावा दिया जाता है कि वे अपनी यह ज़िम्मेदारी अच्छी तरह निभाएँ।” क्या आप इस समय का अच्छा इस्तेमाल करके अपने बच्चों की चरवाही कर रहे हैं? यकीन रखिए कि आप अपने बच्चों की मदद करने के लिए जो मेहनत करते हैं, उसकी वे सचमुच में कदर करते हैं।—मत्ती 5:3; फिलि. 1:10.

उन्हें अच्छी तरह खिलाइए (पैराग्राफ 10-12 देखिए)

12. (क) नौजवानों को बिना नागा पारिवारिक उपासना करने से कैसे फायदा हुआ है? (बक्स “ वे इसकी कदर करते हैं” भी देखिए।) (ख) पारिवारिक उपासना करने से निजी तौर पर आपको क्या फायदे हुए हैं?

12 कारीसा नाम की एक किशोर बहन और उसके परिवार को पारिवारिक उपासना के इंतज़ाम से बहुत फायदा हुआ है। वह कहती है: “मुझे अच्छा लगता है कि हम सब एक-साथ बैठकर बात कर सकते हैं। ऐसा करने से हमारा रिश्ता और भी मज़बूत होता है और आगे चलकर साथ गुज़ारे इन पलों को याद करके हमें खुशी होगी। पापा हमारे साथ पारिवारिक उपासना करने से कभी नहीं चूकते। यह देखकर मेरा हौसला बढ़ता है कि वे इस इंतज़ाम को इतनी गंभीरता से लेते हैं। और इस वजह से मुझे भी इसे गंभीरता से लेने का बढ़ावा मिलता है। साथ ही, इससे मेरे दिल में अपने पापा और आध्यात्मिक मुखिया के लिए और भी इज़्ज़त बढ़ती है।” ब्रिटनी नाम की एक जवान बहन कहती है: “पारिवारिक उपासना मुझे अपने मम्मी-पापा के और करीब ले आयी है। इससे मुझे ये देखने में मदद मिली है कि वे सच में मेरी परेशानियाँ जानना चाहते हैं और वे सचमुच मेरी परवाह करते हैं। इससे हमारे परिवार का रिश्ता मज़बूत होता है और हमारे बीच एकता बढ़ती है।” वाकई, अपने बच्चों को आध्यात्मिक खाना खिलाकर आप एक अच्छा चरवाहा साबित हो सकते हैं। और पारिवारिक उपासना ऐसा करने का एक सबसे अच्छा तरीका है। *

अपने बच्चों का मार्गदर्शन कीजिए

13. बच्चों को यहोवा की सेवा करने के लिए कैसे बढ़ावा दिया जा सकता है?

13 एक अच्छा चरवाहा अपने झुंड का मार्गदर्शन करने और उसकी हिफाज़त करने के लिए अपनी लाठी का इस्तेमाल करता है। उसका खास मकसद होता है, अपनी भेड़ों को “अच्छी चराई में” ले जाना। (यहे. 34:13, 14) माता-पिता होने के नाते, आध्यात्मिक मायने में क्या आपका भी यही मकसद नहीं है? क्या आप अपने बच्चों का मार्गदर्शन करना नहीं चाहते, ताकि वे यहोवा की सेवा करें? क्या आप नहीं चाहते कि आपके बच्चे भजनहार की तरह महसूस करें, जिसने लिखा: “हे मेरे परमेश्वर मैं तेरी इच्छा पूरी करने से प्रसन्न हूं; और तेरी व्यवस्था मेरे अन्त:करण में बसी है”? (भज. 40:8) जब वे सच में भजनहार की तरह महसूस करते हैं, तो वे अपनी ज़िंदगी यहोवा को समर्पित करने और बपतिस्मा लेने के लिए उभारे जाएँगे। यह एक गंभीर फैसला है और लाज़िमी है कि आपके बच्चे इतने सयाने होने चाहिए कि वे यह फैसला ले सकें और उनमें यहोवा की सेवा करने का जज़्बा भी होना चाहिए।

14, 15. (क) माता-पिताओं का क्या लक्ष्य होना चाहिए? (ख) एक नौजवान को बाइबल की शिक्षाओं पर शक क्यों हो सकता है?

