इस जानकारी को छोड़ दें

सैकेंडरी मैन्यू को छोड़ दें

विषय-सूची को छोड़ दें

यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  अप्रैल 2014

 जीवन कहानी

पूरे समय की सेवा—मुझे कहाँ ले गयी

पूरे समय की सेवा—मुझे कहाँ ले गयी

पूरे समय की सेवा में बिताए 65 सालों को याद करते हुए, मैं पूरे यकीन के साथ कह सकता हूँ कि मेरी ज़िंदगी बहुत खुशनुमा रही है। इसका यह मतलब नहीं कि मेरी ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव नहीं आए या मैंने ऐसे दिन नहीं देखे जब मैं निराश हुआ। (भज. 34:12; 94:19) लेकिन कुल मिलाकर, मेरी ज़िंदगी मकसद-भरी रही है और मैनें ढेरों आशीषों का लुत्फ उठाया है।

7 सितंबर, 1950 को मैं ब्रुकलिन बेथेल परिवार का सदस्य बना। उस वक्‍त बेथेल परिवार में कई अलग-अलग देशों से आए 355 भाई-बहन थे। और वहाँ 19 से लेकर 80 साल तक के हर उम्र के भाई-बहन थे। उनमें से कई अभिषिक्‍त मसीही थे।

मैंने यहोवा की सेवा करनी कैसे शुरू की

मेरे बपतिस्मा के दिन, जब मैं 10 साल का था

“आनंदित परमेश्वर” की सेवा करना मैंने अपनी माँ से सीखा। (1 तीमु. 1:11) मैं बहुत छोटा था, जब उन्होंने यहोवा की सेवा करनी शुरू की। एक जुलाई, 1939 को, जब मैं 10 साल का था, मैंने अमरीका के नेब्रास्का राज्य के कोलम्बस शहर में हुए एक ज़ोन सम्मेलन (जिसे आज सर्किट सम्मेलन कहा जाता है) में बपतिस्मा लिया। हम करीब 100 लोग भाई जोसफ रदरफर्ड के ज़रिए दिए गए एक भाषण की रिकॉर्डिंग सुनने के लिए किराए पर लिए एक छोटे-से हॉल में इकट्ठा हुए थे। भाषण का विषय था “फासिस्टवाद या आज़ादी।” अभी आधा ही भाषण खत्म हुआ था कि एक भीड़ हॉल के बाहर जमा हो गयी। भीड़ ज़बरदस्ती अंदर घुस आयी, हमारी सभा बीच में रोक दी और हमें शहर से बाहर खदेड़ दिया। हम एक भाई के घर में इकट्ठा हुए, जो शहर से ज़्यादा दूर नहीं था और वहाँ हमने बाकी का कार्यक्रम सुना। जैसा कि आप अंदाज़ा लगा सकते हैं, मैं अपने बपतिस्मे की तारीख आज तक नहीं भूला हूँ।

मेरी माँ ने बड़ी लगन से सच्चाई में मेरी परवरिश की। हालाँकि मेरे पिताजी एक अच्छे इंसान और एक अच्छे पिता थे, लेकिन वे धर्म में या मेरी आध्यात्मिकता में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं लेते थे। मेरी माँ और ओमाहा मंडली के दूसरे साक्षियों ने मेरा बहुत हौसला बढ़ाया, जिसकी मुझे बेहद ज़रूरत थी।

एक नयी दिशा

जब मेरी हाई स्कूल की पढ़ाई खत्म होनेवाली थी, तब मुझे फैसला करना था कि मैं अपनी ज़िंदगी में आगे क्या करूँगा। स्कूल में हर साल गर्मियों की छुट्टियों में, मैं अपनी उम्र के दूसरे भाई-बहनों के साथ वेकेशन पायनियर (जिसे अब सहयोगी पायनियर कहा जाता है) सेवा करता था।

