इस जानकारी को छोड़ दें

सैकेंडरी मैन्यू को छोड़ दें

विषय-सूची को छोड़ दें

यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  मार्च 2014

अविश्वासी रिश्तेदारों के दिल तक पहुँचना

अविश्वासी रिश्तेदारों के दिल तक पहुँचना

“अपने घर, अपने रिश्तेदारों के पास जा और यहोवा ने जो कुछ तेरे लिए किया है और जो दया तुझ पर दिखायी है, वे सारी बातें उन्हें बता।” ये शब्द यीशु मसीह ने एक ऐसे व्यक्‍ति से कहे थे, जो उसका चेला बनना चाहता था। उस वक्‍त यीशु शायद गडारा शहर के पास था, जो गलील सागर के दक्षिण-पूर्व की तरफ है। यीशु के ये शब्द दिखाते हैं कि वह इंसानों की एक बुनियादी खासियत से अच्छी तरह वाकिफ था, और वह है कोई दिलचस्प या खास बात अपने रिश्तेदारों के साथ बाँटने की हमारी तमन्ना।—मर. 5:19.

आज भी लोगों में यह खासियत देखी जा सकती है, हालाँकि कुछ संस्कृतियों के लोगों में यह दूसरों से ज़्यादा पायी जाती है। इसलिए जब एक शख्स सच्चे परमेश्वर, यहोवा की उपासना करने लगता है, तो आम तौर पर वह यह बात अपने रिश्तेदारों को बताना चाहता है। मगर जब अपने रिश्तेदारों को सच्चाई बताने की बात आती है, तो एक व्यक्‍ति को यह कैसे करना चाहिए? वह अपने उन रिश्तेदारों के दिल तक कैसे पहुँच सकता है, जो किसी दूसरे धर्म को मानते हैं, या फिर किसी भी धर्म को नहीं मानते? बाइबल इस बारे में बेहतरीन और कारगर सलाह देती है।

“हमें मसीहा मिल गया है”

पहली सदी में, अन्द्रियास उन लोगों में से एक था, जिन्होंने सबसे पहले यीशु को मसीहा के तौर पर पहचाना था। और उसने सबसे पहले यह बात किसको जाकर बतायी? “अन्द्रियास सबसे पहले अपने सगे भाई शमौन से मिला और उससे कहा: ‘हमें मसीहा मिल गया है।’” अन्द्रियास शमौन पतरस को यीशु के पास ले गया, और इस तरह उसने पतरस को यीशु का एक चेला बनने का मौका दिया।—यूह. 1:35-42.

करीब छ: साल बाद जब पतरस याफा में रह रहा था, तब उसे उत्तर की तरफ बसे कैसरिया में कुरनेलियुस नाम के एक सेना-अफसर के घर जाने का न्यौता मिला। जब पतरस वहाँ पहुँचा, तो कुरनेलियुस के घर कौन-कौन आया हुआ था? “बेशक, वहाँ कुरनेलियुस उनका [यानी पतरस और उसके साथ सफर कर रहे भाइयों का] इंतज़ार कर रहा था और उसने अपने रिश्तेदारों और करीबी दोस्तों को अपने यहाँ इकट्ठा किया हुआ था।” इस तरह, कुरनेलियुस ने अपने रिश्तेदारों को यह मौका दिया कि वे पतरस की बातें  सुन सकें और सुनी हुई बातों के आधार पर खुद अपने लिए फैसला ले सकें।—प्रेषि. 10:22-33.

जिस तरह अन्द्रियास और कुरनेलियुस अपने रिश्तेदारों के साथ पेश आए, उससे हम क्या सीख सकते हैं?

