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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  अगस्त 2014

यहोवा हमारे करीब कैसे आता है?

यहोवा हमारे करीब कैसे आता है?

“परमेश्वर के करीब आओ और वह तुम्हारे करीब आएगा।”—याकू. 4:8.

1. (क) इंसानों को किस ज़रूरत के साथ बनाया गया है? (ख) इस ज़रूरत को कौन पूरा कर सकता है?

इंसानों को इस ज़रूरत के साथ बनाया गया है कि वे दूसरों के करीब रहना चाहते हैं। हमें खुशी होती है जब हम अपने परिवार के सदस्यों और ऐसे दोस्तों के बीच होते हैं, जो वाकई हमसे प्यार करते हैं, हमारी कदर करते हैं और हमें समझते हैं। लेकिन इन सब रिश्तों से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है, अपने सृष्टिकर्ता यहोवा के साथ एक करीबी रिश्ता कायम करना।—सभो. 12:1.

2. (क) यहोवा हमसे क्या वादा करता है? (ख) मगर कई लोग इस वादे पर यकीन क्यों नहीं करते?

2 यहोवा हमें न्यौता देता है कि हम उसके दोस्त बनें। वह हमसे वादा करता है कि अगर हम उसके करीब आएँ, तो वह भी हमारे करीब आएगा। (याकू. 4:8) यह जानकर हमें कितनी खुशी होती है! लेकिन बहुत-से लोगों को यह विश्वास करना मुश्किल लगता है कि परमेश्वर उनके करीब आना चाहता है। उन्हें लगता है कि वे इस लायक नहीं कि परमेश्वर उनके साथ एक रिश्ता कायम करे। या उन्हें लगता है कि परमेश्वर उनकी पहुँच से बाहर है। क्या यहोवा के करीब आना वाकई मुमकिन है?

3. यहोवा को जानना क्यों मुमकिन है?

3 जी हाँ, यहोवा को जानना और उसके करीब आना मुमकिन है क्योंकि  “वह [उनमें] से किसी से भी दूर नहीं है,” जो उससे दोस्ती करना चाहते हैं। (प्रेषितों 17:26, 27; भजन 145:18 पढ़िए।) हालाँकि हम असिद्ध इंसान हैं, लेकिन फिर भी यहोवा हमारी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने और हमारी दोस्ती कबूल करने को तैयार है। (यशा. 41:8; 55:6) अपने अनुभव से भजन के रचयिता ने यहोवा के बारे में कहा: “हे प्रार्थना के सुननेवाले! सब प्राणी तेरे ही पास आएंगे। क्या ही धन्य है वह; जिसको तू चुनकर अपने समीप आने देता है।” (भज. 65:2, 4) आइए बाइबल से देखें कि यहूदा का राजा आसा परमेश्वर के करीब कैसे आया और परमेश्वर भी आसा के करीब कैसे आया। *

पुराने ज़माने की एक मिसाल से सीखिए

4. यहूदा के लोगों के लिए राजा आसा ने क्या उदाहरण रखा?

4 राजा आसा में सच्ची उपासना के लिए जोश था। वह उस समय राजा बना था, जब देश में मूर्तिपूजा और मंदिर में व्यभिचार बहुत आम बात थी। लेकिन उसने इन सारी घिनौनी चीज़ों को देश से निकालकर यहोवा की आज्ञा मानी। (1 राजा 15:9-13) क्योंकि आसा खुद यहोवा के करीब गया था और उसने परमेश्वर के नियमों को माना था, इसलिए वह लोगों से कह सका: ‘अपने पूर्वजों के परमेश्वर यहोवा की खोज करो और व्यवस्था और आज्ञा को मानो।’ यहोवा ने आसा के राज के पहले दस सालों पर आशीष दी। उस दौरान पूरे देश में शांति थी। आसा जानता था कि यह शांति यहोवा की वजह से है और उसने लोगों से कहा: “हमने उसकी खोज की और उस ने हमको चारों ओर से विश्राम दिया है।” (2 इति. 14:1-7) इसके बाद क्या हुआ?

5. (क) आसा ने किस हालात में दिखाया कि वह परमेश्वर पर भरोसा करता था? (ख) इसका नतीजा क्या हुआ?

