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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  मई 2014

यहोवा संगठित तरीके से काम करनेवाला परमेश्वर है

यहोवा संगठित तरीके से काम करनेवाला परमेश्वर है

“परमेश्वर गड़बड़ी का नहीं, बल्कि शांति का परमेश्वर है।”—1 कुरिं. 14:33.

1, 2. (क) परमेश्वर ने सबसे पहले किसकी सृष्टि की? (ख) यहोवा ने उसे कैसे इस्तेमाल किया? (ग) हम कैसे जानते हैं कि स्वर्गदूत संगठित तरीके से काम करते हैं?

हमारा सृष्टिकर्ता, यहोवा हर चीज़ कायदे से और तरतीब से करता है। सबसे पहले, उसने अपने इकलौते बेटे की सृष्टि की जिसे बाइबल “वचन” कहती है, क्योंकि वह परमेश्वर की तरफ से बोलनेवाला खास प्रतिनिधि है। बाइबल कहती है: “बहुत पहले, जब परमेश्वर ने किसी भी चीज़ की सृष्टि नहीं की थी, तब वचन परमेश्वर के साथ था।” वह अरबों-खरबों सालों से स्वर्ग में यहोवा की सेवा करता आया है। बाइबल यीशु के बारे में यह भी कहती है: “सारी चीज़ें उसी के [वचन के] ज़रिए वजूद में आयीं और एक भी चीज़ ऐसी नहीं जो उसके बिना वजूद में आयी हो।” आज से 2,000 से भी ज़्यादा साल पहले, यहोवा ने वचन को धरती पर सिद्ध इंसान, यीशु मसीह के तौर पर भेजा। यहोवा ने उससे जो कुछ करने के लिए कहा था, वह सब उसने वफादारी से किया।—यूह. 1:1-3, 14.

2 धरती पर आने से पहले, परमेश्वर के बेटे ने वफादारी से परमेश्वर के “कुशल कारीगर” के तौर पर सेवा की। (नीति. 8:30, अ न्यू हिंदी ट्रांस्लेशन) उसके ज़रिए, यहोवा ने स्वर्ग में करोड़ों स्वर्गदूतों की रचना की। (कुलु. 1:16) बाइबल हमें बताती है कि यहोवा के पास बहुत ही तरतीब से, या संगठित तरीके से काम करनेवाली स्वर्गदूतों की ‘सेनाएँ’ हैं: ‘हजारों हजार उसकी सेवा टहल कर रहे थे, और  लाखों लाख उसके साम्हने हाज़िर थे।’—भज. 103:21; दानि. 7:10.

3. (क) इस विश्व में कितने तारे हैं? (ख) तारों और ग्रहों को कैसे संगठित किया गया है?

3 जब यहोवा ने विश्व को बनाया, तो उसने इतने सारे तारों और ग्रहों को सिरजा कि हम उन्हें कभी-भी गिन नहीं पाएँगे। इस विश्व में कितने तारे हैं? द हूस्टन, टेक्सस, क्रॉनिकल नाम के अखबार में बताया गया था कि हाल में हुए एक अध्ययन के बाद, अब वैज्ञानिकों का मानना है कि इस पूरे विश्व में “300 सेकस्टिलियन” (3 के बाद 23 शून्य) तारे हैं, यानी वैज्ञानिकों ने पहले जो अनुमान लगाया था, उससे तीन गुना ज़्यादा। क्या ये तारे और ग्रह संगठित हैं? जी हाँ, तारों के समूहों को मंदाकिनियों में संगठित किया गया है। हर मंदाकिनी में कई ग्रह और अरबों-खरबों तारे हैं। ज़्यादातर मंदाकिनियों को समूहों में संगठित किया गया है। इनमें से हर समूह को क्लस्टर कहा जाता है। और क्लस्टरों को और भी बड़े समूहों में संगठित किया गया है, जिनमें से हर बड़े समूह को सूपर-क्लस्टर कहा जाता है।

4. हम कैसे कह सकते हैं कि परमेश्वर धरती पर अपने सेवकों को संगठित करता है?