अन्द्रियास और पतरस ने बातें संयोग पर नहीं छोड़ीं, कि जब भी उनके रिश्तेदारों को सच्चाई में आना होगा वे आ जाएँगे। इसके बजाय उन दोनों ने खुद पहल की। अन्द्रियास ने खुद पतरस को यीशु से मिलवाया और कुरनेलियुस ने इंतज़ाम किया ताकि उसके रिश्तेदार पतरस की बातें सुन सकें। लेकिन अन्द्रियास और कुरनेलियुस ने अपने रिश्तेदारों पर कोई दबाव नहीं डाला, न ही उन्हें चालाकी से यीशु के चेले बनने के लिए फुसलाया। क्या आपको इससे कोई सीख मिलती है? जी हाँ, हमें भी उनकी मिसाल पर चलना चाहिए। हम अपने रिश्तेदारों को बाइबल की कुछ बातें बताते रहने की कोशिश कर सकते हैं और कुछ मौके बना सकते हैं, ताकि वे बाइबल सच्चाइयों और हमारे मसीही भाई-बहनों के संपर्क में आ सकें। लेकिन हम जानते हैं कि उन्हें चुनाव करने का अधिकार है और इसलिए हम कभी भी उन पर कोई दबाव नहीं डालना चाहते। हम अपने रिश्तेदारों की मदद कैसे कर सकते हैं, इसे समझने के लिए यूरगन और उसकी पत्नी पेट्रा की मिसाल पर गौर कीजिए, जो जर्मनी में रहते हैं।

पेट्रा ने यहोवा के साक्षियों के साथ बाइबल अध्ययन किया और कुछ समय बाद उसका बपतिस्मा हो गया। उसका पति, यूरगन फौज में एक अफसर था। पहले-पहल तो यूरगन अपने पत्नी के फैसले से खुश नहीं था। मगर कुछ समय बाद वह समझ गया कि साक्षी बाइबल की मदद से सच्चाई का प्रचार करते हैं। उसने भी यहोवा को अपनी ज़िंदगी समर्पित की और आज वह अपनी मंडली में एक प्राचीन के तौर पर सेवा कर रहा है। जो रिश्तेदार किसी और धर्म को मानते हैं, उनके दिल तक पहुँचने के लिए अब वह क्या सलाह देता है?

यूरगन कहता है: “हमें ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए और अपने रिश्तेदारों को एक-साथ ढेर सारी आध्यात्मिक बातें नहीं बता देनी चाहिए। इससे वे सच्चाई जानने से और भी ज़्यादा पीछे हट जाएँगे। बेहतर यही होगा कि हम समझ-बूझ दिखाते हुए कभी-कभी उन्हें थोड़ा-बहुत बताते रहें। उन्हें ऐसे भाइयों के संपर्क में लाना भी फायदेमंद साबित हो सकता है, जो उन्हीं की उम्र के हों और जिनकी दिलचस्पी भी उन्हीं बातों में हो, जिनमें हमारे रिश्तेदार दिलचस्पी रखते हैं। ऐसा करने से वे सच्चाई की तरफ आकर्षित हो सकते हैं।”

‘हमें ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए और अपने रिश्तेदारों को एक-साथ ढेर सारी बातें नहीं बतानी चाहिए।’—यूरगन

प्रेषित पतरस और कुरनेलियुस के रिश्तेदारों ने बाइबल के संदेश को कबूल करने में ज़रा भी वक्‍त नहीं गँवाया। वहीं दूसरी तरफ, पहली सदी में रहनेवाले दूसरे कुछ लोगों को बाइबल की सच्चाई अपनाने में ज़्यादा वक्‍त लगा।

यीशु के भाइयों के बारे में क्या?

यीशु के कई रिश्तेदारों ने उसकी सेवा के दौरान उस पर विश्वास दिखाया। उदाहरण के लिए, ऐसा लगता है कि प्रेषित याकूब और यूहन्ना यीशु के मौसेरे भाई थे और उनकी माँ, सलोमी, यीशु की मौसी थी। सलोमी शायद उन ‘दूसरी कई स्त्रियों’ में से एक थी, जो “अपनी धन-संपत्ति से यीशु और उसके चेलों की सेवा करती थीं।”—लूका 8:1-3.

लेकिन यीशु के परिवार के दूसरे सदस्यों ने इतनी जल्दी उस पर विश्वास नहीं किया। मिसाल के लिए, एक मौके पर, यीशु के बपतिस्मे के एक साल बाद, लोगों की भीड़ एक घर में जमा हो गयी ताकि वे यीशु की बातें सुन सकें। “जब यीशु के घरवालों ने इन सब बातों की चर्चा सुनी, तो वे निकले ताकि उसे पकड़कर अपने साथ ले जाएँ, क्योंकि वे कह रहे थे: ‘उसका दिमाग फिर गया है।’” इसके कुछ समय बाद, जब यीशु के सौतेले भाइयों ने उसके सफर की योजनाओं के बारे में चर्चा की, तो यीशु ने उन्हें सीधे-सीधे कुछ नहीं बताया। क्यों? क्योंकि “दरअसल, उसके भाई उस पर विश्वास नहीं दिखाते थे।”—मर. 3:21; यूह. 7:5.