दो जवान अविवाहित भाई, जॉन चिमिक्लिस और टेड जारज़, जो हाल ही में गिलियड स्कूल की सातवीं क्लास से ग्रैजुएट हुए थे, हमारे इलाके में सफरी काम करने आए। मुझे यह जानकर बहुत हैरानी हुई कि उनकी उम्र बस 21-22 साल ही थी। मैं उस वक्‍त 18 साल का था और बहुत जल्द मेरी हाई स्कूल की पढ़ाई खत्म होनेवाली थी। मुझे आज भी याद है जब भाई चिमिक्लिस ने मुझसे पूछा था कि मैं अपनी ज़िंदगी में क्या करना चाहता हूँ। जब मैंने उन्हें अपना लक्ष्य बताया,  तो उन्होंने मुझे बढ़ावा दिया: “शाबाश, सीधे पूरे समय की सेवा शुरू कर दो। क्या पता ये तुम्हें कहाँ तक ले जाए।” उस सलाह ने, साथ ही उन भाइयों की अच्छी मिसाल ने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी। इसलिए हाई स्कूल की पढ़ाई खत्म करने के बाद, मैंने सन्‌ 1948 में पायनियर सेवा शुरू की।

मैं बेथेल कैसे आया

जुलाई 1950 में मैं और मेरे माता-पिता न्यू यॉर्क सिटी के यैंकी स्टेडियम में रखे गए अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन में हाज़िर हुए। अधिवेशन के दौरान, मैं बेथेल में सेवा करने की इच्छा रखनेवालों के लिए रखी गयी सभा में हाज़िर हुआ। वहाँ मैंने अर्ज़ी भरी, जिसमें मैंने लिखा कि मुझे बेथेल में सेवा करने में बहुत खुशी होगी।

हालाँकि मेरे पिताजी को मेरे पायनियर सेवा करने और घर पर रहने से कोई एतराज़ नहीं था, लेकिन वे चाहते थे कि उनके साथ रहने-खाने का खर्च कुछ हद तक मैं खुद उठाऊँ। इसलिए अगस्त महीने की शुरूआत में एक दिन मैं नौकरी ढूँढ़ने घर से निकल पड़ा। रास्ते में पहले मैं डाक देखने गया। मैंने देखा कि मेरे लिए ब्रुकलिन से एक खत आया था। वह खत भाई नेथन एच. नॉर की तरफ से था। उन्होंने लिखा था: “बेथेल में सेवा करने की आपकी अर्ज़ी हमें मिल गयी है। आपने कहा है कि आप तब तक बेथेल में रहने के लिए तैयार हैं, जब तक कि प्रभु आपको ले नहीं जाता। इसलिए मैं चाहूँगा कि आप 7 सितंबर, 1950 को 124 कोलम्बिया हाइट्स, ब्रुकलिन, न्यू यॉर्क में बेथेल में रिपोर्ट करें।”

उस दिन जब मेरे पिताजी काम से घर लौटे, तो मैंने उन्हें बताया कि मुझे एक नौकरी मिल गयी है। उन्होंने कहा: “शाबाश! तो तुम कहाँ नौकरी करोगे?” मैंने जवाब दिया, “ब्रुकलिन बेथेल में, जहाँ मुझे हर महीने 10 डॉलर मिलेंगे।” यह सुनकर उन्हें थोड़ा झटका लगा, मगर उन्होंने कहा कि अगर मेरा यही फैसला है, तो मुझे इसमें कामयाब होने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। इसके कुछ ही समय बाद, 1953 में यैंकी स्टेडियम में हुए एक अधिवेशन में उन्होंने बपतिस्मा लिया।

अपने पायनियर साथी, एल्फ्रेड नुसरल्ला के साथ

खुशी की बात है कि मेरे साथ पायनियर सेवा करनेवाले भाई एल्फ्रेड नुसरल्ला को भी उसी वक्‍त बेथेल में सेवा करने का न्यौता मिला और हम दोनों ने वहाँ तक जाने के लिए साथ में सफर किया। आगे चलकर, उसने शादी कर ली और वह और उसकी पत्नी, जोऐन, गिलियड स्कूल गए, जिसके बाद उन्होंने लेबनान देश में मिशनरी सेवा की और फिर वापस अमरीका आकर सफरी काम किया।

बेथेल में ज़िम्मेदारियाँ

बेथेल में मुझे सबसे पहले जिल्दसाज़ी विभाग (बाइन्ड्री) में काम करने के लिए कहा गया। जिस किताब पर मैंने सबसे पहले काम किया था, वह थी धर्म ने मानवजाति के लिए क्या किया है? (अँग्रज़ी)। जिल्दसाज़ी में करीब आठ महीने काम करने के बाद, मुझे सेवा विभाग में भाई थॉमस जे. सलिवन की निगरानी में काम करने के लिए भेजा गया। उनके साथ काम करके मुझे बहुत अच्छा लगा और संगठन में सालों से काम करने की वजह से उन्होंने आध्यात्मिक मामलों में जो बुद्धि और अंदरूनी समझ हासिल की थी, उससे भी मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला।

