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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  मई 2014

हमें “हर एक को” कैसे “जवाब” देना चाहिए?

हमें “हर एक को” कैसे “जवाब” देना चाहिए?

“तुम्हारे बोल हमेशा मन को भानेवाले, . . . हों। अगर तुम ऐसा करोगे तो तुम्हें हर एक को वैसे जवाब देना आ जाएगा, जैसे तुमसे उम्मीद की जाती है।”—कुलु. 4:6.

1, 2. (क) एक अनुभव बताइए जो दिखाता है कि सही सवाल पूछना बहुत ज़रूरी है। (लेख की शुरूआत में दी तसवीर देखिए।) (ख) हमें मुश्किल विषयों पर बात करने से क्यों घबराना नहीं चाहिए?

एक मसीही बहन अपने अविश्वासी पति के साथ बाइबल पर चर्चा कर रही थी। पति ने कहा कि वह त्रिएक की शिक्षा को मानता है। लेकिन बहन को पता चला कि वह दरअसल नहीं जानता था कि उसका चर्च त्रिएक के बारे में क्या सिखाता था। इसलिए बहन ने समझ-बूझ से अपने पति से पूछा: “क्या आप मानते हैं कि परमेश्वर परमेश्वर है, यीशु परमेश्वर है और पवित्र शक्‍ति भी परमेश्वर है; लेकिन परमेश्वर तीन नहीं बल्कि सिर्फ एक ही है?” पति ने हैरान होकर कहा, “नहीं, मैं ऐसा तो नहीं मानता!” नतीजा, उन दोनों के बीच इस विषय पर दिलचस्प बातचीत छिड़ गयी कि असल में परमेश्वर कौन है।

2 हम इस अनुभव से क्या सीख सकते हैं? समझ-बूझ दिखाते हुए सही सवाल पूछना बहुत ज़रूरी है। हम यह भी सीखते हैं कि हमें त्रिएक, नरक या सिरजनहार के वजूद जैसे मुश्किल विषयों पर बात करने से घबराना नहीं चाहिए। अगर हम यहोवा पर और उसके ज़रिए दी जानेवाली तालीम पर निर्भर रहें, तो हम इस तरह सिखा सकेंगे कि हमारी बात सुननेवालों के दिल तक पहुँच जाए। (कुलु.  4:6) इस लेख में हम चर्चा करेंगे कि कैसे हम आगे दिए तरीकों का इस्तेमाल करके दूसरों को सिखाने में और भी असरदार बन सकते हैं: (1) सवाल पूछकर, ताकि सामनेवाला अपनी राय बताए, (2) बाइबल से तर्क करके, और (3) मिसालों का इस्तेमाल करके, ताकि मुद्दा और अच्छी तरह समझ में आए।

सुननेवाले की राय जानने के लिए सवाल पूछिए

3, 4. (क) यह क्यों ज़रूरी है कि हम किसी व्यक्‍ति के विश्वास के बारे में जानने के लिए उससे सवाल पूछें? एक मिसाल देकर समझाइए।

3 सवाल पूछने से हमें यह जानने में मदद मिल सकती है कि एक व्यक्‍ति क्या विश्वास करता है। यह जानना ज़रूरी क्यों है? नीतिवचन 18:13 कहता है, “जो बिना बात सुने उत्तर देता है, वह मूढ़ ठहरता, और उसका अनादर होता है।” इसलिए हमें पहले यह पता लगाने की ज़रूरत है कि सामनेवाला असल में क्या विश्वास करता है? अगर हम ऐसा न करें, तो हो सकता है कि हम अपना काफी समय किसी बात को गलत साबित करने में लगा दें और फिर हमें पता चले कि वह व्यक्‍ति कभी उस बात को मानता ही नहीं था।—1 कुरिं. 9:26.

4 मिसाल के लिए, हो सकता है हम किसी के साथ नरक की शिक्षा के बारे में बात कर रहे हों। कुछ लोगों का मानना है कि नरक एक ऐसी जगह है जहाँ बुरे लोगों को आग में तड़पाया जाता है। दूसरे किसी और वजह से नरक की शिक्षा को मानते हैं। ऐसे में शायद हम घर-मालिक से कुछ ऐसा पूछ सकते हैं: “नरक के बारे में लोगों की अलग-अलग राय है। क्या मैं जान सकता हूँ इस बारे में आप क्या मानते हैं?” उसका जवाब सुनने के बाद, हम उसे यह समझने में मदद दे पाएँगे कि बाइबल उस बारे में क्या सिखाती है।

5. सवाल पूछने से कैसे हमें यह जानने में मदद मिल सकती है कि एक व्यक्‍ति क्यों किसी बात को मानता है?