यीशु अपने रिश्तेदारों के साथ जिस तरह पेश आया, उससे हम क्या सीख सकते हैं? जब कुछ लोगों ने दावा किया कि यीशु का दिमाग फिर गया है, तो उसने उनकी बात का बुरा नहीं माना। यहाँ तक कि अपनी मौत और जी उठाए जाने के बाद भी, यीशु ने अपने रिश्तेदारों को इस बात के सबूत दिए कि वही मसीहा है। कैसे? अपने सौतेले भाई याकूब को दिखायी देकर। ऐसा लगता है कि यीशु  के दोबारा दिखायी देने के बाद, न सिर्फ याकूब को बल्कि यीशु के दूसरे सौतेले भाइयों को भी इस बात का यकीन हो गया कि यीशु वाकई मसीहा है। इसलिए वे यरूशलेम के ऊपरी कमरे में प्रेषितों और दूसरे भाइयों के साथ थे और बेशक उन्हें भी पवित्र शक्‍ति मिली। कुछ समय बाद, याकूब और यहूदा ने, जो यीशु के सौतेले भाइयों में से थे, परमेश्वर की सेवा में कई बढ़िया ज़िम्मेदारियों का लुत्फ उठाया।—प्रेषि. 1:12-14; 2:1-4; 1 कुरिं. 15:7.

कुछ लोगों को ज़्यादा वक्‍त लगता है

“सब्र, सब्र और, और भी ज़्यादा सब्र दिखाने से बहुत अच्छे नतीजे निकल सकते हैं।”—रॉस्वीता

पहली सदी की तरह, आज भी कुछ रिश्तेदारों को ज़िंदगी के रास्ते पर आने के लिए काफी वक्‍त लगता है। रॉस्वीता की मिसाल पर गौर कीजिए। जब 1978 में उसके पति का यहोवा के साक्षी के तौर पर बपतिस्मा हुआ, तब वह रोमन कैथोलिक चर्च की एक जोशीली सदस्य थी। रॉस्वीता अपने धर्म को बहुत गंभीरता से लेती थी, इसलिए शुरू-शुरू में वह अपने पति का बहुत विरोध करती थी। लेकिन कई साल गुज़र जाने के बाद, उसका विरोध करना कम होता गया और उसने देखा कि साक्षी सच्चाई सिखाते हैं। सन्‌ 2003 में उसने भी बपतिस्मा ले लिया। बदलाव करने में किस बात ने उसकी मदद की? शुरू-शुरू में रॉस्वीता जिस तरह विरोध करती थी, उस पर नाराज़ होने के बजाए, उसके पति ने रॉस्वीता को सच्चाई की तरफ अपना नज़रिया बदलने के कई मौके दिए। वह क्या सलाह देती है? “सब्र, सब्र और, और भी ज़्यादा सब्र दिखाने से बहुत अच्छे नतीजे निकल सकते हैं।”

मोनीका का बपतिस्मा 1974 में हुआ और करीब 10 साल बाद उसके दोनों बेटे भी साक्षी बन गए। हालाँकि उसके पति, हान्स ने कभी उनके विश्वास का विरोध नहीं किया, लेकिन 2006 तक उसने बपतिस्मा नहीं लिया था। इस परिवार की क्या सलाह है? “यहोवा के वफादार बने रहिए और अपने विश्वास के साथ कोई समझौता मत कीजिए।” बेशक, हान्स को लगातार यह यकीन दिलाए जाने की ज़रूरत थी कि उसकी पत्नी और उसके बच्चे उससे प्यार करते हैं। और उन्होंने कभी यह उम्मीद नहीं छोड़ी कि वह एक दिन उनके विश्वास को ज़रूर अपना लेगा।

सच्चाई के पानी से तरो-ताज़ा हुए

यीशु ने एक बार सच्चाई के संदेश की तुलना ऐसे पानी से की, जो हमेशा की ज़िंदगी देता है। (यूह. 4:13,14) हम चाहते हैं कि हमारे रिश्तेदार सच्चाई का ठंडा और साफ पानी पीकर तरो-ताज़ा हो जाएँ। बेशक हम नहीं चाहेंगे कि उन्हें सारा-का-सारा पानी ज़बरदस्ती एक साथ पिला दें, जिससे उनकी साँस ही अटकने लगे। वे तरो-ताज़ा महसूस करेंगे या घुटन महसूस करेंगे, यह कुछ हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि हम अपने विश्वास के बारे में उन्हें कैसे समझाते हैं। बाइबल कहती है कि “धर्मी मन में सोचता है कि क्या उत्तर दूं” और “बुद्धिमान का मन उसके मुंह पर भी बुद्धिमानी प्रगट करता है, और उसके वचन में विद्या रहती है।” हम इस सलाह को कैसे लागू कर सकते हैं?—नीति. 15:28; 16:23.