14 हो सकता है आपको पता चले कि आपके बच्चे आध्यात्मिक तौर पर तरक्की करने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहे हैं। हो सकता है वे बाइबल की शिक्षाओं पर भी सवाल उठा रहे हों। ऐसे में आप क्या कर सकते हैं? अपने बच्चों के साथ तर्क करने और उनके दिल में यहोवा के लिए प्यार जगाने में मेहनत कीजिए। उन्हें उन सब बातों के लिए शुक्रगुज़ार होना भी सिखाइए, जो यहोवा ने उनके लिए की हैं। (प्रका. 4:11) जब वे यह सब करने के काबिल हो जाएँगे, तब वे खुद यहोवा की उपासना करने का फैसला ले पाएँगे।

15 क्या आपके बच्चों को शक है कि बाइबल की शिक्षाएँ सच हैं या नहीं? अगर हाँ, तो आप उनकी चरवाही कैसे कर सकते हैं? सब्र रखिए और उनका मार्गदर्शन करने की कोशिश कीजिए। उन्हें यह समझने में मदद दीजिए कि यहोवा की सेवा करना ही ज़िंदगी जीने का सबसे बेहतरीन तरीका है और इससे हमेशा तक फायदे मिलते रहेंगे। साथ ही, यह पता लगाने की कोशिश कीजिए कि बाइबल की शिक्षाओं पर शक करने के पीछे उनकी असल वजह क्या है। मिसाल के लिए, क्या आपका बेटा वाकई बाइबल में लिखी बातों से सहमत नहीं है, या फिर बात यह है कि वह दूसरे बच्चों को प्रचार करने से घबराता है? क्या  आपकी बेटी सच में इस बात पर यकीन नहीं करती कि यहोवा की आज्ञाएँ हमारी भलाई के लिए हैं, या फिर उसे ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि उसके साथ कोई दोस्ती नहीं करना चाहता और वह अकेला महसूस करती है?

उनका मार्गदर्शन कीजिए (पैराग्राफ 13-18 देखिए)

16, 17. माता-पिता अपने बच्चों को यहोवा के साथ खुद अपना एक निजी रिश्ता जोड़ने में किन तरीकों से मदद दे सकते हैं?

16 आपके बच्चों को बाइबल की शिक्षाओं के बारे में जो शक है, उसे दूर करने में आप उनकी मदद कैसे कर सकते हैं? कई माता-पिता अपने बच्चों से आगे दिए सवाल पूछकर उनकी मदद करने में कामयाब रहे हैं: “एक मसीही के तौर पर ज़िंदगी जीना आपको आसान लगता है या मुश्किल? आपको क्या लगता है, मसीही ज़िंदगी जीने के क्या फायदे हैं? अगर आप यहोवा की सेवा करते हैं, तो आप किन चीज़ों से महरूम रह जाएँगे या आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा? मसीही ज़िंदगी जीने की वजह से जो आशीषें हमें आज मिल रही हैं और जो आशीषें हमें भविष्य में मिलनेवाली हैं, उनके बारे में आपको कैसा महसूस होता है? क्या ये आशीषें आपके लिए ज़्यादा मायने रखती हैं या वे चीज़ें जिनसे आप महरूम रह जाएँगे या वे हालात जिनसे आप बचना चाहते हैं?” ध्यान रहे कि आप ये सवाल अपने शब्दों में पूछें और वह भी दिल से, प्यार से और उनमें दिलचस्पी दिखाते हुए। उन्हें ऐसा नहीं लगना चाहिए कि आप उनसे पूछताछ कर रहे हैं। आप शायद अपनी चर्चा में मरकुस 10:29, 30 भी शामिल करना चाहें। इस चर्चा के दौरान कुछ नौजवान शायद दो सूची बनाना चाहें, एक सूची में मसीही होने की आशीषें लिखने के लिए और दूसरी में वे चीज़ें लिखने के लिए, जिनसे वे महरूम रह जाएँ या जिनका वे सामना नहीं करना चाहते। इससे शायद आपको और आपके बच्चों को उन परेशानियों को पहचानने और उनका हल ढूँढ़ने में मदद मिल पाए, जिनका आपके बच्चे सामना कर रहे हैं। अगर हमें दिलचस्पी दिखानेवालों के साथ बाइबल सिखाती है किताब और परमेश्वर का प्यार किताब से अध्ययन करने की ज़रूरत है, तो हमें अपने बच्चों के साथ इन किताबों से अध्ययन करने की और भी कितनी ज़रूरत है! क्या आप ऐसा कर रहे हैं?