5 सोच-समझकर पूछे गए सवालों से हमें यह जानने में भी मदद मिल सकती है कि एक व्यक्‍ति क्यों किसी बात को मानता है। मिसाल के लिए, मान लीजिए हम प्रचार करते वक्‍त किसी ऐसे व्यक्‍ति से मिलते हैं, जो कहता है कि वह परमेश्वर को नहीं मानता। हो सकता है यह सुनकर हम इस नतीजे पर पहुँच जाएँ कि वह विकासवाद को माननेवाला व्यक्‍ति है। (भज. 10:4) लेकिन कुछ लोग परमेश्वर पर विश्वास खो बैठे हैं, क्योंकि उन्होंने दूसरों को बहुत-से दुख झेलते देखा है या फिर खुद उन्होंने अपनी ज़िंदगी में बहुत-सी तकलीफें झेली हैं। वे यह बात नहीं समझ पाते कि एक प्यार करनेवाला सिरजनहार लोगों को दुख-तकलीफें झेलते कैसे देख सकता है। इसलिए अगर एक घर-मालिक कहता है, “मैं परमेश्वर को नहीं मानता,” तो हम शायद उससे पूछ सकते हैं, “क्या आप शुरू से ही ऐसा मानते आए हैं?” अगर वह व्यक्‍ति कहता है “नहीं,” तो शायद हम उससे पूछ सकते हैं कि क्या उसकी ज़िंदगी में ऐसा कुछ हुआ था, जिस वजह से वह परमेश्वर के वजूद पर शक करने लगा। उसका जवाब जानने के बाद, हमें यह तय करने में मदद मिल सकती है कि हम कैसे उसकी मदद करेंगे।—नीतिवचन 20:5 पढ़िए।

6. सवाल पूछने के बाद हमें क्या करना चाहिए?

6 सवाल पूछने के बाद, हमें ध्यान से उस व्यक्‍ति का जवाब सुनना चाहिए और उसे यह एहसास दिलाना चाहिए कि हम उसकी राय की कदर करते हैं। मिसाल के लिए, हो सकता है कोई आपसे कहे कि एक हादसे के बाद से उसे प्यार करनेवाले सिरजनहार के वजूद पर शक होने लगा है। सबसे पहले, अच्छा होगा अगर हम उसे बताएँ कि इस बारे में सोचना गलत नहीं कि क्यों हम पर दुख-तकलीफें आती हैं। फिर, हम समझा सकते हैं कि हम कैसे जानते हैं कि परमेश्वर वजूद में है। (हब. 1:2, 3) अगर हम सब्र दिखाएँ और प्यार-से बात करें, तो हो सकता है वह इस बारे में और भी जानना चाहे। *

आयतों से तर्क कीजिए

प्रचार काम में और भी असरदार होने के लिए क्या बात हमारी मदद करेगी? (पैराग्राफ 7 देखिए)

7. प्रचार काम में असरदार होने के लिए हमें क्या करना होगा?

7 प्रचार काम में हमारा सबसे ज़रूरी औज़ार है, बाइबल। यह हमें “हर अच्छे काम के लिए पूरी तरह से  योग्य और हर तरह से तैयार” होने में मदद देती है। (2 तीमु. 3:16, 17) लेकिन प्रचार में असरदार होने के लिए सिर्फ बहुत-सी आयतें पढ़ना काफी नहीं। इसके लिए ज़रूरी है कि हम आयतों से तर्क करना और उन्हें समझाना भी जानते हों। (प्रेषितों 17:2, 3 पढ़िए।) इस बात को समझने के लिए, आइए तीन उदाहरणों पर गौर करें।

8, 9. (क) जो मानते हैं कि यीशु परमेश्वर के बराबर है, उनसे तर्क करने का एक तरीका क्या है? (ख) आपने इस विषय पर लोगों से तर्क करने के लिए और कौन-सा तरीका अपनाया है?