5 कल्पना कीजिए कि आप राजा आसा हैं। जेरह नाम का एक कूशी 10 लाख सैनिकों और 300 रथों के साथ आपके देश के खिलाफ युद्ध लड़ने आया है। (2 इति. 14:8-10) लेकिन आपकी फौज में तो सिर्फ 5 लाख 80 हज़ार सैनिक हैं। उसकी फौज आपकी फौज से करीब दुगनी है। ऐसे में आप क्या करेंगे? क्या आप यह सोचेंगे कि परमेश्वर ऐसा क्यों होने दे रहा है? वह दुश्मन फौज को रोकता क्यों नहीं? क्या आप उनसे लड़ने के लिए अपनी बुद्धि पर भरोसा करेंगे? या आप हिफाज़त के लिए यहोवा पर भरोसा करेंगे? राजा आसा ने यहोवा पर भरोसा किया। उसने जो कदम उठाया, उससे पता चलता है कि यहोवा के साथ उसका एक करीबी रिश्ता था। उसने पुकारा: “हे हमारे परमेश्वर यहोवा! हमारी सहायता कर, क्योंकि हमारा भरोसा तुझी पर है और तेरे नाम का भरोसा करके हम इस भीड़ के विरुद्ध आए हैं। हे यहोवा, तू हमारा परमेश्वर है; मनुष्य तुझ पर प्रबल न होने पाएगा।” यहोवा ने उसकी प्रार्थना का जवाब कैसे दिया? ‘यहोवा ने कूशियों को मार’ डाला। उनमें से एक भी ज़िंदा नहीं बचा।—2 इति. 14:11-13.

6. आसा की मिसाल पर चलते हुए हमें भी क्या करना चाहिए?

6 आसा इस बात पर पूरा भरोसा कैसे कर पाया कि परमेश्वर उसकी हिफाज़त करेगा और उसका मार्गदर्शन करेगा? बाइबल कहती है कि ‘आसा ने वही किया जो यहोवा की दृष्टि में ठीक था’ और उसका ‘मन यहोवा की ओर पूरी रीति से लगा रहा।’ (1 राजा 15:11, 14) हमें भी परमेश्वर की सेवा पूरे मन से करनी चाहिए, ताकि हम आज और भविष्य में उसके करीब बने रहें। हम एहसानमंद हैं कि यहोवा ने पहल करके हमें अपनी तरफ खींचा है और वह हमारी मदद करता है, ताकि हम उसके साथ एक करीबी रिश्ता जोड़ें और उसे कायम रखें। आइए ऐसे दो तरीकों पर गौर करें जिनके ज़रिए परमेश्वर ने ऐसा किया है।

यहोवा फिरौती बलिदान के ज़रिए हमें अपनी तरफ खींचता है

7. (क) यहोवा ने हमारे लिए क्या-क्या किया है, जो हमें उसके करीब ले जाता है? (ख) सबसे बढ़कर, परमेश्वर किस तरह हमें अपनी तरफ खींचता है?

7 यहोवा ने हम इंसानों के रहने के लिए एक खूबसूरत घर, यानी धरती बनाकर हमारे लिए प्यार दिखाया। हमारे जीवन को कायम रखकर यहोवा आज भी हमारे लिए प्यार दिखा रहा है। (प्रेषि. 17:28; प्रका. 4:11)  इससे भी बढ़कर, हमारी आध्यात्मिक ज़रूरतें पूरी करके यहोवा हमारे लिए प्यार दिखाता है। (लूका 12:42) वह हमें इस बात का भी यकीन दिलाता है कि जब हम उससे प्रार्थना करते हैं, तो वह हमारी प्रार्थना खुद सुनता है। (1 यूह. 5:14) लेकिन इन सब से कहीं बढ़कर, यहोवा फिरौती बलिदान के ज़रिए प्यार दिखाकर हमें अपनी तरफ खींचता है और हम भी उसकी तरफ खिंचे चले जाते हैं। (1 यूहन्ना 4:9, 10, 19 पढ़िए।) यहोवा ने अपने ‘इकलौते बेटे’ को धरती पर भेजा, ताकि हमें पाप और मौत से छुटकारा मिल सके।—यूह. 3:16.

8, 9. यहोवा के मकसद में यीशु की क्या भूमिका है?