4 स्वर्ग में स्वर्गदूतों को और विश्व में तारों और ग्रहों को बहुत ही खूबसूरती से संगठित किया गया है। (यशा. 40:26) इसलिए लाज़िमी है कि हमारा सिरजनहार धरती पर अपने सेवकों को भी संगठित करता है। उनका संगठित होना बेहद ज़रूरी भी है, क्योंकि उन्हें बहुत-से ज़रूरी काम पूरे करने हैं। हज़ारों सालों से यहोवा अपने लोगों को संगठित करता आया है, ताकि वे वफादारी से उसकी सेवा कर सकें। ऐसे बहुत-से उदाहरण हैं, जो साबित करते हैं कि वह उनके साथ रहा है और वह “गड़बड़ी का नहीं, बल्कि शांति का परमेश्वर” है।—1 कुरिंथियों 14:33, 40 पढ़िए।

पुराने ज़माने में परमेश्वर ने अपने लोगों को संगठित किया

5. धरती के लिए परमेश्वर के मकसद में कुछ वक्‍त के लिए रुकावट कैसे आ गयी?

5 जब यहोवा ने सबसे पहले इंसानों को बनाया, तो उसने उनसे कहा: “फूलो-फलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगनेवाले सब जन्तुओं पर अधिकार रखो।” (उत्प. 1:28) यहोवा ने करोड़ों लोगों को एक ही साथ नहीं बना दिया। आदम और हव्वा के बच्चे होते, फिर उन बच्चों के बच्चे होते, जब तक कि इंसान पूरी धरती पर नहीं फैल जाते। परमेश्वर का मकसद था कि वे पूरी धरती को फिरदौस बना दें। जब आदम और हव्वा ने परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानी, तो परमेश्वर के इस मकसद के पूरा होने में कुछ वक्‍त के लिए रुकावट आ गयी। (उत्प. 3:1-6) आदम और हव्वा के ज़्यादातर बच्चों ने यहोवा की सेवा नहीं की और कुछ समय बाद, “यहोवा ने देखा, कि मनुष्यों की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है सो निरन्तर बुरा ही होता है।” इस दुष्टता की वजह से “पृथ्वी परमेश्वर की दृष्टि में बिगड़ गई थी, और उपद्रव से भर गई थी।” इसलिए परमेश्वर ने फैसला किया कि वह पूरी धरती पर जलप्रलय लाकर सभी दुष्टों का नाश कर देगा।—उत्प. 6:5, 11-13, 17.

6, 7. (क) यहोवा ने नूह को क्यों बचाया? (लेख की शुरूआत में दी तसवीर देखिए।) (ख) उन सभी लोगों का क्या हुआ, जिन्होंने नूह की सुनने से इनकार कर दिया था?

6 लेकिन जलप्रलय में सभी लोग नाश नहीं हुए। “यहोवा के अनुग्रह की दृष्टि नूह पर बनी रही” क्योंकि वह एक “धर्मी पुरुष” था, जो “परमेश्वर ही के साथ साथ चलता रहा।” यहोवा ने उसे एक बड़ा जहाज़ बनाने की आज्ञा दी और ऐसा करने के लिए उसे सारी हिदायतें भी दीं। (उत्प. 6:8, 9, 14-16) उस जहाज़ को इस तरह बनाया गया था कि वह पानी पर तैर सके, ताकि उसमें इकट्ठा हुए सभी इंसान और जानवर जलप्रलय से बच निकलें। नूह और उसके परिवार ने ठीक वही किया, जो यहोवा ने उनसे कहा था। जब वे जानवरों को जहाज़ में ले आए, तो ‘यहोवा ने द्वार बन्द कर दिया।’—उत्प. 7:5, 16.