8 उदाहरण 1: प्रचार के दौरान हमारी मुलाकात एक ऐसे व्यक्‍ति से होती है, जो मानता है कि यीशु परमेश्वर के बराबर है। हम इस घर-मालिक से तर्क करने के लिए किन आयतों का इस्तेमाल कर सकते हैं? शायद हम उसे यूहन्ना 6:38 पढ़ने के लिए कह सकते हैं, जहाँ यीशु ने कहा: “मैं अपनी मरज़ी नहीं बल्कि उसकी मरज़ी पूरी करने स्वर्ग से नीचे आया हूँ जिसने मुझे भेजा है।” यह आयत पढ़ने के बाद, हम उस व्यक्‍ति से पूछ सकते हैं: “अगर यीशु परमेश्वर है, तो उसे स्वर्ग से नीचे धरती पर किसने भेजा? क्या वह यीशु से महान नहीं होगा? बेशक, भेजनेवाला, भेजे हुए व्यक्‍ति से ज़्यादा महान होता है।”

9 हम फिलिप्पियों 2:9 भी पढ़ सकते हैं, जहाँ प्रेषित पौलुस समझाता है कि यीशु के मरने और जी उठाए जाने के बाद, परमेश्वर ने क्या किया। वह आयत कहती है: “परमेश्वर ने उसे [यीशु को] पहले से भी ऊँचा पद देकर महान किया और मेहरबान होकर उसे वह नाम दिया जो दूसरे हर नाम से महान है।” घर-मालिक के साथ इस आयत पर तर्क करने के लिए, हम पूछ सकते हैं: “अगर यीशु मरने से पहले परमेश्वर के बराबर था, और बाद में परमेश्वर ने उसे पहले से भी ऊँचा पद दिया, तो क्या इसका यह मतलब नहीं हुआ कि अब यीशु परमेश्वर से भी महान है? लेकिन कोई परमेश्वर से महान कैसे हो सकता है?” अगर एक व्यक्‍ति नेकदिल है और परमेश्वर के वचन का आदर करता है, तो इस तरह तर्क करने से हो सकता है वह इस बारे में और सीखना चाहे।—प्रेषि. 17:11.

10. (क) हम नरक की शिक्षा को माननेवाले व्यक्‍ति के साथ कैसे तर्क कर सकते हैं? (ख) आपने इस विषय पर लोगों के साथ कैसे तर्क किया है?

10 उदाहरण 2: एक घर-मालिक को यह मानना मुश्किल लगता है कि नरक जैसी कोई जगह नहीं है, जहाँ बुरे लोगों को हमेशा-हमेशा के लिए तड़पाया जाएगा। शायद वह नरक की शिक्षा को इसलिए मानता हो क्योंकि वह चाहता है कि बुरे लोगों को अपने किए की सज़ा मिले। जो व्यक्‍ति इस तरह सोचता है, उसके साथ हम कैसे तर्क कर सकते हैं? सबसे पहले, हम उसे इस बात का यकीन दिला सकते हैं कि बुरे लोगों का नाश ज़रूर किया जाएगा। (2 थिस्स. 1:9) फिर, हम उसे उत्पत्ति 2:16, 17 पढ़ने के लिए कह सकते हैं, जो दिखाता है कि पाप की सज़ा मौत है। हम उसे बता सकते हैं कि परमेश्वर ने ऐसा कभी नहीं कहा कि पाप की सज़ा नरक है।  फिर हम उत्पत्ति 3:19 पढ़ सकते हैं। इस आयत में परमेश्वर ने आदम से कहा कि उसके पाप की सज़ा यह होगी कि वह मिट्टी में मिल जाएगा। इसके बाद हम उससे पूछ सकते हैं, “अगर आदम वाकई नरक की आग में तड़पनेवाला होता, तो क्या परमेश्वर उससे कहता कि वह मिट्टी में मिल जाएगा?” इस तरह का सवाल पूछने से हो सकता है एक नेकदिल इंसान इस विषय पर गहराई से सोचे।

11. (क) जो मानते हैं कि सब अच्छे लोग स्वर्ग जाते हैं, उनके साथ तर्क करने का एक तरीका क्या है? (ख) आपने लोगों के साथ इस विषय पर कैसे तर्क किया है?