8 यहोवा का मकसद था कि फिरौती बलिदान से सभी इंसानों को फायदा हो, उन्हें भी जो फिरौती बलिदान दिए जाने से पहले जीए थे। यह कैसे मुमकिन है? जब यहोवा ने हमारे आनेवाले उद्धारकर्ता के बारे में भविष्यवाणी की, तो उसकी नज़र में फिरौती बलिदान मानो दिया जा चुका था, क्योंकि वह जानता था कि इंसानों के लिए उसका मकसद पूरा होकर ही रहेगा। (उत्प. 3:15) सालों बाद, प्रेषित पौलुस ने यहोवा को ‘उस फिरौती के ज़रिए रिहाई दिलाने’ के लिए धन्यवाद कहा, “जो मसीह यीशु ने चुकायी है।” पौलुस ने यह भी कहा कि परमेश्वर “बीते ज़माने के दौरान . . . लोगों के पापों को माफ करता रहा।” (रोमि. 3:21-26) इसलिए हम यीशु के बगैर परमेश्वर के करीब बने नहीं रह सकते।

9 यहोवा सिर्फ यीशु के ज़रिए नम्र लोगों को अपने साथ एक करीबी रिश्ता बनाने की इजाज़त देता है। बाइबल कहती है: “परमेश्वर ने अपने प्यार की अच्छाई हम पर इस तरह ज़ाहिर की है कि जब हम पापी ही थे, तब मसीह हमारे लिए मरा।” (रोमि. 5:6-8) फिरौती बलिदान इसलिए नहीं दिया गया, क्योंकि हम इसके लायक हैं, बल्कि इसलिए कि यहोवा और यीशु हमसे बेहद प्यार करते हैं। यीशु ने कहा: “कोई भी इंसान मेरे पास तब तक नहीं आ सकता जब तक कि पिता, जिसने मुझे भेजा है, उसे मेरे पास खींच न लाए।” उसने यह भी कहा: “कोई भी पिता के पास नहीं आ सकता, सिवा उसके जो मेरे ज़रिए आता है।” (यूह. 6:44; 14:6) यहोवा यीशु के ज़रिए लोगों को अपनी तरफ कैसे खींचता है और उन्हें अपने साथ एक अच्छा रिश्ता बनाने में कैसे मदद देता है, ताकि वे हमेशा की ज़िंदगी पा सकें? अपनी पवित्र शक्‍ति की मदद से। (यहूदा 20, 21 पढ़िए।) अब आइए दूसरा तरीका देखें जिससे यहोवा हमें अपनी तरफ खींचता है।

यहोवा बाइबल के ज़रिए हमें अपनी तरफ खींचता है

10. बाइबल हमें परमेश्वर के करीब आने में कैसे मदद देती है?

10 इस लेख में अब तक हमने बाइबल की 14 किताबों से आयतें इस्तेमाल की हैं। अपनी पवित्र शक्‍ति की प्रेरणा से यहोवा ने बाइबल लिखवायी, ताकि हम उसके करीब आ सकें। अगर बाइबल न होती, तो हम कैसे जान पाते कि हम अपने सृष्टिकर्ता के करीब आ सकते हैं? अगर बाइबल न होती, तो हम फिरौती बलिदान के बारे में कैसे सीख पाते? हम कैसे सीख पाते कि यीशु हमें यहोवा के करीब आने में किस तरह मदद देता है? और अगर बाइबल न होती, तो हम यहोवा की खूबसूरत शख्सियत और इंसानों के लिए उसके मकसद के बारे में कैसे सीख पाते? मिसाल के लिए, निर्गमन 34:6, 7 में यहोवा ने खुद को “दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीरजवन्त, और अति करुणामय और सत्य, हज़ारों पीढ़ियों तक निरन्तर करुणा करनेवाला, अधर्म और अपराध और पाप का क्षमा करनेवाला” परमेश्वर बताया है। भला कौन ऐसे परमेश्वर की तरफ खिंचा नहीं आएगा? यहोवा जानता है कि जब हम उसके बारे में और ज़्यादा सीखते हैं, तो वह हमारे लिए और भी असल शख्स बन जाता है और हम उसके और भी करीब महसूस करते हैं।

11. यहोवा के बारे में सीखना क्यों ज़रूरी है? (लेख की शुरूआत में दी तसवीर देखिए।)

11 यहोवा के करीब आओ किताब की शुरूआत में बताया गया है कि हम परमेश्वर के साथ एक नज़दीकी रिश्ता कैसे बना सकते हैं: “हम किसी के साथ दोस्ती तभी करते हैं जब हम उस इंसान को अच्छी तरह जान जाते हैं, उसके अच्छे गुणों की कदर करते हैं और इसलिए उसे पसंद करते हैं। उसी तरह परमेश्वर के करीब आने के लिए बेहद ज़रूरी है  कि हम उसके उन गुणों और मार्गों का अध्ययन करें जिनके बारे में बाइबल में बताया गया है।” हम कितने शुक्रगुज़ार हैं कि यहोवा ने बाइबल को इस तरह लिखवाया कि हम इंसान इसे आसानी से समझ सकें।

12. यहोवा ने बाइबल लिखवाने के लिए इंसानों का इस्तेमाल क्यों किया?