17 एक वक्‍त ऐसा आएगा जब आपके बच्चों को खुद यह फैसला करना होगा कि वे यहोवा की सेवा करना चाहेंगे या नहीं। यह मत सोचिए कि अगर आपने यहोवा की सेवा करने का फैसला किया है, तो आपके बच्चे भी खुद-ब-खुद ऐसा करेंगे। उनका यहोवा के साथ खुद अपना एक निजी रिश्ता होना चाहिए। (नीति. 3:1, 2) लेकिन अगर कोई बात आपके बच्चे को परमेश्वर के करीब आने से रोक रही है, तब क्या? उसे बढ़ावा दीजिए कि वह खुद से ये सवाल पूछकर अपने विश्वास की जाँच करे: “मैं कैसे जानता हूँ कि परमेश्वर वजूद में है? मैं कैसे जानता हूँ कि यहोवा सचमुच में मेरी परवाह करता है? क्या मैं सच में यकीन करता हूँ कि परमेश्वर की आज्ञाएँ मानने से मुझे फायदा होगा?” माता-पिताओ, अच्छे चरवाहे बनिए और सब्र दिखाते हुए अपने बच्चों का मार्गदर्शन कीजिए। उनकी मदद कीजिए कि वे खुद को यह साबित करें कि यहोवा की सेवा करना ही ज़िंदगी जीने का सबसे बेहतरीन तरीका है। *रोमि. 12:2.

18. माता-पिता सबसे महान चरवाहे, यहोवा की मिसाल पर कैसे चल सकते हैं?

18 सभी सच्चे मसीही सबसे महान चरवाहे, यहोवा की मिसाल पर चलना चाहते हैं। (इफि. 5:1; 1 पत. 2:25) खासकर माता-पिताओं के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि वे अपने झुंड, यानी अपने अज़ीज़ बच्चों को अच्छी तरह जानें। माता-पिताओं को अपने बच्चों का मार्गदर्शन करने की ज़रूरत है, ताकि वे परमेश्वर के ज़रिए वादा की गयी आशीषों का हमेशा-हमेशा के लिए लुत्फ उठा सकें! जी हाँ, अपने बच्चों की चरवाही करने और सच्चाई में उनकी परवरिश करने के लिए जी-तोड़ मेहनत कीजिए!

^ पैरा. 9 और भी सुझावों के लिए, अक्टूबर-दिसंबर 2008 की प्रहरीदुर्ग के पेज 18-20 देखिए।

^ पैरा. 12 ज़्यादा जानकारी के लिए, 15 अक्टूबर, 2009 की प्रहरीदुर्ग के पेज 29-31 पर दिया लेख “पारिवारिक उपासना—एक सुरक्षा कवच” देखिए।

^ पैरा. 17 ज़्यादा जानकारी के लिए, जुलाई-सितंबर 2012 की प्रहरीदुर्ग के पेज 22-25 देखिए।