एक पत्नी शायद अपने पति को अपने विश्वास के बारे में बताना चाहती हो। अगर वह ‘मन में सोचे कि क्या उत्तर दूँ,’ तो वह बहुत ध्यान से अपने शब्दों का चुनाव करेगी और बिना सोचे-समझे कुछ नहीं कहेगी। उसे अपने पति को यह महसूस नहीं कराना चाहिए कि वह खुद को बहुत धर्मी या बड़ा समझती है। उसकी सोच-समझकर कही गयी बातें उसके पति को तरो-ताज़ा कर सकती हैं और इससे दोनों के बीच शांति बनी रहेगी। वह देख सकती है कि कब उसका पति फुरसत में होता है और कब उससे आराम से बैठकर बात की जा सकती है? किस तरह के विषयों पर उसे बात करना या पढ़ना पसंद है? क्या उसे विज्ञान, राजनीति या खेल-कूद में दिलचस्पी है? किस तरह पत्नी उसकी भावनाओं और सच्चाई की तरफ उसके नज़रिए का लिहाज़ करते हुए बाइबल में उसकी दिलचस्पी बढ़ा सकती है? इन बातों पर सोचने से उसे मदद मिलेगी कि वह समझदारी दिखाते हुए बात करे और काम करे।

जो रिश्तेदार सच्चाई में नहीं है, उनके दिल तक पहुँचने में सिर्फ अपने विश्वास के बारे में हमेशा थोड़ा-थोड़ा बताते रहना शामिल नहीं है। जो हम कहते हैं, उसके साथ-साथ हमें अपना अच्छा चालचलन भी बनाए रखना चाहिए।

बढ़िया चालचलन

यूरगन, जिसका ज़िक्र शुरू में किया गया था, बताता है: “रोज़ाना की ज़िंदगी में बाइबल सिद्धांतों को लागू करते रहिए। भले ही रिश्तेदार आपसे इस बारे में खुलकर बात न करे, लेकिन उसके दिल में दिलचस्पी जगाने का यह एक बहुत ही असरदार तरीका है।” हान्स, जिसका बपतिस्मा अपनी पत्नी के बपतिस्मे के कुछ 30 साल बाद हुआ, इस बात से सहमत है। वह कहता है: “बढ़िया मसीही चालचलन बनाए रखना बेहद ज़रूरी है, ताकि हमारे रिश्तेदार देख सकें कि सच्चाई ने किस तरह हमारी ज़िंदगी पर अच्छा असर किया है।” हमारे रिश्तेदारों को यह नज़र आना चाहिए कि हमारा विश्वास हमें दूसरों से अलग करता है, और हममें अच्छे गुण पैदा करता है, न कि बुरे।

“बढ़िया मसीही चालचलन बनाए रखना बेहद ज़रूरी है, ताकि हमारे रिश्तेदार देख सकें कि सच्चाई ने किस तरह हमारी ज़िंदगी पर अच्छा असर किया है।”—हान्स

प्रेषित पतरस ने उन पत्नियों को बड़ी असरदार सलाह दी, जिनके पति सच्चाई में नहीं हैं: “अपने-अपने पति के अधीन रहो ताकि अगर किसी का पति परमेश्वर के वचन की आज्ञा नहीं मानता, तो वह अपनी पत्नी के पवित्र चालचलन और गहरे आदर को देखकर तुम्हारे कुछ बोले बिना ही जीत लिया जाए। और तुम्हारा सजना-सँवरना ऊपरी न हो, जैसे बाल गूंथना, सोने के गहने या बढ़िया पोशाक पहनना। इसके बजाय, तुम अपने अंदर के इंसान को सजाओ-सँवारो और इसे शांत और कोमल स्वभाव पहनाओ। यह ऐसी सजावट है  जो कभी पुरानी नहीं पड़ती और परमेश्वर की नज़रों में अनमोल है।”—1 पत. 3:1-4.