7 नूह ने लोगों को जलप्रलय के बारे में चेतावनी दी। मगर ज़्यादातर लोगों ने उसकी नहीं सुनी। (2 पत. 2:5) ईसा पूर्व 2370 में जलप्रलय की शुरूआत हुई। तब “जो जो भूमि पर थे, सो सब पृथ्वी पर से मिट गए।” लेकिन यहोवा ने वफादार नूह, उसके बेटों और उनकी पत्नियों को  जहाज़ में सुरक्षित रखा। (उत्प. 7:23) आज धरती पर सभी लोग वफादार नूह और उसके परिवार से आए हैं। मगर जिन्होंने नूह की चेतावनियों को सुनने से इनकार कर दिया, उनमें से कोई भी जलप्रलय से नहीं बच पाया।

कायदे और तरतीब से काम करने की वजह से आठ लोगों को जलप्रलय से बच निकलने में मदद मिली (पैराग्राफ 6, 7 देखिए)

8. क्या बात दिखाती है कि जब यहोवा ने अपने लोगों को कनान देश में जाने की आज्ञा दी, तब इसराएलियों को राष्ट्र के तौर पर संगठित किया गया था?

8 जलप्रलय के 800 से भी ज़्यादा साल बाद, परमेश्वर ने इसराएलियों को एक राष्ट्र के तौर पर संगठित किया। उसने उन्हें जीवन के हर पहलू से जुड़े कई कायदे-कानून दिए, ताकि उनकी ज़िंदगी व्यवस्थित तरीके से चले। उसने ऐसा खासकर उपासना के सिलसिले में किया। उदाहरण के लिए, उसने उनमें से कुछ को याजक और लेवी ठहराया। और कुछ स्त्रियों को उसने “मिलापवाले तम्बू के द्वार पर सेवा” करने के लिए ठहराया। (निर्ग. 38:8) यहोवा ने इस राष्ट्र को कनान देश में जाकर रहने की आज्ञा दी। लेकिन ज़्यादातर इसराएली डरते थे और उन्होंने जाने से इनकार कर दिया, इसलिए यहोवा ने उनसे कहा: “यपुन्ने के पुत्र कालिब और नून के पुत्र यहोशू को छोड़ कोई भी उस देश में न जाने पाएगा, जिसके विषय मैं ने शपथ खाई है कि तुम को उस में बसाऊंगा।” सिर्फ यहोशू और कालेब ही वादा किए गए देश की जासूसी करके एक अच्छी खबर लाए थे। (गिन. 14:30, 37, 38) बाद में, यहोवा ने इसराएलियों की अगुवाई करने के लिए यहोशू को चुना। (गिन. 27:18-23) जब यहोशू उन्हें कनान देश में ले जाने ही वाला था, तब यहोवा ने उससे कहा: “हियाव बान्धकर दृढ़ हो जा; भय न खा, और तेरा मन कच्चा न हो; क्योंकि जहां जहां तू जाएगा वहां वहां तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे संग रहेगा।”—यहो. 1:9.

9. राहाब यहोवा और उसके लोगों के बारे में कैसा महसूस करती थी?

9 जहाँ-जहाँ यहोशू गया, यहोवा परमेश्वर उसके साथ था। उदाहरण के लिए, ईसा पूर्व 1473 में इसराएली कनान देश के यरीहो शहर के पास डेरा डाले हुए थे। यहोशू ने दो जासूसों को यरीहो की जासूसी करने के लिए भेजा, जहाँ उनकी मुलाकात राहाब नाम की वेश्या से हुई। उस शहर के लोगों ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की, लेकिन राहाब ने उन्हें अपने घर की छत पर छिपा दिया। उसने इसराएली जासूसों से कहा: ‘मुझे तो निश्चय है कि यहोवा ने तुम लोगों को यह देश दिया है क्योंकि हम ने सुना है कि यहोवा  ने तुम्हारे साम्हने लाल समुद्र का जल सुखा दिया। और तुम लोगों ने एमोरियों के दोनों राजाओं को सत्यानाश कर डाला।’ फिर उसने कहा: “तुम्हारा परमेश्वर यहोवा ऊपर के आकाश का और नीचे की पृथ्वी का परमेश्वर है।” (यहो. 2:9-11) राहाब और उसके परिवार ने यहोवा के संगठित लोगों, या दूसरे शब्दों में कहें, तो उसके संगठन का साथ दिया। बाद में, जब इसराएलियों ने यरीहो पर जीत हासिल कर ली, तो यहोवा ने राहाब और उसके परिवार की जान बख्श दी। (यहो. 6:25) वफादार राहाब यहोवा और उसके संगठन का गहरा आदर करती थी।