सेवा विभाग में करीब तीन साल बिताने के बाद, छपाई विभाग के निगरान, भाई मैक्स लारसन ने मुझसे कहा कि भाई नॉर मुझसे मिलना चाहते हैं। मैं सोचने लगा कि कहीं मुझसे कोई गलती तो नहीं हो गयी। मुझे यह जानकर कितनी राहत मिली जब भाई नॉर ने कहा कि वे जानना चाहते हैं कि क्या आगे चलकर मेरा बेथेल छोड़ने का कोई इरादा है। उन्हें कुछ वक्‍त के लिए अपने दफ्तर में एक भाई की ज़रूरत थी, और वे जानना चाहते थे कि क्या मैं यह ज़िम्मेदारी निभा सकूँगा। मैंने उनसे कहा कि मेरा बेथेल छोड़ने का कोई इरादा नहीं है। नतीजा, अगले 20 सालों तक मुझे उनके दफ्तर में काम करने का सम्मान मिला।

मैं अकसर कहता हूँ कि मैं कभी पैसों से उस शिक्षा को खरीद नहीं सकता, जो मैंने भाई सलिवन और भाई नॉर के साथ काम करने से, साथ ही बेथेल में दूसरे भाइयों के साथ काम करने से हासिल की, जैसे कि भाई मिल्टन हेन्शल, क्लॉस जेनसन, मैक्स लारसन, हूगो रीमर और ग्रान्ट सूटर के साथ। *

 जिन भाइयों के साथ मैंने सेवा की, वे संगठन के लिए जो भी काम करते थे, बहुत ही तरतीब और कायदे से करते थे। भाई नॉर बिना थके काम करते रहते थे और चाहते थे कि जितना हो सके, राज का काम आगे बढ़ता जाए। उनके दफ्तर में काम करनेवाले दूसरे भाइयों को उनसे बात करने में कोई हिचकिचाहट महसूस नहीं होती थी। किसी मामले में अगर हमारी राय उनसे अलग भी होती, तब भी हम खुलकर अपनी राय उन्हें बता सकते थे, और इस बात का यकीन रख सकते थे कि वे हमसे नाराज़ नहीं होंगे।

एक बार भाई नॉर ने छोटी-छोटी बातों का खयाल रखने के बारे में मुझसे बात की। मिसाल के लिए, उन्होंने बताया कि जब वे छपाई विभाग के निगरान थे, तो भाई रदरफर्ड उन्हें फोन करके कहते: “भाई नॉर, जब आप खाना खाने के लिए फैक्टरी से निकलें, तो मेरे लिए कुछ रबर लेते आइएगा। मुझे उनकी ज़रूरत है।” भाई नॉर ने बताया कि वे फौरन सप्लाई रूम जाते, कुछ रबर लेते और उन्हें अपनी जेब में रख लेते। फिर 12 बजे वे उन्हें भाई रदरफर्ड के दफ्तर में ले जाकर दे देते। ये एक छोटी-सी बात थी, लेकिन भाई रदरफर्ड के लिए यह बहुत काम की चीज़ थी। फिर भाई नॉर ने मुझसे कहा: “मुझे अपनी मेज़ पर छिली हुई पेंसिलें पसंद हैं। इसलिए कृपया हर सुबह उन्हें वहाँ रख दीजिएगा।” इसके बाद, कई सालों तक मैंने इस बात का ध्यान रखा कि उनकी पेंसिलें अच्छी तरह छिली हों।

भाई नॉर अकसर कहते कि जब हमें कुछ खास काम करने के लिए कहा जाता है, तो ज़रूरी है हम हिदायतों को बहुत ध्यान से सुनें। एक दफा उन्होंने मुझे एक काम करने के लिए कहा और बारीकी से निर्देश दिए, लेकिन मैंने उनकी बात ध्यान से नहीं सुनी। नतीजा, मेरी वजह से उन्हें बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ी। मुझे बहुत बुरा लग रहा था, इसलिए मैंने उन्हें एक छोटी-सी चिट्ठी लिखी और कहा कि मुझे अपने किए पर बहुत अफसोस है और मुझे लगता है कि भलाई इसी में है कि मुझे उनके दफ्तर से हटाकर कहीं और काम दे दिया जाए। उसी सुबह कुछ देर बाद भाई नॉर मेरी मेज़ पर आए। उन्होंने कहा, “रॉबर्ट, मुझे तुम्हारी चिट्ठी मिली। तुमने गलती की। मैंने तुमसे उस बारे में बात की और मुझे यकीन है कि आगे से तुम और भी सावधानी बरतोगे। अब चलो दोनों काम पर लग जाएँ।” उनकी दया और उनका प्यार मेरे दिल को छू गया।