11 उदाहरण 3: प्रचार के दौरान हमारी मुलाकात एक ऐसे व्यक्‍ति से होती है, जो मानता है कि सब अच्छे लोग स्वर्ग जाते हैं। उसके इस विश्वास का, बाइबल के बारे में उसकी समझ पर भी असर पड़ सकता है। मिसाल के लिए, अगर हम प्रकाशितवाक्य 21:4 पढ़ें, तो हो सकता है वह सोचे कि यह आयत स्वर्ग में मिलनेवाले जीवन के बारे में बात कर रही है। (पढ़िए।) ऐसे में, आप उस व्यक्‍ति के साथ कैसे तर्क कर सकते हैं? उसे दूसरी बहुत-सी आयतें दिखाने के बजाय, हम उसका ध्यान उसी आयत में दिए इन शब्दों पर दिला सकते हैं: “न मौत रहेगी।” हम उससे पूछ सकते हैं: “क्या आप इस बात से सहमत हैं कि जब हम कहते हैं कि फलाँ बात न रहेगी, तो इसका मतलब है कि वह बात एक समय पर थी?” मुमकिन है वह इस सवाल का जवाब “हाँ” में देगा। फिर हम उससे कह सकते हैं कि स्वर्ग में मौत नहीं होती, सिर्फ धरती पर ही लोग मरते हैं। तो लाज़िमी है कि प्रकाशितवाक्य 21:4 में स्वर्ग नहीं, बल्कि धरती पर मिलनेवाली आशीषों के बारे में बताया गया है।—भज. 37:29.

मुद्दा समझाने के लिए मिसालें दीजिए

12. यीशु ने मिसालों का इस्तेमाल क्यों किया?

12 यीशु ने प्रचार करते वक्‍त मिसालों का इस्तेमाल किया। (मत्ती 13:34, 35 पढ़िए।) उसकी मिसालों से यह जानने में मदद मिलती थी कि कौन नेकदिल है और सच्चे दिल से यहोवा की सेवा करना चाहता है। (मत्ती 13:10-15) यीशु इसलिए भी मिसालें देता था, ताकि लोग उसकी सिखायी बातें याद रख सकें और उन्हें उसकी बातें सुनने में मज़ा आए। सिखाते वक्‍त हम कैसे मिसालों का इस्तेमाल कर सकते हैं?

13. आप किस मिसाल की मदद से यह सिखा सकते हैं कि परमेश्वर यीशु से ज़्यादा महान है?

13 आसान और समझ में आनेवाली मिसालों का इस्तेमाल करना सबसे फायदेमंद होता है। उदाहरण के लिए, अगर हम घर-मालिक को यह सिखाना चाहते हैं कि परमेश्वर यीशु से भी महान है, तो हम यह मिसाल दे सकते हैं: पहले हम कह सकते हैं कि यीशु और यहोवा दोनों ने ही अपने रिश्ते की तुलना एक पिता और बेटे के बीच के रिश्ते से की। (लूका 3:21, 22; यूह. 14:28) फिर हम उससे पूछ सकते हैं: “अगर आपको समझाना हो कि दो लोग बराबर हैं, तो आप परिवार के किस रिश्ते की मिसाल देंगे?” घर-मालिक शायद दो भाइयों या जुड़वा भाइयों का ज़िक्र करे। फिर हम कह सकते हैं: “हाँ, यह सही मिसाल होगी। अगर हम इतनी आसानी से इस मिसाल के बारे में सोच सकते हैं, तो क्या सबसे महान शिक्षक, यीशु अपने और यहोवा के रिश्ते को समझाने के लिए यह मिसाल नहीं दे सकता था? लेकिन ऐसा करने के बजाय, उसने कहा कि परमेश्वर उसका पिता है। इस तरह यीशु ने ज़ाहिर किया कि परमेश्वर उससे बड़ा है और उससे ज़्यादा अधिकार रखता है।”

14. कौन-सी मिसाल दिखाती है कि इस बात में कोई तुक नहीं बनता कि परमेश्वर बुरे लोगों को नरक में तड़पाने के लिए शैतान का इस्तेमाल करेगा?