पहली सदी के मसीही संगठित थे

10. (क) यीशु ने यहूदी धर्म-गुरुओं से क्या कहा? (ख) उसने ऐसा क्यों कहा?

10 जब वफादार यहोशू इसराएलियों का अगुवा था, तब उन्होंने एक-एक करके कनान देश के शहरों पर कब्ज़ा कर लिया। लेकिन बाद में, करीब 1,500 साल तक, इसराएली बार-बार यहोवा की आज्ञा तोड़ते रहे। जब यीशु धरती पर आया, तो इसराएली इस कदर यहोवा और उसके भविष्यवक्ताओं की बातों को अनसुना करने लगे थे कि यीशु ने यरूशलेम में रहनेवाले इसराएलियों को ‘भविष्यवक्ताओं के हत्यारे’ कहा। (मत्ती 23:37, 38 पढ़िए।) यहोवा ने यहूदी धर्म-गुरुओं को ठुकरा दिया क्योंकि उन्होंने उसकी आज्ञा नहीं मानी। यीशु ने उनसे कहा: “परमेश्वर का राज तुमसे ले लिया जाएगा और उस जाति को, जो इसके योग्य फल पैदा करती है, दे दिया जाएगा।”—मत्ती 21:43.

11, 12. (क) कौन-सी घटना दिखाती है कि यहोवा ने इसराएल राष्ट्र के बजाय, एक नए संगठन पर अपनी मंज़ूरी दी? (ख) कौन इस नए संगठन का हिस्सा बने?

11 यीशु के धरती पर आने के कुछ ही समय बाद, यहोवा ने इसराएल राष्ट्र को ठुकरा दिया। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि अब धरती पर यहोवा का कोई संगठन नहीं रहा। अब भी धरती पर वफादार सेवकों से बना उसका एक संगठन था, जो मसीह और उसकी शिक्षाओं को मानता था। ईसवी सन्‌ 33 में पिन्तेकुस्त के दिन, यहोवा ने इसराएल राष्ट्र के बजाय, एक नए संगठन पर अपनी मंज़ूरी दी। उस दिन यीशु के करीब 120 चेले इकट्ठा हुए थे, जब “अचानक आकाश से साँय-साँय करती तेज़ आँधी जैसी आवाज़ हुई और इससे सारा घर . . . गूँज उठा।” फिर, “उन्हें आग की लपटें दिखायी दीं जो जीभ जैसी थीं और ये अलग-अलग बँट गयीं और उनमें से हरेक के ऊपर एक-एक जा ठहरी। तब वे सभी पवित्र शक्‍ति से भर गए और जैसा पवित्र शक्‍ति उन्हें बोलने के काबिल कर रही थी, वे अलग-अलग भाषाएँ बोलने लगे।” (प्रेषि. 2:1-4) इस शानदार घटना से यह साफ हो गया कि बेशक यहोवा मसीह के चेलों से बने इस नए संगठन पर आशीष दे रहा था।