शादी करने की ख्वाहिश

बेथेल में आठ साल सेवा करने के बाद, बेथेल सेवा में लगे रहने के अलावा मेरा और कोई इरादा नहीं था। लेकिन, फिर एक बदलाव आया। सन्‌ 1958 में यैंकी स्टेडियम और पोलो ग्राउंड्स में रखे गए अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन के आस-पास मैंने लरेन ब्रुक्स को देखा। मैं उससे 1955 में मिला था, जब वह कनाडा के मॉन्ट्रिऑल शहर में पायनियर सेवा कर रही थी। पूरे समय की सेवा के बारे में उसका रवैया कमाल का था और यहोवा का संगठन उसे जहाँ भी भेजता, वहाँ जाने के लिए वह तैयार थी। मुझे उसकी ये दोनों बातें बहुत पसंद आयीं। लरेन का लक्ष्य गिलियड स्कूल जाने का था। सन्‌ 1956 में, जब वह 22 साल की थी, उसे गिलियड स्कूल की 27वीं क्लास में हाज़िर होने का न्यौता मिला। स्कूल के बाद, उसे ब्राज़ील में मिशनरी के तौर पर सेवा करने के लिए भेजा गया। सन्‌ 1958 में मैंने और लरेन ने दोबारा अपनी जान-पहचान बढ़ायी और लरेन ने मुझसे शादी करने का प्रस्ताव कबूल किया। हमने तय कर लिया कि अगले साल हम शादी कर लेंगे और हमारी इच्छा थी कि हम साथ मिलकर मिशनरी सेवा करें।

जब मैंने भाई नॉर को अपने इरादों के बारे में बताया, तो उन्होंने सुझाव दिया कि हम तीन साल इंतज़ार करें और उसके बाद शादी  करें और ब्रुकलिन बेथेल में सेवा करें। उस वक्‍त, अगर एक जोड़ा शादी करने के बाद बेथेल में सेवा करते रहना चाहता था, तो ज़रूरी था कि उनमें से एक को बेथेल में सेवा करते हुए कम-से-कम दस साल बीत चुके हों और दूसरे को कम-से-कम तीन। इसलिए लरेन शादी से पहले दो साल ब्राज़ील बेथेल में और फिर एक साल ब्रुकलिन बेथेल में सेवा करने के लिए राज़ी हो गयी।

अपनी सगाई के पहले दो साल हम सिर्फ खत के ज़रिए एक-दूसरे के साथ संपर्क में रहे। टेलीफोन से बात करना बहुत महँगा था और उन दिनों ई-मेल भी नहीं होता था! 16 सितंबर, 1961 को हमारी शादी हुई और हमें यह सम्मान मिला कि भाई नॉर ने हमारी शादी का भाषण दिया। इसमें कोई शक नहीं कि वे तीन साल काटना बहुत मुश्किल था, ऐसा लगता था कि वे कभी खत्म ही नहीं होंगे। लेकिन आज जब हम अपनी शादी के 50 से भी ज़्यादा साल बाद पीछे मुड़कर देखते हैं, और गौर करते हैं कि किस तरह हमारी ज़िंदगी संतुष्टि और खुशियों-भरी रही, तो हम कह सकते हैं कि सब्र रखने का फल वाकई मीठा निकला!