पतरस ने लिखा कि एक पति अपनी पत्नी का अच्छा चालचलन देखकर सच्चाई की तरफ आकर्षित हो सकता है। बाइबल में दिए इस निर्देशन को ध्यान में रखते हुए, क्रिस्टा नाम की एक मसीही बहन 1972 से, यानी जब से उसका बपतिस्मा हुआ है, तब से अपने चालचलन से अपने पति का दिल जीतने की कोशिश करती आयी है। हालाँकि उसका पति एक वक्‍त पर साक्षियों के साथ अध्ययन करता था, लेकिन उसने अब तक सच्चाई को नहीं अपनाया है। वह कुछ मसीही सभाओं में हाज़िर हुआ है और मंडली के भाई-बहनों के साथ भी उसका दोस्ताना रिश्ता है। भाई-बहन भी उसके चुनाव करने के अधिकार का आदर करते हैं। क्रिस्टा कैसे उसके दिल तक पहुँचने की कोशिश करती है?

वह बताती है, “मैंने ठान लिया है कि यहोवा मुझे जिस राह पर ले जाना चाहता है, मैं उसी पर चलती रहूँगी। साथ ही, मैं ‘कुछ बोले बिना ही’ अपने अच्छे व्यवहार से अपने पति को जीतने की कोशिश करती हूँ। जब बाइबल सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं हो रहा होता, तो मैं वह सब करने की कोशिश करती हूँ जो वे चाहते हैं। और बेशक, मैं उनके चुनाव करने की आज़ादी का आदर करती हूँ और मामले को यहोवा के हाथ में छोड़ देती हूँ।”

क्रिस्टा की मिसाल दिखाती है कि हालात के मुताबिक खुद को ढालना कितना ज़रूरी है। वह आध्यात्मिक कामों में जोश के साथ लगी रहती है, जिसमें मसीही सभाओं में बिना नागा हाज़िर होना और प्रचार सेवा में पूरा-पूरा हिस्सा लेना भी शामिल है। फिर भी, क्रिस्टा समझदारी दिखाती है। उसे इस बात का एहसास है कि उसके प्यार पर, उसका साथ पाने पर और उसके समय पर उसके पति को पूरा हक है। हममें से जो भी अपने अविश्वासी रिश्तेदारों को सच्चाई की तरफ आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, उनके लिए हालात के मुताबिक खुद को ढालना और समझ से काम लेना अक्लमंदी होगी। बाइबल कहती है, “हर एक बात का एक समय है।” इसमें वह समय भी शामिल है, जो हम अपने परिवार के अविश्वासी सदस्यों के साथ, खासकर अपने अविश्वासी साथी के साथ, बिताते हैं। साथ वक्‍त बिताने से अच्छी बातचीत होती है। अनुभव दिखाते हैं कि अविश्वासी सदस्य के साथ अच्छी बातचीत करने से वे अकेला महसूस नहीं करते, या उनमें जलन जैसी भावना नहीं आती, और ना ही वे यह महसूस करते हैं कि उन्हें नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।—सभो. 3:1.

कभी उम्मीद मत छोड़िए

हॉल्गर, जिसके पिता का बपतिस्मा परिवार के दूसरे सदस्यों के बपतिस्मे के 20 साल बाद हुआ, कहता है: “परिवार के उस अविश्वासी सदस्य को यह जताना बहुत ज़रूरी है कि हम उससे प्यार करते हैं और उसके लिए प्रार्थना करते हैं।” क्रिस्टा कहती है कि वह ‘कभी उम्मीद नहीं छोड़ेगी कि उसका पति एक दिन यहोवा की उपासना करना शुरू करे और सच्चाई अपनाए।’ हमें भी अपने अविश्वासी रिश्तेदारों की तरफ हमेशा सही नज़रिया बनाए रखना चाहिए और कभी उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।

हमारा लक्ष्य है कि रिश्तों पर कभी आँच न आए, हम अपने रिश्तेदारों को मौका दें कि वे सच्चाई को पहचानें और बाइबल का संदेश उनके दिल को छू जाए। और हमें सभी बातों में “कोमल स्वभाव और गहरे आदर के साथ” पेश आना चाहिए।—1 पत. 3:15.