12 यहोवा चाहता तो स्वर्गदूतों से बाइबल लिखवा सकता था। उन्हें हममें और हमारे काम में बहुत दिलचस्पी है। (1 पत. 1:12) इसमें कोई शक नहीं कि वे यहोवा के संदेश को हम इंसानों के लिए लिख सकते थे। लेकिन स्वर्गदूत इंसानों की तरह नहीं हैं। उन्होंने कभी उन भावनाओं, ज़रूरतों और कमज़ोरियों को अनुभव नहीं किया है, जो हम इंसानों में होती हैं। इसलिए वे कभी हमारे नज़रिए से मामलों को देख नहीं सकते। यहोवा जानता है कि स्वर्गदूत हमसे बहुत अलग हैं, इसलिए उसने बाइबल लिखवाने के लिए इंसानों को चुना। जब हम बाइबल के लेखकों और दूसरे लोगों की नाकामियों, गलतियों और दूसरी भावनाओं के बारे में पढ़ते हैं, तो हम उनका दर्द महसूस कर पाते हैं। और जब हम उनकी खुशियों के बारे में पढ़ते हैं, तो हमें भी खुशी महसूस होती है। एलिय्याह नबी की तरह, बाइबल के सभी लेखकों की “हमारे जैसी भावनाएँ” थीं।—याकू. 5:17.

यहोवा योना और पतरस के साथ जिस तरह पेश आया, उस पर मनन करने से हम उसकी तरफ कैसे खिंचते हैं? (पैराग्राफ 13, 15 देखिए)

13. योना की प्रार्थना पढ़कर आपको कैसा महसूस होता है?

13 मिसाल के लिए, परमेश्वर ने योना को एक ज़रूरी काम दिया था, लेकिन वह उस काम से दूर भाग गया। ज़रा सोचिए, अगर किसी स्वर्गदूत ने योना की यह कहानी लिखी होती, तो क्या वह उस नबी की भावनाओं को पूरी तरह बयान कर पाता? यह कितना बेहतर था कि यहोवा ने खुद योना को ही अपनी आप-बीती लिखने के लिए चुना, जिसमें उसने वह प्रार्थना भी शामिल की, जो उसने समुद्र की गहराइयों में की थी! योना ने कहा, “जब मैं निराशा में डूबा जा रहा था, तो मैंने [यहोवा] को याद किया।” (वाल्द-बुल्के अनुवाद।)—योना 1:3, 10; 2:1-9.

14. यशायाह ने अपने बारे में जो लिखा, उसे आप क्यों समझ सकते हैं?

14 इस बात पर भी गौर कीजिए कि यहोवा की प्रेरणा से यशायाह ने अपने बारे में क्या लिखा। जब उसने यहोवा की महिमा का दर्शन देखा, तो उसे एहसास हुआ कि वह  कितना पापी है, और उसने कहा: “हाय! हाय! मैं नाश हुआ; क्योंकि मैं अशुद्ध होंठवाला मनुष्य हूं, और अशुद्ध होंठवाले मनुष्यों के बीच में रहता हूं; क्योंकि मैं ने सेनाओं के यहोवा महाराजाधिराज को अपनी आंखों से देखा है!” (यशा. 6:5) क्या आपको लगता है कि कोई भी स्वर्गदूत खुद के बारे में ये शब्द कह पाता? बिलकुल नहीं। लेकिन यशायाह कह पाया। यशायाह की तरह असिद्ध होने की वजह से हम कल्पना कर सकते हैं कि उसे उस वक्‍त कैसा महसूस हुआ होगा।

15, 16. (क) हम दूसरे इंसानों की भावनाएँ क्यों समझ पाते हैं? कुछ उदाहरण दीजिए। (ख) यहोवा के करीब आने में क्या बात हमारी मदद करेगी?

15 क्या स्वर्गदूत याकूब की तरह, खुद के बारे में कह सकते थे कि ‘मैं योग्य नहीं हूं,’ या क्या वे पतरस की तरह खुद को “पापी” कह सकते थे? (उत्प. 32:10; लूका 5:8) क्या वे कभी यीशु के चेलों की तरह ‘डर के मारे थरथराते,’ या क्या उन्हें पौलुस और दूसरों की तरह, खुशखबरी सुनाते वक्‍त सताए जाने पर हिम्मत जुटाने की ज़रूरत पड़ती? (यूह. 6:19; 1 थिस्स. 2:2) नहीं, क्योंकि स्वर्गदूत हर मायने में सिद्ध हैं और इंसानों से कहीं ज़्यादा ताकतवर हैं। बाइबल के लेखकों की तरह हम भी असिद्ध हैं। इसलिए हम उनकी भावनाएँ समझ सकते हैं। जब हम उनकी लिखी बातें पढ़ते हैं, तो हम ‘खुशी मनानेवालों के साथ खुशी मना पाते हैं’ और ‘रोनेवालों के साथ रो पाते हैं।’—रोमि. 12:15.