12 उसी दिन, यहोवा के नए संगठन में ‘करीब तीन हज़ार लोग शामिल हो गए।’ बाइबल यह भी कहती है कि “यहोवा हर दिन और भी ज़्यादा लोगों को उनमें शामिल करता रहा, जिन्हें वह उद्धार दिला रहा था।” (प्रेषि. 2:41, 47) यीशु के चेले प्रचार काम में इतने कामयाब हुए कि बाइबल कहती है: “परमेश्वर का वचन फैलता गया और यरूशलेम में चेलों की गिनती बड़ी तेज़ी से बढ़ती चली गयी।” यहाँ तक कि “बड़ी तादाद में याजक भी विश्वासी बन गए।” (प्रेषि. 6:7) इस तरह बहुत-से नेकदिल लोगों ने मसीह की शिक्षाएँ कबूल कीं। बाद में, जब यहोवा “गैर-यहूदियों” को मसीही मंडली में लाया, तो इससे साबित हो गया कि इस नए संगठन पर उसकी आशीष थी।—प्रेषितों 10:44, 45 पढ़िए।

13. यहोवा ने अपने नए संगठन को क्या काम सौंपा था?

13 इसमें कोई शक नहीं था कि परमेश्वर ने मसीह के चेलों को क्या काम सौंपा था। धरती पर रहते वक्‍त यीशु ने उनके लिए एक मिसाल रखी थी। अपने बपतिस्मे के कुछ ही वक्‍त बाद, यीशु ने ‘स्वर्ग के राज’ के बारे में प्रचार करना शुरू कर दिया। (मत्ती 4:17) यीशु ने अपने चेलों को भी यही काम करना सिखाया। उसने उनसे यह भी कहा: “तुम . . . यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया देश में यहाँ तक कि दुनिया के सबसे दूर के इलाकों में मेरे बारे में गवाही दोगे।” (प्रेषि. 1:8) क्या यीशु के चेलों को समझ में आया कि उन्हें क्या काम करना था? बेशक। मिसाल के लिए, पिसिदिया इलाके के अंताकिया शहर में, पौलुस और बरनबास ने निडर होकर विरोध करनेवाले यहूदियों से कहा:  “यह ज़रूरी था कि परमेश्वर का वचन पहले तुम यहूदियों को सुनाया जाए। मगर इसलिए कि तुम इसे ठुकराकर खुद से दूर कर रहे हो और खुद को हमेशा की ज़िंदगी के लायक नहीं ठहराते, इसलिए देखो! हम दूसरी जातियों में जा रहे हैं। दरअसल यहोवा ने यह कहकर हमें आज्ञा दी है, ‘मैंने तुम्हें दूसरी जातियों के लिए रौशनी ठहराया है ताकि तुम पृथ्वी की छोर तक जाकर यह ऐलान करो कि मैं किसके ज़रिए लोगों का उद्धार करूँगा।’” (प्रेषि. 13:14, 45-47) पहली सदी से यहोवा के संगठन का धरती पर मौजूद हिस्सा, दूसरों को यह बता रहा है कि यहोवा ने मानवजाति को बचाने के लिए क्या-क्या किया है।

परमेश्वर के सेवक बच निकले

14. (क) पहली सदी में यरूशलेम का क्या हुआ? (ख) इस विनाश से कौन बचे?