हमारी शादी के दिन। बायीं तरफ से: नेथन एच. नॉर, पट्रिशिया ब्रुक्स (लरेन की बहन), लरेन और मैं, कर्टिस जॉनसन, फे और रॉए वॉलन (मेरे माता-पिता)

सेवा में मिले सम्मान

सन्‌ 1964 में मुझे ज़ोन निगरान के तौर पर दूसरे देशों का दौरा करने का सम्मान मिला। उस वक्‍त पत्नियों को इन दौरों पर अपने पति के साथ नहीं भेजा जाता था। लेकिन 1977 में इस इंतज़ाम में बदलाव आया और पत्नियाँ भी अपने पति के साथ सफर करने लगीं। उस साल मैं और लरेन, भाई ग्रान्ट सूटर और उनकी पत्नी ईडिथ सूटर के साथ जर्मनी, ऑस्ट्रिया, ग्रीस, कुप्रुस, तुर्की और इसराइल के शाखा दफ्तरों में दौरे के लिए गए। कुल मिलाकर, अब तक मैं करीब 70 देशों में दौरे के लिए जा चुका हूँ।

सन्‌ 1980 में, ब्राज़ील में दौरा करते वक्‍त हम बेलेम नाम के एक शहर में गए, जो भूमध्य रेखा पर स्थित है। लरेन ने इस शहर में पहले मिशनरी सेवा की थी। हम मेनॉस नाम के एक शहर में भाइयों से मिलने के लिए भी रुके। वहाँ एक स्टेडियम में भाषण के दौरान हमने एक समूह को अलग से बैठे देखा। लेकिन ब्राज़ीलवासियों के रिवाज़ के मुताबिक, एक-दूसरे से मिलते वक्‍त इन लोगों में से न तो स्त्रियाँ एक-दूसरे के गाल चूम रही थीं, और न ही पुरुष एक-दूसरे से हाथ मिला रहे थे। वजह क्या थी?

ये हमारे ही प्यारे भाई-बहन थे, जो अमेज़न वर्षा-वन के अंदरूनी इलाके में बसी कोढ़ियों की बस्ती से आए थे। उनकी बीमारी दूसरों को न लगे, इसलिए वे वहाँ हाज़िर दूसरे लोगों को छूना नहीं चाहते थे। लेकिन उन्होंने हमारे दिल ज़रूर छू लिए, और हम उनके खुशी से दमकते चेहरे कभी नहीं भूल सकते! यशायाह की किताब में लिखे ये शब्द कितने सच हैं: “मेरे दास हर्ष के मारे जयजयकार करेंगे।”—यशा. 65:14.

मकसद और आशीषों से भरी ज़िंदगी

मैं और लरेन अकसर यहोवा की सेवा में बिताए 60 से भी ज़्यादा सालों को याद करते हैं। हमने यहोवा के संगठन के ज़रिए मिलनेवाले उसके निर्देशों को जिस तरह माना, उसकी वजह से हमें जो ढेरों आशीषें मिली हैं, उनके लिए हम बहुत शुक्रगुज़ार हैं। हालाँकि अब मैं पहले की तरह पूरी दुनिया में घूम नहीं सकता, लेकिन मैं शासी निकाय के मददगार के तौर पर अपना रोज़ का काम ज़रूर पूरा कर पाता हूँ। मुझे प्रबंधक-समिति और सेवा-समिति के साथ काम करने की ज़िम्मेदारी दी गयी है। इस तरह, पूरी दुनिया में फैले हमारे भाई-बहनों का साथ देने में मुझे एक छोटी-सी भूमिका अदा करने का जो सम्मान मिला, उसकी मैं बहुत कदर करता हूँ। यह देखकर हमें आज भी हैरानी होती है कि इतने सारे जवान भाई और बहन, पूरे समय की सेवा करने के लिए आगे आए हैं और वही रवैया दिखा रहे हैं, जो यशायाह का था, जिसने कहा: “मैं यहां हूं! मुझे भेज।” (यशा. 6:8) वाकई, इतने बड़े पैमाने पर सेवा करनेवाले ये भाई-बहन, सर्किट निगरान के ज़रिए दी गयी वह सलाह याद दिलाते हैं, जो उन्होंने बहुत पहले मुझसे कही थी: “सीधे पूरे समय की सेवा शुरू कर दो। क्या पता ये तुम्हें कहाँ तक ले जाए।”

^ पैरा. 20 इनमें से कुछ भाइयों की जीवन कहानी पढ़ने के लिए प्रहरीदुर्ग (अँग्रेज़ी) के ये अंक देखिए: थॉमस जे. सलिवन (15 अगस्त, 1965); क्लॉस जेनसन (15 अक्टूबर, 1969); मैक्स लारसन (1 सितंबर, 1989); हूगो रीमर (15 सितंबर, 1964); और ग्रान्ट सूटर (1 सितंबर, 1983)।