16 पुराने ज़माने में यहोवा अपने वफादार सेवकों के साथ जिस तरह पेश आया था, उस पर मनन करने से हम अपने परमेश्वर के बारे में कई अच्छी बातें जान पाएँगे। हम देख पाएँगे कि वह उन असिद्ध इंसानों के साथ सब्र और प्यार से पेश आकर उनके करीब आया। जैसे-जैसे हम यहोवा को और भी अच्छी तरह जानेंगे और उससे प्यार करेंगे, वैसे-वैसे हम उसके और भी करीब आएँगे।—याकूब 4:8 पढ़िए।

परमेश्वर के साथ अटूट रिश्ता कायम कीजिए

17. (क) अजर्याह ने आसा को क्या बुद्धि-भरी सलाह दी? (ख) आसा ने अजर्याह की सलाह को कैसे अनसुना कर दिया? (ग) इसका अंजाम क्या हुआ?

17 राजा आसा से हमें और भी कुछ सीखने को मिलता है। जब राजा आसा ने कूशी फौज पर ज़बरदस्त तरीके से फतह हासिल कर ली, तो परमेश्वर के भविष्यवक्ता अजर्याह ने उसे और उसके लोगों को बुद्धि-भरी सलाह दी। उसने कहा: “जब तक तुम यहोवा के संग रहोगे तब तक वह तुम्हारे संग रहेगा; और यदि तुम उसकी खोज में लगे रहो, तब तो वह तुम से मिला करेगा, परन्तु यदि तुम उसको त्याग दोगे तो वह भी तुम को त्याग देगा।” (2 इति. 15:1, 2) अफसोस कि आगे चलकर आसा ने इस बुद्धि-भरी सलाह को अनसुना कर दिया। जब इसराएल के उत्तरी राज्य ने यहूदा पर हमला किया, तो आसा डर गया। एक बार फिर यहोवा से मदद माँगने के बजाय, उसने सीरिया के लोगों से मदद माँगी, जो यहोवा को नहीं मानते थे। यहोवा ने उससे कहा: “तू ने यह काम मूर्खता से किया है, इसलिये अब से तू लड़ाइयों में फंसा रहेगा।” और ठीक ऐसा ही हुआ। आसा अपने शासन के बचे हुए साल लड़ाइयों में ही फँसा रहा। (2 इति. 16:1-9) हम इससे क्या सबक सीख सकते हैं?

18, 19. (क) अगर हम यहोवा के उतने करीब नहीं हैं, जितने हम पहले हुआ करते थे, तो हमें क्या करना चाहिए? (ख) हम लगातार यहोवा के करीब कैसे आ सकते हैं?

18 हमें कभी यहोवा से दूर नहीं जाना चाहिए। अगर हम उसके उतने करीब नहीं हैं, जितने हम पहले हुआ करते थे, तो हमें फौरन होशे 12:6 के मुताबिक कदम उठाना चाहिए: “तू अपने परमेश्वर की ओर फिर; कृपा और न्याय के काम करता रह, और अपने परमेश्वर की बाट निरन्तर जोहता रह।” जब हम फिरौती के इंतज़ाम पर मनन करते हैं और ध्यान से बाइबल का अध्ययन करते हैं, तो हम यहोवा के और करीब आते हैं।—व्यवस्थाविवरण 13:4 पढ़िए।

19 भजनहार ने लिखा: “परमेश्वर के समीप [“आना,” एन.डब्ल्यू.], यही मेरे लिये भला है।” (भज. 73:28) ऐसा हो कि यह बात हममें से हरेक के मामले में भी सच साबित हो। आइए हम अपना लक्ष्य बना लें कि हम यहोवा के बारे में लगातार नयी-नयी बातें सीखते रहेंगे। जब हम ऐसा करेंगे, तो हम उससे और भी ज़्यादा प्यार करने लगेंगे। जब हम उसके करीब आएँगे, तो यहोवा आज और हमेशा के लिए हमारे करीब आएगा!

^ पैरा. 3 आसा के बारे में 15 अगस्त, 2012 की प्रहरीदुर्ग में दिया लेख “तुम्हें अपने अच्छे काम का पुरस्कार मिलेगा” देखिए।