14 ज़्यादातर यहूदियों ने यीशु के बारे में खुशखबरी कबूल नहीं की। और जब यीशु ने उन्हें बताया कि यरूशलेम का क्या अंजाम होगा, तो उन्होंने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। उसने अपने चेलों को आगाह किया था: “जब तुम यरूशलेम को डेरा डाली हुई फौजों से घिरा हुआ देखो, तब जान लेना कि उसके उजड़ने का समय पास आ गया है। इसके बाद जो यहूदिया में हों, वे पहाड़ों की तरफ भागना शुरू कर दें और जो यरूशलेम शहर के अंदर हों, वे बाहर निकल जाएँ और जो देहातों में हों वे इस शहर के अंदर न जाएँ।” (लूका 21:20, 21) ठीक जैसे यीशु ने भविष्यवाणी की थी, वैसा ही हुआ। ईसवी सन्‌ 66 में, यहूदियों की बगावत का मुँह तोड़ जवाब देने के लिए सेस्टियस गैलस की कमान में रोमी फौजों ने यरूशलेम पर हमला बोला। उन्होंने यरूशलेम को घेर लिया और उसका नाश करने ही वाले थे। लेकिन फिर अचानक, वे वहाँ से चले गए। इससे यीशु के चेलों के सामने यरूशलेम और यहूदिया छोड़ने का रास्ता खुल गया। इतिहासकार युसेबियस के मुताबिक, बहुत-से मसीही यरदन नदी पार करके पेरिया प्रांत में बसे पेल्ला शहर के पहाड़ों की तरफ भाग गए। ईसवी सन्‌ 70 में, जनरल टाइटस की कमान में रोमी फौजें वापस आ गयीं और उन्होंने यरूशलेम को नेस्तनाबूद कर दिया। और मसीहियों का क्या हुआ? यीशु की चेतावनी पर ध्यान देने की वजह से वे उस विनाश से बच गए।

15. किन हालात के बावजूद, बहुत-से लोग मसीही बने?

15 पहली सदी में, मसीहियों का कड़ा विरोध किया गया और उनके विश्वास की परीक्षा हुई। इसके बावजूद, बहुत-से लोग मसीही बने। (प्रेषि. 11:19-21; 19:1, 19, 20) ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि मसीही मंडली पर परमेश्वर की मंज़ूरी थी।—नीति. 10:22.

16. अपना विश्वास मज़बूत बनाए रखने के लिए सभी मसीहियों को क्या करना था?

16 अपना विश्वास मज़बूत बनाए रखने के लिए और एकता में बने रहने के लिए, उन सभी मसीहियों को अपनी तरफ से मेहनत करनी थी। उन्हें शास्त्र का अध्ययन करना था, लगातार सभाओं में हाज़िर होना था और प्रचार काम में जोश से हिस्सा लेना था। मंडली से जुड़े सभी काम कायदे और तरतीब से किए जाते थे। उस वक्‍त मंडलियों में प्राचीन और सहायक सेवक थे, जो भाई-बहनों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे और उनकी कड़ी मेहनत से मंडलियों को फायदा होता था। (फिलि. 1:1; 1 पत. 5:1-4) साथ ही, मंडलियाँ पौलुस जैसे सफरी निगरानों के दौरों का भी लुत्फ उठाती थीं। (प्रेषि. 15:36, 40, 41) यह वाकई गौर करने लायक है कि पहली सदी के मसीहियों की उपासना और आज हमारी उपासना में कितनी समानताएँ हैं! हम इतने शुक्रगुज़ार हैं कि यहोवा हमेशा से अपने सेवकों को संगठित करता आया है। *

17. अगले लेख में किस बारे में चर्चा की जाएगी?

17 हम आखिरी दिनों में जी रहे हैं और जल्द ही शैतान की दुनिया मिट जाएगी। वहीं दूसरी तरफ, परमेश्वर के संगठन का धरती पर मौजूद हिस्सा पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ी से आगे बढ़ता जा रहा है। क्या आप यहोवा के संगठन के साथ-साथ आगे बढ़ रहे हैं? अगले लेख में बताया जाएगा कि आप यह कैसे कर सकते हैं।

^ पैरा. 16 15 जुलाई, 2002 की प्रहरीदुर्ग में प्रकाशित किए गए लेख, “मसीही, आत्मा और सच्चाई से उपासना करते हैं” और “वे सत्य पर चलते रहते हैं” देखिए। आज यहोवा के संगठन के धरती पर मौजूद हिस्से के बारे में ज़्यादा जानकारी के लिए किताब जेहोवाज़ विटनेसेज़—प्रोक्लेमर्स ऑफ गॉड्स किंगडम और ब्रोशर आज कौन यहोवा की मरज़ी पूरी कर रहे हैं? देखिए।