14 आइए एक और उदाहरण पर गौर करें। कुछ देशों में लोगों का मानना है कि परमेश्वर ने बुरे लोगों को नरक में तड़पाने की ज़िम्मेदारी शैतान को दी है। हम एक माँ या पिता को यह देखने में कैसे मदद दे सकते हैं कि इस बात में कोई तुक नहीं बनता। हम उनसे पूछ सकते हैं, “अगर आपका बच्चा आपकी बात नहीं मानता और कई बुरे काम करने लगता है, तो आप क्या करेंगे?” मुमकिन है वे कहेंगे कि वे अपने बच्चे को सुधारने की कोशिश करेंगे। वे शायद कई बार बच्चे को समझाएँ कि वह बुरे काम करना छोड़ दे। (नीति. 22:15) इसके बाद हम  शायद पूछ सकते हैं, “अगर आपका बच्चा सुधरने से साफ इनकार कर देता है, तो आप क्या करेंगे?” ज़्यादातर माता-पिता कहेंगे कि ऐसे में वे बच्चे को सज़ा देंगे। फिर हम पूछ सकते हैं, “लेकिन अगर आपको पता चलता है कि कोई दुष्ट इंसान आपके बच्चे को बुरे काम करने के लिए बहका रहा है, तब आप क्या करेंगे?” बेशक, माँ या पिता को ऐसे इंसान पर बहुत गुस्सा आएगा। आखिर में इस मिसाल को देने के पीछे अपना मकसद बताते हुए, हम उनसे पूछ सकते हैं, “यह जानते हुए कि एक दुष्ट इंसान आपके बच्चे पर बुरा असर कर रहा है, क्या आप उस इंसान से कहेंगे कि वह आपकी तरफ से आपके बच्चे को सज़ा दे?” इसमें कोई दो राय नहीं कि उनका जवाब होगा “कभी नहीं।” शैतान ही वह दुष्ट व्यक्‍ति है, जो लोगों को बुरे काम करने के लिए बहकाता है। इससे साफ हो जाता है कि परमेश्वर बुरे लोगों को सज़ा देने के लिए शैतान का इस्तेमाल कतई नहीं करेगा।

संतुलन बनाए रखिए

15, 16. (क) हमें यह उम्मीद क्यों नहीं करनी चाहिए कि सभी लोग राज का संदेश कबूल करेंगे? (ख) असरदार तरीके से प्रचार करने के लिए यह ज़रूरी क्यों नहीं कि हम बहुत अच्छे शिक्षक हों? समझाइए। (बक्स “ जवाब देने में हमारी मदद करने के लिए एक औज़ार” भी देखिए।)

15 चाहे हम कितने ही अच्छे सवाल क्यों न पूछ लें, कितने ही बढ़िया तरीके से तर्क क्यों न कर लें, और कितनी ही अच्छी मिसालें क्यों न दे दें, सभी लोग राज का संदेश कबूल नहीं करेंगे। (मत्ती 10:11-14) यीशु इस धरती पर रहनेवाला सबसे महान शिक्षक था, फिर भी बहुत कम लोगों ने उसकी शिक्षा को कबूल किया।—यूह. 6:66; 7:45-48.

16 लेकिन तब क्या अगर हमें लगता है कि हम बहुत अच्छे शिक्षक नहीं हैं? तब भी, हम असरदार तरीके से प्रचार कर सकते हैं। (प्रेषितों 4:13 पढ़िए।) बाइबल हमें यकीन दिलाती है कि “वे सभी जो हमेशा की ज़िंदगी पाने के लायक अच्छा मन रखते” हैं, खुशखबरी ज़रूर कबूल करेंगे। (प्रेषि. 13:48) इसलिए आइए हम संतुलन बनाए रखें। बेशक, हमें सिखाने की कला में सुधार लाना चाहिए, लेकिन जब लोग खुशखबरी कबूल नहीं करते, तो हमें निराश नहीं होना चाहिए। अगर हम यहोवा पर और उसके ज़रिए दी जानेवाली तालीम पर निर्भर रहें, तो हम बेहतर शिक्षक बनेंगे, और इससे हमें और हमारी बात सुननेवालों, दोनों को फायदा होगा। (1 तीमु. 4:16) यहोवा ‘हर एक को जवाब’ देने में हमारी मदद कर सकता है। अगले लेख में हम सीखेंगे कि कैसे हम सुनहरे नियम पर अमल करके प्रचार काम में कामयाब हो सकते हैं।

^ पैरा. 6 1 अक्टूबर, 2009 की प्रहरीदुर्ग (अँग्रेज़ी) में दिया लेख, “क्या एक सिरजनहार में विश्वास करना मुमकिन है?” देखिए।